(भूमिका )
महाकाल वन,जिसके क्षेत्र ने ब्रह्मा और विष्णु दोनों को निवसित किया है .साक्षात् महाकाल स्थित हैं यहाँ .इस क्षेत्र में सृष्टि का सृजन पालन और संहार समाहित हो गया है ..इसी धरती पर बहती है क्षिप्रा नदी ,दोनों ओर गहन घोर वन और बीच से बहती कल कल निनादिनी क्षिप्रा !समुद्र तल से बहुत ऊँचा समतल क्षेत्र .जिसकी मिट्टी काली है.जैसे माँ का काजल पुँछा ,नेहभरा आँचल .मालवा की धरती ,यह पुण्य क्षेत्र ,जहाँ से प्रत्येक युग में सृष्टि का पालन -परिचालन होता है .
काल और स्थान की परिकल्पना ,हमारी स्मृति के पहुँच से भी पहले यहीं से प्रारंभ हुई !
कितना सघन वन !सूर्य की किरणें ,जिसकी घन हरीतिमा की पर्तें पार करते-करते अपनी दमक खो कर सघन श्याम हो उठती हैं .इस उज्ज्वल श्यामलता से सारा वन प्रदेश उद्भासित हो उठता है .एक दूसरे होड लगा कर ऊँचे उठते पेड .लता जाल को अपने से लिपटाये आसमान टोहते खडे रहते हैं .)और हर-हर सर-सर करती हवायें..एक विचित्र सी सुगन्ध चतुर्दिक व्याप्त रहती है..ऋतुओं के साथ साथ वन गंध परिवर्तित होती रहती है .वसन्त में आम की बौराती और महुओं की मदमाती महक के साथ वन पुष्पों कीम मह-मह गंध .चैत में जाने कौन कौन सी अनाम अनगिन वनस्पतियाँ पुष्पित हो जाती हैं और मदहोश करती महक चारों ओर छा जाती है .पशु-पक्षी जोडे बाँधने लगते हैं ,धरती पर बिछे होते हैं ढेर के ढेर पत्ते ,पाँव रखते ही बालिश्त भर नीचे धँस जाते हैं ,जैसे धरती माँ ने अपनी सन्तानों की क्रीडा के लिये,सुख-सेज बिछा दी हो .
चिट्-चिट् करती गिलहरियां एक दूसरी के पीछे भागती हैं .तोतों के झुंड के झुंड वृक्षों पर टियू-टियू कर ऐसा शोर मचाते हैं जैसे पूरा वृक्ष कलरव कर उठा हो .वानरों की कूद-फाँद और हाथियों की पुकार भरी चिंघाड .शेर की दहाड गूँजती है वन में और एक सन्नाटा सा खिंच जाता है वन में .घनी अँधेरी रातें ,आकाश में झिलमिल करते सितारे और नीचे अलस वनस्पतियों में वन्य जीवों की साँसों के स्वर में स्वर मिला कर गहरी साँसें छोडता वन .रात्रि के अन्तिम प्रहर में गहरा सन्नाटा छा जाता है,सितारे ऊँघने लगते हैंऔर साँसों का संगीत भी थम जाता है,तब काल पुरुष, भी गहरी नींद सो जाता है- कुछ क्षणों के लिये .
उत्तर में है विन्ध्याटवी .यहाँ से वहाँ तक वन्य पशुओं का मुक्त आवागमन अबाध रूप से चलता है .सरपत और झाऊ के घने वन ,घासें इतनी ऊँची कि हाथी भी चलता हुआ दिखाई न दे ..बहुत ऊँचा है विन्ध्याचल .उत्तर और दक्षिण के बीच में एक ऊँची दीवीर ,कोई पार नहीं कर पाता .विंध्याटवी की कुछ भूमियाँ असूर्यंपश्या हैं .सूरज की किरणों ने भी नहीं देखा है -ऐसी कुँआरी धरती .
महुये टपाटप टपकते हैं और नशीली हवायें इस महाकाल वन में अपनी मादक गंध लिये घुस आती हैं.लगता है विन्ध्यवासिनी महाकाल का आवाहन कर रही है'आओ,आओ.चले आओ .अपनी समाधि भंग कर दो .'काल चंचल हो उठता है .कोई अट्टहास गूँजता है और वनप्रान्त चौंक जाठता है .
बारहों मास वृक्ष फलों या फूलों से लदे रहते हैं.,कभी आम तो कभी आमलक ,कैथ .बेर ,करंज काफल ,फलों की कोई गिनती है यहाँ ?कदली वन ऊँचे विशाल जात हिलाता,हरहराता डोलता अपनी महक उँडेल देता है.कौन खायेगा इतने फल ?पक्षी खाते है गिराते हैं .वानर कूद-फाँद मचाते खों-खों करते क्ीडा करते हैं .महाकाल और मुक्त प्रकृति दोनों मिल कर इस संसृति का संचालन करते हैं .
. बरसात की रातों का बीहड अँधकार धरती पर घनी वनस्पतियाँ ,आकाश में सजल मेघजाल ,और सबको घेरता सघन वन का अँधेरा .वृक्षों के पत्तों पर अविराम वर्षा की झडी ,धरती पंकिल हो गई है ,रह रह कर मेघों की गर्जना .कौंधती बिजलियों की चमक से पूरा वन क्षणांश को प्रकाशित हो उठता है .साँप-रेंग रेंग कर वृक्षों पर चढने को प्रयत्नशील,कहीं वृक्षों से लिपटे .सीत्कार करती उन्मुक्त हवा हरहराती चलती है ,लतायें वृक्षों से विच्छिन्न हो धरती पर गिरती हैं तरुओं को को झकझोरती हवा4एं सारे अरण्य-प्रान्त को दहला देती हैं .लगता है साक्षात् महाकाल ताण्डव करने लगे हैं .
**
स्वच्छ निरभ्र आकाश !पूर्ण चन्द्र अपनी पूरी द्युति से चमक रहा है .उज्ज्वल किरणें चारों ओर बिखरी पडी हैं ..कहीं कोई हलचल नहीं .उन्चासों पवन जैसे शान्त दिशाओं के आँचल में दुबके सो रहे हों .जल स्तब्ध लहरें लेना भूल गया हो जैसे .गति हीन पवन ,मेघहीन आकाश ,सितारे भी टिमटिमाना भूल गये हैं. एकदम स्तब्ध सौंदर्य.,ऊँचे-ऊँचे वृक्ष चित्रवत् खडे हैं,धरती से आकाश को मिलाते इस चाँदनी के ज्वार में डूबे .
अकेले बैठे बैठे सीता की आँखें भर आती हैं .अनसोई ,लंबी रातों की तडपन ,वह एकाकीपन जिसे बाँटनेवाला कोई नहीं.
जीवन के प्रारंभिक क्षणों में ही जननी के स्नेह से वंचित कर शायद नियति ने यह पूर्वाभास दे दिया कि जीवन में तुम्हें कुछ नहीं मिलना है .जो नव शिशु का सहज अधिकार होता है,जीवन की अनिवार्य शर्त होती है ,वह सब मेरे लिये नकार दिया गया था .प्रारंभ से पटाक्षेप तक उसी वंचना के बीच भटकना है राम तुम्हारी विश्वास ,बहुत वल देता था ,तुमने मेरे अतिरिक्त किसी नारी को स्वीकार न करने का जो वचन भरा था .उसके लिये मैं आभारी हूं तुम्हारी .नहीं ,चिर ऋणी हूँ तुम्हारी ..तुम राजा हो .सत्कुलोत्पन्न,सत् के प्रतिष्ठापक और मर्यादाओं के रक्षक कहलाते हो .
और मैं अज्ञात् कुलोत्पन्न ,जिसे दूसरों के द्वारा पाला गया ,मेरी क्या मर्यादा है ,चिर -कलंकिता हूँ मैं .बचपन से मैं सोचा करती थी ,मेरे माता-पिता कैसे होंगे जो जन्म लेते ही त्याग दियामुझे ?कौन हूँ मैं ?क्या अपराध था मेरा ?
अब तो जिस मनस्थिति में मैं जी रही हूं उसमें सच भी सपना लगने लगा है .
मैं कभी सामान्य नहीं रह सकी .दुनियाँ में सब जैसा स्वाभाविक जीवन जीते हैं ,मेरे हिस्से में वह बिल्कुल नहीं आया .मन पर यह बोझ लिये सारा जीवन बीतेगा .जानकी हूँ मैं .राजा जनक की कन्या ,कन्या नहीं पालिता कन्या !
जन साधारण का मुँह कौन बन्द कर सकता है?वह नीच धोबीपर किसी को नीच कने का मुझे क्या अधिकार .मैं रावण -मन्दोदरी की पुत्री राक्षसी हुई मैं भी .देव योनि में नहीं हूँ मैं .
पर इन्द्र की पत्नी शची भी पुलोमा दैत्य का पुत्री है ,कितनी असुर दैत्य और दनुजों की कन्यायें देवों के कुल में ब्याही हैं .
इतना पूर्ण चंद्रमा ,दूर तक फैला गहन नील आकाश .इतनी पूर्ण ,इतनी विचित्र रात्रि आज तक कभी देखने में नहीं आई .-क्या होनेवाला है?कैसा षड्यंत्र चल रहा है यह/
सीता का मन जाने कसा कैसा हो रहा है .प्रकृति शान्त ,वनस्पतियाँ शान्त,धरित्री शान्त ,आकास शान्त सारी दिशायें स्तब्ध ,मूक .पर मेरे मन में शान्ति क्यों नहीं ?
आँधियाँ और तूफान इस वन प्रदेश में आते ही रहते हैं .सीता उनसे नहीं घबराती .घनघोर गर्जन प्रचण्ड हवायें जब पेडों को उखाडती ,अंधाधुन्ध दौडती चली आती हैं ,तब सीता निर्भय कुटिया का द्वार खोल कर है. खडी हो जाती है .मन उन्मत्त आनन्द से भर उठता है .जैसा तूफान मन में समाया है ,वैसा ही बाहर भी .दोनों में ताल-मेल बैठाने की चेष्टा करती रहती है वह .इतने लम्बे वनवास में प्रकृति की ये क्रीडायें बहुत देखी हैं.अब इनमें ऐसा कुछ नहीं जो भयभीत करे .
पर आज की रात्रि!यह पूर्ण और विलक्षण शान्ति मन को विचलित किये दे रही है.ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ .
जीवन में क्या कुछ नहीं घटा ? जन्म की सुनी भर हैं ,पर वह सुनना ,समझना मन को गहन रिक्तता से भर जाता था .,फिर वनवास ,अपहरण ,कलंक ,परित्याग और अब यह चिर एकाकी जीवन .अब क्या शेष रह गया .?कौन सी विडंबना बाकी रह गई ?
राम ,मुझमें क्या कमी रह गई थी ,,अपना मन और तन तुम्हें सौंप दिया था मैंने ,मेरा प्रेम ,विश्वास सब व्यर्थ कर दिया तुमने .
सीता चुप बैठी है ,रात का गहरा अँधेरा .आँखों से आँसू टप टप गिरते हैं और धरती की माटी सोख लेती है .....
(उपन्यासांश)क्रमशः
सोमवार, 13 सितंबर 2010
सोमवार, 30 अगस्त 2010
स्वीकारोक्ति
*
ट्रेन का सफ़र कभी-कभी बड़ी यादगार बन जाता है . मुझे बहुत यात्राएं करनी पड़ी हैं और अधिकतर अकेले ही .पति अधिकतर टूर पर और फिर उन्हें इतनी छुट्टी भी कहाँ .
उस दिन भी विषय-विशेषज्ञ बन कर एक मीटिंग में जा रही थी.
पहले ही पता कर लिया था जिस कूपे में मेरा रिज़र्वेशन है उसमें एक महिला और हैं .मुझे सी ऑफ़ कर ये चले गए .
वे महिला समवयस्का निकलीं
चलो ,अच्छी कट जाएगी !
बातें शुरू -
'आप कहां जा रही हैं .'
'इंदौर ,और आप?'
'हमें तो उज्जैन तक जाना है ,आप भी अकेली हैं '
'म ?हां अकेली ही ,अक्सर जाना-आना पड़ा है ,आदत-सी हो गई है .'.
'हमारी भाभी बीमार हैं सो अचानक चल दिए आप तो इन्दौर रहती हैं शायद.
'नहीं अहिल्याबाई वि.वि में एक मीटिंग है ,बस अगले दिन लौटना है .'
'हाँ हम भी दो दिन की सी.एल ले के '.
पता लगा मेरठ में पढ़ाती हैं ,और खूब घुल-मिल कर बातें होने लगीं .
कहां -कहां के सूत्र निकल आए .
मज़ेदार बात यह कि दोनों ने एक ही कॉलेज से बी.एड. किया ,बस भावना जी एक साल पहले कर चुकी थीं,उस कॉलेज को खुलने का पहला साल ,तब वह पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था .
हम अगले साल वहीं दाखिल हुए .
वार्डन -लेक्चरर प्रीफ़ेक्ट सबकी बातें.मिट्ठू,जो ऊपर के काम कर देता था -दोनों होस्टलों में उसकी पूँछ थी.
'मिट्ठू ?'
'हाँ -हाँ ,था तो .पर ब्वाएज़ हॉस्टल में ज़्यादा रहता था .हमारे यहां तो कभी वार्डन के पास या किसी काम से नोटिस वगैरा ले कर आता था . '
' आपके सामने ब्वायजट हॉस्टल कहाँ था ?'
'उधर चौबीस खंभा रोड पर जो धरमशालावाली बिल्डिंग है वही किराए पर चल रही थी ,सुनने में आ रहा था कि अगले साल होस्टल शिफ्ट हो जाएगा ..''
'हूँ .'
'ये मिट्ठू दोनों होस्टलों में काम करता था न,और एक मज़ेदार बात ,हम मिट्ठू के लिए टियू-टियू शब्द स्तेमाल करते थे और खूब हँसते थे .पर .उसके सामने नहीं .'
'हाँ ,वो तो शुरू से ही दोनों होस्टलों के काम देखता था ,पास में हैं न .हमारे वार्डन ने भी कह रखा ता ,झाड़ू वगैरा लगा कर उधर चले जाया करो .उन दिनों खाना तो इकट्ठा वहीं बनता था .'
'और वह सामने की दूधवाली दूध में वात्सल्य रसकी मात्रा बहुत कर देती थी .'
'हम लोगों ने तो अपना अलग इंतज़ाम कर लिया था .'
रूम मेट कैसे हमारा घी चाट कर स्वास्थ्य बनाती थी,
और फिर मिट्ठू !
'वही तो ...'
'क्या वही तो ?'
'कुछ नहीं यों ही '.
'सब टेम्परेरी इंतज़ाम थे तब.कोई ऐसा कमरा भी नहीं जहाँ यूनियन की मीटिंग कर लें .'
' वो तो हमारे सामने तक था .कैबिनेट की मीटिंग किसी के रूम में कर लेते थे और जनरल के लिए हॉल ,बस.'
'अब तो बढ़िया होस्टल बन गया है .आप नहीं गईं कभी फिर ?'
'नहीं जा नहीं पाए .मन तो करता था पर बात कुछ ऐसी हो गई थी कि जाने की हिम्मत नहीं पड़ी .'
'ऐसा क्या हो गया ?''
वे चुप हैं
'आप मुस्करा रही हैं .'
'हाँ ,एक बात मन में है .अब तक किसी से कहते नहीं बनी .पर अब उम्र के चौथे पहर में इच्छा होती है कि सब-कुछ .कह-सुन कर हल्की हो लूं . '
'हम दोनों तो बराबरी की हैं एक दूसरे को समझने में मुश्किल नहीं होगी.'
'हां,हां इसीलिए तो .आप भी तो वहीं पढ़ चुकी है ?'
*
थोड़ी भूमिका बाँधने के बाद बताने लगीं - छात्र चुनाव में एक काफ़ी बड़ा-सा गंभीर सा लगनेवाला लड़का सेक्रेटरा बना .काफ़ी रिज़ोर्सफुल था .
उसने अपनी कैबिनेट में हमें भी ले लिया .कई क्षेत्रों में सक्रिय रहे थे न हम .
मैंने अपने होस्टल की दो लड़कियों और एक लड़के को ,जिसे मेरी रूम-मेट जानती थीं बोलीं बहुत साहित्यिक रुचि का संस्कारी लड़का है - ले लिया .
'मैं चाहती थी मीटिंग्ज़ में अनुराग जाए ,मुझे न जाना पड़े.'
'क्यों , जब इन्चार्ज आप थीं .'
'हाँ ,थी .पर ..असल में जो सेक्रेटरी था वह मिट्ठू के हाथ मुझे पर्चियाँ भेजा करता था ,अकेले में मुझे देने के लिए .'
'फिर?'
उत्तर वह माँगता था . मैंने कभी दिया नहीं ,
'हाँ तो वो लड़का क्या नाम था उसका ?
'अब असली नाम बता कर क्या होगा समझ लो- आलोक.'
'और पर्ची में संबोधन क्या ?'
'इस सबसे क्या .बात तो कुछ और है जो बतानी है ..'
'नहीं ,यह तो बताना ही पड़ेगा नहीं तो इमेज कैसे बनेगी ?'
'संबोधन कुछ खास नहीं डियर फ़्रेंड ,या माई चम और अपने को क्वेशचन मार्क ,या ऐसे ही कुछ .'
'क्या लिखता था?'
'छोटी-छोटी बातें -तुम ध्यान में रहती हो वगैरा '.
'और क्या लिखा होता था .'
'बस साधारण सी बातें -कि तुम मुझे अच्छी लगती हो .कभी कोई परेशानी हो तो बताना .'
'बस यही ?'
'हां. कभी-कभी यह भी कि क्लास के बाद ऑफ़िस की तरफ़ आ जाना ,कुछ छात्रसंघ के बारे में सलाह करनी है .'
'तुम लिखता था ?'
'अरे ,अंग्रेज़ी में -क्या आप और क्या तुम !'
'सही कहा , जो हिन्दी में कहना शोभनीय नहीं लगता अंग्रेजी मे अच्छी तरह चल जाता हैं , कभी वे तीन शब्द लिखे थे उसने?'
'अच्छा !अब आप मज़ा ले रही हैं?नहीं ऐसा कभी कुछ नहीं ?'
'हां तो और क्या ?'
'यही कि सुबह-सुबह तुम्हें देख लेता हूं तो दिन अच्छा बीतता है .'
'सुबह-सुबह कैसे ?'
'सब लोग इकट्ठे प्रेयर करते थे सात बजे लड़कों के होस्टल में -फिर नाश्ता और फिर क्लासेज़ शुरू .'
'नाश्ते में क्या ?'
'ज़्यादातर पोहे ,चाय कभी-कभी और कुछ भी ,जलेबी वगैरा .. '
'वाह उज्जैन के पोहे !पानी आ गया मुँह में !'
' देवास गेट पर हम हमेशा खाते हैं .ऊपर से सेव डाल कर देता है .'
और आप क्या क्या जवाब देती थीं ?
मिट्ठू हमेशा जवाब माँगता पर हम क्या लिखें और क्यों लिखे ?
कह देती मैं खुद बात कर लूँगी , और उसके जाते ही पर्ची फाड़ कर फेंक देती .'
'आप जाती थीं ?'
हाँ ,जिन दो को साथिनों को मैनें अपनी समिति में लिया था उन्हे भी बुला लेती ,कि अच्छी सलाह हो जाए ,एक तो साथ में होती ही थी .उसने एकाध बार कहा भी क्या मुझसे डरती हैं ,कुछ बातें सबसे कहने की नहीं होती और ये लड़कियाँ ऐसी हैं ख़ुद मुझे रोक लेती हैं और सबसे कहती फिरती हैं कि मैं उन्हें बुलाता हूँ .मैंने आपके सिवा किसी को नहीं बुलाया ..'
*
मैं चुपचाप रुचिपूर्वक सुन रही हूँ .
अचानक वे पूछ बैठीं ' अगर आपसे कोई पूछे -तुम तो खाई -खेली हो तो कैसा लगेगा ?' .
'एक चाँटा लगा दूँगी ' .
'आज नहीं ,तब जब होस्टल में रह कर बी.एड. कर रहीं थी .तब क्या कहतीं ?'
'अब इतना तो नहीं बता सकती ,आजकल की लड़कियों में समझदारी हमलोगों से ज़्यादा विकसित है .हम लोग ये सब काफ़ी बातें देर में समझा करते थे. अब अब ये टी.वी. वगैरा ..'
हाँ वही तो ! और जब इसका मतलब मुझे पता चला तभी से . मन पर एक बोझ सा आ गया .'
'पर क्यों ?'
वे बताने लगीं -
अक्सर ही बुलावा आ जाता था आलोक की ओर से -कल्चरल सोसायटी की इन्चार्ज जो बना दिया था मुझे
कभी पत्रिका कैसी हो इसके बारे में डिस्कशन ,कभी क्या प्रगति ,चल रही है ,मीटिंगे हो रही है .शुरू-शुरू में बड़ उत्साह से पहुँच जाती रही फिर जब रंग-ढंग समझ में आने लगे ,तो वह बचने की कोशिश कर जाती .एक अजीब -सी खिसियाहट घेर लेती .फिर भी जाना तो अक्सर ही पड़ता था.
एक बार खबर आई ,मीटिंग कामना लॉज के रूम नं. 7 में है .वहाँ जल-पान का बढ़िया डौल बन जाता है.अनुराग पिछले दो दिनों से गैरहाज़िर था और मीरा -निर्मला दोनों एक साथ किसी रिश्तेदारी में पार्टी खाने .
मैं पहुँच गई टाइम से ,समय से पहुँचना आदत में शुमार है .
पहुँची तो वहाँ कोई नहीं बस आलोक कुर्सी पर जमा बैठा है.
जाते ही कहने लगा ,देख लिया ?ये हाल हैं यहाँ के ,किसी को काम की चिन्ता नहीं .सब मौज कर रहे हैं .एक मैं ही हूँ जो मरा जा रहा हूँ'जैसे मेरा अपना इन्टरेस्ट हो !
,'क्या कोई नहीं आया ?'!
'आते ?अरे ,नोटिस पर साइन ही नहीं किये .भगा दिया होगा मिट्ठू को.'
'तो फिर तो कोई आयेगा भी नहीं ...मैं बेकार ..'
'वाह बेकार क्यों ?तुम्हीं तो एक समझती हो मुझे .तुम भी नहीं आतीं तो मैं तो बिल्कुल अकेला रह जाता ..मैंने तो नाश्ते का बढ़िया दे रखा है ।'
'मुझे नहीं करना ,कर के आई हूँ .'
अरे बैठो ,बैठो ..अब मिले हैं तो कुछ बातें करही लें',उसने आगे जोड़ा ,तुमने भी तो कुछ सोचा होगा मेगज़ीन के लिये .'
वह कुर्सी से उठा और सोफ़े पर लेट- सा गया ,'क्या बताऊं कल ,बिल्कुल सो नहीं पाया..'
'क्यों क्या कुछ परेशानी है ?'
इधर बैठो न आराम से ..'
'नहीं ,ठीक हूँ यहीं .'
'हाँ तो ,क्या-क्या कर लिया है ?'
उसकी की आँखें उसे अपने चेहरे पर चुभती लग रही थीं .लंबा-चौड़ा था ही जब सामने बैठ कर अपनी नज़रें पर गड़ा देता - लगता भीतर तक पढ़ लेना चाहता है, बड़ी उलझन होने लगती थी.
खिड़की से बाहर देखते मैंने कहा,
'मीरा और निर्मला की रचनाएं ले ली हैं , कई लोग देने वाले हैं और अनुराग जी की कवितायें
भी, सुन्दर लिखते हैं .'
एकदम बोला
'कब से जानती हैं आनुराग को ?''
'बस यहीं आकर .पहले एकाध कविता पढ़ी थी कहीं ..'
और वह अनुराग को बिलकुल पसंद नहीं करता , एकदम मुझे याद आया..अनुराग भी उसकी मीटिंग में आना अक्सर टाल जाता है .
उस दिन की घटना याद आते ही अपने लिए धिक्कार उठने लगती है . कैसी बेवकूफ़ी ,उफ़
रोम खड़े हो जाते हैं .. '
मैं बैठी सुन रही हूँ -विस्मित सी .
उसने मुझसे पूछा था ,'तुम तो खाई खेली हो ?'
मैंने बैठने की पोज़ीशन बदली थी .
वे कहे जा रहीं थीं -
'हाँ .बिलकुल .'मैं नेउत्तर दिया था .'
उसकी कौतुक भरी दृष्टि मुझ पर टिकी थी ,
'अच्छा !'
'और क्या !घर में छोटी थी ,छूट मिलती रही ,बचपन से खूब खाती-खेलती रही '.
'वाह !'
मैं उसे देख कर हँस दी .
वह चुप हो गया .फिर अचानक बोला
'अच्छा, अब तुम जाओ.'
मैं चौंक गई .उसका विचित्र व्यवहार समझ में नहीं आया कैसे बोल रहा है यह .
मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था.
'तुम फ़ौरन यहां से चली जाओ.'
मैं हकबकाई सी उठी अपना पर्स उठाया और एकदम चल दी .अपने कमरे पर आकर ही दम लिया .
रूम-मेट लेटी हुई थी पूछने लगी .'क्या हुआ ?'
'कुछ नहीं ,बस अच्छा नहीं लग रहा है .'
'घर की याद ?'
'पता नहीं क्यों आँखों में आँसू भर आए .ऐसा व्यवहार किसी ने मेरे साथ नहीं किया था .
मैं भी लेट गई चुपचाप .किसी से कुछ कहने को था ही क्या ?'
तब तो कुछ खास नहीं लगा .एक्ज़ाम हो गए सब तितर-बितर हो गए .
बाद में जब खाई-खेली का असली मतलब पता लगा तो मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया .'
मैं क्या बोलती !बैठी रही आगे का सुनने के चाव में
'जब भी वह घटना ध्यान में आती मन ग्लानि से भर जाता ..पता नहीं क्या सोचता होगा मेरे लिए ,पता नहीं और लोगों से उसने क्या-क्या कहा होगा .
बाद में जितने दिन होस्टल में रही लोग कैसी निगाहों से देखते होंगे मुझे ,और मैं बेखबर .लोगों को लगता होगा इसकी आँखों में शरम है ही नहीं .
इसीलिये बाद में कभी किसी से मिली नहीं .और फिर तो सब इधर-उधर हो जाते हैं .सबको भूल जाना चाहती थी मैं. '
'और फिर कोई चिट नहीं भेजी ?'
'एक्ज़ाम पास आ रहे थे ,सब बिज़ी हो गए थे .
मेरी उस स्वीकारोक्ति के बाद .उसने कभी मिट्ठू के हाथ कोई चिट नहीं भेजी और कभी जब मौका पड़ा भी बड़ी सभ्यता से बात करता था .
शादी के बाद भी सर्विस करती रही मैं
पर सेमिनार ,आदि के अवसर पर यही डर रहता था कि कहीं वह सामने न पड़ जाय !
बहुत डर-डर कर रही हूँ .
मैंने आज तक किसी से नहीं कहा आज अपना मन हल्का कर रही हूं ,पर अब मन पर से वह बोझ उतर चुका है ,इसीलिए कह पाई हूँ .'
'और कहीं वह मिल गया तो ?'
वह हँसीं -निश्छल हँसी .
'पता नहीं कैसी स्थिति हो !पर अब घबराहट नहीं लगती .
उम्र के इस प्रहर में अपनी बेवकूफ़ी पर तरस आता है .
अब वह सामने आ गया तो उससे भी हँसकर बोल लूँगी .'
'पूछ लीजिएगा उसने क्या समझा था . '
वे सिर्फ़ मुस्करा दीं .
उज्जैन आ गया था ,उन्हें यहीं तो उतरना था .
***
ट्रेन का सफ़र कभी-कभी बड़ी यादगार बन जाता है . मुझे बहुत यात्राएं करनी पड़ी हैं और अधिकतर अकेले ही .पति अधिकतर टूर पर और फिर उन्हें इतनी छुट्टी भी कहाँ .
उस दिन भी विषय-विशेषज्ञ बन कर एक मीटिंग में जा रही थी.
पहले ही पता कर लिया था जिस कूपे में मेरा रिज़र्वेशन है उसमें एक महिला और हैं .मुझे सी ऑफ़ कर ये चले गए .
वे महिला समवयस्का निकलीं
चलो ,अच्छी कट जाएगी !
बातें शुरू -
'आप कहां जा रही हैं .'
'इंदौर ,और आप?'
'हमें तो उज्जैन तक जाना है ,आप भी अकेली हैं '
'म ?हां अकेली ही ,अक्सर जाना-आना पड़ा है ,आदत-सी हो गई है .'.
'हमारी भाभी बीमार हैं सो अचानक चल दिए आप तो इन्दौर रहती हैं शायद.
'नहीं अहिल्याबाई वि.वि में एक मीटिंग है ,बस अगले दिन लौटना है .'
'हाँ हम भी दो दिन की सी.एल ले के '.
पता लगा मेरठ में पढ़ाती हैं ,और खूब घुल-मिल कर बातें होने लगीं .
कहां -कहां के सूत्र निकल आए .
मज़ेदार बात यह कि दोनों ने एक ही कॉलेज से बी.एड. किया ,बस भावना जी एक साल पहले कर चुकी थीं,उस कॉलेज को खुलने का पहला साल ,तब वह पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था .
हम अगले साल वहीं दाखिल हुए .
वार्डन -लेक्चरर प्रीफ़ेक्ट सबकी बातें.मिट्ठू,जो ऊपर के काम कर देता था -दोनों होस्टलों में उसकी पूँछ थी.
'मिट्ठू ?'
'हाँ -हाँ ,था तो .पर ब्वाएज़ हॉस्टल में ज़्यादा रहता था .हमारे यहां तो कभी वार्डन के पास या किसी काम से नोटिस वगैरा ले कर आता था . '
' आपके सामने ब्वायजट हॉस्टल कहाँ था ?'
'उधर चौबीस खंभा रोड पर जो धरमशालावाली बिल्डिंग है वही किराए पर चल रही थी ,सुनने में आ रहा था कि अगले साल होस्टल शिफ्ट हो जाएगा ..''
'हूँ .'
'ये मिट्ठू दोनों होस्टलों में काम करता था न,और एक मज़ेदार बात ,हम मिट्ठू के लिए टियू-टियू शब्द स्तेमाल करते थे और खूब हँसते थे .पर .उसके सामने नहीं .'
'हाँ ,वो तो शुरू से ही दोनों होस्टलों के काम देखता था ,पास में हैं न .हमारे वार्डन ने भी कह रखा ता ,झाड़ू वगैरा लगा कर उधर चले जाया करो .उन दिनों खाना तो इकट्ठा वहीं बनता था .'
'और वह सामने की दूधवाली दूध में वात्सल्य रसकी मात्रा बहुत कर देती थी .'
'हम लोगों ने तो अपना अलग इंतज़ाम कर लिया था .'
रूम मेट कैसे हमारा घी चाट कर स्वास्थ्य बनाती थी,
और फिर मिट्ठू !
'वही तो ...'
'क्या वही तो ?'
'कुछ नहीं यों ही '.
'सब टेम्परेरी इंतज़ाम थे तब.कोई ऐसा कमरा भी नहीं जहाँ यूनियन की मीटिंग कर लें .'
' वो तो हमारे सामने तक था .कैबिनेट की मीटिंग किसी के रूम में कर लेते थे और जनरल के लिए हॉल ,बस.'
'अब तो बढ़िया होस्टल बन गया है .आप नहीं गईं कभी फिर ?'
'नहीं जा नहीं पाए .मन तो करता था पर बात कुछ ऐसी हो गई थी कि जाने की हिम्मत नहीं पड़ी .'
'ऐसा क्या हो गया ?''
वे चुप हैं
'आप मुस्करा रही हैं .'
'हाँ ,एक बात मन में है .अब तक किसी से कहते नहीं बनी .पर अब उम्र के चौथे पहर में इच्छा होती है कि सब-कुछ .कह-सुन कर हल्की हो लूं . '
'हम दोनों तो बराबरी की हैं एक दूसरे को समझने में मुश्किल नहीं होगी.'
'हां,हां इसीलिए तो .आप भी तो वहीं पढ़ चुकी है ?'
*
थोड़ी भूमिका बाँधने के बाद बताने लगीं - छात्र चुनाव में एक काफ़ी बड़ा-सा गंभीर सा लगनेवाला लड़का सेक्रेटरा बना .काफ़ी रिज़ोर्सफुल था .
उसने अपनी कैबिनेट में हमें भी ले लिया .कई क्षेत्रों में सक्रिय रहे थे न हम .
मैंने अपने होस्टल की दो लड़कियों और एक लड़के को ,जिसे मेरी रूम-मेट जानती थीं बोलीं बहुत साहित्यिक रुचि का संस्कारी लड़का है - ले लिया .
'मैं चाहती थी मीटिंग्ज़ में अनुराग जाए ,मुझे न जाना पड़े.'
'क्यों , जब इन्चार्ज आप थीं .'
'हाँ ,थी .पर ..असल में जो सेक्रेटरी था वह मिट्ठू के हाथ मुझे पर्चियाँ भेजा करता था ,अकेले में मुझे देने के लिए .'
'फिर?'
उत्तर वह माँगता था . मैंने कभी दिया नहीं ,
'हाँ तो वो लड़का क्या नाम था उसका ?
'अब असली नाम बता कर क्या होगा समझ लो- आलोक.'
'और पर्ची में संबोधन क्या ?'
'इस सबसे क्या .बात तो कुछ और है जो बतानी है ..'
'नहीं ,यह तो बताना ही पड़ेगा नहीं तो इमेज कैसे बनेगी ?'
'संबोधन कुछ खास नहीं डियर फ़्रेंड ,या माई चम और अपने को क्वेशचन मार्क ,या ऐसे ही कुछ .'
'क्या लिखता था?'
'छोटी-छोटी बातें -तुम ध्यान में रहती हो वगैरा '.
'और क्या लिखा होता था .'
'बस साधारण सी बातें -कि तुम मुझे अच्छी लगती हो .कभी कोई परेशानी हो तो बताना .'
'बस यही ?'
'हां. कभी-कभी यह भी कि क्लास के बाद ऑफ़िस की तरफ़ आ जाना ,कुछ छात्रसंघ के बारे में सलाह करनी है .'
'तुम लिखता था ?'
'अरे ,अंग्रेज़ी में -क्या आप और क्या तुम !'
'सही कहा , जो हिन्दी में कहना शोभनीय नहीं लगता अंग्रेजी मे अच्छी तरह चल जाता हैं , कभी वे तीन शब्द लिखे थे उसने?'
'अच्छा !अब आप मज़ा ले रही हैं?नहीं ऐसा कभी कुछ नहीं ?'
'हां तो और क्या ?'
'यही कि सुबह-सुबह तुम्हें देख लेता हूं तो दिन अच्छा बीतता है .'
'सुबह-सुबह कैसे ?'
'सब लोग इकट्ठे प्रेयर करते थे सात बजे लड़कों के होस्टल में -फिर नाश्ता और फिर क्लासेज़ शुरू .'
'नाश्ते में क्या ?'
'ज़्यादातर पोहे ,चाय कभी-कभी और कुछ भी ,जलेबी वगैरा .. '
'वाह उज्जैन के पोहे !पानी आ गया मुँह में !'
' देवास गेट पर हम हमेशा खाते हैं .ऊपर से सेव डाल कर देता है .'
और आप क्या क्या जवाब देती थीं ?
मिट्ठू हमेशा जवाब माँगता पर हम क्या लिखें और क्यों लिखे ?
कह देती मैं खुद बात कर लूँगी , और उसके जाते ही पर्ची फाड़ कर फेंक देती .'
'आप जाती थीं ?'
हाँ ,जिन दो को साथिनों को मैनें अपनी समिति में लिया था उन्हे भी बुला लेती ,कि अच्छी सलाह हो जाए ,एक तो साथ में होती ही थी .उसने एकाध बार कहा भी क्या मुझसे डरती हैं ,कुछ बातें सबसे कहने की नहीं होती और ये लड़कियाँ ऐसी हैं ख़ुद मुझे रोक लेती हैं और सबसे कहती फिरती हैं कि मैं उन्हें बुलाता हूँ .मैंने आपके सिवा किसी को नहीं बुलाया ..'
*
मैं चुपचाप रुचिपूर्वक सुन रही हूँ .
अचानक वे पूछ बैठीं ' अगर आपसे कोई पूछे -तुम तो खाई -खेली हो तो कैसा लगेगा ?' .
'एक चाँटा लगा दूँगी ' .
'आज नहीं ,तब जब होस्टल में रह कर बी.एड. कर रहीं थी .तब क्या कहतीं ?'
'अब इतना तो नहीं बता सकती ,आजकल की लड़कियों में समझदारी हमलोगों से ज़्यादा विकसित है .हम लोग ये सब काफ़ी बातें देर में समझा करते थे. अब अब ये टी.वी. वगैरा ..'
हाँ वही तो ! और जब इसका मतलब मुझे पता चला तभी से . मन पर एक बोझ सा आ गया .'
'पर क्यों ?'
वे बताने लगीं -
अक्सर ही बुलावा आ जाता था आलोक की ओर से -कल्चरल सोसायटी की इन्चार्ज जो बना दिया था मुझे
कभी पत्रिका कैसी हो इसके बारे में डिस्कशन ,कभी क्या प्रगति ,चल रही है ,मीटिंगे हो रही है .शुरू-शुरू में बड़ उत्साह से पहुँच जाती रही फिर जब रंग-ढंग समझ में आने लगे ,तो वह बचने की कोशिश कर जाती .एक अजीब -सी खिसियाहट घेर लेती .फिर भी जाना तो अक्सर ही पड़ता था.
एक बार खबर आई ,मीटिंग कामना लॉज के रूम नं. 7 में है .वहाँ जल-पान का बढ़िया डौल बन जाता है.अनुराग पिछले दो दिनों से गैरहाज़िर था और मीरा -निर्मला दोनों एक साथ किसी रिश्तेदारी में पार्टी खाने .
मैं पहुँच गई टाइम से ,समय से पहुँचना आदत में शुमार है .
पहुँची तो वहाँ कोई नहीं बस आलोक कुर्सी पर जमा बैठा है.
जाते ही कहने लगा ,देख लिया ?ये हाल हैं यहाँ के ,किसी को काम की चिन्ता नहीं .सब मौज कर रहे हैं .एक मैं ही हूँ जो मरा जा रहा हूँ'जैसे मेरा अपना इन्टरेस्ट हो !
,'क्या कोई नहीं आया ?'!
'आते ?अरे ,नोटिस पर साइन ही नहीं किये .भगा दिया होगा मिट्ठू को.'
'तो फिर तो कोई आयेगा भी नहीं ...मैं बेकार ..'
'वाह बेकार क्यों ?तुम्हीं तो एक समझती हो मुझे .तुम भी नहीं आतीं तो मैं तो बिल्कुल अकेला रह जाता ..मैंने तो नाश्ते का बढ़िया दे रखा है ।'
'मुझे नहीं करना ,कर के आई हूँ .'
अरे बैठो ,बैठो ..अब मिले हैं तो कुछ बातें करही लें',उसने आगे जोड़ा ,तुमने भी तो कुछ सोचा होगा मेगज़ीन के लिये .'
वह कुर्सी से उठा और सोफ़े पर लेट- सा गया ,'क्या बताऊं कल ,बिल्कुल सो नहीं पाया..'
'क्यों क्या कुछ परेशानी है ?'
इधर बैठो न आराम से ..'
'नहीं ,ठीक हूँ यहीं .'
'हाँ तो ,क्या-क्या कर लिया है ?'
उसकी की आँखें उसे अपने चेहरे पर चुभती लग रही थीं .लंबा-चौड़ा था ही जब सामने बैठ कर अपनी नज़रें पर गड़ा देता - लगता भीतर तक पढ़ लेना चाहता है, बड़ी उलझन होने लगती थी.
खिड़की से बाहर देखते मैंने कहा,
'मीरा और निर्मला की रचनाएं ले ली हैं , कई लोग देने वाले हैं और अनुराग जी की कवितायें
भी, सुन्दर लिखते हैं .'
एकदम बोला
'कब से जानती हैं आनुराग को ?''
'बस यहीं आकर .पहले एकाध कविता पढ़ी थी कहीं ..'
और वह अनुराग को बिलकुल पसंद नहीं करता , एकदम मुझे याद आया..अनुराग भी उसकी मीटिंग में आना अक्सर टाल जाता है .
उस दिन की घटना याद आते ही अपने लिए धिक्कार उठने लगती है . कैसी बेवकूफ़ी ,उफ़
रोम खड़े हो जाते हैं .. '
मैं बैठी सुन रही हूँ -विस्मित सी .
उसने मुझसे पूछा था ,'तुम तो खाई खेली हो ?'
मैंने बैठने की पोज़ीशन बदली थी .
वे कहे जा रहीं थीं -
'हाँ .बिलकुल .'मैं नेउत्तर दिया था .'
उसकी कौतुक भरी दृष्टि मुझ पर टिकी थी ,
'अच्छा !'
'और क्या !घर में छोटी थी ,छूट मिलती रही ,बचपन से खूब खाती-खेलती रही '.
'वाह !'
मैं उसे देख कर हँस दी .
वह चुप हो गया .फिर अचानक बोला
'अच्छा, अब तुम जाओ.'
मैं चौंक गई .उसका विचित्र व्यवहार समझ में नहीं आया कैसे बोल रहा है यह .
मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था.
'तुम फ़ौरन यहां से चली जाओ.'
मैं हकबकाई सी उठी अपना पर्स उठाया और एकदम चल दी .अपने कमरे पर आकर ही दम लिया .
रूम-मेट लेटी हुई थी पूछने लगी .'क्या हुआ ?'
'कुछ नहीं ,बस अच्छा नहीं लग रहा है .'
'घर की याद ?'
'पता नहीं क्यों आँखों में आँसू भर आए .ऐसा व्यवहार किसी ने मेरे साथ नहीं किया था .
मैं भी लेट गई चुपचाप .किसी से कुछ कहने को था ही क्या ?'
तब तो कुछ खास नहीं लगा .एक्ज़ाम हो गए सब तितर-बितर हो गए .
बाद में जब खाई-खेली का असली मतलब पता लगा तो मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया .'
मैं क्या बोलती !बैठी रही आगे का सुनने के चाव में
'जब भी वह घटना ध्यान में आती मन ग्लानि से भर जाता ..पता नहीं क्या सोचता होगा मेरे लिए ,पता नहीं और लोगों से उसने क्या-क्या कहा होगा .
बाद में जितने दिन होस्टल में रही लोग कैसी निगाहों से देखते होंगे मुझे ,और मैं बेखबर .लोगों को लगता होगा इसकी आँखों में शरम है ही नहीं .
इसीलिये बाद में कभी किसी से मिली नहीं .और फिर तो सब इधर-उधर हो जाते हैं .सबको भूल जाना चाहती थी मैं. '
'और फिर कोई चिट नहीं भेजी ?'
'एक्ज़ाम पास आ रहे थे ,सब बिज़ी हो गए थे .
मेरी उस स्वीकारोक्ति के बाद .उसने कभी मिट्ठू के हाथ कोई चिट नहीं भेजी और कभी जब मौका पड़ा भी बड़ी सभ्यता से बात करता था .
शादी के बाद भी सर्विस करती रही मैं
पर सेमिनार ,आदि के अवसर पर यही डर रहता था कि कहीं वह सामने न पड़ जाय !
बहुत डर-डर कर रही हूँ .
मैंने आज तक किसी से नहीं कहा आज अपना मन हल्का कर रही हूं ,पर अब मन पर से वह बोझ उतर चुका है ,इसीलिए कह पाई हूँ .'
'और कहीं वह मिल गया तो ?'
वह हँसीं -निश्छल हँसी .
'पता नहीं कैसी स्थिति हो !पर अब घबराहट नहीं लगती .
उम्र के इस प्रहर में अपनी बेवकूफ़ी पर तरस आता है .
अब वह सामने आ गया तो उससे भी हँसकर बोल लूँगी .'
'पूछ लीजिएगा उसने क्या समझा था . '
वे सिर्फ़ मुस्करा दीं .
उज्जैन आ गया था ,उन्हें यहीं तो उतरना था .
***
शुक्रवार, 27 अगस्त 2010
तार -
*
वह बड़ा उदास था।थोड़ी देर पहले ही उसे तार मिला था,उसके भतीजे की मृत्यु हो गई थी।जवान भतीजा,खूब तन्दुरुस्त,अच्छा ऊँचा पूरा,नाक के नीचे स्याह रेखाएँ बहुत स्पष्ट दिखने लगीं थी।डूब कर मर गया।ऐसी कोई बात तो थी नहीं ,बड़ी मस्त तबियत का था।किसे मालूम था जाकर वापस नहीं लौटेगा ? लौटी उसकी निष्प्राण देह!माँ-बाप कैसे सहन कर पायें,छोटे-छोटे भाई-बहिनो को कैसा लग रहा होगा !
उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हितेन मर गया है।अभी कुछ दिन पहले ही तो उसके पास आया था।एक हफ़्ते साथ-साथ रहे थे दोनो ।उम्र मे भी तो कोई खास अंतर नहीं था।घर मे कोई उसके सबसे निकट था तो बस हितेन ही।भतीजे से अधिक दोस्त था वह उसका। उसे बार-बार लगता अभी दरवाज़ा खुवेगा और बैग लिये हितेन कमरे मे घुस आयेगा,खूब जोर-जोर से हँसकर सारा कमरा गुँजा देगा। नहीं, वह अब कभी नहीं अयेगा!
वह धीरे-धीरे उठा,रोज़मर्रा के काम तो होंगे ही,देह के धर्म तो निभाने ही पड़ेंगे!बिना किसी उत्साह के उसने कपड़े बदले। चाय भी ते नहीं पी थी अभी,पर उसका मन नहीं हुअ कि चाय बनाये और पिये।उदासी और बढ़ गई।रेलवे टाइम-टेबल उठा कर देखा - पौने बारह बजे मिलेगी पहली गाड़ी,तब तक क्या किया जाय?खाना खा ले?फिर तो कहीं आधी रात को पहुँचेगा। मौत के घर मे जाते ही खाने-पीने का डौल नहीं बन पायेगा।यह सब अच्छा भी तो नहीं लगेगा।फूछनेवाला होगा भी कौन?भइया भाभी बेचारे जाने किस हाल मे होंगे!पता नहीं कौन-कौन होगा वहाँपर !
भूख- प्यास ? शरार अपनी माँग करेगा ही।
उसने उठ कर कमरे का ताला लगा दिया।पाँव होटल की ओर बढ़ चले।रास्ते मे भी वह हितेन के बारे मे सोचता रहा।बड़ी छेड़ने की आदत थी,'चाचा,चाची के और बहने होंगी ?','यार,चाचा तुमने कुछ सूट-ऊट के कपड़े नहीं खरीदे?' वह कह देता , 'अब मै लेकर क्या करूँ,सब वहीं से आ जायेगा।' जब से शादी तय हुई थी ,कुछ-न-कुच परिहास करता ही रहता था।'हाँ,चाचा,अब तो कुछ नामा इकट्ठा कर लो।'बात बड़े पते की कहता था।बीच-बीच मे उसे भाई का ग़मगीन चेहरा और पछाड़ें खाती भाभी के चित्र दिखाई देते रहे।एक मन हुआ खाना खाने न जाय! लेकिन मेरे न खाने से क्या होगा?वहाँ जाकर पता नहीं कब क्या हो!दौड़ भाग भी तो सारी उसी को करनी पड़ेगी।पता नहीं क्या-क्या होगा !उसका मन बड़ा भारी हो आया।भूख बड़े ज़ोर की लग रही थी।खाना खा लेना ही ठीक है ,चाय भी तो नहीं पी है!इस तरह न खाने को देखेगा भी कौन?
रास्ते मे गुप्ता दिखायी दे गया।उसने कतरा कर निकल जाना चाहा,जैसे देखा ही न हो। पर गुप्ता आवाज़ दे बैठा ,'क्या मुँह लटकाये चले जा रहे हो? शादी क्या तय हुई, दुनिया-ज़माने का भी होश खो बैठा, मेरा यार।'
उसने सोचा कह दूँ भतीजा मर गया है,वही हितेन ,जो यहाँ आया था- पर वह रुक गया।यह भी क्या सोचेगा ,सगा भतीजा मर गया और चले जा रहे हैं खाना खाने!
'आज पता नहीं माइंड बड़ा अपसेट हो रहा है,' वह गुप्ता की ओर हल्के से मुस्करा दिया।
'यह बात!पेट मे चूहे कूद रहे होंगे।चलो ,तुम्हें कुछ स्पेशल खिलायें!'
उसने होटल के नौकर से दाल और फुल्का ले आने को कहा,गुप्ता ने बीच मे टोक दिया,'कहाँ बहक रहे हो आज?ओ शंभू, कबाब और टमाटर प्याज़ की प्लेट बाबू के आगे लाकर रख।'
'लहीं यार, आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं।'.
'तो खाने से क्या दुश्मनी है?चल, बिल मेरी तरफ!तू क्यों फ़िक्र करता है? आखिर ,दोस्ती किस दिन के लिये है?'
वह इन्कार नहीं कर सका।बढ़िया खाना और चार जनो के बीच हा-हा-हू-हू मे उसके ध्यान से सब उतर गया।जितना उदास और भारी मन लेकर वह आया था ,उतना ही हल्कापन और भरा पेट लेकर बाहर निकला।उसे लगा खाली पेट मे हर दुख बहुत बड़ा लगा करता है।
मेरे अफ़्सोस करने से होगा भी क्या!जो होना था हो चुका ,उसके लिये कुछ किया भी तो नहीं जा सकता! मेरे पास आता था तो मुझे इतना भी लगा नहीं तो किसी के मरने पर किसी और को कौन सा फ़र्क पड़ता है? सुनकर चच्-चच् सभी कर देते हैं,एकाध बात खोद कर पूछ लेते हैं और अपना रास्ता लेते हैं।अपनी-अपनी व्यस्तताओं मे दूसरे के सुख-दुख का ध्यान किसे रहता है?
गुप्ता को नहीं बताया अच्छा ही किया ,उसने सोचा ,दुख तो केवल उन्हीं लोगों को होता है जिनका कुछ सम्बन्ध होता है।अन्य लोगों के लिये उसका महत्व ही क्या!और सब ऊपरी दिखावा करते हैं।होँ भाई को तो दुख होगा ही,बहुत दुख,घर का बड़ा बेटा था,उसी पर सारी आशाएँ केन्द्रित थीं।पाले-पनासे की ममता,घर के एक बहुत खास सदस्य की दुखद हानि!और किसी ,किसी बाहरवाले को क्या फ़र्क पड़ता है उसके होने या न होने से?यों मुँह देखी सभी कह देते हैं।
गुप्ता को मेरा चुप रहना अजीब लग रहा होगा ,सोच कर उसने उसकी ओर मुस्करा दिया।दोनो ने साथ-साथ सिगरेट पी फिर वह अपने कमरे पर चला आया।अन्दर कदम रखते ही उसे वही तार दिखायी दे गया।घड़ी देखी ,गाड़ी जाने मे अभी बहुत देर है।चलो दफञ्तर चल कर ही एप्लीकेशन दे देंगे यहाँ बैठ कर भी क्या होगा।उसने तार उठा कर जेब मे डाल लिया - एप्लीकेशन के साथ नत्थी दर दूँगा - हो सकता है,बाद मे छुट्टी बढ़ाने की ज़रूरत पड़ जाये।
उसे एकदम ध्यान आया - कल तो छुट्टी है सेकन्ड सेटर डे की,और परसों संडे!आज छुट्टी लेता हूँ तो ये दोनो बेकार जाएँगी।आज और तार न आता!फिर उसके दिमाग़ मे विचार आया,आजकल तो तार भी अक्सर साधारण डाक से भी देर मे मिलते है।मै ठहरा अकेला आदमी!कोई जरूरी नहीं तार के टाइम कमरे पर ही मिलूँ!तो ये दिन निकाल दूँ,तीन छुट्टियाँ एकदम बच जायेंगी।और आब वहाँ धरा ही क्या होगा,शुरू का सारा काम निबट चुका होगा!
उसके पाँव ऑफ़िस की ओर चल पड़े।अच्छा हुआ गुप्ता से कहा नहीं ,और छुट्टी की एप्लीकेशन भी नहीं दी।एक बड़ी बेवकूफ़ी से बच गया।उसने चैन की साँस ली।
हाँ,बेकार की भावुकता मे क्या घरा है?आज ऑफ़िस करके रात की ट्रेन से चला जाऊँगा,हद -से-हद कल सुबह!यह भी तो हो सकता था ,मै पहले ही कहीं निकल जाता और फिर तार आता! मै खाना खाने होटल जा चुका होता,फिर वहीं से दफ़्तर चला जाता,तब तो शाम को ही कमरे पर पहुँचता!वह काफ़ी निश्चिन्त हो गया।
ऑफ़िस मे उसका मन काफ़ी हल्का रहा,खाया भी तो खूब पेट भर के था!चार जनो के साथ ही तो हँसने-बोलने की इच्छा होती है ,नहीं तो चला जा रहा होता ट्रेन मे मोहर्रमी सूरत लिये!
लेकिन हितेन था बड़ा हँसमुख!जब भी आता भाभी से काफ़ी-सा नाश्ता बनवा लाता था।मट्ठियाँ तो उसे बहुत पसन्द थीं औऱ उनके साथ आम का अचार!चचा-भतीजे वहीं कमरे मे चाय बनाते और मिल कर खाते थे।अब कौन लायेगा मट्ठियाँ!वैसे तो कभी भाभी ने भेजी नहीं,वो तो ये कहो अपने बेटे के साथ भेजती थीं,सो मै भी साथ खा लेता था!पर भाई !भाई के लिये उसके मन मे बड़ी करुणा उपजी।पिता के बाद उन्हीने गृहस्थी का भार सम्हाला था। उसे पढ़ाया-लिखाया,और अब तो शादी भी तय कर दी थी- वहीं कहीं।पर अब साल भर तो उसकी शादी होने से रही!
'कैसे ,चुपचाप बैठे हो आज यार?नींद आरही है क्या?'
वह एकदम चौंक गया,फिर चैतन्य हो गया।
'कल रात नींद ठीक से नहीं आई,' फिर उसे लगा जवाब कुछ मार्के का नहीं बन पड़ा तो उसने जोड़ दिया,'जब दिल ही टूट गया....'और बड़े नाटकीय ढंग से सीने पर हाथ रख लिया।
'छेड़ो मत उसे। अपनी होनेवाली बीवी के वियोग का मारा है बेचारा!'
सब लोग खिलखिला उठे।
अपनी प्रत्युत्पन्न मति के लिये उसने मन-ही-मन अपनी पीठ ठोंकी।
किसी को पता नही लगने देना है अभी।बताने से और दस बातें निकल आयेंगी।अजीब-अजीब बातें जिनका जवाब देने मे उसे और उलझन होगी।अभी तार ही तो मिला है कैसे क्या हो गया कुछ भी तो पता नहीं।बहुत पहले पढ़ा हुआ रहीम का एक दोहा उसे याद आ गया-'रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय' रहिमन बिचारे भी कभी ऐसी परिस्थिति मे पड़े होंगे-क्या पते की बात कह गये हैं!
घर पर उसकी प्रतीक्षा हो रही होगी!पर उसके होने न होने सेफ़र्क क्या पड़ता है?दुख तो वास्तव मे उसी को भोगना पड़ता है,जिस पर पड़ता है बाकी सब तो देखनेवाले हैं ,तमाशबीन की तरह आते है चले जाते हैं।'हाय.,ग़जब हो गया','बहुत बुरा हुआ', ये सब तो व्यवहार की बातें हैं।ग़मी मे जाना भी तो लोगों की एक मजबूरी है।कैसे घिसे-पिटे वाक्य कहे-सुने जाते हैं।....पर भइया-भाभी बड़े दुखी होंगे।दुख तो होना ही है,इतना बड़ा जवान लड़का ,जिस पर ज़िन्दगी की आशायें टिकी हों,देखते-देखते छिन जाये!कैसा लग रहा होगा उन्हे!
'सेकिन्ड -सेटर डे'भनक उसके कानो मे पड़ी।मुँह से निकल गया ,' क्या बात है?'
'पूछकर मना मत कर देना।'
उसकी जगह उत्तर गुप्ता ने दे दिया ,'अरे ,हम लेग क्यों मना करेंगे?मना करे तुम लोग ,जो दो-दो,चार-चार बच्चों के बाप हो। ला मिला हाथ1 '
गुप्ता ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।उसने बिना सोचे-समझे अपना हाथ दे दिया।
'दो दिन की छुट्टियाँ हैं तो पिकनिक का प्रोग्राम बना रहे हैं।'
'नहीं,नहीं ,मै तो कल घर जा रहा हूँ।'
'अब धोखा मत दे यार!फिर यहाँ क्या मज़ा आयेगा,ख़ाक?' गुप्ता फिर बोल दिया।
'नहीं यार गुप्ता, मुझे ज़रूरी जाना है।ता....खत आया है..।'वह कहते-कहते सम्हल गया।
कहते-कहते उसका हाथ फिर पैन्ट की जेब मे चला गया जिसमे तार पड़ा था।उसने फ़ौरन हाथ बाहर खींच लिया। उसकी अस्वाभाविकता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
'तो, कौन वहाँ बीवी इन्तज़ार कर रही है तेरी?'
'अरे वही तो चक्कर है',क्या बोले यह सोचने का मौका उसके पास नहीं था।
उत्सुकता मे दो-चार जने उसके पास खिसक आये।
यह क्या कह दिया उसे पछतावा होने लगा।
' तो यह कह ससुर जी ज़ेवर चढ़ाने आ रहे हैं ? '
'और हमारी मिठाई?'
उसने मन-ही मन स्वयं को धिक्कारा।कुछ उत्तर सूझ न पड़ा। मुँह से निकला ,'अब तो घपले मे पड़ गई ...साल...साल..' कहते-कहते रुक गया ।'
'जाने दे यार ! जब कह रहा है जाना जरूरी है।'
'तो एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा?'
' वह चुप रहा ,हाँ एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा -उसके भी मन मे आया। न हो कल शाम को चला जाऊँगा ,रात की गाड़ी सो! परेशान लोगों को रात मे न जगाना ही ठीक रहेगा । उसने हामी भर दी ।
अपने आप ही फिर उसका हाथ जेब मे चला गया और तर के कागज से फिर छू गया।उसका मन फिर दुविधा मे पड़ गया।पिकनिक पर जाना अच्छा नहीं लगता,क्यों न लोगों को बता दूँ? पर ये लोग क्या सोचेंगे ?गुप्ता तो सुबह से ही पीछे लगा है.सहसे कहता फिरेगा! नहीं-नहीं ,बेकार है कहना।
कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? एक भाई ग़मी मे पड़ा है दूसरा पिकनिक पर जा रहा है। पर किसी को क्या पता कि मुझे तार मिल गया है१उसने अपने मन को संतुष्ट कर लिया ।
इतनी जल्दी उस वातावरण मे जाने मे उसे उलझन हो रही थी।भाई के बाद वही घर का बड़ा है।उस स्थिति मे वह स्वयं को बड़ा असहाय अनुभव करने लगा।उसे स्वयं पर बड़ी दया आने लगी।उस दृष्य की कल्पना कर वहफिर विचलित हो गया।
'क्यों शादी क्यों टल गई?लड़की मे कुछ...।'
'नहीं,नहीं उसकी रिश्तेदारी मे मौत हो गई है,'उसने अपना पिण्ड छुड़ाया।
' वाह मरे कोई और शादी किसी की रुके ?'
बड़ि शायराना अन्दाज़ मे रिमार्क पास किया गया था।उसे फिर उलझन होने लगी पर वह चुप रहा।
'इसीलिये ऑफ़ है मेरा यार ?' गुप्ता ने फिर टहोका
उसका मन समाधान खोज रहा था-जब कल जाना है तो आज बेकार परेशान हुआ जाय!उसने स्वयं को तर्क दिया-दुख किसी को दिखाने के लिये थोड़े ही होता है ,वह तो मन की चीज़ है ।ये ऊपरी व्यवहार तो चलते ही रहते हैं ।चलो ,बिगड़ी बत सम्हल गई!
सुबह खाने का बिल गुप्ता ने दिया था।क्यों न आज शाम को उसका उधार उतार दूँ!वह गुप्ता की ओर मुड़ा।
'ऐगुप्ता, भाग मत जाना ,साथ चलेंगे ।'
'भागूँगा कहाँ?हम दो ही तो हैं फ़िलहाल अल्लामियाँ से नाता रखनेवाले ।'
बेकार कमरे पर जा कर क्या करूँगा ,उसने सोचा,यहीं से घूमने निकल जोयेंगं,फिर खाना खाकर पिक्चर चले जायेंगे ,रात भी कट जायेगी ।
उसे फिर भूख लगने लगी थी और ग़म फिर उसके मूड पर छाने लगा था। जल्दी से जल्दी वह होटल पहुँच जाना चाहता था। खाली पेट मे उलझने और बढ जाती हैं ।
भतीजे की मृत्यु अब उसके लिये पुरानी बात हो गई थी ।घर पहुँच कर फिर रिन्यू कर लेंगे उसने सोचा ।
उसका हाथ फिर जेब मे चलागया और उस काग़ज से टकरा गया । जैसे बिच्छू छू गया हो ,उसने झटक कर जेब से हाथ निकाल लिया और गुप्ता के साथ होटल की ओर बढ़ गया ।
वह बड़ा उदास था।थोड़ी देर पहले ही उसे तार मिला था,उसके भतीजे की मृत्यु हो गई थी।जवान भतीजा,खूब तन्दुरुस्त,अच्छा ऊँचा पूरा,नाक के नीचे स्याह रेखाएँ बहुत स्पष्ट दिखने लगीं थी।डूब कर मर गया।ऐसी कोई बात तो थी नहीं ,बड़ी मस्त तबियत का था।किसे मालूम था जाकर वापस नहीं लौटेगा ? लौटी उसकी निष्प्राण देह!माँ-बाप कैसे सहन कर पायें,छोटे-छोटे भाई-बहिनो को कैसा लग रहा होगा !
उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हितेन मर गया है।अभी कुछ दिन पहले ही तो उसके पास आया था।एक हफ़्ते साथ-साथ रहे थे दोनो ।उम्र मे भी तो कोई खास अंतर नहीं था।घर मे कोई उसके सबसे निकट था तो बस हितेन ही।भतीजे से अधिक दोस्त था वह उसका। उसे बार-बार लगता अभी दरवाज़ा खुवेगा और बैग लिये हितेन कमरे मे घुस आयेगा,खूब जोर-जोर से हँसकर सारा कमरा गुँजा देगा। नहीं, वह अब कभी नहीं अयेगा!
वह धीरे-धीरे उठा,रोज़मर्रा के काम तो होंगे ही,देह के धर्म तो निभाने ही पड़ेंगे!बिना किसी उत्साह के उसने कपड़े बदले। चाय भी ते नहीं पी थी अभी,पर उसका मन नहीं हुअ कि चाय बनाये और पिये।उदासी और बढ़ गई।रेलवे टाइम-टेबल उठा कर देखा - पौने बारह बजे मिलेगी पहली गाड़ी,तब तक क्या किया जाय?खाना खा ले?फिर तो कहीं आधी रात को पहुँचेगा। मौत के घर मे जाते ही खाने-पीने का डौल नहीं बन पायेगा।यह सब अच्छा भी तो नहीं लगेगा।फूछनेवाला होगा भी कौन?भइया भाभी बेचारे जाने किस हाल मे होंगे!पता नहीं कौन-कौन होगा वहाँपर !
भूख- प्यास ? शरार अपनी माँग करेगा ही।
उसने उठ कर कमरे का ताला लगा दिया।पाँव होटल की ओर बढ़ चले।रास्ते मे भी वह हितेन के बारे मे सोचता रहा।बड़ी छेड़ने की आदत थी,'चाचा,चाची के और बहने होंगी ?','यार,चाचा तुमने कुछ सूट-ऊट के कपड़े नहीं खरीदे?' वह कह देता , 'अब मै लेकर क्या करूँ,सब वहीं से आ जायेगा।' जब से शादी तय हुई थी ,कुछ-न-कुच परिहास करता ही रहता था।'हाँ,चाचा,अब तो कुछ नामा इकट्ठा कर लो।'बात बड़े पते की कहता था।बीच-बीच मे उसे भाई का ग़मगीन चेहरा और पछाड़ें खाती भाभी के चित्र दिखाई देते रहे।एक मन हुआ खाना खाने न जाय! लेकिन मेरे न खाने से क्या होगा?वहाँ जाकर पता नहीं कब क्या हो!दौड़ भाग भी तो सारी उसी को करनी पड़ेगी।पता नहीं क्या-क्या होगा !उसका मन बड़ा भारी हो आया।भूख बड़े ज़ोर की लग रही थी।खाना खा लेना ही ठीक है ,चाय भी तो नहीं पी है!इस तरह न खाने को देखेगा भी कौन?
रास्ते मे गुप्ता दिखायी दे गया।उसने कतरा कर निकल जाना चाहा,जैसे देखा ही न हो। पर गुप्ता आवाज़ दे बैठा ,'क्या मुँह लटकाये चले जा रहे हो? शादी क्या तय हुई, दुनिया-ज़माने का भी होश खो बैठा, मेरा यार।'
उसने सोचा कह दूँ भतीजा मर गया है,वही हितेन ,जो यहाँ आया था- पर वह रुक गया।यह भी क्या सोचेगा ,सगा भतीजा मर गया और चले जा रहे हैं खाना खाने!
'आज पता नहीं माइंड बड़ा अपसेट हो रहा है,' वह गुप्ता की ओर हल्के से मुस्करा दिया।
'यह बात!पेट मे चूहे कूद रहे होंगे।चलो ,तुम्हें कुछ स्पेशल खिलायें!'
उसने होटल के नौकर से दाल और फुल्का ले आने को कहा,गुप्ता ने बीच मे टोक दिया,'कहाँ बहक रहे हो आज?ओ शंभू, कबाब और टमाटर प्याज़ की प्लेट बाबू के आगे लाकर रख।'
'लहीं यार, आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं।'.
'तो खाने से क्या दुश्मनी है?चल, बिल मेरी तरफ!तू क्यों फ़िक्र करता है? आखिर ,दोस्ती किस दिन के लिये है?'
वह इन्कार नहीं कर सका।बढ़िया खाना और चार जनो के बीच हा-हा-हू-हू मे उसके ध्यान से सब उतर गया।जितना उदास और भारी मन लेकर वह आया था ,उतना ही हल्कापन और भरा पेट लेकर बाहर निकला।उसे लगा खाली पेट मे हर दुख बहुत बड़ा लगा करता है।
मेरे अफ़्सोस करने से होगा भी क्या!जो होना था हो चुका ,उसके लिये कुछ किया भी तो नहीं जा सकता! मेरे पास आता था तो मुझे इतना भी लगा नहीं तो किसी के मरने पर किसी और को कौन सा फ़र्क पड़ता है? सुनकर चच्-चच् सभी कर देते हैं,एकाध बात खोद कर पूछ लेते हैं और अपना रास्ता लेते हैं।अपनी-अपनी व्यस्तताओं मे दूसरे के सुख-दुख का ध्यान किसे रहता है?
गुप्ता को नहीं बताया अच्छा ही किया ,उसने सोचा ,दुख तो केवल उन्हीं लोगों को होता है जिनका कुछ सम्बन्ध होता है।अन्य लोगों के लिये उसका महत्व ही क्या!और सब ऊपरी दिखावा करते हैं।होँ भाई को तो दुख होगा ही,बहुत दुख,घर का बड़ा बेटा था,उसी पर सारी आशाएँ केन्द्रित थीं।पाले-पनासे की ममता,घर के एक बहुत खास सदस्य की दुखद हानि!और किसी ,किसी बाहरवाले को क्या फ़र्क पड़ता है उसके होने या न होने से?यों मुँह देखी सभी कह देते हैं।
गुप्ता को मेरा चुप रहना अजीब लग रहा होगा ,सोच कर उसने उसकी ओर मुस्करा दिया।दोनो ने साथ-साथ सिगरेट पी फिर वह अपने कमरे पर चला आया।अन्दर कदम रखते ही उसे वही तार दिखायी दे गया।घड़ी देखी ,गाड़ी जाने मे अभी बहुत देर है।चलो दफञ्तर चल कर ही एप्लीकेशन दे देंगे यहाँ बैठ कर भी क्या होगा।उसने तार उठा कर जेब मे डाल लिया - एप्लीकेशन के साथ नत्थी दर दूँगा - हो सकता है,बाद मे छुट्टी बढ़ाने की ज़रूरत पड़ जाये।
उसे एकदम ध्यान आया - कल तो छुट्टी है सेकन्ड सेटर डे की,और परसों संडे!आज छुट्टी लेता हूँ तो ये दोनो बेकार जाएँगी।आज और तार न आता!फिर उसके दिमाग़ मे विचार आया,आजकल तो तार भी अक्सर साधारण डाक से भी देर मे मिलते है।मै ठहरा अकेला आदमी!कोई जरूरी नहीं तार के टाइम कमरे पर ही मिलूँ!तो ये दिन निकाल दूँ,तीन छुट्टियाँ एकदम बच जायेंगी।और आब वहाँ धरा ही क्या होगा,शुरू का सारा काम निबट चुका होगा!
उसके पाँव ऑफ़िस की ओर चल पड़े।अच्छा हुआ गुप्ता से कहा नहीं ,और छुट्टी की एप्लीकेशन भी नहीं दी।एक बड़ी बेवकूफ़ी से बच गया।उसने चैन की साँस ली।
हाँ,बेकार की भावुकता मे क्या घरा है?आज ऑफ़िस करके रात की ट्रेन से चला जाऊँगा,हद -से-हद कल सुबह!यह भी तो हो सकता था ,मै पहले ही कहीं निकल जाता और फिर तार आता! मै खाना खाने होटल जा चुका होता,फिर वहीं से दफ़्तर चला जाता,तब तो शाम को ही कमरे पर पहुँचता!वह काफ़ी निश्चिन्त हो गया।
ऑफ़िस मे उसका मन काफ़ी हल्का रहा,खाया भी तो खूब पेट भर के था!चार जनो के साथ ही तो हँसने-बोलने की इच्छा होती है ,नहीं तो चला जा रहा होता ट्रेन मे मोहर्रमी सूरत लिये!
लेकिन हितेन था बड़ा हँसमुख!जब भी आता भाभी से काफ़ी-सा नाश्ता बनवा लाता था।मट्ठियाँ तो उसे बहुत पसन्द थीं औऱ उनके साथ आम का अचार!चचा-भतीजे वहीं कमरे मे चाय बनाते और मिल कर खाते थे।अब कौन लायेगा मट्ठियाँ!वैसे तो कभी भाभी ने भेजी नहीं,वो तो ये कहो अपने बेटे के साथ भेजती थीं,सो मै भी साथ खा लेता था!पर भाई !भाई के लिये उसके मन मे बड़ी करुणा उपजी।पिता के बाद उन्हीने गृहस्थी का भार सम्हाला था। उसे पढ़ाया-लिखाया,और अब तो शादी भी तय कर दी थी- वहीं कहीं।पर अब साल भर तो उसकी शादी होने से रही!
'कैसे ,चुपचाप बैठे हो आज यार?नींद आरही है क्या?'
वह एकदम चौंक गया,फिर चैतन्य हो गया।
'कल रात नींद ठीक से नहीं आई,' फिर उसे लगा जवाब कुछ मार्के का नहीं बन पड़ा तो उसने जोड़ दिया,'जब दिल ही टूट गया....'और बड़े नाटकीय ढंग से सीने पर हाथ रख लिया।
'छेड़ो मत उसे। अपनी होनेवाली बीवी के वियोग का मारा है बेचारा!'
सब लोग खिलखिला उठे।
अपनी प्रत्युत्पन्न मति के लिये उसने मन-ही-मन अपनी पीठ ठोंकी।
किसी को पता नही लगने देना है अभी।बताने से और दस बातें निकल आयेंगी।अजीब-अजीब बातें जिनका जवाब देने मे उसे और उलझन होगी।अभी तार ही तो मिला है कैसे क्या हो गया कुछ भी तो पता नहीं।बहुत पहले पढ़ा हुआ रहीम का एक दोहा उसे याद आ गया-'रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय' रहिमन बिचारे भी कभी ऐसी परिस्थिति मे पड़े होंगे-क्या पते की बात कह गये हैं!
घर पर उसकी प्रतीक्षा हो रही होगी!पर उसके होने न होने सेफ़र्क क्या पड़ता है?दुख तो वास्तव मे उसी को भोगना पड़ता है,जिस पर पड़ता है बाकी सब तो देखनेवाले हैं ,तमाशबीन की तरह आते है चले जाते हैं।'हाय.,ग़जब हो गया','बहुत बुरा हुआ', ये सब तो व्यवहार की बातें हैं।ग़मी मे जाना भी तो लोगों की एक मजबूरी है।कैसे घिसे-पिटे वाक्य कहे-सुने जाते हैं।....पर भइया-भाभी बड़े दुखी होंगे।दुख तो होना ही है,इतना बड़ा जवान लड़का ,जिस पर ज़िन्दगी की आशायें टिकी हों,देखते-देखते छिन जाये!कैसा लग रहा होगा उन्हे!
'सेकिन्ड -सेटर डे'भनक उसके कानो मे पड़ी।मुँह से निकल गया ,' क्या बात है?'
'पूछकर मना मत कर देना।'
उसकी जगह उत्तर गुप्ता ने दे दिया ,'अरे ,हम लेग क्यों मना करेंगे?मना करे तुम लोग ,जो दो-दो,चार-चार बच्चों के बाप हो। ला मिला हाथ1 '
गुप्ता ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।उसने बिना सोचे-समझे अपना हाथ दे दिया।
'दो दिन की छुट्टियाँ हैं तो पिकनिक का प्रोग्राम बना रहे हैं।'
'नहीं,नहीं ,मै तो कल घर जा रहा हूँ।'
'अब धोखा मत दे यार!फिर यहाँ क्या मज़ा आयेगा,ख़ाक?' गुप्ता फिर बोल दिया।
'नहीं यार गुप्ता, मुझे ज़रूरी जाना है।ता....खत आया है..।'वह कहते-कहते सम्हल गया।
कहते-कहते उसका हाथ फिर पैन्ट की जेब मे चला गया जिसमे तार पड़ा था।उसने फ़ौरन हाथ बाहर खींच लिया। उसकी अस्वाभाविकता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
'तो, कौन वहाँ बीवी इन्तज़ार कर रही है तेरी?'
'अरे वही तो चक्कर है',क्या बोले यह सोचने का मौका उसके पास नहीं था।
उत्सुकता मे दो-चार जने उसके पास खिसक आये।
यह क्या कह दिया उसे पछतावा होने लगा।
' तो यह कह ससुर जी ज़ेवर चढ़ाने आ रहे हैं ? '
'और हमारी मिठाई?'
उसने मन-ही मन स्वयं को धिक्कारा।कुछ उत्तर सूझ न पड़ा। मुँह से निकला ,'अब तो घपले मे पड़ गई ...साल...साल..' कहते-कहते रुक गया ।'
'जाने दे यार ! जब कह रहा है जाना जरूरी है।'
'तो एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा?'
' वह चुप रहा ,हाँ एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा -उसके भी मन मे आया। न हो कल शाम को चला जाऊँगा ,रात की गाड़ी सो! परेशान लोगों को रात मे न जगाना ही ठीक रहेगा । उसने हामी भर दी ।
अपने आप ही फिर उसका हाथ जेब मे चला गया और तर के कागज से फिर छू गया।उसका मन फिर दुविधा मे पड़ गया।पिकनिक पर जाना अच्छा नहीं लगता,क्यों न लोगों को बता दूँ? पर ये लोग क्या सोचेंगे ?गुप्ता तो सुबह से ही पीछे लगा है.सहसे कहता फिरेगा! नहीं-नहीं ,बेकार है कहना।
कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? एक भाई ग़मी मे पड़ा है दूसरा पिकनिक पर जा रहा है। पर किसी को क्या पता कि मुझे तार मिल गया है१उसने अपने मन को संतुष्ट कर लिया ।
इतनी जल्दी उस वातावरण मे जाने मे उसे उलझन हो रही थी।भाई के बाद वही घर का बड़ा है।उस स्थिति मे वह स्वयं को बड़ा असहाय अनुभव करने लगा।उसे स्वयं पर बड़ी दया आने लगी।उस दृष्य की कल्पना कर वहफिर विचलित हो गया।
'क्यों शादी क्यों टल गई?लड़की मे कुछ...।'
'नहीं,नहीं उसकी रिश्तेदारी मे मौत हो गई है,'उसने अपना पिण्ड छुड़ाया।
' वाह मरे कोई और शादी किसी की रुके ?'
बड़ि शायराना अन्दाज़ मे रिमार्क पास किया गया था।उसे फिर उलझन होने लगी पर वह चुप रहा।
'इसीलिये ऑफ़ है मेरा यार ?' गुप्ता ने फिर टहोका
उसका मन समाधान खोज रहा था-जब कल जाना है तो आज बेकार परेशान हुआ जाय!उसने स्वयं को तर्क दिया-दुख किसी को दिखाने के लिये थोड़े ही होता है ,वह तो मन की चीज़ है ।ये ऊपरी व्यवहार तो चलते ही रहते हैं ।चलो ,बिगड़ी बत सम्हल गई!
सुबह खाने का बिल गुप्ता ने दिया था।क्यों न आज शाम को उसका उधार उतार दूँ!वह गुप्ता की ओर मुड़ा।
'ऐगुप्ता, भाग मत जाना ,साथ चलेंगे ।'
'भागूँगा कहाँ?हम दो ही तो हैं फ़िलहाल अल्लामियाँ से नाता रखनेवाले ।'
बेकार कमरे पर जा कर क्या करूँगा ,उसने सोचा,यहीं से घूमने निकल जोयेंगं,फिर खाना खाकर पिक्चर चले जायेंगे ,रात भी कट जायेगी ।
उसे फिर भूख लगने लगी थी और ग़म फिर उसके मूड पर छाने लगा था। जल्दी से जल्दी वह होटल पहुँच जाना चाहता था। खाली पेट मे उलझने और बढ जाती हैं ।
भतीजे की मृत्यु अब उसके लिये पुरानी बात हो गई थी ।घर पहुँच कर फिर रिन्यू कर लेंगे उसने सोचा ।
उसका हाथ फिर जेब मे चलागया और उस काग़ज से टकरा गया । जैसे बिच्छू छू गया हो ,उसने झटक कर जेब से हाथ निकाल लिया और गुप्ता के साथ होटल की ओर बढ़ गया ।
***
रविवार, 8 अगस्त 2010
बखत की बात
जैसे ही मैने रमेश को आवाज लगाई ,अम्माँ जी ने आकर टोक दिया ,'देखो बहू,रमेस, को रमेस न कहा करो ।'
'क्यों अम्माँ जी?'
'इतना तो खुद समझना चाहिये । रमेस तुम्हारे छोटे जेठ का नाम हैगा ।मुँह से कैसे निकल जाता है तुम्हारे ?'
मैं एकदम से चकपका गई।पूछ बैठी,'फिर क्या कह कर आवाज दूँ उसे ?'
'गनेस कहा करो ।'
मेरी बडी इच्छा हुई जोर से हँसूँ,लेकिन खूब सिर झुकाकर बोली ,'अच्छा ।'
बडी मुश्किल है ।
देवताओं का तो हमारे यहाँ पूरा जमघट है -ससुर जी हैं कृष्णचन्द्र,तइया ससुर रामकिशन,चचिया ससुर शिवशंकर ,फूफा जी विशन स्वरूप और रही-सही कसर पूरी कर दी जेठों और ननदोइयों ने ।आखिर कौन-कौन से नाम निकाल दूँ अपनी जीभ से ?
मुँह से निकला ,'हे भगवान!फिर मैं किसी देवता नाम न लूँ ?'
'बहू देखो, भगवान-भगवान मत करो ।भगवान हमारे बडे भैया का नाम हैगा -तुम्हारे ममिया ससुर ।और देवता दीन हैं तुम्हारे मौसिया ससुर ,हमारे मँझले जीजा ।इतना मान तो हमेरे मैकेवालों का होना ही चाहिये ।'
' हाय अल्ला ,अब नहीं कहूँगी अम्माँजी ।'
'तुम हिन्दुअन के घर की बहू हो ,ये अल्ला -अल्ला काहे करती हो ?अरे ठीक से बोलो ,नहीं कोई समझेगा मुसलमानी ब्यह लाये हैंगे ।'
वैसे तो मेरी ससुरालवाले बडे उदार हैं।पर्दा तो नहीं के बराबर है ,और बहू नौकरी कर ले तो भी कोई आपत्ति नहीं।अम्माँजी जरा पुराने ढर्रे पर हैं,पुराने कायदे पसन्द हैं उन्हें। क्या किया जाय उनका भी मन रखला है ।पर अभी एक ही साल तो हुआ है शादी को, इस घर में तो और भी कम दिन! आदतें बदलते बदलते ही तो बदलेंगी ।
यह जो रागिनी है मेरी ननद, मेरी आदतों से वाकिफ़ है ।शादी के पहले से पहचान है ,चार साल साथ-साथ पढी हैं ।हम दोनों की खूब घुटती थी।ऐसे मौकों को वही सम्हाले रखती है ।साल-डेढ साल में वह भी चली जायेगी ।शादी तय हो गई है ,लडका विदेश गया है ।दोनों की चिट्ठी-पत्री चलती है,पर इसका पता सिर्फ मुझी को है।
ससुर जी बडे रोशन-खयाल हैं।पढी-लिखी बहू को देख-देख सिहाते हैं ।कहते हैं इत्ता पढा-लिखा है उसने,घर में पडे-पडे ऊबेगी ।उसकी इच्छा है तो करने दो नौकरी ।'
खुद इन्टरव्यू दिलाने ले गये थे ।लौट कर बोले ,'देखना ,हमारी बहू बडों-बडें के कान काटेगी ।'
अम्माँजी कुछ बोलीं नहीं ,मुँह बिचका कर कमरे में चली गईं थीं।
*
आजकल परीक्षायें चल रही हैं ,नंबर वगैरा चढाने का काफी काम घर लाना पडता है ।रागिनी बहुत मदद करती है मेरी।
मैं नंबर चढा रही थी ,वह बोल रही थी ।वह बोली ,'अब मैं बोलती हूँ ,तुम मिला लो ।चेकिंग भी यहीं हो जायगी ।'
मैं बोलने लगी ।इतने में नाम आया -इन्द्रेश कुमारी ।पास के कमरे से झाँकर सासजी बोलीं ,'इन्द्रेस कौन ?'
वैसे तो उन्हें कुछ ऊँचा सुनाई देता है,पर ऐसी बातें बड़ी जल्दी सुन लेती हैं ।
'भाभी की एक स्टूडेन्ट है ।और देखो तो अम्माँ ,एक जगदीश भी है।'
'तुम्हारी किलास में है?'मुझसे प्रश्न हुआ ।
'हाँ ,मेरी में ही तो ।'
'तुम रोज-रोज नाम ले के पुकारती होओगी ?'
'हाजरी तो रोज ही लेनी पडती है ।'
'सब लड़कियन का सामने दूल्हा और जेठ का नाम तुमसे कैसे बोला जाता हैगा ?'
'नाम कहाँ लेती हूँ ?'
'कुछ नहीं उनके नाम आते हैं तो शकल देखके पी लगा देती हूँ .' मैं साफ़ झूठ बोल गई ।
'अउर का ?हमसे तो सुहागनों के न्योते में भी तुम्हारे ससुर का नाम नहीं निकलता हैगा ,हम तो के सी कह देती हैंगी ।'
'के.सी. मतलब कृष्ण चन्द्र ' समझने की कोशिश में मैं बोल बैठी ।
अम्माँजी ने आँखें तरेर कर देखा ,मैने जुबान काट ली -हाय राम, ससुर जी का नाम ले बैठी ।
'माफ करो अम्माँ जी ,गलती हो गई ।आगे से कभी नहीं कहूँगी ।'
वे पैर पटकती चली गईं ,कुछ शब्द पीछे छोड गईं,'आजकल की बहुअन को जरा सरम -लिहाज नहीं--'
रागिनी मेरा मुँह ताके जा रही थी,मुस्करा कर बोली ,'सच्ची भाभी, शकल देख के हाजरी लगा देती हो ?'
'चलो हटो ! मैं काहे को शकल देख कर हाजरी लगाऊँ? कल तो इन्द्रेश को आवाज़ लगा कर वो फटकार लगाई कि बस ।'
'और ,जगदीश ।'
'वो तो जेठ जी हैं;फिर भी बुलाना तो पडता ही है ।ससरी बडी बदमाश है।इसकी तो एक चिट्ठी पकड़ी थी हम लोगों ने ..'
रागिनी खिलखिला कर हँसी ,'फिर तो खूब मजा लिया होगा तुम लोगों ने ।अच्छा क्या लिखा था ,हमें भी बताओ न।'
'अरे ,वही सब जो तुम लोगों की चिट्ठियों में होता है।बस, भाषा जरा सस्ते टाइप की और भाव भी अधकचरा ।'
'तुम्हें क्या पता हम लोग क्या लिखते हैं?मेरी चिट्ठी चुरा के पढती हो तुम ?'
'वाह,वाह !ये अच्छी तोहमत !'
'सच्ची बताओ भाभी ,तुमने हमारी चिट्ठियाँ पढी हैं ?'
'अरे बाबा ,चुरा कर क्यों पढूँगी ?तुम्हारे ढंग देख कर अंदाज तो लगा सकती हूँ ।'
वह कुछ शान्त हुई ,'भाभी तुम बड़ी खराब हो ।'
'मैं खराब हूँ !अभी अम्माँ जी को पता चले कि तुमलोगों की चिट्ठी-पत्री चलती है ,और तुम सुकान्त का नाम लेती हो तो तुम्हारी गर्दन काट के फेंक देंगी ।'
'कहीं न काट के फेंक देंगी ।अपनी बिटिया की तो सब बातें दबा दी जाती हैं, वो सब तो तुम्हें सुनाने के लिये है ।'
'हो समझदार !फोटोवाली बात याद है न?'
'अच्छी तरह?'
मेरे कमरे में ,जो इनके साथवाला मेरा साइड पोज का फोटो फ्रेम में लगा रखा है ,अम्माँजी उसे उठा कर देखने लगीं एक दिन ।घुमा-फिरा कर ध्यान से देखती रहीं ,फिर पूछने लगीं ,'ये क्या गाल पे गाल धर के खिंचाया हैगा ।
'मैं कटकर रह गई।बोली ,'थोडा आगे-पीछे खडे हैं ,साइड से तो ऐसा ही पोज़ आता है।'
'पोज-ओज तुमलोग बनाओ,हम क्या जाने !हमें तो सबके सामने ये सब देख के सरम लगती हैगी।'
बात लग गई थी मुझे ।सुकान्त ने विदेश जाने से पहले रागिनी के साथ फोटे खिंचाया था -रागिनी के बहुत पास खडे उसके कन्धे पर हाथ धरे उसकी आँखों मे देख रहे थे ।फ़ोटो मेरे हाथ पड गया ।मैंने मौके का फायदा उठाया ।एक दम अम्माँ जी के पास पहुँची ।
'अम्माँजी ,एक चीज़ दिखाऊँ?'
'क्या है ?'
'रहने दीजिये ,आप नाराज न हो जायें कहीं ' मैंने वापस होने की मुद्रा बनाई ।
'क्या है बहू, दिखाओ तो ।'
'एख मज़ेदार चीज़ है, पर पता नहीं आपको कैसी लगे !'
'ऐसा क्या है ?लाओ तो इधर, देखें ।'
'आप नहीं मानतीं तो लीजिये ,' मैंने फ़ोटो पकडा दिया ।
'ऐं,ये किसका फोटू है ?कैसी बेहयाई से खिंचवाया हैगा,' ठीक से पहचानने के लिये चश्मा लगाने लगीं।मैं ध्यान से उनकी शकल देखती रही ।चश्मा लगा कर उन्होने ध्यान से देखा ,पहचाना फिर एकदम सामने से हटा दिया ।मुझसे कहा ,'बेहया कहूँ की !लड़कियन के ऐसे फोटू कहूँ महतारी -बापन को दिखये जात हैंगे ?अरे, दूल्हा ने कहा होगा खिंचाओ. क्या करती बिचारी !'
मैंने रागिनी से कहा,'हाँ ,तुम्हें तो उनने बिना शादी के दूल्हा -दुल्हन बना रखा है।'
'डोन्ट करो परवाह भाभी, अम्माँओं की यह वीकनेस जग-विदित है ।अपना याद करो न ।और तुम्हें तो मैं हमेशा सपोर्ट करती हूँ ।'
'तभी तो तुम्हारी हर नालायकी पचा जाती हूँ ।'
*
'राधा शर्मा पन्द्रह,अनुपमा बीस ,हिना उन्नीस ,स्वप्ना तेरह ,टेकवती सात ,हरभजन ..'
'अरे रे रे ,ये क्या कर दिया... ?'
'क्या हुआ ,गलत चढ गये ?'
'तुमने तो आसमान से एकदम ज़मीन पर लाकर पटक दिया ।'
'क्या मतलब ?'
'मधुरिमा ,स्वप्ना ,हिना और एकदम से टेकवती ..?तुम्हार एस्थेटिक सेंस कहाँ चला गया भाभी ? जरा नामों का सीरियल पहले ही ढंग से बना लिया करो ,ऐसा धक्का लगता है कि .. ।'
बडी देर से नंबर चढाते-चढाते ऊब रहे थे ,चाय पीने की इच्छा हुई ।इतने में रमेश दिखाई दिया ,मैंने आवाज लगाई,'गणेश ,ओ गणेश !'
उसने सुना ही नहीं ,चलता चला गया ।
'ओ रे गणेश ,सुनता नहीं है ,' मैं फिर चिल्लाई ।
पर उसका नाम गणेश हो तो वह सुने ।हार कर अम्माँ जी की शरण ली ।'
'अम्माँ जी ,चाहे जित्ती आवाज दो ,ये गणेश सुनता नहीं है।'
'क्यों रे ,बहू ने आवाज दी तू बोला क्यों नहीं ?'
'हमका नाहीं बुलावा रहे ,ई तो गनेश का गुहरावत रहीं ।'
'तो, तू बोला क्यों नहीं ?'
'हमार नाम रमेस अहै ।'
नहीं तेरा नाम गनेश हैगा ।'
यह नया नामकरण किस खुशी में हो रहा है ,वह समझ नहीं पाया ,'हम आपुन नाम ना बदली ।'
'नाम से क्या फरक पडता हैगा ?अरे रमेस न कहा गनेस कह दिया ।'
'वाह माँ जी ,बाप दादा केर दिया नाम अहै. हम काहे बदली ?'
'अच्छा, तो घर में तुझे क्या कहते हैं ?'
'महतारी छुटकू कहत रहीं ,बाप रमेसुआ बुलावत रहे ,भइया रमेसू कहित हैं ...।'
'अच्छा तो फिर तुझसे छुटकू कहें /'
'हां ,ईमाँ कउनौ बात नाहीं।काहे से कि घर माँ छोट रहे तौन ...।'
'अच्छा तो बहू,इससे छुटकू कहा करो ।'
ननद बैठी-बैठी मुस्करा रही है।
'अम्माँ ये नाम भाभी के लिये है कि हम भी ...'
'तुम ससुर जेठों की लिस्ट मँगा कर अभी से आदत डाल लो ।दूल्हा का नाम तो ...',मैने वाक्य अधूरा छोड दिया ।रागिनी ने आँखें तरेरीं ,मुझे कहना थोडे ही था उसे छेड़ना भर था ।
*
'तुमने इज्जतबेग ना म सुना है,भाभी ?'
'हाँ ,इज्जतबेग -अस्मतबेग दोनों सुने हैं।'
'सुनकर कैसा लगा तुम्हें?'
'लगना क्या है उसमें ?बस नाम हैं जैसे तुम्हारे सुकान्त ।'
'चुप करो भाभी ,सुकान्त को क्यों घसीटती हो ?इन दोनों नामों की बात कर रही हूँ ।तुम्हें कैसे लगते हैं ये ?'
'मतलब बोलो अपना ।'
'इज्जतबेग सुकर लगता है जैसे किसी ने अपनी इज्जत उठाकर बैग में रख दी हो और चल दिया हो ;अस्मतबेग भी....' 'खाली रहती हो ,तभी न ये खुराफातें सूझती हैं ।'
इतने में अन्दर से आवाज आई,'किसकी इज्जत ले ली ?'
हम दोनों चौंक कर एकदूसरी का मुँह देखने लगीं.
अम्माँ जी चली आ रही थीं ।
मुझसे कहने लगीं,'कैसी-कैसी बातें करती हो तुमलोग !रागिनी, तुम तो थोडी सरम करो ।...और बहू परसों साम को तुम माल रोड के ठेले पे गोलगप्पे खा रही थीं ?'
मैने खोज भरी निगाह रागिनी के चेहरे पर डाली ।
'मैं और चाट ! किसने कहा अम्माँ जी ?'
'वो मिसराइन चाची इस्टेसन से लौट रहीं थीं ;कह रहीं थीं -हमें तो बिसवास नहीं हुआ ।इत्ती कायदेवाली बहू नन्हा-सा बिलाउज पहने ,अधनंग पीठ किये पत्ते चाटती हैगी ! हमने कहा -हमारी बहू तो इसकूल के परोगराम में गई हैगी . वो कहाँ से जायगी ?तो बोलीं -नहीं ,वही पीली जरी के बूटोंवाली साडी पहने थी ।'
परसों के प्रोग्राम में तो भाभी ने बैंगनी साडी पहनी थी ,पीली साड़ी, तो कबसे मेरे पास पडी है अम्माँ ।ये तुम्हारी पडोसिने भी घर में आग लगानेवाली हैं ,झूठी लगाई-बुझाई करती रहती हैं।'
'अरे, अब समझी ,' मैंं भी शुरू हो गई ,'मेरी वो सहेली थी न रमा ।मुझसे बहुत शकल मिलती है. सब कहते हैं।मेरी साड़ी देख के उसने भी वैसी ही खरीदी थी ।दूर से तो लोगों को अक्सर ही धोखा हो जाता है ।'
'वो तुम्हारी सहेली कैसी है?'
'पूछिये मत अम्माँजी , बडी बेशरम है ।सारी पीठखोले घूमती है ।अब तो बाल भी कटा लिये हैं... 'कहते-कहते मेरे हाथ अपने कटे बालों पर चले गये,जिन्हें अब तक अम्माँजी से छिपाये थी ।
पीठ पर पल्ला खींचती मैं हड़बड़ा कर वहाँ से हट गई ।
रागिनी मेरे पीछे-पीछे चली आई,'क्यों ,ये बाल कटाने की बात क्यों कही तुमने?'
'घबराहट में एकदम मुँह से निकल गया ,रागिनी।......ये सब तुम्हारी वजह से हुआ।तुम तो उन्हें दिखाई नहीं दीं मै पकड गई ।....और बाल भी तुम्हीं ने जिद करके कटवाये ।'
'वाह ,कित्ती अच्छी लगती हो भाभी, जरा भैया के दिल से पूछो !और हमने तो तुमसे भी छोटे कराये हैं ।अगर अम्माँ कहें तो कह देना -दूल्हा ने कहा कटाओ,मैं मना नहीं कर पाई, बिचारी ।'
*
'अम्माँजी ,वो जो मेरी सहेली है न, रमा जो मेरे जैसी लगती है ....।'
'कहती तो रहती हो हमेसा ,कभी घर पे नहीं लाईं, बहू?'
'उस बेहया को घर पर लाकर क्या करूँ ?अपने पति का तो नाम लेकर पुकारती है ।लव सेरिज की है ,आपको अच्छी नहीं लगेगी ।शादी के पहले भी कॉलिज में मिलने आता था..।'
'लडकियन के इस्कूल में ..?'
'अपनी बहन को बुलाने के बहाने से जाता था।'
'किसकी बात कर रही हो ?'
'उसी रमा की ।बडी बेशरम है।मैं तो उसका साथ ही छोडे दे रही हूँ ।'
मुझ लगा अम्माँ हल्के से मुस्कराईं ।
'बखत-बखत की बात है ।न देखो तब तक लगता है ।अब घर-घर यही हाल है ।'
मैं चौंकी ,' क्या हाल अम्माँजी?'
अरे, कुछ नहीं ,बहू।तुम उसे कहती हो ,वो तुम्हें कहती होयगी ।इन्द्रेस भी तो जाते थे रागिनी को बुलाने ।तुम दोनों का सहेलापा था ।अब क्या उसे कहें क्या तुम्हें ?'
अम्माँ जी मेरी ओर देख कर मुस्करा रहीं थीं ।
मेरे बोलने को बचा ही क्या था !
*
'क्यों अम्माँ जी?'
'इतना तो खुद समझना चाहिये । रमेस तुम्हारे छोटे जेठ का नाम हैगा ।मुँह से कैसे निकल जाता है तुम्हारे ?'
मैं एकदम से चकपका गई।पूछ बैठी,'फिर क्या कह कर आवाज दूँ उसे ?'
'गनेस कहा करो ।'
मेरी बडी इच्छा हुई जोर से हँसूँ,लेकिन खूब सिर झुकाकर बोली ,'अच्छा ।'
बडी मुश्किल है ।
देवताओं का तो हमारे यहाँ पूरा जमघट है -ससुर जी हैं कृष्णचन्द्र,तइया ससुर रामकिशन,चचिया ससुर शिवशंकर ,फूफा जी विशन स्वरूप और रही-सही कसर पूरी कर दी जेठों और ननदोइयों ने ।आखिर कौन-कौन से नाम निकाल दूँ अपनी जीभ से ?
मुँह से निकला ,'हे भगवान!फिर मैं किसी देवता नाम न लूँ ?'
'बहू देखो, भगवान-भगवान मत करो ।भगवान हमारे बडे भैया का नाम हैगा -तुम्हारे ममिया ससुर ।और देवता दीन हैं तुम्हारे मौसिया ससुर ,हमारे मँझले जीजा ।इतना मान तो हमेरे मैकेवालों का होना ही चाहिये ।'
' हाय अल्ला ,अब नहीं कहूँगी अम्माँजी ।'
'तुम हिन्दुअन के घर की बहू हो ,ये अल्ला -अल्ला काहे करती हो ?अरे ठीक से बोलो ,नहीं कोई समझेगा मुसलमानी ब्यह लाये हैंगे ।'
वैसे तो मेरी ससुरालवाले बडे उदार हैं।पर्दा तो नहीं के बराबर है ,और बहू नौकरी कर ले तो भी कोई आपत्ति नहीं।अम्माँजी जरा पुराने ढर्रे पर हैं,पुराने कायदे पसन्द हैं उन्हें। क्या किया जाय उनका भी मन रखला है ।पर अभी एक ही साल तो हुआ है शादी को, इस घर में तो और भी कम दिन! आदतें बदलते बदलते ही तो बदलेंगी ।
यह जो रागिनी है मेरी ननद, मेरी आदतों से वाकिफ़ है ।शादी के पहले से पहचान है ,चार साल साथ-साथ पढी हैं ।हम दोनों की खूब घुटती थी।ऐसे मौकों को वही सम्हाले रखती है ।साल-डेढ साल में वह भी चली जायेगी ।शादी तय हो गई है ,लडका विदेश गया है ।दोनों की चिट्ठी-पत्री चलती है,पर इसका पता सिर्फ मुझी को है।
ससुर जी बडे रोशन-खयाल हैं।पढी-लिखी बहू को देख-देख सिहाते हैं ।कहते हैं इत्ता पढा-लिखा है उसने,घर में पडे-पडे ऊबेगी ।उसकी इच्छा है तो करने दो नौकरी ।'
खुद इन्टरव्यू दिलाने ले गये थे ।लौट कर बोले ,'देखना ,हमारी बहू बडों-बडें के कान काटेगी ।'
अम्माँजी कुछ बोलीं नहीं ,मुँह बिचका कर कमरे में चली गईं थीं।
*
आजकल परीक्षायें चल रही हैं ,नंबर वगैरा चढाने का काफी काम घर लाना पडता है ।रागिनी बहुत मदद करती है मेरी।
मैं नंबर चढा रही थी ,वह बोल रही थी ।वह बोली ,'अब मैं बोलती हूँ ,तुम मिला लो ।चेकिंग भी यहीं हो जायगी ।'
मैं बोलने लगी ।इतने में नाम आया -इन्द्रेश कुमारी ।पास के कमरे से झाँकर सासजी बोलीं ,'इन्द्रेस कौन ?'
वैसे तो उन्हें कुछ ऊँचा सुनाई देता है,पर ऐसी बातें बड़ी जल्दी सुन लेती हैं ।
'भाभी की एक स्टूडेन्ट है ।और देखो तो अम्माँ ,एक जगदीश भी है।'
'तुम्हारी किलास में है?'मुझसे प्रश्न हुआ ।
'हाँ ,मेरी में ही तो ।'
'तुम रोज-रोज नाम ले के पुकारती होओगी ?'
'हाजरी तो रोज ही लेनी पडती है ।'
'सब लड़कियन का सामने दूल्हा और जेठ का नाम तुमसे कैसे बोला जाता हैगा ?'
'नाम कहाँ लेती हूँ ?'
'कुछ नहीं उनके नाम आते हैं तो शकल देखके पी लगा देती हूँ .' मैं साफ़ झूठ बोल गई ।
'अउर का ?हमसे तो सुहागनों के न्योते में भी तुम्हारे ससुर का नाम नहीं निकलता हैगा ,हम तो के सी कह देती हैंगी ।'
'के.सी. मतलब कृष्ण चन्द्र ' समझने की कोशिश में मैं बोल बैठी ।
अम्माँजी ने आँखें तरेर कर देखा ,मैने जुबान काट ली -हाय राम, ससुर जी का नाम ले बैठी ।
'माफ करो अम्माँ जी ,गलती हो गई ।आगे से कभी नहीं कहूँगी ।'
वे पैर पटकती चली गईं ,कुछ शब्द पीछे छोड गईं,'आजकल की बहुअन को जरा सरम -लिहाज नहीं--'
रागिनी मेरा मुँह ताके जा रही थी,मुस्करा कर बोली ,'सच्ची भाभी, शकल देख के हाजरी लगा देती हो ?'
'चलो हटो ! मैं काहे को शकल देख कर हाजरी लगाऊँ? कल तो इन्द्रेश को आवाज़ लगा कर वो फटकार लगाई कि बस ।'
'और ,जगदीश ।'
'वो तो जेठ जी हैं;फिर भी बुलाना तो पडता ही है ।ससरी बडी बदमाश है।इसकी तो एक चिट्ठी पकड़ी थी हम लोगों ने ..'
रागिनी खिलखिला कर हँसी ,'फिर तो खूब मजा लिया होगा तुम लोगों ने ।अच्छा क्या लिखा था ,हमें भी बताओ न।'
'अरे ,वही सब जो तुम लोगों की चिट्ठियों में होता है।बस, भाषा जरा सस्ते टाइप की और भाव भी अधकचरा ।'
'तुम्हें क्या पता हम लोग क्या लिखते हैं?मेरी चिट्ठी चुरा के पढती हो तुम ?'
'वाह,वाह !ये अच्छी तोहमत !'
'सच्ची बताओ भाभी ,तुमने हमारी चिट्ठियाँ पढी हैं ?'
'अरे बाबा ,चुरा कर क्यों पढूँगी ?तुम्हारे ढंग देख कर अंदाज तो लगा सकती हूँ ।'
वह कुछ शान्त हुई ,'भाभी तुम बड़ी खराब हो ।'
'मैं खराब हूँ !अभी अम्माँ जी को पता चले कि तुमलोगों की चिट्ठी-पत्री चलती है ,और तुम सुकान्त का नाम लेती हो तो तुम्हारी गर्दन काट के फेंक देंगी ।'
'कहीं न काट के फेंक देंगी ।अपनी बिटिया की तो सब बातें दबा दी जाती हैं, वो सब तो तुम्हें सुनाने के लिये है ।'
'हो समझदार !फोटोवाली बात याद है न?'
'अच्छी तरह?'
मेरे कमरे में ,जो इनके साथवाला मेरा साइड पोज का फोटो फ्रेम में लगा रखा है ,अम्माँजी उसे उठा कर देखने लगीं एक दिन ।घुमा-फिरा कर ध्यान से देखती रहीं ,फिर पूछने लगीं ,'ये क्या गाल पे गाल धर के खिंचाया हैगा ।
'मैं कटकर रह गई।बोली ,'थोडा आगे-पीछे खडे हैं ,साइड से तो ऐसा ही पोज़ आता है।'
'पोज-ओज तुमलोग बनाओ,हम क्या जाने !हमें तो सबके सामने ये सब देख के सरम लगती हैगी।'
बात लग गई थी मुझे ।सुकान्त ने विदेश जाने से पहले रागिनी के साथ फोटे खिंचाया था -रागिनी के बहुत पास खडे उसके कन्धे पर हाथ धरे उसकी आँखों मे देख रहे थे ।फ़ोटो मेरे हाथ पड गया ।मैंने मौके का फायदा उठाया ।एक दम अम्माँ जी के पास पहुँची ।
'अम्माँजी ,एक चीज़ दिखाऊँ?'
'क्या है ?'
'रहने दीजिये ,आप नाराज न हो जायें कहीं ' मैंने वापस होने की मुद्रा बनाई ।
'क्या है बहू, दिखाओ तो ।'
'एख मज़ेदार चीज़ है, पर पता नहीं आपको कैसी लगे !'
'ऐसा क्या है ?लाओ तो इधर, देखें ।'
'आप नहीं मानतीं तो लीजिये ,' मैंने फ़ोटो पकडा दिया ।
'ऐं,ये किसका फोटू है ?कैसी बेहयाई से खिंचवाया हैगा,' ठीक से पहचानने के लिये चश्मा लगाने लगीं।मैं ध्यान से उनकी शकल देखती रही ।चश्मा लगा कर उन्होने ध्यान से देखा ,पहचाना फिर एकदम सामने से हटा दिया ।मुझसे कहा ,'बेहया कहूँ की !लड़कियन के ऐसे फोटू कहूँ महतारी -बापन को दिखये जात हैंगे ?अरे, दूल्हा ने कहा होगा खिंचाओ. क्या करती बिचारी !'
मैंने रागिनी से कहा,'हाँ ,तुम्हें तो उनने बिना शादी के दूल्हा -दुल्हन बना रखा है।'
'डोन्ट करो परवाह भाभी, अम्माँओं की यह वीकनेस जग-विदित है ।अपना याद करो न ।और तुम्हें तो मैं हमेशा सपोर्ट करती हूँ ।'
'तभी तो तुम्हारी हर नालायकी पचा जाती हूँ ।'
*
'राधा शर्मा पन्द्रह,अनुपमा बीस ,हिना उन्नीस ,स्वप्ना तेरह ,टेकवती सात ,हरभजन ..'
'अरे रे रे ,ये क्या कर दिया... ?'
'क्या हुआ ,गलत चढ गये ?'
'तुमने तो आसमान से एकदम ज़मीन पर लाकर पटक दिया ।'
'क्या मतलब ?'
'मधुरिमा ,स्वप्ना ,हिना और एकदम से टेकवती ..?तुम्हार एस्थेटिक सेंस कहाँ चला गया भाभी ? जरा नामों का सीरियल पहले ही ढंग से बना लिया करो ,ऐसा धक्का लगता है कि .. ।'
बडी देर से नंबर चढाते-चढाते ऊब रहे थे ,चाय पीने की इच्छा हुई ।इतने में रमेश दिखाई दिया ,मैंने आवाज लगाई,'गणेश ,ओ गणेश !'
उसने सुना ही नहीं ,चलता चला गया ।
'ओ रे गणेश ,सुनता नहीं है ,' मैं फिर चिल्लाई ।
पर उसका नाम गणेश हो तो वह सुने ।हार कर अम्माँ जी की शरण ली ।'
'अम्माँ जी ,चाहे जित्ती आवाज दो ,ये गणेश सुनता नहीं है।'
'क्यों रे ,बहू ने आवाज दी तू बोला क्यों नहीं ?'
'हमका नाहीं बुलावा रहे ,ई तो गनेश का गुहरावत रहीं ।'
'तो, तू बोला क्यों नहीं ?'
'हमार नाम रमेस अहै ।'
नहीं तेरा नाम गनेश हैगा ।'
यह नया नामकरण किस खुशी में हो रहा है ,वह समझ नहीं पाया ,'हम आपुन नाम ना बदली ।'
'नाम से क्या फरक पडता हैगा ?अरे रमेस न कहा गनेस कह दिया ।'
'वाह माँ जी ,बाप दादा केर दिया नाम अहै. हम काहे बदली ?'
'अच्छा, तो घर में तुझे क्या कहते हैं ?'
'महतारी छुटकू कहत रहीं ,बाप रमेसुआ बुलावत रहे ,भइया रमेसू कहित हैं ...।'
'अच्छा तो फिर तुझसे छुटकू कहें /'
'हां ,ईमाँ कउनौ बात नाहीं।काहे से कि घर माँ छोट रहे तौन ...।'
'अच्छा तो बहू,इससे छुटकू कहा करो ।'
ननद बैठी-बैठी मुस्करा रही है।
'अम्माँ ये नाम भाभी के लिये है कि हम भी ...'
'तुम ससुर जेठों की लिस्ट मँगा कर अभी से आदत डाल लो ।दूल्हा का नाम तो ...',मैने वाक्य अधूरा छोड दिया ।रागिनी ने आँखें तरेरीं ,मुझे कहना थोडे ही था उसे छेड़ना भर था ।
*
'तुमने इज्जतबेग ना म सुना है,भाभी ?'
'हाँ ,इज्जतबेग -अस्मतबेग दोनों सुने हैं।'
'सुनकर कैसा लगा तुम्हें?'
'लगना क्या है उसमें ?बस नाम हैं जैसे तुम्हारे सुकान्त ।'
'चुप करो भाभी ,सुकान्त को क्यों घसीटती हो ?इन दोनों नामों की बात कर रही हूँ ।तुम्हें कैसे लगते हैं ये ?'
'मतलब बोलो अपना ।'
'इज्जतबेग सुकर लगता है जैसे किसी ने अपनी इज्जत उठाकर बैग में रख दी हो और चल दिया हो ;अस्मतबेग भी....' 'खाली रहती हो ,तभी न ये खुराफातें सूझती हैं ।'
इतने में अन्दर से आवाज आई,'किसकी इज्जत ले ली ?'
हम दोनों चौंक कर एकदूसरी का मुँह देखने लगीं.
अम्माँ जी चली आ रही थीं ।
मुझसे कहने लगीं,'कैसी-कैसी बातें करती हो तुमलोग !रागिनी, तुम तो थोडी सरम करो ।...और बहू परसों साम को तुम माल रोड के ठेले पे गोलगप्पे खा रही थीं ?'
मैने खोज भरी निगाह रागिनी के चेहरे पर डाली ।
'मैं और चाट ! किसने कहा अम्माँ जी ?'
'वो मिसराइन चाची इस्टेसन से लौट रहीं थीं ;कह रहीं थीं -हमें तो बिसवास नहीं हुआ ।इत्ती कायदेवाली बहू नन्हा-सा बिलाउज पहने ,अधनंग पीठ किये पत्ते चाटती हैगी ! हमने कहा -हमारी बहू तो इसकूल के परोगराम में गई हैगी . वो कहाँ से जायगी ?तो बोलीं -नहीं ,वही पीली जरी के बूटोंवाली साडी पहने थी ।'
परसों के प्रोग्राम में तो भाभी ने बैंगनी साडी पहनी थी ,पीली साड़ी, तो कबसे मेरे पास पडी है अम्माँ ।ये तुम्हारी पडोसिने भी घर में आग लगानेवाली हैं ,झूठी लगाई-बुझाई करती रहती हैं।'
'अरे, अब समझी ,' मैंं भी शुरू हो गई ,'मेरी वो सहेली थी न रमा ।मुझसे बहुत शकल मिलती है. सब कहते हैं।मेरी साड़ी देख के उसने भी वैसी ही खरीदी थी ।दूर से तो लोगों को अक्सर ही धोखा हो जाता है ।'
'वो तुम्हारी सहेली कैसी है?'
'पूछिये मत अम्माँजी , बडी बेशरम है ।सारी पीठखोले घूमती है ।अब तो बाल भी कटा लिये हैं... 'कहते-कहते मेरे हाथ अपने कटे बालों पर चले गये,जिन्हें अब तक अम्माँजी से छिपाये थी ।
पीठ पर पल्ला खींचती मैं हड़बड़ा कर वहाँ से हट गई ।
रागिनी मेरे पीछे-पीछे चली आई,'क्यों ,ये बाल कटाने की बात क्यों कही तुमने?'
'घबराहट में एकदम मुँह से निकल गया ,रागिनी।......ये सब तुम्हारी वजह से हुआ।तुम तो उन्हें दिखाई नहीं दीं मै पकड गई ।....और बाल भी तुम्हीं ने जिद करके कटवाये ।'
'वाह ,कित्ती अच्छी लगती हो भाभी, जरा भैया के दिल से पूछो !और हमने तो तुमसे भी छोटे कराये हैं ।अगर अम्माँ कहें तो कह देना -दूल्हा ने कहा कटाओ,मैं मना नहीं कर पाई, बिचारी ।'
*
'अम्माँजी ,वो जो मेरी सहेली है न, रमा जो मेरे जैसी लगती है ....।'
'कहती तो रहती हो हमेसा ,कभी घर पे नहीं लाईं, बहू?'
'उस बेहया को घर पर लाकर क्या करूँ ?अपने पति का तो नाम लेकर पुकारती है ।लव सेरिज की है ,आपको अच्छी नहीं लगेगी ।शादी के पहले भी कॉलिज में मिलने आता था..।'
'लडकियन के इस्कूल में ..?'
'अपनी बहन को बुलाने के बहाने से जाता था।'
'किसकी बात कर रही हो ?'
'उसी रमा की ।बडी बेशरम है।मैं तो उसका साथ ही छोडे दे रही हूँ ।'
मुझ लगा अम्माँ हल्के से मुस्कराईं ।
'बखत-बखत की बात है ।न देखो तब तक लगता है ।अब घर-घर यही हाल है ।'
मैं चौंकी ,' क्या हाल अम्माँजी?'
अरे, कुछ नहीं ,बहू।तुम उसे कहती हो ,वो तुम्हें कहती होयगी ।इन्द्रेस भी तो जाते थे रागिनी को बुलाने ।तुम दोनों का सहेलापा था ।अब क्या उसे कहें क्या तुम्हें ?'
अम्माँ जी मेरी ओर देख कर मुस्करा रहीं थीं ।
मेरे बोलने को बचा ही क्या था !
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गुरुवार, 29 जुलाई 2010
पति-भ्रम
होम करते हाथ जलें चाहे न जलें ,आँखों में धुएँ की चिरमिराहट और तन-बदन में लपटों की झार लगती ही है ।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ ।
मेरी बहुत पक्की सहेली थी रितिका !प्राइमरी से बी.ए . तक साथ पढे।खूब पटती थी हम दोनों में -दाँत काटी रोटी थी ।एक का कोई राज दूसरी से छिपा नहीं था ।हर जगह साथ रहते थे ।लगता था एक के बिना, दूसरी अधूरी है। साथ-साथ रोये हँसे ,शरारतें कीं ,सहपाठियों से लडाई -झगडे और मेल-मिलाप भी एक साथ किये। स्कूल में हम दोनों दो शरीर एक जान समझी जाती थीं । कितनी इच्छा थी एक दूसरी को दुल्हन के रूप में निहारने की ,सजाने की ,नये-नये जीजा से चुहल करने की । पर मनचीती कहाँ हो पाती है !बी.ए. के बाद दोनों की शादियाँ भी दो दिनों के अन्तर से हुईं। इतना कम अंतर रहा कि एक दूसरी के विवाह में शामिल भी न हो सके ।उसका विवाह उसके ननिहाल से संपन्न हुआ था ,जो पास के शहर में ही था ।शादी के बाद भी पतियों की चिट्ठियाँ तक शेयर की थीं ।एक दूसरी से ससुराली नुस्खे सीखे थे आगे के प्रोग्राम बनाये थे ।मैंने तो हर तरह से उसे आदर-मान किया,हर तरह से ध्यान रखा पूरी खातिरदारी करने की कोशिश की । पर बदले में क्या मिला ? तीखी बातें और बेरुखी !और नौबत यहाँ तक आ गई कि आपस में बोल-चाल बन्द ,चिट्ठी-पत्री बन्द ,घरवालों से एक दूसरी के हाल-चाल पूछना भी बन्द ।मुझे अक्सर उसकी याद आती है ,उसे भी जरूर आती होगी ।पर बीच में जो खाई पडी है उसे पार करना न मेरे बस में रह गया है न उसके ।
होनी कुछ ऐसी हुई कि ,हम दोनो के विवाह भी छुट्टियो में तय हुये।वह अपनी ननिहाल गई हुई थी और वहीं पसन्द कर ली गई। और इधर मेरी शादी का दिन मुकर्रर हुआ ।उसके ससुरालवाले चट मँगनी पट ब्याह चाहते थे।नतीजतन दोंनो के फेरे दो दिनों के अंतर से पडने थे।
हाँ , बस दो दिनों के अन्तर ने हम लोगों को दूर कर दिया । एक दूसरी के विवाह में शामिल होने की तमन्ना मन की मन मे रह गई । नये क्रम में थोडा ए़डजस्ट होते ही दोनो को एक दूसरी की याद सताने लगी ।नये-नये अनुभव आपस में एक्सचेंज करने की आकाँक्षा जोर मारने लगी ।इधर मेरे पिता जी का ट्रान्सफर हो गया और मायके जाने पर भेंट होने की संभावना भी समाप्त हो गई ।दोनो के पति हमारी घनिष्ठता से परिचित हो गये थे।उनकी भी एक दूसरे से मिलने की इच्छा थी ,और हम दोनो तो उतावले बैठे थे कि कब मुलाकात हो ।एक दूसरी के पति को देखा तक नहीं था ।शादी के फोटोज का आदान-प्रदान हुआ था पर हमारे यहाँ तो दूल्हा-दुल्हन का ऐसा स्वाँग रचाया जाता है कि अस्लियत जानना नामुमकिन ।एक दूसरी से मिलने का मौका ही नहीं मिल रहा था। कभी मेरे घर की बाधायें, कभी उसकी मजबूरियाँ ! डेढ साल निकल गया तब कहीं जाकर साथ एक साथ होने का प्रोग्राम बना ।बना क्या ,तलवार फिर भी सिर पर लटक रही थी कि कब किसके पति के सामने कुछ और इमरजेन्सी आ जाय और मामला फिर टाँय-टाँय फिस्स ।इसी लिये कहीं दूर का नहीं,पास ही आगरे जाने का दो दिन का कार्यक्रम बनाया ।तय किया कि दोनो ट्रेन से टूण्डला पहुँचेंगे और वहाँ से टैक्सी लेकर सीधे आगरे ।
'दो कमरे, अच्छे से होटल में बुक करा लिये ,एक तेरे लिये एक अपने ,'मैंने उसे बताया ।
'लेकिन मेरेवाले तो इसी हफ्ते ,सिंगापूर जा रहे हैं ।पता नहीं शुक्रवार तक लौट पायें या नहीं ।'
'अरे मेरे तो ,मद्रास चले गये हैं पर मैने कह दिया है ,बृहस्पतिवार तक तुम्हें लौट आना है ।तू भी कह दे ।ये प्रोग्राम बिगडा तो शायद कभी न बन पाये ।'
'हाँ ,मैं भी कहूँगी ।पक्के तौर पर कहूँगी ।'
हम लोगों के साथ जो होता है एक साथ होता है ।शुरू से यही होता आया है ।इस बार हम दोनों तो मिल ही सकती हैं दोनों के पतियों के लिये कोशिश करें। एक के भी आ जायें तो आसानी रहेगी ।पूरा न सही आधा ही सही ,कुछ तो हाथ आयेगा ।मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगी ।'
'तू निशाखातिर रह ,मैं भी इतनी ही उतावली हूँ ।'
इनका मद्रास वाला काम दो दिन को और बढ गया ।मेरा कहना-सुनना सब बेकार गया ।
तीन दिन से फोन की लाइन नहीं मिल रही । रितिका से बात नहीं हो पा रही ।पर मुझे विश्वास है वह आयेगी जरूर ।
मैं तैयारी में लगी हूँ ।
मेरी ट्रेन आधे घन्टे पहले पहुँचती थी ,सो स्टेशन पर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।ट्रेन आई मैने उसे कंपार्टमेन्ट से झाँकते देखा उसने प्लेट फार्म पर डब्बे की तरफ बढते देख लिया था ।नीचे उतरते उसने हाथ की अटैची और बैग साइड में पटका और मुझसे लिपट गई । ।इतने में आवाज आई 'प्रेम-मिलन फिर कर लीजियेगा पहले अपना सामान सम्हालिये ' एक सूटेड-बूटेड आदमी उसकी अटैची किनारे मेरे सामान के पास रख रहा था ।
'आप नहीं देखते तो ,मेरी तो अटैची गई थी । धन्यवाद !'
वाह क्या बढिया मैनर्स हैं आपस में भी ,पति को धन्यवाद दे रही है ।पता नहीं सेन्स आफ ह्यूमर है इनका ,या औपचारिकता !खैर ,होगा ,मुझे क्या !
मैंने ध्यान से देखा -तो यह है इसका पति ।वह भी उस को ध्यान से देख रही थी -ये क्या हमेशा इसे ऐसे ही देखती है -मैने सोचा ।
'तो अब टैक्सी ले ली जाय ,या यहीं खडे रहेंगे हम लोग ?'उसके पति से पूछा मैंने ।
उत्तर रितिका ने दिया ,यहाँ रुकने से क्या फायदा ।आगरा हई कित्ती दूर !फ्रेश होकर इत्मीनान से नाश्ता करेंगे ।हम लोग बाहर निकल रही हैं आप आगे जाकर टैक्सी का इन्तजाम कर लीजिये ।'
उसने आश्चर्य से देखा ,बोला 'मैं?'
मैंने कहा ,'और नहीं तो क्या हम लोग जायेंगी ?आप यहाँ हैं तो आप ही को करना है ।'
वह अपना बैग लिये-लिये चला गया ।
'रितिका,बैग सामान में रखवा देती ,बेकार उठाये-उठाये घूमेंगे ?'
'तू ने क्यों नहीं कह दिया ?मेरा ध्यान ही नहीं गया ।'
'वो नहीं आ पाये! .जरूर कुछ मजबूरी होगी ,चलो एक का तो है ।हैंडसम हैं तेरे पति ।'
'तेरे भी !वैसे फोटो से कुछ समझ में नहीं आया ।उसके हिसाब से तो सामने होते भी पहचान नहीं पाती ।'
'हाँ ,मैं भी ।'
कुली से सामान उठवा कर हम दोनों बाहर निकलीं ।ब्याह के बाद पहली बार एक दूसरी को देखते जी नहीं भर रहा था ।
'हम दोनो पीछे की सीट पर बैठ गईं ',आप आगे ड्राइवर के पास ! माइंड तो नहीं करेंगे ?हमें बहुत बातें करनी हैं ।क्या करें आपका जोडी दार आ नहीं पाया ।'
'पर ,मैं आगरा नहीं जाऊँगा ।यहाँ का काम करके मुझे वापस जाना है ।'
'अरे वाह !' हम दोनों ने एक साथ कहा ,'
'क्या तमाशा है' रितिका ने कहा आप भी वैसे ही निकले। '
'काम फिर होता रहेगा ।कल शनिवार है ,परसों इतवार ।परसों सोमवार को भी छुट्टी पड रही है ।तब निपटा लीजियेगा अपना काम ।अभी तो हम लोगों के साथ रहना है ,'कहने में मैं पीछे क्यों रहती ।
'और क्या अकेली छोड देंगे यहाँ ?"
वह पसोपेश में पड गया ।रितिका ने उसका बैग उठाकर अपनी तरफ रखा और बोली ,'चलिये बैठिये ,इतनी मुश्किल से साथ रहने का मौका मिला और आप भाग रहे हैं ।कितने दिनों में मिली हैं हम दोनों ।आप साथ रहेंगे तो हम निश्चिंत हो कर साथ रह पायेंगी।सिर्फ दो ही दिन तो मिले हैं,कर लें मन की। कहाँ तो दो शरीर एक प्राण थीं ।'
‘देखिये मुझे चलने दीजिये।यों आप दोनों के बीच रहना ठीक भी नहीं।अच्छी तरह एक दूसरे को जानते भी नहीं।‘
‘जानने में क्या देर लगती है।बस जान लिया आपस में हमने।‘
'हम भागने नहीं देंगे बड़ी मुश्किल से तो मौका हाथ लगा है।‘
'अब बैठिये भी ।आगरा घूमे बिना हम आपको छोडनेवाले नहीं ।'
'ऐसा था तो फिर आप वहीं से साथ न आते ?'
'और क्या !'
दो कमरे बुक कराये थे ।एक मे मैंने अपना सामान रख लिया ।सबने चाय-वाय पी ।,उन लोगों का बैग अटैची भी इसी कमरे में आ गये थे ।
'आपका सामान साथवाले कमरे में हो जायेगा ।'
वह अपना बैग उठा कर चल दिया ।
'तू भी ले जा न अपना सामान ,'मैंने रितिका से कहा ।
'देख ,बेतुके मजाक छोड ।मैं इसी कमरे में रुकूँगी ।तू चाहे तो जा ।'
'अरे चिढती क्यों है ?चल हम दोनो साथ- साथ रहेंगे ।रात में खूब बातें होंगी ,पति के साथ तो हमेशा ही रहते हैं ।'
'और क्या ' उसने हामी भरी ।
आज का दिन ताज महल देखने में बिताया जाय ,हम दोनों ने तय किया ।टैक्सी कर लेते हैं ,खाना रास्ते में कहीं अच्छा सा होटल देख कर खा लेंगे ।
उसका पति !बडा अस्वाभाविक सा लगा ,कुछ बेवकूफ -सा भी !कभी मेरी शक्ल देखता ,कभी उसकी ,और झिझक -झिझक कर व्यवहार करता ।वह तो उससे भी फ्री ली बात नहीं कर रहा था ।कैसे मियाँ-बीवी हैं ।कभी मुझे उस पर तरस आता था ,कभी गुस्सा ।
मुझे लगा उसे भी हँसी आ रही है ।कैसा अजीब व्यवहार लग रहा था उन दोनों का ।मैं तो आग्रहपूर्वक खिला रही थी उसके पति को पर वह उससे मुझसे भी बढ कर आग्रह किये जारही थी ।जबर्दस्ती कर के परसे जा रही थी ।वह जितना मना करता हम दोनों आग्रहपूर्वक और खिलाने पर तुल जातीं ।उसके पति का व्यवहार ?मुझे बडा अटपटा लग रहा था ,बडी असुविधा सी हो रही थी ।पर अपनी प्रिय मित्र के पति की मान-मनुहार तो करनी ही थी।ताज्जुब ये हो रहा था कि वह खुद अपने पति को बढ-बढ कर पूछ रही थी ,हद्द हो गई । अरे ,जब मैं पूरी खातिर कर रही हूँ तो उसे अपनी सीमा में रहना चाहिये ।
मुझे कभी हँसी आती थी ,कभी विस्मय होता था -अच्छी खासी थी, शादी के बाद कैसी हो गई !
उलटा उसने मुझसे कहा ,'शादी के बाद ऐसी हो जायेगी तू ,मैं तो सोच भी नहीं सकती थी ।अरे जब मैं उन्हें इतने आग्रह से खिला रही हूँ ,तो तू काहे को और पीछे पडी जा रही है ?'
'तेरा ही अधिकार है ,मै पूछ भी नहीं सकती ?'
और हम दोनों ने जिद ही जिद में ढेर सा खाना उसको परस दिया ।वह ना-ना करता रहा पर ,रितिका के मुँह से एक बार भी नहीं फूटा कि अब उसे मत परस ।थोडा सा बचा था ,उसे हम दोनों ने खा लिया ।
एक बार होता तो भी ठीक है चलो ,पर हर बार बही सब !चाहे.उसकी प्लेट मे जूठा बच कर फिंक जाय और हम दोनों भूखे रह जायँ ,पर वह उसे भर -भर कर परोसती जायेगी ।।इतनी भी क्या फारमेलिटी !मैने कभी रितिका को उसका सामान निकाल कर देते नहीं देखा ।उसकी अटैची में क्या-क्या है रितिका को शायद पता भी नहीं होगा ।अपने आप अपनी सारी चीजें धरता-उठाता है ।और अजीब बात रितिका कभी उससे कुछ लाने को नहीं कहती ,खुद ले आती है ।एकाध बार उसने पेमेन्ट करने का उपक्रम किया, तो मैं आपत्ति करूँ ,इसके पहले ही रितिका ने उसे मना करते हुये खुद पेमेंट कर दिया ।कैसी हो गई है, सारे पैसे अपने चार्ज में रखती है।उसे गिन गिन कर देती होगी।
बहुत परेशान होगई तो दूसरी शाम मेरे मुँह से निकल गया ,तुम दोनो में ताल मेल तो अच्छा है न?'
'मैं तुझे कैसे समझाऊँ?मुझे तो तुम दोनों के बारे में लगता है।इनके साथ तू इन्टीमेट नहीं हो पाई ?
'तेरा खयाल है शादी के बाद मैं बिलकुल बेशरमी लाद लूँ ?'
इतने में वह आ गया हमलोग दूसरी बात करने लगीं।मुझे क्या करना मैंने सोचा ।पर वह तो मेरी पक्की दोस्त है ,खुल कर बात तो कर ही सकती हूँ ।
उसके साथ तुझे देख कर लगता है जैसे किराये का पति ले आई हो ।'
'मैं क्यों किराये का लाऊँगी ,मेरा अपना पति है ।तू क्या मँगनी का ले आई है।'
'मुझे ऐसा मज़ाक बिल्कुल पसंद नहीं।मैं तो तेरी वजह से झेले जा सही हूँ ।'
'झेल तू रही है कि मैं?ऐसा पेटू बना रखा है उसे ,फिर भी खिलाने पर तुली रहती है ।
'मैं कि तू ?मैं सोचती हूँ ये खिलारही है तो मैं क्यों पीछे रहूँ मैंरी तरफ़ से और खालें ,सारा खा डालें ?'
मुझे क्या करना । तू खुद ध्यान रख अपने पति का ।'
अपने का ध्यान मैं रख लूंगी तू,यहाँ तो तेरा है तू सँभाल ,मैं तो हैरान हो रही हूँ देख देख कर ।'
मेरा काहे को होता ?तू लाई है अपने साथ,तोहमत मत लगा।'
'झूठी कहीं की । उसका बैग रख कर तूने खींच कर बैठाल लिया ।
मैं तो तेरा समझ कर खातिर कर रही थी।चाहे जैसा हो है तो तेरा पति ।'
'ट्रेन से देखा था मैं ने ,बराबर से साथ खड़ा किये थी ,जैसे अपना खसम हो ।'
मेरा ध्यान तो तुझ पर लगा था ,बराबर में कौन खड़ा है मुझे क्या पता ।तू ही तो खींच कर जबर्दस्ती पकड़ लाई ।'
'चल हट,ऐसा लीचड ,पेटू मेरा पति ,क्यों होने लगा ?'
'तू ही उसे ठूँस-ठूस कर खिला रही थी ,मुझे तो देख देख कर कोफ्त हो रही थी ,कि इसमें तो शादी के बाद शरम -हया कुछ बची ही नहीं ।'
'मैं तो तेरा पति समझ कर हर तरह से खातिर कर रही थी ।चाहे जैसा हो, है तो तेरा पति -.यही सोचा मैने ।'
'बस बस ,जुबान सम्हाल कर बोल ।'
'तू जुबान सम्हाल अपनी ।ऐसे आदमी को मेरा पति कैसे समझा तूने ?'
'बस खबरदार !।तेरा सामान वह सहेज रहा था ,जैसे तेरा अपना पति हो और इल्जाम मुझ पर ।'
'ट्रेन से देखा था मैंने ,बराबर से साथ खडा किये थी जैसे तेरा खसम हो ।'
हम दोनो में तू-तू मैं-मैं होने लगी 1एक दूसरी को कहनी अनकहनी सब कह डालीं ।अभी यह प्रकरण चल ही रहा था ,कि वह आदमी आता दिखाई दिया -हाथ में एक पैकेट पकडे था ,ऊपर झलकती चिकनाई से लग रहा था समोसे,कचौरी कुछ ले कर आया है ।
मैंने झपट कर पूछा ,'आप कौन हैं ?'
'मैं ,मैं ।मैं तो ..'
हम दोनों तुली खड़ी थीं वह कुछ घबरा गया।
उसकी बात पूरी होने से पहले ही रितिका डपट पडी ,'आप हमारे साथ क्यों चले आये ?अपने रास्ते नहीं जा सकते थे ?'
वह सकपका गया ,'मैं कोई अपने मन से तो आया नहीं ।आप दोनों ने इतना आग्रह किया ..'
'पर आप बता तो सकते थे ..।'
'क्या बताता ?आपने कुछ पूछा भी?मैं समझा आप दोनों अकेली हैं ,इस शहर में...'
'बस,बस बहुत हो गया ।उठाइये सामान और अपना रास्ता पकडिये ।'
' ये समोसे लाया था आप लोगों के लिये ।'
'नहीं चाहियें हमे आपके समोसे न जान न पहचान !'
वह चकराया-सा खडा था,' आप लोगों को मैं बिल्कुल समझ नहीं पाया।
' समझने की जरूरत भी नहीं ,रास्ता पकडिये अपना ।'
'अजीब महिलाये हैं, ' बुदबुदाते हुये उसने अपना बैग उठाया ,एक विचित्र दृष्टि हम दोनो पर डाली और चल दिया ।
एक दूसरी को कुपित दृष्टि से देखते हम लोगों ने भी अपना-अपना रास्ता पकडा ।
******
मैने यह बात किसी को नहीं बतायी ।उसने भी नहीं बताई होगी मुझे पूरा विश्वास है ।कोई बताये भी तो किस मुँह से ?पर इसमे मेरी क्या गलती जो वह मुझसे कुपित है ? दो साल बीत गये हैं ।अब उसके पति का पत्र मेरे पति के पास आया है ,दोनो विस्मित हैं कि हम लोगों को हो क्या गया है जो चिट्ठी न पत्री .एक दूसरी की चर्चा भी नहीं ।वे लोग इसी शहर में एक विवाह में आ रहे हैं ।
हम चारों मिलेंगे जरूर ।देखो, आगे क्या होता है !
*
मेरी बहुत पक्की सहेली थी रितिका !प्राइमरी से बी.ए . तक साथ पढे।खूब पटती थी हम दोनों में -दाँत काटी रोटी थी ।एक का कोई राज दूसरी से छिपा नहीं था ।हर जगह साथ रहते थे ।लगता था एक के बिना, दूसरी अधूरी है। साथ-साथ रोये हँसे ,शरारतें कीं ,सहपाठियों से लडाई -झगडे और मेल-मिलाप भी एक साथ किये। स्कूल में हम दोनों दो शरीर एक जान समझी जाती थीं । कितनी इच्छा थी एक दूसरी को दुल्हन के रूप में निहारने की ,सजाने की ,नये-नये जीजा से चुहल करने की । पर मनचीती कहाँ हो पाती है !बी.ए. के बाद दोनों की शादियाँ भी दो दिनों के अन्तर से हुईं। इतना कम अंतर रहा कि एक दूसरी के विवाह में शामिल भी न हो सके ।उसका विवाह उसके ननिहाल से संपन्न हुआ था ,जो पास के शहर में ही था ।शादी के बाद भी पतियों की चिट्ठियाँ तक शेयर की थीं ।एक दूसरी से ससुराली नुस्खे सीखे थे आगे के प्रोग्राम बनाये थे ।मैंने तो हर तरह से उसे आदर-मान किया,हर तरह से ध्यान रखा पूरी खातिरदारी करने की कोशिश की । पर बदले में क्या मिला ? तीखी बातें और बेरुखी !और नौबत यहाँ तक आ गई कि आपस में बोल-चाल बन्द ,चिट्ठी-पत्री बन्द ,घरवालों से एक दूसरी के हाल-चाल पूछना भी बन्द ।मुझे अक्सर उसकी याद आती है ,उसे भी जरूर आती होगी ।पर बीच में जो खाई पडी है उसे पार करना न मेरे बस में रह गया है न उसके ।
होनी कुछ ऐसी हुई कि ,हम दोनो के विवाह भी छुट्टियो में तय हुये।वह अपनी ननिहाल गई हुई थी और वहीं पसन्द कर ली गई। और इधर मेरी शादी का दिन मुकर्रर हुआ ।उसके ससुरालवाले चट मँगनी पट ब्याह चाहते थे।नतीजतन दोंनो के फेरे दो दिनों के अंतर से पडने थे।
हाँ , बस दो दिनों के अन्तर ने हम लोगों को दूर कर दिया । एक दूसरी के विवाह में शामिल होने की तमन्ना मन की मन मे रह गई । नये क्रम में थोडा ए़डजस्ट होते ही दोनो को एक दूसरी की याद सताने लगी ।नये-नये अनुभव आपस में एक्सचेंज करने की आकाँक्षा जोर मारने लगी ।इधर मेरे पिता जी का ट्रान्सफर हो गया और मायके जाने पर भेंट होने की संभावना भी समाप्त हो गई ।दोनो के पति हमारी घनिष्ठता से परिचित हो गये थे।उनकी भी एक दूसरे से मिलने की इच्छा थी ,और हम दोनो तो उतावले बैठे थे कि कब मुलाकात हो ।एक दूसरी के पति को देखा तक नहीं था ।शादी के फोटोज का आदान-प्रदान हुआ था पर हमारे यहाँ तो दूल्हा-दुल्हन का ऐसा स्वाँग रचाया जाता है कि अस्लियत जानना नामुमकिन ।एक दूसरी से मिलने का मौका ही नहीं मिल रहा था। कभी मेरे घर की बाधायें, कभी उसकी मजबूरियाँ ! डेढ साल निकल गया तब कहीं जाकर साथ एक साथ होने का प्रोग्राम बना ।बना क्या ,तलवार फिर भी सिर पर लटक रही थी कि कब किसके पति के सामने कुछ और इमरजेन्सी आ जाय और मामला फिर टाँय-टाँय फिस्स ।इसी लिये कहीं दूर का नहीं,पास ही आगरे जाने का दो दिन का कार्यक्रम बनाया ।तय किया कि दोनो ट्रेन से टूण्डला पहुँचेंगे और वहाँ से टैक्सी लेकर सीधे आगरे ।
'दो कमरे, अच्छे से होटल में बुक करा लिये ,एक तेरे लिये एक अपने ,'मैंने उसे बताया ।
'लेकिन मेरेवाले तो इसी हफ्ते ,सिंगापूर जा रहे हैं ।पता नहीं शुक्रवार तक लौट पायें या नहीं ।'
'अरे मेरे तो ,मद्रास चले गये हैं पर मैने कह दिया है ,बृहस्पतिवार तक तुम्हें लौट आना है ।तू भी कह दे ।ये प्रोग्राम बिगडा तो शायद कभी न बन पाये ।'
'हाँ ,मैं भी कहूँगी ।पक्के तौर पर कहूँगी ।'
हम लोगों के साथ जो होता है एक साथ होता है ।शुरू से यही होता आया है ।इस बार हम दोनों तो मिल ही सकती हैं दोनों के पतियों के लिये कोशिश करें। एक के भी आ जायें तो आसानी रहेगी ।पूरा न सही आधा ही सही ,कुछ तो हाथ आयेगा ।मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगी ।'
'तू निशाखातिर रह ,मैं भी इतनी ही उतावली हूँ ।'
इनका मद्रास वाला काम दो दिन को और बढ गया ।मेरा कहना-सुनना सब बेकार गया ।
तीन दिन से फोन की लाइन नहीं मिल रही । रितिका से बात नहीं हो पा रही ।पर मुझे विश्वास है वह आयेगी जरूर ।
मैं तैयारी में लगी हूँ ।
मेरी ट्रेन आधे घन्टे पहले पहुँचती थी ,सो स्टेशन पर उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।ट्रेन आई मैने उसे कंपार्टमेन्ट से झाँकते देखा उसने प्लेट फार्म पर डब्बे की तरफ बढते देख लिया था ।नीचे उतरते उसने हाथ की अटैची और बैग साइड में पटका और मुझसे लिपट गई । ।इतने में आवाज आई 'प्रेम-मिलन फिर कर लीजियेगा पहले अपना सामान सम्हालिये ' एक सूटेड-बूटेड आदमी उसकी अटैची किनारे मेरे सामान के पास रख रहा था ।
'आप नहीं देखते तो ,मेरी तो अटैची गई थी । धन्यवाद !'
वाह क्या बढिया मैनर्स हैं आपस में भी ,पति को धन्यवाद दे रही है ।पता नहीं सेन्स आफ ह्यूमर है इनका ,या औपचारिकता !खैर ,होगा ,मुझे क्या !
मैंने ध्यान से देखा -तो यह है इसका पति ।वह भी उस को ध्यान से देख रही थी -ये क्या हमेशा इसे ऐसे ही देखती है -मैने सोचा ।
'तो अब टैक्सी ले ली जाय ,या यहीं खडे रहेंगे हम लोग ?'उसके पति से पूछा मैंने ।
उत्तर रितिका ने दिया ,यहाँ रुकने से क्या फायदा ।आगरा हई कित्ती दूर !फ्रेश होकर इत्मीनान से नाश्ता करेंगे ।हम लोग बाहर निकल रही हैं आप आगे जाकर टैक्सी का इन्तजाम कर लीजिये ।'
उसने आश्चर्य से देखा ,बोला 'मैं?'
मैंने कहा ,'और नहीं तो क्या हम लोग जायेंगी ?आप यहाँ हैं तो आप ही को करना है ।'
वह अपना बैग लिये-लिये चला गया ।
'रितिका,बैग सामान में रखवा देती ,बेकार उठाये-उठाये घूमेंगे ?'
'तू ने क्यों नहीं कह दिया ?मेरा ध्यान ही नहीं गया ।'
'वो नहीं आ पाये! .जरूर कुछ मजबूरी होगी ,चलो एक का तो है ।हैंडसम हैं तेरे पति ।'
'तेरे भी !वैसे फोटो से कुछ समझ में नहीं आया ।उसके हिसाब से तो सामने होते भी पहचान नहीं पाती ।'
'हाँ ,मैं भी ।'
कुली से सामान उठवा कर हम दोनों बाहर निकलीं ।ब्याह के बाद पहली बार एक दूसरी को देखते जी नहीं भर रहा था ।
'हम दोनो पीछे की सीट पर बैठ गईं ',आप आगे ड्राइवर के पास ! माइंड तो नहीं करेंगे ?हमें बहुत बातें करनी हैं ।क्या करें आपका जोडी दार आ नहीं पाया ।'
'पर ,मैं आगरा नहीं जाऊँगा ।यहाँ का काम करके मुझे वापस जाना है ।'
'अरे वाह !' हम दोनों ने एक साथ कहा ,'
'क्या तमाशा है' रितिका ने कहा आप भी वैसे ही निकले। '
'काम फिर होता रहेगा ।कल शनिवार है ,परसों इतवार ।परसों सोमवार को भी छुट्टी पड रही है ।तब निपटा लीजियेगा अपना काम ।अभी तो हम लोगों के साथ रहना है ,'कहने में मैं पीछे क्यों रहती ।
'और क्या अकेली छोड देंगे यहाँ ?"
वह पसोपेश में पड गया ।रितिका ने उसका बैग उठाकर अपनी तरफ रखा और बोली ,'चलिये बैठिये ,इतनी मुश्किल से साथ रहने का मौका मिला और आप भाग रहे हैं ।कितने दिनों में मिली हैं हम दोनों ।आप साथ रहेंगे तो हम निश्चिंत हो कर साथ रह पायेंगी।सिर्फ दो ही दिन तो मिले हैं,कर लें मन की। कहाँ तो दो शरीर एक प्राण थीं ।'
‘देखिये मुझे चलने दीजिये।यों आप दोनों के बीच रहना ठीक भी नहीं।अच्छी तरह एक दूसरे को जानते भी नहीं।‘
‘जानने में क्या देर लगती है।बस जान लिया आपस में हमने।‘
'हम भागने नहीं देंगे बड़ी मुश्किल से तो मौका हाथ लगा है।‘
'अब बैठिये भी ।आगरा घूमे बिना हम आपको छोडनेवाले नहीं ।'
'ऐसा था तो फिर आप वहीं से साथ न आते ?'
'और क्या !'
दो कमरे बुक कराये थे ।एक मे मैंने अपना सामान रख लिया ।सबने चाय-वाय पी ।,उन लोगों का बैग अटैची भी इसी कमरे में आ गये थे ।
'आपका सामान साथवाले कमरे में हो जायेगा ।'
वह अपना बैग उठा कर चल दिया ।
'तू भी ले जा न अपना सामान ,'मैंने रितिका से कहा ।
'देख ,बेतुके मजाक छोड ।मैं इसी कमरे में रुकूँगी ।तू चाहे तो जा ।'
'अरे चिढती क्यों है ?चल हम दोनो साथ- साथ रहेंगे ।रात में खूब बातें होंगी ,पति के साथ तो हमेशा ही रहते हैं ।'
'और क्या ' उसने हामी भरी ।
आज का दिन ताज महल देखने में बिताया जाय ,हम दोनों ने तय किया ।टैक्सी कर लेते हैं ,खाना रास्ते में कहीं अच्छा सा होटल देख कर खा लेंगे ।
उसका पति !बडा अस्वाभाविक सा लगा ,कुछ बेवकूफ -सा भी !कभी मेरी शक्ल देखता ,कभी उसकी ,और झिझक -झिझक कर व्यवहार करता ।वह तो उससे भी फ्री ली बात नहीं कर रहा था ।कैसे मियाँ-बीवी हैं ।कभी मुझे उस पर तरस आता था ,कभी गुस्सा ।
मुझे लगा उसे भी हँसी आ रही है ।कैसा अजीब व्यवहार लग रहा था उन दोनों का ।मैं तो आग्रहपूर्वक खिला रही थी उसके पति को पर वह उससे मुझसे भी बढ कर आग्रह किये जारही थी ।जबर्दस्ती कर के परसे जा रही थी ।वह जितना मना करता हम दोनों आग्रहपूर्वक और खिलाने पर तुल जातीं ।उसके पति का व्यवहार ?मुझे बडा अटपटा लग रहा था ,बडी असुविधा सी हो रही थी ।पर अपनी प्रिय मित्र के पति की मान-मनुहार तो करनी ही थी।ताज्जुब ये हो रहा था कि वह खुद अपने पति को बढ-बढ कर पूछ रही थी ,हद्द हो गई । अरे ,जब मैं पूरी खातिर कर रही हूँ तो उसे अपनी सीमा में रहना चाहिये ।
मुझे कभी हँसी आती थी ,कभी विस्मय होता था -अच्छी खासी थी, शादी के बाद कैसी हो गई !
उलटा उसने मुझसे कहा ,'शादी के बाद ऐसी हो जायेगी तू ,मैं तो सोच भी नहीं सकती थी ।अरे जब मैं उन्हें इतने आग्रह से खिला रही हूँ ,तो तू काहे को और पीछे पडी जा रही है ?'
'तेरा ही अधिकार है ,मै पूछ भी नहीं सकती ?'
और हम दोनों ने जिद ही जिद में ढेर सा खाना उसको परस दिया ।वह ना-ना करता रहा पर ,रितिका के मुँह से एक बार भी नहीं फूटा कि अब उसे मत परस ।थोडा सा बचा था ,उसे हम दोनों ने खा लिया ।
एक बार होता तो भी ठीक है चलो ,पर हर बार बही सब !चाहे.उसकी प्लेट मे जूठा बच कर फिंक जाय और हम दोनों भूखे रह जायँ ,पर वह उसे भर -भर कर परोसती जायेगी ।।इतनी भी क्या फारमेलिटी !मैने कभी रितिका को उसका सामान निकाल कर देते नहीं देखा ।उसकी अटैची में क्या-क्या है रितिका को शायद पता भी नहीं होगा ।अपने आप अपनी सारी चीजें धरता-उठाता है ।और अजीब बात रितिका कभी उससे कुछ लाने को नहीं कहती ,खुद ले आती है ।एकाध बार उसने पेमेन्ट करने का उपक्रम किया, तो मैं आपत्ति करूँ ,इसके पहले ही रितिका ने उसे मना करते हुये खुद पेमेंट कर दिया ।कैसी हो गई है, सारे पैसे अपने चार्ज में रखती है।उसे गिन गिन कर देती होगी।
बहुत परेशान होगई तो दूसरी शाम मेरे मुँह से निकल गया ,तुम दोनो में ताल मेल तो अच्छा है न?'
'मैं तुझे कैसे समझाऊँ?मुझे तो तुम दोनों के बारे में लगता है।इनके साथ तू इन्टीमेट नहीं हो पाई ?
'तेरा खयाल है शादी के बाद मैं बिलकुल बेशरमी लाद लूँ ?'
इतने में वह आ गया हमलोग दूसरी बात करने लगीं।मुझे क्या करना मैंने सोचा ।पर वह तो मेरी पक्की दोस्त है ,खुल कर बात तो कर ही सकती हूँ ।
उसके साथ तुझे देख कर लगता है जैसे किराये का पति ले आई हो ।'
'मैं क्यों किराये का लाऊँगी ,मेरा अपना पति है ।तू क्या मँगनी का ले आई है।'
'मुझे ऐसा मज़ाक बिल्कुल पसंद नहीं।मैं तो तेरी वजह से झेले जा सही हूँ ।'
'झेल तू रही है कि मैं?ऐसा पेटू बना रखा है उसे ,फिर भी खिलाने पर तुली रहती है ।
'मैं कि तू ?मैं सोचती हूँ ये खिलारही है तो मैं क्यों पीछे रहूँ मैंरी तरफ़ से और खालें ,सारा खा डालें ?'
मुझे क्या करना । तू खुद ध्यान रख अपने पति का ।'
अपने का ध्यान मैं रख लूंगी तू,यहाँ तो तेरा है तू सँभाल ,मैं तो हैरान हो रही हूँ देख देख कर ।'
मेरा काहे को होता ?तू लाई है अपने साथ,तोहमत मत लगा।'
'झूठी कहीं की । उसका बैग रख कर तूने खींच कर बैठाल लिया ।
मैं तो तेरा समझ कर खातिर कर रही थी।चाहे जैसा हो है तो तेरा पति ।'
'ट्रेन से देखा था मैं ने ,बराबर से साथ खड़ा किये थी ,जैसे अपना खसम हो ।'
मेरा ध्यान तो तुझ पर लगा था ,बराबर में कौन खड़ा है मुझे क्या पता ।तू ही तो खींच कर जबर्दस्ती पकड़ लाई ।'
'चल हट,ऐसा लीचड ,पेटू मेरा पति ,क्यों होने लगा ?'
'तू ही उसे ठूँस-ठूस कर खिला रही थी ,मुझे तो देख देख कर कोफ्त हो रही थी ,कि इसमें तो शादी के बाद शरम -हया कुछ बची ही नहीं ।'
'मैं तो तेरा पति समझ कर हर तरह से खातिर कर रही थी ।चाहे जैसा हो, है तो तेरा पति -.यही सोचा मैने ।'
'बस बस ,जुबान सम्हाल कर बोल ।'
'तू जुबान सम्हाल अपनी ।ऐसे आदमी को मेरा पति कैसे समझा तूने ?'
'बस खबरदार !।तेरा सामान वह सहेज रहा था ,जैसे तेरा अपना पति हो और इल्जाम मुझ पर ।'
'ट्रेन से देखा था मैंने ,बराबर से साथ खडा किये थी जैसे तेरा खसम हो ।'
हम दोनो में तू-तू मैं-मैं होने लगी 1एक दूसरी को कहनी अनकहनी सब कह डालीं ।अभी यह प्रकरण चल ही रहा था ,कि वह आदमी आता दिखाई दिया -हाथ में एक पैकेट पकडे था ,ऊपर झलकती चिकनाई से लग रहा था समोसे,कचौरी कुछ ले कर आया है ।
मैंने झपट कर पूछा ,'आप कौन हैं ?'
'मैं ,मैं ।मैं तो ..'
हम दोनों तुली खड़ी थीं वह कुछ घबरा गया।
उसकी बात पूरी होने से पहले ही रितिका डपट पडी ,'आप हमारे साथ क्यों चले आये ?अपने रास्ते नहीं जा सकते थे ?'
वह सकपका गया ,'मैं कोई अपने मन से तो आया नहीं ।आप दोनों ने इतना आग्रह किया ..'
'पर आप बता तो सकते थे ..।'
'क्या बताता ?आपने कुछ पूछा भी?मैं समझा आप दोनों अकेली हैं ,इस शहर में...'
'बस,बस बहुत हो गया ।उठाइये सामान और अपना रास्ता पकडिये ।'
' ये समोसे लाया था आप लोगों के लिये ।'
'नहीं चाहियें हमे आपके समोसे न जान न पहचान !'
वह चकराया-सा खडा था,' आप लोगों को मैं बिल्कुल समझ नहीं पाया।
' समझने की जरूरत भी नहीं ,रास्ता पकडिये अपना ।'
'अजीब महिलाये हैं, ' बुदबुदाते हुये उसने अपना बैग उठाया ,एक विचित्र दृष्टि हम दोनो पर डाली और चल दिया ।
एक दूसरी को कुपित दृष्टि से देखते हम लोगों ने भी अपना-अपना रास्ता पकडा ।
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मैने यह बात किसी को नहीं बतायी ।उसने भी नहीं बताई होगी मुझे पूरा विश्वास है ।कोई बताये भी तो किस मुँह से ?पर इसमे मेरी क्या गलती जो वह मुझसे कुपित है ? दो साल बीत गये हैं ।अब उसके पति का पत्र मेरे पति के पास आया है ,दोनो विस्मित हैं कि हम लोगों को हो क्या गया है जो चिट्ठी न पत्री .एक दूसरी की चर्चा भी नहीं ।वे लोग इसी शहर में एक विवाह में आ रहे हैं ।
हम चारों मिलेंगे जरूर ।देखो, आगे क्या होता है !
*
बुधवार, 21 जुलाई 2010
क़ीमत
रोने की धीमी-धीमी आवाज़ अब भी उसे सुनाई दे रही है ।
'क्या सोच रही हो ,डार्लिंग ?ऐसी सोई-सोई निगाहें जैसे तुम किसी दूसरी दुनिया में होओ ।'
उसका मुँह अपनी ओग घुमाकर आदमी ने उसे और निकट खींच लिया।तंबाकू और शराब की भभक से मोतिया को उबकाई आने लगी ।
रात काफ़ी बात चुकी थी । एक बजा होगा उसने सोचा ,इन आदमियों को नींद नहीं आती ? फिर स्वयं को समझाया उसने -पैसा दिया है .उसकी कीमत तो वसूल करेगा ही ।उसके दबाव से छुटकारा पाने के लिये उसने पूछा,'पानी लेंगे ..?'
'पानी ?' कीचड़ से भरी आँखें मिचमिचा कर भरभराती आवाज़ में वह बोला ,'हम पानी नहीं पीते डार्लिंग ,हमारी प्यास तो उससे बुझती है... ,' उसने बोतल की ओर इशारा किया ।
..'और तुम्हारे शबाब से ..।'अच्छा चलो एक पेग और पिला दो ।'
वह कपड़े सम्हाल कर उठी ।
और शराब .और नशा ,और वहशीपन ! होश में रहते हुये भी कौन सी कसर छोड़ देते हैं जो शराब पी-पी कर और दरिन्दे बन जाते हैं ।
गिलास पकड़ाते-पकड़ाते उसे लगा बच्चे के रोने की आवाज़ और धीमी हो गई है ।
कहाँ तक रोयेगा ! थक गया होगा ,रोते-रोते गला सूख रहा होगा ।पाँच महीने का कमज़ोर सा बीमार बच्चा ,नौ बजे से अकेला पड़ा है ।मन रो उठा मोतिया का ।
रोने की आवाज़ बार-बार रुक जाती थी, फिर धीमे-धीमे सुनाई देने लगती थी ।यह आदमी क्या बहरा है ?इसे कुछ सुनाई नहीं देता !पर इसका ध्यान जायेगा ही क्यों ?बच्चा दूसरे कमरे में है ,दरवाज़ा बंद है ।रोने की आवाज़ भी इतनी धीमी कि पूरा ध्यान दिये बिना पता ही न चले ।
इसके बच्चे होंगे या ?..होंगे घर पर बीवी बच्चे ,यहाँ हम जैसी ...।
वह धीमी आवाज़ मोतिया का कलेजा चीरे डाल रही थी ।
बच्चा तो मेरा है .मुझे तो सुनाई देगा ही ।और कौन सुनेगा ?जैसे ही आवाज़ रुकती है उसका सारा ध्यान उधर ही केन्द्रित हो जाता है ।।उसे लगा मेरे मन का भ्रम तो नहीं है ,बच्चा रो रहा हो और मुझे लग रहा हो चुप हो गया ? थक कर सो गया ।..नही । सोयेगा कैसे ?भूखा जो है ।आठ बजे दूध पिलाया था ।।जब से बीमार पड़ा है ठीक से पीता ही कहाँ है !जरा-सा पिया और मुँह झटक लिया ।और अब तो रात का डेढ बजने आया ।भीगा होगा ,हो सकता है गंदा भी पड़ा हो । गला सूख गया होगा ! कोई कम रोया है !
ठंड में पड़ा होगा भीगा-भागा ।कहाँ तक रोयेगा ?आज वैसे भी गले से आवाज़ नहीं निकल रही है ।
उसकी आँखों में आँसू आ गये ।
'ये भरी-भरी आँखें ! क्या खूबसूरती है !बस आँखों में ही सम्हाले रखना , ढुलक न जायें कहीं ।वाह ,क्या अदा है ,मेरा जान !इसी पर तो मरते हैं हम ।'
उसने अपनी ओर फिर खींच लिया ।मोतिया ने मुख घुमा कर आँसू पोंछ लिये ।
'रोओ,मत ।आई हेट टियर्ज।तुम्हारी वजह से मैंने पच्चास रुपये ज़्यादा दिये हैं ।बिल्कुल नई-नई आई हो न अभी । हाँ लगती भी हो एकदम नई ।नहीं तो सौ रुपये कुछ कम नहीं थे ।..और मेरी जान ,हमारे साथ हो ,मौज करो ।ये रोना क्यों आ रहा है ?'
'आपका प्यार देख कर घरावालों की बेइन्साफ़ी याद आ गई साहब !'
खुश होकर वह और उत्तेजित हो उठा ,मोटी-मोटी उँगलियों का दबाव असहनीय हो उठा ।पर सवा सौ रुपये बहुत होते हैं ।
पच्चीस तो होटलवाला रखेगा ।बच्चे की दवा ,उसका अपना पेट ,जिसे भरे बिना बच्चा भूखा रहेगा ।और खोली का तीन महीने का किराया ,जिसे वसूलने मालिक का आदमी हर चौथे-पाँचवें दिन आ बैठता है ।उसकी आँखें और बातें डर पैदा करती हैं ।एक महीने का किराया तो दे ही देगी ।फिर एक महीने तो पीछा छोड़ेगा ।और कहीं खोली भी कहाँ मिलेगी रहने के लिये ?
भाई को लिखा था ले जाय आकर ।पर ढाई महीना हो गया इन्तज़ार करते-करते , चिट्ठी तक नहीं आई ।पता नहीं वहीं है या कहीं और चला गया ।।ससुराल में बूढ़ी सास के अलावा जेठ हैं पर उनने कभी मतलब नहीं रखा । यहीं रहना है मोतिया को तो ।कोई काम ढूँढ लेगी । शुरू-शुरू में चार छः दिन पास-पड़ोसियों ने पूछा। पर वे भी कितना करते ?सबके अपने-अपने रोने ।खोली के बाहर नये-नये चेहरे दिखाई देने लगे हैं । उसे देख कर मुस्कराते हैं, गाते हैं । किससे कहे मोतिया ? बच्चे को ले कर चुपचाप पड़ी रहती है ।
'हमें खुशी चाहिये,पैसे दिये हैं मुँह लटकाने के लिये नहीं ।'
वह मुस्करा दी ।
शराब का भभका जैसे सिर में चढा जा रहा है ।वह मुँह घुमाती है पर मोटा-सा हाथ उसका मुँह अपनी ओर घुमा लेता है ।
साँस लेना मुश्किल हो रहा है ।दम घुटा जा रहा है वह अपना सिर एक ओर करने की कोशिश करती है ।
'दूर-दूर क्यों भागती हो मेरी जान ,बस यों लेटी रहो ।
होठों पर थूक लगा है ,गाल चिपचिपा रहे हैं ।बाँह उठा कर वह पोंछ लेती है । ठीक से साँस भी नहीं लेने देता।
लगता है सो गया है ।।उसने अलग होने की चेष्टा की तो और जकड़ लिया ।
रोने की धीमी आवाज़ रुक-रुक कर आ रही है ।
क्या बात है डार्लिंग ?'
'कुछ नहीं '
'फिर इतनी ठंडी क्यों हो ? एक पेग ले लो सब दुरुस्त हो जायेगा ।मौज करो मेरे खर्चे पर ।'
वह उसके मुँह से लगाना चाहता है ।मोतिया ने मुँह फेर लिया ,'हम नहीं पीते साहब ।कभी नहीं पी ।आदत ही नहीं है '
मोतिया का पेट भूख के मारे ऐंठ रहा है ।
'तुम्हारा आदमी तो पीता होगा ?
''उसकी बात मत करिये , साहब ।'
उसकी बात ! वह होता तो यह नौबत क्यों आती ।कैसे चाव से लाया था इस शहर में ।ढाई साल ही तो हुये थे ब्याह को ।क्या मालूम था दंगे में गोली उसी को लगेगी !उसे तो पता भी नहीं था कपड़े लेकर कहाँ-कहाँ फेरी लगाने जाता है ।मंदिर और मस्जिद के बीच की जगह थी ।एक दम झगड़े की आवाज़ें आने लगीं । भगदड़ मच गई ,फटाफट दूकाने बंद होने लगीं ।ईंट-पत्थर ,छुरेबाज़ी ,मार-काट और फिर गोलयाँ चलने लगीं ।एक गोली आकर सिंभू -मोतिया के घरवाले , को लगी ।पड़ोस के बिन्देसरी ने बताया था -सिंभू उस मोहल्ले में अक्सर फेरी लगाने जाता है ।दो दिन तो कुछ पता नहीं चला ।और पता चला तो रोती-कलपती मोतिया तीन महीने के बच्चे को लेकर पहुँची ।हाथ आई चिरी-कटी लाश ,जो पहचानी भी नहीं जा रही थी ।
पर रोने पीटने से तो आदमी जिन्दा नहीं होता ।
'साहब ,हमें तो आपके लिये लग रहा है ।घर पर किसी ने खाली पेट पीने को मना नहीं किया ?बस ,बस ।अब खाली पेट नहीं।कुछ खाने को मँगाओ खाओ, तब ...।'
'तुम भी खाओगी ' वह खुश होकर बोला ।
खाली पेट तो बस रोना आयेगा ,फिर बच्चे का पेट भी तो भरना है ।
'हाँ हाँ ,आपका साथ फिर कौन देगा ?
'लो अभी मँगाता हूँ ।'
फ़ौरन बैरे को आर्डर दिया ,दो प्लेट बढिया खाना फ़ौरन ले कर आओ ।'
वाह खाना ।खाती है ,खिलाती भी है ।वह खुश हो रहा है ।
मोतिया उसके चेहरे को देखती है लाल-लाल आँखें ,चारों ओर कालिख !देख कर मन खराब हो गया ।
चलो थोड़ी देर और सही ।अब तो पेट भरा है ,कहाँ तक नहीं सोयेगा !
आज छुट्टी मिल जाय बस ! बच्चे को सम्हाल लेगी ।बस, कल उसकी दवा और दूध की बात है ।फिर तो कहीं काम ढूँढ लेगी ।
चौका-बर्तन ,कुटना-पिसना सब करेगी ।इस होटल में कभी नहीं आयेगी ।
होटलवाला तो कबसे बुला रहा था ,वही तैयार नहीं होती थी ।पर भूख और बच्चे की बीमारी ने लाचार कर दिया ।तब मजबूर होकर खुद आई ।बच्चे को हर कीमत पर ज़िन्दा रखना है ।
'चल, अकल तो आई तुझे ,' होटलवाले ने कहा था ।बच्चे को पास के स्टोर में सुलाने की व्यवस्था भी कर दी थी ।
'आ जाया कर मोती ।किसी को पता नहीं चलेगा ।आखिर को ज़िन्दा तो रहना है ।'
अचानक मोतिया को बड़ा सन्नाटा लगने लगा ।कान लगा कर सुना ।नहीं आवाज़ नहीं आ रही ।सो गया ?थक कर चुप हो गया ? शायद रोते-रोते गला बिल्कुल बैठ गया ?आवाज़ बिल्कुल नहीं सुनाई दे रही ।
ध्यान से सुनने की कोशिश करती है ।नहीं सिसकी भी नहीं ।बिल्कुल शान्ति !
थोड़ा-थोड़ा खिसक कर वह उठ कर खड़ी हो जाती है ।
कहीं चेत न जाय, नही तो फिर टूट पड़ेगा ।जानवर भी ऐसे नहीं होते ।गिद्ध है, गिद्ध !
आदमी ने करवट बदली ।मुँह खुल गया ।लार बह चली ।घिना कर मोतिया परे हट गई ।
स्थूल शरीर विकृत चेहरा ।घृणा हो आई उसे ।
भरभराती आवाज़ आई - 'कहाँ चलीं जान ?'
बड़ा जुलम किया है साहब !अंग-अंग चटका जा रहा है ।आप तो बड़े ..अब क्या कहें शरम आती है ..।'
' हूँ ।
आदमी पर सुस्ती छाई है ।'
'तुम बहुत अच्छी हो ।चलो आज छुट्टी तुम्हारी ।'फिर कब ? '
'अरे साहब ,आप जब कहें दौड़ कर आऊँगी ।'
फिर हिम्मत कर बोली ,'तो अब आराम कीजिये ।'
'हूँ।'
उसने रुपये उठाये और दरवाज़ा खोल कर भागी ।
भड़ से स्टोर का दरवाज़ा खोलती हुई भीतर घुसी ।
अंदर धीमी रोशनी में बिल्कुल शान्ति !
झुक कर जमीन पर बिछी चौतहा चादर टटोली ।सारे कपड़े भीगे हैं ।कितना ठंडा हो गया ।एक तो सर्दी ऊपर से भीगे कपड़े ।
उसने बच्चे को उठा कर पेट से लगा लिया ।
कहीं कोई हरकत नहीं !
हिलाय-डुलाया ।कुछ अंतर नहीं पड़ा ।उसने झट से उसे चादर पर रखा । सिर एक ओर लुढ़क गया ,हाथ-पाँव अकड़े हुये ,स्पंदनहीन ,निर्जीव !
ब्लाउज़ के बटन बंद नहीं ,कंधे का स्ट्रैप खुलकर नीचे लटक आई ब्रॉ, फूल कर उभऱ आये नीले-नीले निशान दिख रहे हैं ।ढीले से पेटीकोट में घुरसा साड़ी का एक कोना ,बाकी देहरी के बाहर घिसटती पड़ी हुई ।
रुपये हाथ से गिर कर बिखर गये ।वह आँखें फाड़े बच्चे की लाश को घूरे जा रही है !
**
-- प्रतिभा सक्सेना.
'क्या सोच रही हो ,डार्लिंग ?ऐसी सोई-सोई निगाहें जैसे तुम किसी दूसरी दुनिया में होओ ।'
उसका मुँह अपनी ओग घुमाकर आदमी ने उसे और निकट खींच लिया।तंबाकू और शराब की भभक से मोतिया को उबकाई आने लगी ।
रात काफ़ी बात चुकी थी । एक बजा होगा उसने सोचा ,इन आदमियों को नींद नहीं आती ? फिर स्वयं को समझाया उसने -पैसा दिया है .उसकी कीमत तो वसूल करेगा ही ।उसके दबाव से छुटकारा पाने के लिये उसने पूछा,'पानी लेंगे ..?'
'पानी ?' कीचड़ से भरी आँखें मिचमिचा कर भरभराती आवाज़ में वह बोला ,'हम पानी नहीं पीते डार्लिंग ,हमारी प्यास तो उससे बुझती है... ,' उसने बोतल की ओर इशारा किया ।
..'और तुम्हारे शबाब से ..।'अच्छा चलो एक पेग और पिला दो ।'
वह कपड़े सम्हाल कर उठी ।
और शराब .और नशा ,और वहशीपन ! होश में रहते हुये भी कौन सी कसर छोड़ देते हैं जो शराब पी-पी कर और दरिन्दे बन जाते हैं ।
गिलास पकड़ाते-पकड़ाते उसे लगा बच्चे के रोने की आवाज़ और धीमी हो गई है ।
कहाँ तक रोयेगा ! थक गया होगा ,रोते-रोते गला सूख रहा होगा ।पाँच महीने का कमज़ोर सा बीमार बच्चा ,नौ बजे से अकेला पड़ा है ।मन रो उठा मोतिया का ।
रोने की आवाज़ बार-बार रुक जाती थी, फिर धीमे-धीमे सुनाई देने लगती थी ।यह आदमी क्या बहरा है ?इसे कुछ सुनाई नहीं देता !पर इसका ध्यान जायेगा ही क्यों ?बच्चा दूसरे कमरे में है ,दरवाज़ा बंद है ।रोने की आवाज़ भी इतनी धीमी कि पूरा ध्यान दिये बिना पता ही न चले ।
इसके बच्चे होंगे या ?..होंगे घर पर बीवी बच्चे ,यहाँ हम जैसी ...।
वह धीमी आवाज़ मोतिया का कलेजा चीरे डाल रही थी ।
बच्चा तो मेरा है .मुझे तो सुनाई देगा ही ।और कौन सुनेगा ?जैसे ही आवाज़ रुकती है उसका सारा ध्यान उधर ही केन्द्रित हो जाता है ।।उसे लगा मेरे मन का भ्रम तो नहीं है ,बच्चा रो रहा हो और मुझे लग रहा हो चुप हो गया ? थक कर सो गया ।..नही । सोयेगा कैसे ?भूखा जो है ।आठ बजे दूध पिलाया था ।।जब से बीमार पड़ा है ठीक से पीता ही कहाँ है !जरा-सा पिया और मुँह झटक लिया ।और अब तो रात का डेढ बजने आया ।भीगा होगा ,हो सकता है गंदा भी पड़ा हो । गला सूख गया होगा ! कोई कम रोया है !
ठंड में पड़ा होगा भीगा-भागा ।कहाँ तक रोयेगा ?आज वैसे भी गले से आवाज़ नहीं निकल रही है ।
उसकी आँखों में आँसू आ गये ।
'ये भरी-भरी आँखें ! क्या खूबसूरती है !बस आँखों में ही सम्हाले रखना , ढुलक न जायें कहीं ।वाह ,क्या अदा है ,मेरा जान !इसी पर तो मरते हैं हम ।'
उसने अपनी ओर फिर खींच लिया ।मोतिया ने मुख घुमा कर आँसू पोंछ लिये ।
'रोओ,मत ।आई हेट टियर्ज।तुम्हारी वजह से मैंने पच्चास रुपये ज़्यादा दिये हैं ।बिल्कुल नई-नई आई हो न अभी । हाँ लगती भी हो एकदम नई ।नहीं तो सौ रुपये कुछ कम नहीं थे ।..और मेरी जान ,हमारे साथ हो ,मौज करो ।ये रोना क्यों आ रहा है ?'
'आपका प्यार देख कर घरावालों की बेइन्साफ़ी याद आ गई साहब !'
खुश होकर वह और उत्तेजित हो उठा ,मोटी-मोटी उँगलियों का दबाव असहनीय हो उठा ।पर सवा सौ रुपये बहुत होते हैं ।
पच्चीस तो होटलवाला रखेगा ।बच्चे की दवा ,उसका अपना पेट ,जिसे भरे बिना बच्चा भूखा रहेगा ।और खोली का तीन महीने का किराया ,जिसे वसूलने मालिक का आदमी हर चौथे-पाँचवें दिन आ बैठता है ।उसकी आँखें और बातें डर पैदा करती हैं ।एक महीने का किराया तो दे ही देगी ।फिर एक महीने तो पीछा छोड़ेगा ।और कहीं खोली भी कहाँ मिलेगी रहने के लिये ?
भाई को लिखा था ले जाय आकर ।पर ढाई महीना हो गया इन्तज़ार करते-करते , चिट्ठी तक नहीं आई ।पता नहीं वहीं है या कहीं और चला गया ।।ससुराल में बूढ़ी सास के अलावा जेठ हैं पर उनने कभी मतलब नहीं रखा । यहीं रहना है मोतिया को तो ।कोई काम ढूँढ लेगी । शुरू-शुरू में चार छः दिन पास-पड़ोसियों ने पूछा। पर वे भी कितना करते ?सबके अपने-अपने रोने ।खोली के बाहर नये-नये चेहरे दिखाई देने लगे हैं । उसे देख कर मुस्कराते हैं, गाते हैं । किससे कहे मोतिया ? बच्चे को ले कर चुपचाप पड़ी रहती है ।
'हमें खुशी चाहिये,पैसे दिये हैं मुँह लटकाने के लिये नहीं ।'
वह मुस्करा दी ।
शराब का भभका जैसे सिर में चढा जा रहा है ।वह मुँह घुमाती है पर मोटा-सा हाथ उसका मुँह अपनी ओर घुमा लेता है ।
साँस लेना मुश्किल हो रहा है ।दम घुटा जा रहा है वह अपना सिर एक ओर करने की कोशिश करती है ।
'दूर-दूर क्यों भागती हो मेरी जान ,बस यों लेटी रहो ।
होठों पर थूक लगा है ,गाल चिपचिपा रहे हैं ।बाँह उठा कर वह पोंछ लेती है । ठीक से साँस भी नहीं लेने देता।
लगता है सो गया है ।।उसने अलग होने की चेष्टा की तो और जकड़ लिया ।
रोने की धीमी आवाज़ रुक-रुक कर आ रही है ।
क्या बात है डार्लिंग ?'
'कुछ नहीं '
'फिर इतनी ठंडी क्यों हो ? एक पेग ले लो सब दुरुस्त हो जायेगा ।मौज करो मेरे खर्चे पर ।'
वह उसके मुँह से लगाना चाहता है ।मोतिया ने मुँह फेर लिया ,'हम नहीं पीते साहब ।कभी नहीं पी ।आदत ही नहीं है '
मोतिया का पेट भूख के मारे ऐंठ रहा है ।
'तुम्हारा आदमी तो पीता होगा ?
''उसकी बात मत करिये , साहब ।'
उसकी बात ! वह होता तो यह नौबत क्यों आती ।कैसे चाव से लाया था इस शहर में ।ढाई साल ही तो हुये थे ब्याह को ।क्या मालूम था दंगे में गोली उसी को लगेगी !उसे तो पता भी नहीं था कपड़े लेकर कहाँ-कहाँ फेरी लगाने जाता है ।मंदिर और मस्जिद के बीच की जगह थी ।एक दम झगड़े की आवाज़ें आने लगीं । भगदड़ मच गई ,फटाफट दूकाने बंद होने लगीं ।ईंट-पत्थर ,छुरेबाज़ी ,मार-काट और फिर गोलयाँ चलने लगीं ।एक गोली आकर सिंभू -मोतिया के घरवाले , को लगी ।पड़ोस के बिन्देसरी ने बताया था -सिंभू उस मोहल्ले में अक्सर फेरी लगाने जाता है ।दो दिन तो कुछ पता नहीं चला ।और पता चला तो रोती-कलपती मोतिया तीन महीने के बच्चे को लेकर पहुँची ।हाथ आई चिरी-कटी लाश ,जो पहचानी भी नहीं जा रही थी ।
पर रोने पीटने से तो आदमी जिन्दा नहीं होता ।
'साहब ,हमें तो आपके लिये लग रहा है ।घर पर किसी ने खाली पेट पीने को मना नहीं किया ?बस ,बस ।अब खाली पेट नहीं।कुछ खाने को मँगाओ खाओ, तब ...।'
'तुम भी खाओगी ' वह खुश होकर बोला ।
खाली पेट तो बस रोना आयेगा ,फिर बच्चे का पेट भी तो भरना है ।
'हाँ हाँ ,आपका साथ फिर कौन देगा ?
'लो अभी मँगाता हूँ ।'
फ़ौरन बैरे को आर्डर दिया ,दो प्लेट बढिया खाना फ़ौरन ले कर आओ ।'
वाह खाना ।खाती है ,खिलाती भी है ।वह खुश हो रहा है ।
मोतिया उसके चेहरे को देखती है लाल-लाल आँखें ,चारों ओर कालिख !देख कर मन खराब हो गया ।
चलो थोड़ी देर और सही ।अब तो पेट भरा है ,कहाँ तक नहीं सोयेगा !
आज छुट्टी मिल जाय बस ! बच्चे को सम्हाल लेगी ।बस, कल उसकी दवा और दूध की बात है ।फिर तो कहीं काम ढूँढ लेगी ।
चौका-बर्तन ,कुटना-पिसना सब करेगी ।इस होटल में कभी नहीं आयेगी ।
होटलवाला तो कबसे बुला रहा था ,वही तैयार नहीं होती थी ।पर भूख और बच्चे की बीमारी ने लाचार कर दिया ।तब मजबूर होकर खुद आई ।बच्चे को हर कीमत पर ज़िन्दा रखना है ।
'चल, अकल तो आई तुझे ,' होटलवाले ने कहा था ।बच्चे को पास के स्टोर में सुलाने की व्यवस्था भी कर दी थी ।
'आ जाया कर मोती ।किसी को पता नहीं चलेगा ।आखिर को ज़िन्दा तो रहना है ।'
अचानक मोतिया को बड़ा सन्नाटा लगने लगा ।कान लगा कर सुना ।नहीं आवाज़ नहीं आ रही ।सो गया ?थक कर चुप हो गया ? शायद रोते-रोते गला बिल्कुल बैठ गया ?आवाज़ बिल्कुल नहीं सुनाई दे रही ।
ध्यान से सुनने की कोशिश करती है ।नहीं सिसकी भी नहीं ।बिल्कुल शान्ति !
थोड़ा-थोड़ा खिसक कर वह उठ कर खड़ी हो जाती है ।
कहीं चेत न जाय, नही तो फिर टूट पड़ेगा ।जानवर भी ऐसे नहीं होते ।गिद्ध है, गिद्ध !
आदमी ने करवट बदली ।मुँह खुल गया ।लार बह चली ।घिना कर मोतिया परे हट गई ।
स्थूल शरीर विकृत चेहरा ।घृणा हो आई उसे ।
भरभराती आवाज़ आई - 'कहाँ चलीं जान ?'
बड़ा जुलम किया है साहब !अंग-अंग चटका जा रहा है ।आप तो बड़े ..अब क्या कहें शरम आती है ..।'
' हूँ ।
आदमी पर सुस्ती छाई है ।'
'तुम बहुत अच्छी हो ।चलो आज छुट्टी तुम्हारी ।'फिर कब ? '
'अरे साहब ,आप जब कहें दौड़ कर आऊँगी ।'
फिर हिम्मत कर बोली ,'तो अब आराम कीजिये ।'
'हूँ।'
उसने रुपये उठाये और दरवाज़ा खोल कर भागी ।
भड़ से स्टोर का दरवाज़ा खोलती हुई भीतर घुसी ।
अंदर धीमी रोशनी में बिल्कुल शान्ति !
झुक कर जमीन पर बिछी चौतहा चादर टटोली ।सारे कपड़े भीगे हैं ।कितना ठंडा हो गया ।एक तो सर्दी ऊपर से भीगे कपड़े ।
उसने बच्चे को उठा कर पेट से लगा लिया ।
कहीं कोई हरकत नहीं !
हिलाय-डुलाया ।कुछ अंतर नहीं पड़ा ।उसने झट से उसे चादर पर रखा । सिर एक ओर लुढ़क गया ,हाथ-पाँव अकड़े हुये ,स्पंदनहीन ,निर्जीव !
ब्लाउज़ के बटन बंद नहीं ,कंधे का स्ट्रैप खुलकर नीचे लटक आई ब्रॉ, फूल कर उभऱ आये नीले-नीले निशान दिख रहे हैं ।ढीले से पेटीकोट में घुरसा साड़ी का एक कोना ,बाकी देहरी के बाहर घिसटती पड़ी हुई ।
रुपये हाथ से गिर कर बिखर गये ।वह आँखें फाड़े बच्चे की लाश को घूरे जा रही है !
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-- प्रतिभा सक्सेना.
सोमवार, 12 जुलाई 2010
भूखा कहीं का -
*
किंडर-गार्टन से जो पढ़ाई शुरू हुई, तो साल-दर-साल गुज़रते गये और वह द्रौपदी के चीर सी लंबाती चली गई ।बी.ए.पास करते-करते मन पढ़ाई से भर गया ।उन्हीं दिनों समझा जाने लगा था ,जिसने बी.एड. कर लिया उसने बड़ा तीर मार लिया ।मैंने भी सोचा ,जिस काम में जीवन का एक युग से भी अधिक झोंक दिया ,वहाँ एक साल और सही ।सच तो यह है कि होस्टल में रह कर पढने का आकर्षण था ,जो मैंने बी.एड. ज्वाइन कर लिया ।
खींच-तान औऱ दौड़-भाग में साल बीता । इम्तहान देकर सोचा ,चलो अब पढाई का भूत सिर से उतरा ।मुक्ति का एहसास घर पहुँचने की उत्सुकता को चौगुना किये दे रहा था ।एक और अच्छी बात थी कि घर तक की यात्रा नें मुझे अकेले रह कर बोर नहीं होना था ,होस्टल की मेरी साथिन और उदीयमान लेखिका आरती मेरे साथ थी ।उसे तो मुझसे भी आगे जाना था ।
होस्टल से बोरिया -बिस्तर समेट कर हमने घर की राह पकड़ी ।बमुश्किल दो स्टेशन निकले होंगे कि ट्रेन रुक गई ।पहले इन्तज़ार होता रहा ,अब चली ,अब चली ,फिर लोग नीचे उतरने लगे ।और फिर वहीं चहल-कदमी करने लगे ।जितनी जल्दी घर पहुँचने की थी उतनी ही देर होती जा रही थी । चलते-फिरते लोग ख़बरें लाने लगे -'आगे लाइन टूटी है ' ,'एक्सीडेन्ट हो गया है ', 'आगे पटरियों पर डब्बे उलटे पड़े हैं ' ,'ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी ','अगले स्टेशन से फ़ोन आया है कि इस लाइन की ट्रेनें मत छोड़ो' वगैरह,वगैरह ।जितने मुँह उतनी बातें ।
'पता नहीं घर कब पहुँचेंगे ?'
'तू तो फिर भी पहुँच जायेगी ,अभी तो हम दो जनें हैं ,' आरती की चिन्ता थी ,'मुझे तो इतनी आगे अकेले जाना है ।बड़ी मुश्किल हो जायेगी ।'
हमारा डब्बा प्लेटफ़ार्म से थोड़ा आगे था ।लोग खाने-पीने का सामान खरीदने के लिये दौड़ लगा रहे थे - पता नहीं कितनी देर पड़े रहना पड़े !छोटा-सा स्टेशन !कुछ फलों के ठेले और एकाध चायवाले !
चलते-फिरते मुसाफ़िर ख़बर लाये कि कि वहाँ प्लेटफ़ार्म पर तो इसी के पीछे छीना-झपटी मची है ,वो तो ये कहो कि अभी सिर-फुटौव्वल की नौबत नहीं आई ।
'वो देखो उधऱ गाँव की तरफ़ से कोई केलों का टोकरा लिये चला आ रहा है ।।'
'बुला लो भाई ,बेचेगा ही तो ।हमीं खरीद लें ।'
कुछ लोग जाकर उसे घेर लाये । और डिब्बों के यात्री भी दौड़ पड़े ।
'नहीं भाई ,ये तो हमारे डब्बेवालों ने चुकता कर लिया है ।'
हमारे डिब्बे में धूम मच गई ।
'अरे भई, केलेवाले ,इधऱ !'
'ओये ,इधऱ को देख !'
'केला देना भाई ?'
दनादन केले खरीदे जा रहे थे ।केलों का पूरा -का -पूरा टोकरा हमारे डिब्बे में आ गया ।दाम दुगने हैं तो क्या हुआ ,पेट में तो पड़ेगा कुछ !
सबसे पैसे इकट्ठे हुये और एक-एक केला बाँट दिया गया सबको ।।एक यात्री एक लड़के को पकड़ लाया ।उसके झोले में बिस्कुटों के छोटे-छोटे पैकेट भरे थे ।
'बाहर तो लूट मची है ।सारी ट्रेन के लोग जुटे पड़े हैं ।इसे पकड़ नहीं लाता तो हमें कुछ नहीं मिलता ।'
'दो पैकेट इधर देना ।'
'ना भाई ना । एक व्यक्ति को एक पैकेट।आखिर सभी को चाहिये ।'
'अरे ,औरों को तो इतना भी नहीं मिल पायेगा ।'
'क्यों आरती ,तुम्हारी मौसी इसी स्टेशन पर तो आईं थीं ?
'हाँ ,पर अबकी बार मैंने मना कर दिया था ।आतीं तो कहतीं -छुट्टियों में कुछ दिन रुक जाओ । मैं तो पहले जाकर अपने घर रहूँगी ,फिर सोचूँगी कहीं और का ।'
ट्रेन में बड़ी गर्मी थी ।सब लोग उतरने लगे ।
' कम से कम चार घंटे लगेंगे !आगे का मलवा साफ़ होगा तब ट्रेन बढ़ेगी यहाँ से । '
' चलो आगे ,उधऱ दुकान के पास चलकर बैठते हैं ।उधऱ वेटिंग-रूम है ,' आरती से कहा मैंने ।
'सोच रही हूँ ,मौसी के घर हो आऊँ ।'
'और मैं अकेले रहूँगी यहाँ ?'
'तुमसे कितनी आगे मुझे अकेले जाना है ,कुछ पेट-पूजा का हिसाब भी तो चाहिये ।अच्छा तू भी चल न!'
'ना बाबा ,तू ही जा ।ये सामान भी तो देखना है ' मैंने कहा 'लेकिन आरती ज़रा रुक ।मैं जरा टायलेट तक जाऊँगी ।'
मैंने साबुन तौलिया निकाला और पर्स उसे पकड़ा दिया ,'सामान का ध्यान रखना ।'
आँखों पर पानी के छींटे डाल मैंने ज़रा अपनी गत सुधारी ।बाहर आई तो मेरा माथा ठनका ।थोड़ी दूर वह एक लड़के के साथ खड़ी बतिया रही थी ।इतनी-सी देर में यह लड़का इसे कहाँ से मिल गया ?
मैंने आवाज़ लगाई ,'अरी ओ, आरती !'
'हाँ ,' पास आती हुई वह बोली ,'इससे मिल -अजीत है ,मेरा मौसेरा भाई । इसे पता लग गया ये मोटर साइकिल ले कर आया है । अब मैं जा रही हूँ ।'
'कितनी देर में लौटेगी ?'
'फ़िकर मत कर .जल्दी आ जाऊँगी ।'
'ट्रेन तो चार घंटे पहले नहीं चलने की ' अजीत बोला ।
चलते-चलते आरती ने पर्स पकड़ाया ,' 'विधु ,तेरा सारा सामान मैंने कंड़ी में सम्हाल कर रख दिया है ।देखना !'
मैंने हुँकारा भरा ,'अच्छा !'
मैं अकेली रह गई स्टेशन पर ।मेज़ पर जहाँ मैंने केले और बिस्कुय का पैकेट रखा था एक लड़का बैठ गया था आ कर ।
बैठा रहने दो ,ये तो स्टेशन है !पर बैठा कैसे ठाठ से है -कोई समझे सामने रखा सामान इसी का है !लो चाय भी आ गई उसके लिये !
तौलया -साबुन लिये ही लिये मैं उधर चली आई ,और दूसरी कुर्सी पर बैठ गई कि हाथ बढ़ा कर केला-बिस्कुट उठा सकूँ ।
कितनी देर हो गई ,अभी तक चाय नहीं लाया ,जब कि मैंने पहले ही कह दिया था । मैने छोकरे को इशारे से बुलाया ,' क्यों ,मेरी चाय कहाँ है ?'
'लाया था ,पर आप यहाँ थीं नहीं, तो मैंने सोचा ठंडी हो जायगी सो इन्हें दे दी ।'
कुर्सी पर बैठे लड़के ने हाथ बढ़ा कर केला उठाया ।
मेरा केला !
मैंने ध्यान से उसकी ओर देखा अजीब आदमी है ।अब वह केला छील रहा था ।चूक गई तो भूखी रह जाऊँगी ।
' ,सुनिये ,केला मुझे खाना है ।'
वह चौंका ।अधछिला केला मुँह के पास ले जाते -ले जाते ले जाते रुक गया ।
अजीब तरह से मेरी ओर देख कर बोला ,'हाँ ,हाँ लीजिये ।आप खा लीजिये ।'
अधछिला केला उसने मेरी तरफ़ बढा दिया ।
झपट्टा-सा मार कर केला ले लिया मैंने । यह केला तो मैं खाऊँगी ही । मैं झटपट केला खाने लगी ।
' आज स्टेशन पर नाश्ते के लिये कुछ नहीं है ,' लड़का कह रहा था ।
अब कैसी सफ़ाई दे रहा है , खाने के लिये कुछ नहीं है तो इसका यह मतलब नहीं कि दूसरे का उठा कर खा जाओ - मैंने सोचा पर कहा कुछ नहीं ।
दूसरे हाथ से मैंने बिस्कुट का पैकेट अपनी ओर खिसका लिया ।इसका क्या ठिकाना ,इसी पर हाथ साफ़ करने लगे ।
बस ,मेरे सोचने भर की देर थी ,उसने बिस्कुट का पैकेट अपनी ओर खींचा ,खोला और दो बिस्कुट निकाल कर दूसरी ओर देखते हुये खाने लगा ।
हद हो गई ।शराफ़त जैसी तो कोई चीज़ इस दुनिया में बची ही नहीं ।
छोकरा चाय का प्याला रख गया था ।कहीं मेरा कप उठा कर पीने न लग जाय !मैंने झटपट चाय उठाई और सिप करके रख दी -अब जूठी चाय तो लेने से रहा ।
फिर हाथ बढ़ा कर मैंने बिस्कुट का पैकेट उठाया और बिस्कुट निकाल कर खाने लगी । पैकेट को सावधानी से हाथ में पकड़े रही - कहीं फिर न उड़ा ले !
उसकी आँखों में बड़ा अजीब-सा भाव आया- कुछ सनक गया-सा लगता है ,मैंने सोचा । अच्छे-खासे भले घर का लगता है ।पर किसका दिमाग़ कब चल जाये क्या ठिकाना !
' इधऱ बढ़ाइये, ' उसकी दृष्ट बिस्कुटों पर थी ।मैं थोड़ा डर गई थी ।कहीं कुछ कर न बैठे , ऐसे लोगों का क्या ठिकाना !मैंने चुपचाप पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया ।
उसने बचे हुये में से आधे बिस्कुट निकाल लिये और बाकी का पैकेट मेरी ओर बढ़ा कर मुस्कराया । मैंने हाथ बढ़ाकर से पैकेट ले लिया -कहीं ये भी गये तो मैं तो भूखी ही रह जाऊँगी !
बिस्कुट खा कर वह खड़ा हो गया ।मैं मन-ही मन भुनभुना रही थी ।मुँह से निकला ,'कैसा भूखा है!'
उसने शायद सुन लिया ।पलट कर कुछ क्षण बड़े ताज्जुब से मेरी ओर देखा और आगे बढ़ गया ।
ऊँह, सुन लिया तो सुन ले !कोई झूठ कहा मैंने !दूसरे का सामान उठा कर कोई खाने लगे तो और क्या कहा जायेगा ?
लगता तो पढ़ा-लिखा है ।गुंडा भी नहीं लगता ।आँखों में कोई अप्रीतकर भाव भी नहीं ।फिर ? होगा !ऊपर से क्या पता लगता है कोई कैसा है ?
कैसे-कैसे लोग होते हैं ?लगता है दिमाग़ में कुछ खलल है ।फिर तो घर के लोगों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिये ।
छोड़ो ,मुझे भी क्या ?
दो-चार बिस्कुट ले लिये ।चलो , भूखा था ,खा गया !
मैंने अपना तौलिया -साबुन उठाया और आकर अपने सामान के पास बैठ गई ।
**
आरती अभी तक नहीं आई थी ।ढाई घंटा हो रहा था ।निश्चिन्त होकर बैठी होगी ।उसे क्या पता मैं किस मुसीबत में जा फँसी थी !बैठे-बैठे ऊँघ आने लगी मुझे ।
लो तीन घंटे हो गये ! आरती का कहीं पता नहीं ।अगर ट्रेन चल दे तो !
आराम से ठूँसे जा रही होगी !मैं यहाँ भूखी बैठी हूँ ।पर्स में से इलायची निकाल कर चबा रही थी कि वह आती दिखाई दी ।
आकर बोली ,' मैं तो डट कर खा आई हूं । तूने खाया कुछ?
'हाँ खाया तो है ,पर बताऊँगी पब ।'
'देख, मौसी ने तेरे लिये भी गरम-गरम पूड़ियाँ भेजी हैं ।और यह चाय-नाश्ता भी ।'
उसने पैकेट रखने के लिये कंडी का ढक्कन उठाया ,'अरे , तूने तो कुछ खाया नहीं विधू ? ये बिस्कुट,केला सब जस के तस रखे हैं ।'[
मैं चौंकी !
'मैंने तो निकाल कर मेज़ पर रखे थे ।'
'हाँ , तू टायलेट गई थी न तो मैंने उठा कर कंडी में धर दिये थे ।तुझे बताया तो था ।यहाँ सब भूखे हैं ,कोई उटा लेता तो ?तभी न जाते-जाते कह गई थी ।'
' हाय राम !'
मैं सर पकड़ कर बैठ गई । ..तो वह चीज़ें उसी की थीं !
मेरे सिर में घुमनी-सी आ रही थी ।
'क्या हुआ विधु ?क्या हुआ तुझे ?'
'कुछ नहीं ।'
'तबीयत तो ठीक हैं न तेरी ? गर्म-गर्म पूड़ी खा ले !'
'मुझे नहीं खानी ।'
'अरे क्या बात है ?अभी तू कुछ बताने को कह रही थी ?'
'नहीं, अब कुछ नहीं रहा बताने को ।'
'कैसी अजीब लड़की है ।'
ट्रेन अभी तक रुकी खड़ी है ।
मैंने चारों ओर सिर घुमा कर देखा ।वह कहीं दखाई नहीं दिया ।
'आरती , अब झटपट चल कर ट्रेन में बैठें।'
'हाँ अब तो चलनेवाली होगी ,अजित ने पता कर लिया था ।'
अपना सामान उठा कर मैं एकदम ट्रेन की तरफ़ चल दी ।
'अरे ,अरे ,आराम से चलेंगे ।अभी दस-पन्द्रह मिनट हैं ..' ,वह चिल्लाती रह गई।
सामने से आते हुये एक व्यक्ति से टकराते-टकराते बची ।
'इत्मीनान से चलिये,अभी नहीं छूटी जा रही ट्रेन ।'
मैंने डिब्बे में अपनी सीट पर आकर ही दम लिया ।
आरती को बस खाने की पड़ी है ।सामान ठिकाने से रख कर बोली ,'अब तू भी खा ले न विधू ,बेकार अभी से गर्मी में यहाँ चली आई ।'
'कहा न ,मुझे भूख नहीं है ।'
'अरे क्या हो गया तुझे ?अकेले रहना पड़ा ,गुस्सा आ रहा है मुझ पर ?'
मैं प्लेटफ़ार्म के दूसरी तरफ़ की खिड़की से मुँह बाहर निकाले बैठी हूँ ।मन-ही-मन मना रही हूं - हे भगवान वह इस ट्रेन में न हो !अगर इस ट्रेन में हो, तो भी इस डिब्बे में न आये !फिर ध्यान आया केले और बिस्कुट तो इसी डिब्बे में .....अब अब ..?
आरती सामान के साथ खटर-पटर कर रही थी ।उसे तो बस पूड़ी की पड़ी है ।खुद का पेट भरा है तो अब मेरे पीछे क्यों पड़ी है ?बार-बार खाने को कहे जा रही है ।
'मैं नहीं खाऊँगी ।'
'देख नाराज़ मत हो बहना ,किसी के घर जाकर फिर अपना बस तो रहता नहीं ।'
'नहीं आरती ,मेरा सिर दर्द कर रहा है ।मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा ।'
ट्रेन चलनेवाली थी ।
वह साइड की सीट पर आकर बैठ गया है ।
बाकी का सारा सफ़र मैं साड़ी के पल्ले से मुँह लपेटे खिड़की से टिकी रही ।आरती से कह दिया ,'स्टेशन आने से पहले जगाना नत मुझे ।'
'अच्छा , सो जा तू ।'
हुँह ।ऐसे में नींद किसे आती है ?इतनी गर्मी और ऊपर से मुँह पर साड़ी का लपेटा !
**
घऱ आकर चैन की साँस ली ।शाम को नहा-धो कर बड़ा हल्का-फुल्का लग रहा था ।
भाभी ने कहा ,'लाओ ,आज मैं तुम्हें तैयार कर दूँ ।'
'क्यों?'
'कुछ मेहमान आनेवाले हैं ।'
तैयार होकर हमलोग छत पर खड़े थे ।
'लो,वे लोग आ गये ,'भाभी नीचे देखती हुई बोलीं ।
'कौन लोग ?'
'तुम्हारे दिखवैया ,और कौन ?लड़का और उसकी बहन दोनों आ रहे हैं ,'कहती-कहती वे फटाफट नीचे उतर गईं ।मैंने ज़रा-सा उचक कर देखा ।
अरे ,ये तो वही है -ट्रेनवाला !
मेरे तो होश गुम !
अब क्या होगा ?हाय राम !
इस घर से तो कहीं भाग कर भी नहीं जाया जा सकता ।रास्ता ड्राइँगरूम से होकर है ।और वहाँ ?.नहीं.नहीं उसके सामने बिल्कुल नहीं जाना है ।पता नहीं सबके सामने क्या कह दे !कहीं बदला निकालने को मुझे ही 'भूखी' कह दिया तो ?
मेरा सिर घूमने लगा ।
'चलो न ,अब यहाँ क्या कर रही हो, 'भाभी बुलाने आ पहुँचीं ।
' भाभी ,मेरी तो तबीयत खराब हो रही है ।'
'बेकार नर्वस हुई जा रही हो ।वैसे तो इतनी बोल्ड बनती हो !'
'पहले ज़रा मेरी बात सुन लो ।'
'अब कहना-सुनना बाद में पहले नीचे चलो ।'
'एक बार सुन लो भाभी ,साधारण बात नहीं है यह ।'
'मालूम है ,साधारण बात नहीं है ।...अरे चलो भी ।इतनी जल्दी भूल गईं ?मेरी तो आफ़त कर डाली थी तुमने ।अब भी पूछती हो -सिर झुकाये क्यों बैठी रहीं ?तुमने क्यों नहीं कुछ पूछा ?'
'भाभी ,पूरी बात सुन लो पहले ।'
'मेरे पास फ़ालतू समय नहीं है विधु ,चलो जल्दी ।'
उन्होंने आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया ।
'तुम मुझे बचा लो भाभी !तुम समझ नहीं रही हो ।बात यह है ...'मैं गिड़गिड़ा रही थी ।
'अरे काहे को घबराई जा रही हो ?उसकी बहन तो वही कल्पा है ,तुमसे एक साल सीनियर ।घर तो हमलोगों का जाना-परखा है ।लड़का तुम समझ लो ।'
'मुझे कुछ नहीं पता था सच्ची भाभी ।मैंने किसी का कुछ नहीं खाया ।अच्छा तुम्हीं बताओ ,मेरी नियत खराब है ?'
'कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो ।अरे ,तुम्हारा तो चेहरा फक् पड़ा है ।'
'मुझे चक्कर पर चक्कर आ रहे हैं ।'
अच्छा चलो अपने कमरे में चलो ।'
मुझे कमरे में छोड़कर फिर वे पता नही क्या करने चली गईं !
अपने ही कमरे में अपराधी-सी बैठी हूँ मैं ।
पिता जी के पास आते शब्द कानों में पड़ रहे हैं - 'हाँ, आज ही तो आई है एक्ज़ाम देकर ।रात-रात जाग कर पढ़ाई की गर्मी ।ऊपर से ट्रेन बीच में पाँच घंटे रुकी खड़ी रही ।एक्सीडेन्ट देखा होगा उसने !रास्ते में कुछ खा भी नहीं पाई बिचारी । तबीयत तो ख़राब होगी ही ।'
आवाज़ पास आती जारही है ,कुछ और आवाज़ें भी ।
उन लोगों को यहीं मेरे कमरे में लाया जा रहा है ।
मेरे सिर में ठनाटन हथौड़े जैसे बज रहे हैं ।मालूम नहीं क्या हो रहा है यह सब ।
**
मौज में आने पर अब भी, कभी-कभी ये मुझसे पूछते हैं -' हाँ तो प्रथम भेंट के शुभ-अवसर पर आपने क्या उपाधि प्रदान की थी हमें ?'
शुरू-शरू में तो ऐसी झेंप लगती थी कि कहाँ भाग कर मुँह छिपा लूं अपना !
पर अब .. ख़ैर ..जाने दीजिये क्या फ़ायदा वह सब बताने से !
*
किंडर-गार्टन से जो पढ़ाई शुरू हुई, तो साल-दर-साल गुज़रते गये और वह द्रौपदी के चीर सी लंबाती चली गई ।बी.ए.पास करते-करते मन पढ़ाई से भर गया ।उन्हीं दिनों समझा जाने लगा था ,जिसने बी.एड. कर लिया उसने बड़ा तीर मार लिया ।मैंने भी सोचा ,जिस काम में जीवन का एक युग से भी अधिक झोंक दिया ,वहाँ एक साल और सही ।सच तो यह है कि होस्टल में रह कर पढने का आकर्षण था ,जो मैंने बी.एड. ज्वाइन कर लिया ।
खींच-तान औऱ दौड़-भाग में साल बीता । इम्तहान देकर सोचा ,चलो अब पढाई का भूत सिर से उतरा ।मुक्ति का एहसास घर पहुँचने की उत्सुकता को चौगुना किये दे रहा था ।एक और अच्छी बात थी कि घर तक की यात्रा नें मुझे अकेले रह कर बोर नहीं होना था ,होस्टल की मेरी साथिन और उदीयमान लेखिका आरती मेरे साथ थी ।उसे तो मुझसे भी आगे जाना था ।
होस्टल से बोरिया -बिस्तर समेट कर हमने घर की राह पकड़ी ।बमुश्किल दो स्टेशन निकले होंगे कि ट्रेन रुक गई ।पहले इन्तज़ार होता रहा ,अब चली ,अब चली ,फिर लोग नीचे उतरने लगे ।और फिर वहीं चहल-कदमी करने लगे ।जितनी जल्दी घर पहुँचने की थी उतनी ही देर होती जा रही थी । चलते-फिरते लोग ख़बरें लाने लगे -'आगे लाइन टूटी है ' ,'एक्सीडेन्ट हो गया है ', 'आगे पटरियों पर डब्बे उलटे पड़े हैं ' ,'ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी ','अगले स्टेशन से फ़ोन आया है कि इस लाइन की ट्रेनें मत छोड़ो' वगैरह,वगैरह ।जितने मुँह उतनी बातें ।
'पता नहीं घर कब पहुँचेंगे ?'
'तू तो फिर भी पहुँच जायेगी ,अभी तो हम दो जनें हैं ,' आरती की चिन्ता थी ,'मुझे तो इतनी आगे अकेले जाना है ।बड़ी मुश्किल हो जायेगी ।'
हमारा डब्बा प्लेटफ़ार्म से थोड़ा आगे था ।लोग खाने-पीने का सामान खरीदने के लिये दौड़ लगा रहे थे - पता नहीं कितनी देर पड़े रहना पड़े !छोटा-सा स्टेशन !कुछ फलों के ठेले और एकाध चायवाले !
चलते-फिरते मुसाफ़िर ख़बर लाये कि कि वहाँ प्लेटफ़ार्म पर तो इसी के पीछे छीना-झपटी मची है ,वो तो ये कहो कि अभी सिर-फुटौव्वल की नौबत नहीं आई ।
'वो देखो उधऱ गाँव की तरफ़ से कोई केलों का टोकरा लिये चला आ रहा है ।।'
'बुला लो भाई ,बेचेगा ही तो ।हमीं खरीद लें ।'
कुछ लोग जाकर उसे घेर लाये । और डिब्बों के यात्री भी दौड़ पड़े ।
'नहीं भाई ,ये तो हमारे डब्बेवालों ने चुकता कर लिया है ।'
हमारे डिब्बे में धूम मच गई ।
'अरे भई, केलेवाले ,इधऱ !'
'ओये ,इधऱ को देख !'
'केला देना भाई ?'
दनादन केले खरीदे जा रहे थे ।केलों का पूरा -का -पूरा टोकरा हमारे डिब्बे में आ गया ।दाम दुगने हैं तो क्या हुआ ,पेट में तो पड़ेगा कुछ !
सबसे पैसे इकट्ठे हुये और एक-एक केला बाँट दिया गया सबको ।।एक यात्री एक लड़के को पकड़ लाया ।उसके झोले में बिस्कुटों के छोटे-छोटे पैकेट भरे थे ।
'बाहर तो लूट मची है ।सारी ट्रेन के लोग जुटे पड़े हैं ।इसे पकड़ नहीं लाता तो हमें कुछ नहीं मिलता ।'
'दो पैकेट इधर देना ।'
'ना भाई ना । एक व्यक्ति को एक पैकेट।आखिर सभी को चाहिये ।'
'अरे ,औरों को तो इतना भी नहीं मिल पायेगा ।'
'क्यों आरती ,तुम्हारी मौसी इसी स्टेशन पर तो आईं थीं ?
'हाँ ,पर अबकी बार मैंने मना कर दिया था ।आतीं तो कहतीं -छुट्टियों में कुछ दिन रुक जाओ । मैं तो पहले जाकर अपने घर रहूँगी ,फिर सोचूँगी कहीं और का ।'
ट्रेन में बड़ी गर्मी थी ।सब लोग उतरने लगे ।
' कम से कम चार घंटे लगेंगे !आगे का मलवा साफ़ होगा तब ट्रेन बढ़ेगी यहाँ से । '
' चलो आगे ,उधऱ दुकान के पास चलकर बैठते हैं ।उधऱ वेटिंग-रूम है ,' आरती से कहा मैंने ।
'सोच रही हूँ ,मौसी के घर हो आऊँ ।'
'और मैं अकेले रहूँगी यहाँ ?'
'तुमसे कितनी आगे मुझे अकेले जाना है ,कुछ पेट-पूजा का हिसाब भी तो चाहिये ।अच्छा तू भी चल न!'
'ना बाबा ,तू ही जा ।ये सामान भी तो देखना है ' मैंने कहा 'लेकिन आरती ज़रा रुक ।मैं जरा टायलेट तक जाऊँगी ।'
मैंने साबुन तौलिया निकाला और पर्स उसे पकड़ा दिया ,'सामान का ध्यान रखना ।'
आँखों पर पानी के छींटे डाल मैंने ज़रा अपनी गत सुधारी ।बाहर आई तो मेरा माथा ठनका ।थोड़ी दूर वह एक लड़के के साथ खड़ी बतिया रही थी ।इतनी-सी देर में यह लड़का इसे कहाँ से मिल गया ?
मैंने आवाज़ लगाई ,'अरी ओ, आरती !'
'हाँ ,' पास आती हुई वह बोली ,'इससे मिल -अजीत है ,मेरा मौसेरा भाई । इसे पता लग गया ये मोटर साइकिल ले कर आया है । अब मैं जा रही हूँ ।'
'कितनी देर में लौटेगी ?'
'फ़िकर मत कर .जल्दी आ जाऊँगी ।'
'ट्रेन तो चार घंटे पहले नहीं चलने की ' अजीत बोला ।
चलते-चलते आरती ने पर्स पकड़ाया ,' 'विधु ,तेरा सारा सामान मैंने कंड़ी में सम्हाल कर रख दिया है ।देखना !'
मैंने हुँकारा भरा ,'अच्छा !'
मैं अकेली रह गई स्टेशन पर ।मेज़ पर जहाँ मैंने केले और बिस्कुय का पैकेट रखा था एक लड़का बैठ गया था आ कर ।
बैठा रहने दो ,ये तो स्टेशन है !पर बैठा कैसे ठाठ से है -कोई समझे सामने रखा सामान इसी का है !लो चाय भी आ गई उसके लिये !
तौलया -साबुन लिये ही लिये मैं उधर चली आई ,और दूसरी कुर्सी पर बैठ गई कि हाथ बढ़ा कर केला-बिस्कुट उठा सकूँ ।
कितनी देर हो गई ,अभी तक चाय नहीं लाया ,जब कि मैंने पहले ही कह दिया था । मैने छोकरे को इशारे से बुलाया ,' क्यों ,मेरी चाय कहाँ है ?'
'लाया था ,पर आप यहाँ थीं नहीं, तो मैंने सोचा ठंडी हो जायगी सो इन्हें दे दी ।'
कुर्सी पर बैठे लड़के ने हाथ बढ़ा कर केला उठाया ।
मेरा केला !
मैंने ध्यान से उसकी ओर देखा अजीब आदमी है ।अब वह केला छील रहा था ।चूक गई तो भूखी रह जाऊँगी ।
' ,सुनिये ,केला मुझे खाना है ।'
वह चौंका ।अधछिला केला मुँह के पास ले जाते -ले जाते ले जाते रुक गया ।
अजीब तरह से मेरी ओर देख कर बोला ,'हाँ ,हाँ लीजिये ।आप खा लीजिये ।'
अधछिला केला उसने मेरी तरफ़ बढा दिया ।
झपट्टा-सा मार कर केला ले लिया मैंने । यह केला तो मैं खाऊँगी ही । मैं झटपट केला खाने लगी ।
' आज स्टेशन पर नाश्ते के लिये कुछ नहीं है ,' लड़का कह रहा था ।
अब कैसी सफ़ाई दे रहा है , खाने के लिये कुछ नहीं है तो इसका यह मतलब नहीं कि दूसरे का उठा कर खा जाओ - मैंने सोचा पर कहा कुछ नहीं ।
दूसरे हाथ से मैंने बिस्कुट का पैकेट अपनी ओर खिसका लिया ।इसका क्या ठिकाना ,इसी पर हाथ साफ़ करने लगे ।
बस ,मेरे सोचने भर की देर थी ,उसने बिस्कुट का पैकेट अपनी ओर खींचा ,खोला और दो बिस्कुट निकाल कर दूसरी ओर देखते हुये खाने लगा ।
हद हो गई ।शराफ़त जैसी तो कोई चीज़ इस दुनिया में बची ही नहीं ।
छोकरा चाय का प्याला रख गया था ।कहीं मेरा कप उठा कर पीने न लग जाय !मैंने झटपट चाय उठाई और सिप करके रख दी -अब जूठी चाय तो लेने से रहा ।
फिर हाथ बढ़ा कर मैंने बिस्कुट का पैकेट उठाया और बिस्कुट निकाल कर खाने लगी । पैकेट को सावधानी से हाथ में पकड़े रही - कहीं फिर न उड़ा ले !
उसकी आँखों में बड़ा अजीब-सा भाव आया- कुछ सनक गया-सा लगता है ,मैंने सोचा । अच्छे-खासे भले घर का लगता है ।पर किसका दिमाग़ कब चल जाये क्या ठिकाना !
' इधऱ बढ़ाइये, ' उसकी दृष्ट बिस्कुटों पर थी ।मैं थोड़ा डर गई थी ।कहीं कुछ कर न बैठे , ऐसे लोगों का क्या ठिकाना !मैंने चुपचाप पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया ।
उसने बचे हुये में से आधे बिस्कुट निकाल लिये और बाकी का पैकेट मेरी ओर बढ़ा कर मुस्कराया । मैंने हाथ बढ़ाकर से पैकेट ले लिया -कहीं ये भी गये तो मैं तो भूखी ही रह जाऊँगी !
बिस्कुट खा कर वह खड़ा हो गया ।मैं मन-ही मन भुनभुना रही थी ।मुँह से निकला ,'कैसा भूखा है!'
उसने शायद सुन लिया ।पलट कर कुछ क्षण बड़े ताज्जुब से मेरी ओर देखा और आगे बढ़ गया ।
ऊँह, सुन लिया तो सुन ले !कोई झूठ कहा मैंने !दूसरे का सामान उठा कर कोई खाने लगे तो और क्या कहा जायेगा ?
लगता तो पढ़ा-लिखा है ।गुंडा भी नहीं लगता ।आँखों में कोई अप्रीतकर भाव भी नहीं ।फिर ? होगा !ऊपर से क्या पता लगता है कोई कैसा है ?
कैसे-कैसे लोग होते हैं ?लगता है दिमाग़ में कुछ खलल है ।फिर तो घर के लोगों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिये ।
छोड़ो ,मुझे भी क्या ?
दो-चार बिस्कुट ले लिये ।चलो , भूखा था ,खा गया !
मैंने अपना तौलिया -साबुन उठाया और आकर अपने सामान के पास बैठ गई ।
**
आरती अभी तक नहीं आई थी ।ढाई घंटा हो रहा था ।निश्चिन्त होकर बैठी होगी ।उसे क्या पता मैं किस मुसीबत में जा फँसी थी !बैठे-बैठे ऊँघ आने लगी मुझे ।
लो तीन घंटे हो गये ! आरती का कहीं पता नहीं ।अगर ट्रेन चल दे तो !
आराम से ठूँसे जा रही होगी !मैं यहाँ भूखी बैठी हूँ ।पर्स में से इलायची निकाल कर चबा रही थी कि वह आती दिखाई दी ।
आकर बोली ,' मैं तो डट कर खा आई हूं । तूने खाया कुछ?
'हाँ खाया तो है ,पर बताऊँगी पब ।'
'देख, मौसी ने तेरे लिये भी गरम-गरम पूड़ियाँ भेजी हैं ।और यह चाय-नाश्ता भी ।'
उसने पैकेट रखने के लिये कंडी का ढक्कन उठाया ,'अरे , तूने तो कुछ खाया नहीं विधू ? ये बिस्कुट,केला सब जस के तस रखे हैं ।'[
मैं चौंकी !
'मैंने तो निकाल कर मेज़ पर रखे थे ।'
'हाँ , तू टायलेट गई थी न तो मैंने उठा कर कंडी में धर दिये थे ।तुझे बताया तो था ।यहाँ सब भूखे हैं ,कोई उटा लेता तो ?तभी न जाते-जाते कह गई थी ।'
' हाय राम !'
मैं सर पकड़ कर बैठ गई । ..तो वह चीज़ें उसी की थीं !
मेरे सिर में घुमनी-सी आ रही थी ।
'क्या हुआ विधु ?क्या हुआ तुझे ?'
'कुछ नहीं ।'
'तबीयत तो ठीक हैं न तेरी ? गर्म-गर्म पूड़ी खा ले !'
'मुझे नहीं खानी ।'
'अरे क्या बात है ?अभी तू कुछ बताने को कह रही थी ?'
'नहीं, अब कुछ नहीं रहा बताने को ।'
'कैसी अजीब लड़की है ।'
ट्रेन अभी तक रुकी खड़ी है ।
मैंने चारों ओर सिर घुमा कर देखा ।वह कहीं दखाई नहीं दिया ।
'आरती , अब झटपट चल कर ट्रेन में बैठें।'
'हाँ अब तो चलनेवाली होगी ,अजित ने पता कर लिया था ।'
अपना सामान उठा कर मैं एकदम ट्रेन की तरफ़ चल दी ।
'अरे ,अरे ,आराम से चलेंगे ।अभी दस-पन्द्रह मिनट हैं ..' ,वह चिल्लाती रह गई।
सामने से आते हुये एक व्यक्ति से टकराते-टकराते बची ।
'इत्मीनान से चलिये,अभी नहीं छूटी जा रही ट्रेन ।'
मैंने डिब्बे में अपनी सीट पर आकर ही दम लिया ।
आरती को बस खाने की पड़ी है ।सामान ठिकाने से रख कर बोली ,'अब तू भी खा ले न विधू ,बेकार अभी से गर्मी में यहाँ चली आई ।'
'कहा न ,मुझे भूख नहीं है ।'
'अरे क्या हो गया तुझे ?अकेले रहना पड़ा ,गुस्सा आ रहा है मुझ पर ?'
मैं प्लेटफ़ार्म के दूसरी तरफ़ की खिड़की से मुँह बाहर निकाले बैठी हूँ ।मन-ही-मन मना रही हूं - हे भगवान वह इस ट्रेन में न हो !अगर इस ट्रेन में हो, तो भी इस डिब्बे में न आये !फिर ध्यान आया केले और बिस्कुट तो इसी डिब्बे में .....अब अब ..?
आरती सामान के साथ खटर-पटर कर रही थी ।उसे तो बस पूड़ी की पड़ी है ।खुद का पेट भरा है तो अब मेरे पीछे क्यों पड़ी है ?बार-बार खाने को कहे जा रही है ।
'मैं नहीं खाऊँगी ।'
'देख नाराज़ मत हो बहना ,किसी के घर जाकर फिर अपना बस तो रहता नहीं ।'
'नहीं आरती ,मेरा सिर दर्द कर रहा है ।मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा ।'
ट्रेन चलनेवाली थी ।
वह साइड की सीट पर आकर बैठ गया है ।
बाकी का सारा सफ़र मैं साड़ी के पल्ले से मुँह लपेटे खिड़की से टिकी रही ।आरती से कह दिया ,'स्टेशन आने से पहले जगाना नत मुझे ।'
'अच्छा , सो जा तू ।'
हुँह ।ऐसे में नींद किसे आती है ?इतनी गर्मी और ऊपर से मुँह पर साड़ी का लपेटा !
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घऱ आकर चैन की साँस ली ।शाम को नहा-धो कर बड़ा हल्का-फुल्का लग रहा था ।
भाभी ने कहा ,'लाओ ,आज मैं तुम्हें तैयार कर दूँ ।'
'क्यों?'
'कुछ मेहमान आनेवाले हैं ।'
तैयार होकर हमलोग छत पर खड़े थे ।
'लो,वे लोग आ गये ,'भाभी नीचे देखती हुई बोलीं ।
'कौन लोग ?'
'तुम्हारे दिखवैया ,और कौन ?लड़का और उसकी बहन दोनों आ रहे हैं ,'कहती-कहती वे फटाफट नीचे उतर गईं ।मैंने ज़रा-सा उचक कर देखा ।
अरे ,ये तो वही है -ट्रेनवाला !
मेरे तो होश गुम !
अब क्या होगा ?हाय राम !
इस घर से तो कहीं भाग कर भी नहीं जाया जा सकता ।रास्ता ड्राइँगरूम से होकर है ।और वहाँ ?.नहीं.नहीं उसके सामने बिल्कुल नहीं जाना है ।पता नहीं सबके सामने क्या कह दे !कहीं बदला निकालने को मुझे ही 'भूखी' कह दिया तो ?
मेरा सिर घूमने लगा ।
'चलो न ,अब यहाँ क्या कर रही हो, 'भाभी बुलाने आ पहुँचीं ।
' भाभी ,मेरी तो तबीयत खराब हो रही है ।'
'बेकार नर्वस हुई जा रही हो ।वैसे तो इतनी बोल्ड बनती हो !'
'पहले ज़रा मेरी बात सुन लो ।'
'अब कहना-सुनना बाद में पहले नीचे चलो ।'
'एक बार सुन लो भाभी ,साधारण बात नहीं है यह ।'
'मालूम है ,साधारण बात नहीं है ।...अरे चलो भी ।इतनी जल्दी भूल गईं ?मेरी तो आफ़त कर डाली थी तुमने ।अब भी पूछती हो -सिर झुकाये क्यों बैठी रहीं ?तुमने क्यों नहीं कुछ पूछा ?'
'भाभी ,पूरी बात सुन लो पहले ।'
'मेरे पास फ़ालतू समय नहीं है विधु ,चलो जल्दी ।'
उन्होंने आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया ।
'तुम मुझे बचा लो भाभी !तुम समझ नहीं रही हो ।बात यह है ...'मैं गिड़गिड़ा रही थी ।
'अरे काहे को घबराई जा रही हो ?उसकी बहन तो वही कल्पा है ,तुमसे एक साल सीनियर ।घर तो हमलोगों का जाना-परखा है ।लड़का तुम समझ लो ।'
'मुझे कुछ नहीं पता था सच्ची भाभी ।मैंने किसी का कुछ नहीं खाया ।अच्छा तुम्हीं बताओ ,मेरी नियत खराब है ?'
'कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो ।अरे ,तुम्हारा तो चेहरा फक् पड़ा है ।'
'मुझे चक्कर पर चक्कर आ रहे हैं ।'
अच्छा चलो अपने कमरे में चलो ।'
मुझे कमरे में छोड़कर फिर वे पता नही क्या करने चली गईं !
अपने ही कमरे में अपराधी-सी बैठी हूँ मैं ।
पिता जी के पास आते शब्द कानों में पड़ रहे हैं - 'हाँ, आज ही तो आई है एक्ज़ाम देकर ।रात-रात जाग कर पढ़ाई की गर्मी ।ऊपर से ट्रेन बीच में पाँच घंटे रुकी खड़ी रही ।एक्सीडेन्ट देखा होगा उसने !रास्ते में कुछ खा भी नहीं पाई बिचारी । तबीयत तो ख़राब होगी ही ।'
आवाज़ पास आती जारही है ,कुछ और आवाज़ें भी ।
उन लोगों को यहीं मेरे कमरे में लाया जा रहा है ।
मेरे सिर में ठनाटन हथौड़े जैसे बज रहे हैं ।मालूम नहीं क्या हो रहा है यह सब ।
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मौज में आने पर अब भी, कभी-कभी ये मुझसे पूछते हैं -' हाँ तो प्रथम भेंट के शुभ-अवसर पर आपने क्या उपाधि प्रदान की थी हमें ?'
शुरू-शरू में तो ऐसी झेंप लगती थी कि कहाँ भाग कर मुँह छिपा लूं अपना !
पर अब .. ख़ैर ..जाने दीजिये क्या फ़ायदा वह सब बताने से !
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