रविवार, 13 जून 2010

फिर वह नहीं आई -

*
मुझे लगा वह जा रही है विलक्षणा ,वही कद ,वही पीठ पर झूलती ,लम्बी-सी अधखुली चोटी ,वही साड़ी जो अक्सर उसे पहने देखा है ,वही चलने का ढंग ,निश्चय वही है !मुझे विश्वास हो गया ।मैने चाल तेज़ कर दी ,आवाज़ लगाई ,' विलक्षणा -- बिलू !'
रास्ता चलते कुछ लोगों ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा ,पर मुझे उन की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत नहीं थी । मै जल्दी से उसके पास पहुँच जाना चाहती थी ।
'बिलू ,-- विलक्षणा ,-- ओ बिलू !'
'बिलू' अनायास मेरे मुँह से निकला जा रहा था जैसे मै उसे युगों से 'बिलू' कहकर बुलाती होऊँ । इसके पहले यह शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला था ,मन मे आया था पर मुँह से मैने निकलने नहां दिया था।
आगे जानेवाली युवती मेरे पीछे से आगे निकलते समय ध्यान से मुझे देख गई है -ऐसा मुझे आभास हुआ था ,उसके पग कुछ ठिठके ,कनखियों से उसने मुझे देख लिया और आगे बढ़ गई। मैने अपनी चाल और तेज़ कर दी । मै उससे मिलना चाहती थी ,अब तक जो उसे नहीं दे पाई ,वह देने को मै उतावली हो रही थी ,पर अब लेनेवाली रुक नहीं रही थी । अचानक ही उसने पीछे से आती हुई एक टैक्सी को हाथ दिया ,वह उसके पास जाकर रुकी और फिर उसे लेकर आँखों से ओझल हो गई। अब विलक्षणा नहीं मिलेगी ,देख लेगी तो भी नहीं आएगी मेरे पास ,कतरा कर चली जाएगी । क्यों ? लेकिन क्यों ?
*****
'कौन ?'
'दीदी , मै !'
अच्छा ,विलक्षणा है ।आओ ,आज बहुत दिनो मे दर्शन हुए ।'
'कहाँ ,दीदी, बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर आई हूँ,जरा देर के लिये। वहाँ सारा काम पड़ा होगा !'
मुझे बड़ा सन्तोष हुआ ,चलो ,चाय-नाशते का झंझट नहीं करना पड़ेगा ! फिर मन-ही-मन इस विचार के लिए मैने स्वयं को धिक्कारा ,वह तोइतनी दूर से रिक्शा लेकर मिलने आई और मै ये सोच रही हूँ !
यह तो मुझे काफ़ी बाद मे पता लगा था कि पीठ पीछे लोग उसकी बुराई करते हैं ।अपने साथियों मे भी वह लोक-प्रियता की सीमाओं से दीर रह गई थी । सामने-सामने तो सब अच्छी तरह बोलते पर पीठ फिरते ही मुँह बिचकाने लगते थे ।
मेरी एक साथिन ने एक दिन मेरे कान मे भी फूँका ,' देखना इससे चौकन्नी रहना !सबमे घुली रहकर सबसे भली बनने की कोशिश करती है ,और साधती है अपना मतलब !'
'कौन विलक्षणा ?'
और कौन है हमारे यहाँ जो सबसे मीठा बोलता फिरे ?'
'अच्छा --!'
और दो दिन बाद ही विलक्षणा मुझसे कह रही थी ,' दीदी ,मै कल एबसेन्ट थी । आपने जो नोट्स लिखाए वह मुझे दे दीजिए ।'
'वो तो मै घर छोड़ आई हूँ ।'
' अच्छा ' उलके मुख पर निराशा छा गई ।
'क्लास की किसी लड़की से ले लो ।'
'हाँ ,अच्छा ले लूँगी ।' उसका चेहरा बुझ गयाथा ।
अपने ग्रुप की लड़की को छोड़कर कौन अपने नोट्स किसी को देता है ,और विलक्षणा किसी ग्रुप मे नहीं है ,यह भी मै जानती थी ।
'घर से चाहो तो ले लेना ।'
आश्वस्त होकर वह प्रसन्न हो गई । पर एकदम मेरे दिमाग़ मे आया -ये कहां का झंझट पाल लिया !
'पर घर पर पता नहीं मै कब पहुँचूँ ?खैर मै देखूँगी फिर !' दूसरा आश्वासन दिया मैने ।
घर पहुँचने पर अम्माँ ने कहा ,' कोई लड़की आई थी ,तुझे पूछ रही थी ।'
'लड़की । क्या नाम था ?
'विलक्षणा ।'
मैने चैन की साँस ली .चलो अच्छा हुआ जो घर पर नहीं मिली मै ! अब बार-बार कौन आता है ?
' और वो तेरा सफ़ेद कार्डिगन मैने बिनने को दे दिया है ।'
'बड़ा अच्छा किया ! मै कहाँ तक करती !'
कुल एक हफ़्ता रह गया था शादी मे जाने को । एक तो मुझे समय ही कम मिलता था फिर कार्डिगन के अलावा और भी तो बहुत काम पड़े थे मेरे लिए ! इतनी जल्दी कैसे बुन पाता ,मोल बुनवाना ही सबसे ठीक रहा !
'किसे दिया है ?'
'वोई ले गई , वो जो आई थी ।'
' ऐं ,उसे क्यों दे दिया ? तुम काहे को सबसे कहने बैठ जाती हो ?'
' मैने कहाँ कहा ?उसी ने पूछा ।तू ही तो ऊपर सब छोड़ गई थी । वो पूछने लगी तो मैने बता दिया - काम इत्ता करने को पड़ा है और तेरी दीदी के पास टाइम ही नहीं है ,तो उसने कहा लाइए मै चार दिन मे बुन दूँगी ।'
अम्मा के ऊपर बड़ी खीझ लगी । हरेक के सामने अपना दुखड़ा रोने दैठ जाती हैं ।
किसी डाक्टर ने तो कहा नहीं था कि शादी मे सफ़ेद कार्डिगन पहनो ही ,दूसरी ओर थोड़ी खुशी भी हुई कि चलो बिना मेहनत के बुन जाएगा ।
'और ला के कब देगी ? कहीं रख के बैठ गई तो और मुश्किल ?'
'ऐसा भी कहीं हो सकता है ?तेरे कालेज मे तो पढ़ती है । वो तो बड़ी सीधी लड़की थी । खूब दीदी-दीदी करके बात कर रही थी तेरे लिए। '
अम्माँ बड़ी जल्दी सबसे सगापा जोड़ लेती हैं ! अब एहसान मेरे सिर चढ़ गया ! दूसरों को बेटी बना लेना इन्हें बड़ा आसान लगता है ,मेरी पोज़ीशन का ज़रा ख़याल नहीं ! पर मेरी झुँझलाहट सुनने को अम्मां वहाँ रुकी ही कब थीं !
तीसरे दिन शाम को अचानक विलक्षणा फिर टपक पड़ी । कार्डिगन का पिछला पल्ला और बाँहें उसने बड़ी सफ़ाई से बुने थे । नोट्स मैने ख़ुध लाकर उसे पकड़ा दिये । इतना काम कर रही है किसी मतलब से ही तो ! अम्माँ ने उसे चाय-वाय पिलाई और 'बेटी-बेटी' कर बात करती रहीं । वह मगन हो खाती-पीती रही और मुझे नमस्ते करके चली गई ।
फिर एक दिन घर पर देखा विलक्षणा बैठी मेरी साड़ी के पल्ले तुरप रही है । मुझे देख कर वह सकुचा सी गई ।अम्माँ झट् से बोल दीं ,' देखा ,मेरी नई बेटी मेरा कितना ध्यान रखती है । '
'अरे ,विलक्षणा ! तुम क्यों बेकार परेशान हो रही हो ?'
'आप मेरी दीदी हैं तो ये मेरी भी तो अम्माँ हैं ,अकेली आपकी थोड़े ही हैं ।'
'क्यों नहीं ,विलक्षणा ,तुम मेरी छोटी बहन हो ' एकदम मेरे मुँह से निकल गया ।
उसने अपनी तरल हो-आई पलकें झुका लीं ।
'कभी भी कोई डिफ़ीकल्टी हो तो चली आया करो ।'
मानो मैने उसे बहनत्व का पूरा अधिकार दे दिया !

फिर तो घर मे अक्सर ही उसका नाम सुनने को मिलने लगा । अम्माँ को तो जैसे उसने मोह लिया था ।घर की जो थोड़ी-बहुत सिलाई-बुनाई कर देती थी अब मुझे नहीं करनी पड़ती थी ।छोटी बहन के बर्थ -डे पर सुबह से शाम तक जुटी रही थी वह ।बड़े उत्साह से सारा काम निपटाया था और जब उसके खाने का समय आया तो बहुत सी वस्तुएं समाप्त हो चुकीं थीं । अम्माँ के बार-बार पछताने पर उसने जवाब दिया ,' अम्माँ ,अपने हाथों से पराँठे बना कर खिला दीजिये , म्रेरे लिये तो वह मिठाई से भी बढ़ कर होंगे !'
और वह पराँठों से पेट भरकर चली गई थी।
वह जो फ़्राक का पीस प्रेज़ेन्ट मे लाई थी वह लौटाने को मैने अम्माँ से कहा तो उन्होने साफ़ मना कर दिया कि ऐसे प्यार से लाई गई चीज़ वे वापस नहीं कर सकतीं । मैने वापस करना चाहा ,मेरे बर-बार कहने पर वह कुछ रुआँसी हो आई ,' दीदी ,इतना पराया समझती हैं आप ?'
फिर आगे मैने कुछ नहीं कहा था ।
सब अपने मतलब के लिये ,सोचा था मैने । चलते समयकह दिया था ,' कोई भी किताब चाहिये हो तो मुझसे ले लेना ।'
'जी ? मेरे पास हैं सब !'
'नहीं कोई लाइब्रेरी से न मिलती हो ,या मेरी कोई चाहिये हो तो -- ' मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया !
अम्माँ के लिये तो विलक्षणा 'बिलू' बन गई थी ,थोड़े दिन नहीं आती तो मुझसे पूछतीं ,' बहुत दिनो से बिलू नहीं दिखी । बीमार है क्या ?'
' नहीं कालेज तो रोज़ आती है ।'
'कह देना उससे आने को । तुम्हारे बस का तो है नहीं ,वही सिल जाएगी टेरिकाटवाली फ़्राक !'
मै स्वयं उससे अपने घर आने को कहूँ इसमे मुझे अपनी हेठी लगती थी । मेरा कोई काम उसके बिना थोड़े अटकता था । फिर भी मुझे साड़ियों मे फ़ाल लगे और बार्डर टँके मिलते थे ।मै भी जानती थी कौन करता है यह सब , पर मैने कभी कुछ नहीं कहा ।
गर्मियों की छुट्टियों मे भी उसका हफ़्ते मे एक चक्कर लग ही जाता था ।उस दिन विलक्षणा आई तो अम्माँ घर पर लहीं थीं । मुझे बड़ी उलझन होने लगी । अब क्या मै इसे चाय बना कर पिलाऊं ,अम्माँ ने भी खूब तमाशा लगा रक्खा है ! नहीं पिलाऊँगी तो सोचेगी अम्माँ तो इतनी ख़ातिर करती हैं ,और मैने यों ही टरका दिया ! पर मै काहे को ख़ातिर करूँ मेरी तो स्टूडेन्ट है ?मै पसोपेस मे पड़ी थी । मुझे लगा वह भी उलझन मे है । कुछ देर बैठी किताबें पलटती रही, फिर उठकर खड़ी हो गई ।
' दीदी ,अब चलूँ ?'
'क्यों बैठो चाय पीकर जाना ।'
पर कह कर मै मन ही मन पछताने लगी । चली जाती तो कौन सा गज़ब हो जाता ! हमेशा तो खा-पी कर ही जाती है एक बार नहीं ही सही !
'अच्छा आप अपना काम कीजिय़े ।मै बना लाती हूँ चाय ।'
वह उठ कर रसोई मे चली गई ।
चलो अच्छा हुआ ।बिना बनाए चाय पीने को मिल जाएगी ।बना भी लेगी तो क्या हुआ ,स्टूडेन्ट है मेरी ! और मै भी तो हमेशा उसकी डिफ़ीकल्टी दूर करने को तैयार रहती हूँ ,और कौन करता है उसके लिये इतना भी ?
चाय पीते-पीते मुझे लगा विलक्षणा बड़ी परेशान है । होगी ,मुझे क्या करना ? पर फिर रहा भी नहीं गया ।
' क्या बात है ,विलक्षणा ?'
मेरी आँखें अपने चेहरे पर जमी देख वह कुछ अस्थिर हो उठी । मेरी इच्छा हुई प्यार से उससे कहूँ 'बिलू ' जैसे मेरी अम्मा कहती थीं ,जैसे उसके घर के लोग कहते होंगे ! पर मैने कहा नहीं ,उससे दूरी जो बनाए रखना चाहती थी ।
'मै यदि तुम्हारे कुछ काम आ सकूँ तो कहो ?'
' नहीं दीदी ,आप कुछ नहीं कर सकतीं । मेरी माँ बीमार हैं ।'
उसकी माँ सौतेली थीं अधिकतर बीमार ही रहती थीं ,एक बड़ा भाई घर छोड़ कर कहीं चला गया था ,यह भी अम्माँ ने ही बताया था । यह उन्हें भी नहीं पता कि वह चला क्यों गया। दूसरे के घर की बात ,हमे करना भी क्या था ?
एकदम से मुझे लगा विलक्षणा भी स्वस्थ नहीं है । मैने ध्यान से देखा काफ़ी दुबली लग रही थी । बड़ी दया आई मुझे उस पर, !विलक्षणा शायद समझ गई मेरी दृष्टि को ! उठ कर खड़ी हो गई। फिर वह रुकी नहीं चसी गई ।

इसके बाद भी वह कई बार आई थी पर मेरी उपस्थिति मे नहीं । मेरी साड़िय़ाँ भी संवारी उसने बहिन की फ़्राकें भी सिलीं ,अम्माँ के जाने क्या-क्या काम भी करती रही । पर उसने कभी मुझसे किताबें नहीं माँगी ,न कोई सहायता ली । फ़ाइनल की परीक्षा दे दी उसने ।
सेकिण्ड डिवीज़न पास हो गई विलक्षणा ! बी.ए. की बाईस छात्राओं मे से केवल चार की सेकिण्ड डिवीज़न आई थी ,उन्ही मे एक वह भी थी ।
बीच ने कई बार वह अम्माँ से मिल गई थी ,मेरे लिए मिठाई भी रख गई थी , पर मेरा उसका सामना फिर नहीं हुआ । मुझे लगा ,अब उसकी परीक्षा हो गई है ,वह पास हो गई है ,अब उसे मेरी ज़रूरत भी क्या है ! और वह मेरे ध्यान से उतर गई ।
*****
छुट्टियाँ समाप्त हो चुकीं थीं ,कालेज खुलने ही वाले थे । घूम-घाम कर मै वापस घर लौट आई थी ।बड़ी उत्सुकता से अपनी डाक देख रही थी ,एक पत्र विलक्षणा का भी था - कहीं सर्विस कर ली थी उसने । खोल कर पढ़ा और देखती रह गई ! उन पंक्तियों से आँखें नहीं हट रहीं थीं। उन अक्षरों से परे और जाने क्या-क्या पढ़े जा रही थी मै । उसने लिखा था --
'आपके साथ से मैने अनुभव कर लिया कि माँ और बहिन का स्नेह कैसा होता होगा ! आपकी आभारी सदैव रहूँगी , धन्यवाद देकर सहज ही उऋण होने का साहस मै नहीं कर सकूँगी । वह स्नेह तो चिर- काल मेरे जीवन मे प्रकाश और स्फूर्ति भरता रहेगा --।'
स्तब्ध रह गई थी मै ! पता नहीं उसके मन मे कितने अभाव थे जिन्हे मुझसे भरने का व्यर्थ प्रयत्न करती रही वह । मेरी कितनी साड़ियाँ उसने सँवारीं ,कार्डिगन बुने और ब्लाउज़ सिल कर रख गई ।और अब वह चली गई ।मेरे पास था भी क्या उसे देने को ?
पूरा वर्ष बीत गया ।बीच मे ही उसके पिता ने सट्टे मे हार कर आत्महत्या कर ली ,कई मुखों से कई तरह की बातें उसके लिए सुनने मे आईँ । फिर सुना सौतेली माँ और बहनों को विलक्षणा अपने साथ ले गई । मेरी उससे मुलाकात नहीं हुई । मैने कई बार मिलने की कोशिश की पर ऐसा मौका आया नहीं ।

कालेज का टूर जा रहा था ।शरद-पूनम की रात मे ताजमहल देखने का कार्यक्रम बना था । तीन दिन जी भर कर आगरा घूमे । दूसरे दिन की शाम को चचेरी बहिन बीना के पति मुझे बुलाने आगये । बीना जीजी किसी तरह लौटने नहीं दे रहीं थीं पर 'ड्यूटी पर हूँ ,लड़कियों के साथ हूँ 'आदि कह कर बड़ी मुश्किल से आने की अनुमति ली । लौ़ते सम. रास्ते मे देखा विलक्षणा जा रही है ।किसी तरह मिल जाय वह ! उसके लिये इतना व्याकुल हो जाऊँगी ,मैने स्वप्न मे भी नहीं सोचा था।सोयी स्नेह-भावना जाग उठी थी ,मन उमग रहा था देने के लिये ! पर अब वह लेगी नहीं ।पड़ा रहेगा व्यर्थ जड़ सा होकर !
मै भी कैसे धोखे मे पड़ी रही ।नारी होकर एक नारी के हृदय का सहज स्नेह न ले सकी ,न दे सकी । उलकी सरलता मे मुझे दुनियादारी की गन्ध आने लगी थी ? धिक्कार है मेरी सावधानी ! उसने मुझसे लिया ही क्या ? पर मुझे बहुत कुछ दे गई । विश्वास ,जीवन का सबसे बड़ा संबल उसके पास था ,और मै धोखे की टट्टी मे अपने को उलझाए बैठी हूँ । अमृत उसके पास था पानी मेरे पास ! पानी ,जिसकी प्यास कभी बुझती नहीं ! और अमृत पिला गई वह ,जिसे पीकर मै आकण्ठ तृप्त हो गई हूँ ।
तेरी चिर ऋणी हूँ मै ,ओ विलक्षणा ,एक बार आ जा !
पर अब वह कभी नहीं आएगी ! मुझे देखकर कतरा जाएगी । मुझसे मिलेगी नहीं वह ,कभी नहीं मिलेगी ! अपना जो अभाव मेरे अनजाने वह मुझी से भरती रही, अब जान- बूझ कर उसे भरने नहीं देगी । कैसी विषम प्रकृति है ! विलक्षणा अब देखेगी तो मुँह फेर लेगी मुझसे ।अब वह कभी नहीं आएगी मेरे पास । कभी नहीं !

*

पाकिट

स्कूल से लौटते ही उसने बस्ता सोफ़े पर फेंका और मेरे गले मे हाथ डाल कर पीठ से झूलते हुए बोली ,'मम्मी... ! '
' क्या बात है?'
'मम्मी ,हमें भी पाकिट मँगा दो ।'
'अच्छा,अच्छा ,मँगा दूँगी ! पहले कपड़े बदलो और खाना खाओ ।'
खाना खाते-खाते भी वह पाकिट की बात करती रही -उसकी डिब्बी भी बन जाती है ,हवाई जहाज़ भी । कैंची से काटें तो लालटेन निकल आए । रीना के, मन्टू के पास तीन-तीन हैं ।
' , पापा से कहना बाज़ार से ला देंगे ।'
'पापा से तो हमने कहा था । वो कहते हैं हमें नही पता ।'
'कब कहा था ?'
' कल भी कहा था ,पहले भी कहा था ।'
' अच्छा , अब मैं भी कह दूँगी ।'
पर पता तो मुझे भी नहीं था कि वह काहे के लिए कह रही है । मैंने पूछा ,' यह बताओ, पाकिट क्या चीज़ है ?'
'पाकिट है।'
' पाकिट क्या ?'
'पाकिट है पाकिट ,जैसा सुधीर के पास है ,मोना के पास है और सब के पास है ।'
चार साल की बच्ची को मैं कैसे समझाऊँ कि जो चीज़ सिर्फ़ उसने देखी है ,मैंनहीं जान सकती ।
'किसी के पास से लाकर दिखाओ ,पहले देखूँ तो कैसा है ।'
' कोई नहीं देगा मम्मी , अपना पाकिट ।'
'अच्छा कितना बड़ा है ?'
उसने अपनी छोटी-सी गुलाबी हथेली खोलकर नाप बता दी । सफ़ेद रंग का है ,ऊपर लालटेन का फ़ोटू है और लिखा भी है ।क्या लिखा है ये पता नहीं -अभी जितना पढ़ना आता है उसे ,वह तो मजबूरी मे जितना पढ़ना पड़ता है उतना ही पढ़ती है ,बिचारी !
शाम को खेलने गई तो थोड़ी देर में वापस लौट आई । सबके पास पाकिट हैं उनसे खेल होता है रीनी के पास हई नहीं ।वह उदास होकर घर लौट आई ।उसका चेहरा देखकर मुझे बड़ा तरस आया ।
' नानक की दूकान पर मिलता है ?'
'पता नहीं ।'
' और लोग कहाँ से लाए ?'
'सब अपने घर से लाते हैं ।'
मैं चक्कर में पड़ी - सब के घरों मे पाकिट हैं ,हमारे घर में नहीं ,और हम जानते तक नहीं कि यह क्या चीज़ है , कैसी होती है ।
'अच्छा, अबकी से सुधीर आए तो तुम उसका पाकिट दिखा देना हम तुम्हारे लिए भी ला देंगे ।'
इनके बाज़ार जाते समय भी उसने याद दिलाई ,' पापा ,हमारे लिेये पाकिट जरूर लाना है ।'
'बेटे , हमें पता नहीं पाकिट कैसा होता है ।'
'पापा सबके पास तो है ।'
मैंने बीच में दखल दिया ,' कैसा पाकिट कह रही है ? ला क्यों नहीं देते -इतने दिनों से रट लगाए है ।'
' पर है क्या, कुछ पता भी तो चले ।'
' तो ऐसा कीजिये ,इसे अपने साथ लेते जाइये ।अपने आप देखकर ले लेगी ।'
अच्छा चलो। रीनी बेटे कपड़े बदलवा आओ ।'
ढाई घन्टे बाद बाप-बेटी दोनों मुँह लटकाए लौट आए ।
'क्यों मिल गया पाकिट ?'
रीनी तो रोने-रोने को हो आई ।ये झल्लाए हुए थे ,बोले अब तुम्हीं जाकर खरिदवा दो ।हम तो सारी बाज़ार ढूँढ फिरे , कहीं मिला नहीं ।'
इनसे डाँट खाती है तो मेरे पास आ बैठती है ,ये उसकी पुरानी आदत है ।
मैने सिर सहलाकर कहा ,'जाओ ,अपना स्कूल का काम कर डालो ,मै तुम्हारे लिए पाकिट मँगा दूँगी ।'
वह आश्वस्त होकर चली गई ।

सौदा लाने में इन्होने हमेशा मुझे झिंकाया है ।एक से दूसरी दूकान देखने में इनकी शान घटती है ।जिस दूकान पर ठहर जायेंगे उसी से सारा सामान खरीद लेंगे - चाहे सड़ा हो, गला हो , देखेंगे तक नहीं । घर पर आने के बाद कुछ कहो तो कह देंगे ,'मै क्या करूँ उसके यहाँ और था ही नहीं ।'
अरे ,आदमी दो-चार दुकाने देख कर पूरी तसल्ली कर सामान लेता है ! पर मजाल है जो ये एक दूकान से दूसरी तक बढ़ भी जायँ ।कभी-कभी तो ऐसा सामान लाकर पटका है कि पड़े-पड़े सड़ता रहा और अंत मे कूड़े में फेंक देना पड़ा । मैं तो इनकी खरीदारी जानती हूँ ,रीनी का पाकिट ठीक से ढूँढा थोड़े ही होगा !
मैंने रीनी से पूछा ,' क्यों रीनी ,पापा ने कहाँ-कहां ढूँढा था पाकिट ?'
'खूब सारी दुकाने देखी थीं ,' आशा के विपरीत उत्तर मिला ।
बाप-बेटी देने एक से हैं !
दुकानदार को अपनी बात समझा नहीं पाए होंगे ,नहीं तो सबके पास जो चीज़ है ,वो इन्हे ढूँढे नहीं मिलती ! अब मुझे ही जाना पड़ेगा ।
अगले दिन उसके स्कूल में छुट्टी थी। मैने रीनी से कहा ,'नानक की दुकान पर देख आओ ,पाकिट है ?'
नानक मोहल्ले की परचून की दूकानवाला है , बच्चों के मतलब की चीज़ें भी रखता है थोड़ी-बहुत ।
वह दौड़ी-दौड़ी चली गई पर आधे रास्ते जाकर लोट आई ,' मम्मी ,पैसे तो दिये ही नहीं ।'
'पहले तुम देख तो आओ जाके ।'
' ऐसे तो वो देगा भी नहीं और कह देगा भाग जाओ यहाँ से ।'
मुझे हँसी आ गई - बड़ी समझदार हो गई है मेरी बिटिया ! मैने पाँच रुपए का नोट उसे पकड़ा दिया ।
पर पाकिट उसे नानक की दूकान पर भी नहीं मिला ।

सब बच्चे अपने पापा से पाकिट लेते हैं ,बस रीनी के पापा के पास नहीं है ,उसके लिये शरम की बात है !
इनके आने पर फिर वही रट ! दो-तीन बार इन्होने उसे समझाया , देखा , नहीं समझती तो बुरी तरह डाँट दिया ।वह चुपचाप रोने लगी ।
बच्चों का चुपचाप रोना मन को कितना बुरा लगता है !मुझे बोलना ही पड़ा ,'इस बुरी तरह झिड़क दिया लड़की को ! ज़रा सी चीज़ लाकर दे नहीं सकते ?'
'तुम तो उसी की तरफ़ बोलोगी ! हर बखत पाकिट-पाकिट-- हमारी तो समझ मे नहीं आता आखिर है क्या चीज़ !'
मैने उसे पाँच रुपए का नोट दिया पाकिट के लिए , पर उसने फेंक दिया और रोती रही ।.

*
मेरी अच्छी मुसीबत है ! ये तो डाँट फटकार कर छुट्टी पा लेते हैं ,वह रोती हुई मेरे पास आती है । इन बापों का ढंग भी बड़ा अजीब होता है - कभी तो उसे इतना प्यार करेंगे और कभी एकदम फटकार देंगे ।इनके आगे वह अधिक बोल भी नहीं पाती ,डाँट खाते ङुए सहम जाती है ।पर मुझे तो उसका मन रखना ही है ।
रीनी तीसरे पहर फिर खेलने नहीं गई ।
सब बच्चे जान गए है कि वह पाकिट नहीं मँगा पाई .-उसे दिखा-दिखा कर और चिढ़ाते हैं ।इसलिए वह खेलने ही नहीं जाती ।उदास अकेली बैठी देखकर मेरा मन कचोटता है ।दो साल छोटे टोनू से उसकी बिल्कुल नहीं पटती ,वह तो कभी उसके रिबन खींचता है कभी बाल नोचता है ।

'रीनी , कल सुबह स्कूल जाते समय सुधीर से पाकिट लेकर मुझे दिखा देना फिर मैं तुम्हारा खरीद दूँगी ।'

सुबह का समय? क्या किसी तूफ़ान से कम होता है ।
रीनी तो फिर भी सीधी है ,दो साल का टोनू तो ज़रा सा मन के खिलाफ़ होते ही आसमान सिर पर उठा लेता है - उस पर न बाप की फटकार का असर , न मेरी पुचकार का ।अपनी पूरी बात बोल नहीं पाता तो क्या हुआ बे-मन की बात होने पर ऐसा धमकाता है ।पहली स्टेज होती है नीचे का होंठ सिकोड़ कर पूरा बाहर निकाल कर छ: कोने का मुँह बना कर रोने की तैयारी ।इस पर अगर कोई ध्यान न दे तो दूसरी और आखिरी स्टेज है -खूब ज़ोर से रोने की और वह भी आँखें बन्द करके कि कहीं किसी की पुचकार से रोने की मुद्रा भंग न हो जाए ।रुदन पूर्व की छ: कोने के मुँह और होंठ बाहर फुलाने की आदत तो तब की है जब वह तीन महीने का था ।पहने तो ऐसा मुँह देखकर मुझे बड़े ज़ोर की हँसी छूटती थी - दो चार बार सास वगैरा ने टोका तो अब हँसने पर काफ़ी कंट्रोल कर लिया है । मेरी रीनी ने ऐसा कभी नहीं किया वह सीधे-सीधे रोती है ।
सात बजे रीनी का रिक्शा आ जाता है ,छ: बजे से उसे जगाकर उसके पीछे लगती हूँ - बीच-बीच में टोनू की इमरजेन्सियाँ पूरी करती हूँ और जब वह खा - पी कर समय से तैयार होकर रिक्शे पर बैठ जाती है तो मुझे लगता है एक किला फ़तेह कर लिया । इस सब के बीच दूध गर्म करना , ठण्डा करना ,टोनू की शीशी भरना , शूशू कराना चलता रहता है ।
रीनी को रिक्शे पर भेज कर मैंने चैन की साँस ली ही थी कि रीनी की आवाज़ आई ,' मम्मी --मम्मी--'
'क्या हो गया ?' हाथ मे सँडासी लिए मै दौड़ी-दौड़ी ज़ीने पर आई ।
' मम्मी ये रहा सुधीर का पाकिट --' वह रिक्शे  से चिल्लाई ,'सुधीर ,जल्दी दिखाओ मेरी मम्मी को --।'
सुधीर अपने बस्ते मे कुछ ढूँढ रहा था ।
मेरे पीछे-पीछे टोनू घिसटता चला आया था । मेरी साड़ी की चुन्नटें पकड़ कर वह ऊपरवाली सीढी पर खड़ा उछल-उछल कर नीचे रिक्शे पर ,रीनी को देख किलक रहा था ।नीचे को बढता उसका पाँव देखकर मैने एक हाथ से उसे सम्हाला ,आवाज़ लगाई ,' रीनू, जल्दी दिखा पाकिट ।'
सुधीर ने अपने बस्ते  से कोई सफ़ेद सी चीज़ ऊपर उठाकर दिखाई ,इतने मे दूध जलने की महक आई ।
अरे , मै तो सारा दूध आग पर चढ़ा आई थी !,सँड़सी से उतारने जा रही थी कि रीनी की आवाज़ सुनी ।इधर टोनू एक साथ सारी सीढियाँ फलाँगने ने की कोशिश में ।मैने खींचा तो उसने बड़ी जोर से होंठ निकाल कर मुझे धमकाया , तभी रीनी का रिक्शे वाला चिल्लाया ,' जल्दी करो ।'
'मम्मी देख लिया पाकिट ?'
'हाँ,हाँ--' करती मैं एक हाथ से टोनु को खींचती ,दूसरे हाथ में सँड़ासी सम्हाले अन्दर भागी -दूध उतारने ।मैने सोचा लौटकर आएगी तब देख लूँगी ,पर उस दिन किसी कारण हाफ़ डे में ही छुट्टी हो गई , वह जल्दी ही लौट आई । मुझे पाकिट देखने का मौका नहीं मिला ।
*
शाम को बाज़ार जाने का प्रोग्राम बना ,बना क्या मैंने जान-बूझकर बनाया ।वैसे मुझे बज़ार जाने का कोई शौक नहीं है । पर अब तो पाकिट लेना था ।
हमलोगों ने सारा बाज़र छान मारा ।
दूकानदारों को समझाना मुश्किल हो गया कि पाकिट है क्या ।रीनी अपने ढंग से समझाती थी और वे समझ न पाकर उसे ही बहलाने की कोशिश करते थे ।वे अपनी ही कोई चीज़ भिड़ाने के चक्कर मे रहते ।पर बहल जाय तो रीनी कैसी !हम लोगों ने भी उसे समझाया ,कई खिलौने दिखाए - 'कहा तुम ये लेलो ये पाकिट से भी अच्छे हैं ,और किसी के पास ऐसा है भी नहीं ।'
पर उसकी एक ही रट '-हमें तो पाकिट चाहिए ,सबके पास है हमें भी चाहिए ।'
अब तो मैं भी परेशान हो गई, 'जो चीज़ कहीं मिलती ही नहीं ,तुम्हारे लिए कहाँ से ला दें ?हमने तो कभी देखी भी नहीं ।'
'सुधीर की दिखाई तो थी ।'
'कहाँ देख पाई मै !टोनू नीचे कूदा जा रहा था उधर दूध उबल गया -- ।'
रीनी फिर उदास हो गई ।मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था ।
शाम हो गई थी । मौसम सुहावना था । मैंने सोचा जल्दी घर पहुँच जाएँगे तो ये अकेली चुपचाप बैठी रहेगी खेलने भी नहीं जाएगी ,रास्ते में ही थोड़ा समय निकाल दें ।
'चलो पैदल ही घर चलें रिक्शा लेकर क्या करेंगे ?'
'तुम्हीं थक जाओगी , मुझे क्या -- ।'
हम लेग लौट पड़े ।
आज तो हद हो गई !बीस पच्चीस दूकानो पर पूछा पाकिट किसी के पास नहीं !
ऐसा क्या अजूबा है ?

नुमायश ग्राउण्ड की सफ़ाई हो गई थी ,उधर से निकल चलेंगे तो काफ़ी चक्कर बच जाएगा । हम लोग नुमायश की तैयारियाँ देखते हुए चलते रहे । पूरा मैदान एकदम साफ़ है ,जगह-जगह फाटक लग रहे हैं ,बिजलीवालों के तम्बू गड़े हैं ,बिजली की फ़िटिंग चल रही है .क्यारियों में फूलों की पौध तैयार हो रही है ।हप़्ते भर बाद यहाँ खूब रौनक रहेगी ,शहर के लोग इधर ही उमड़ पड़ेंगे ।लाउड-स्पीकरों के शोर के मारे एक-एक बजे तक सोना मुश्किल हो जाएगा !
गर्मियों की सुहावनी शामें बड़ी जल्दी ढल जाती हैं । नुमायश ग्राउण्ड की इक्की-दुक्की बिजलियाँ जल गईं थीं ,बिजलीवलों के तम्बुओं से हम जरा आगे बढ़े ही थे कि दैड़ती हुई रीनी चिल्लाई ,'मम्मी ,मम्मी , वो रहा पाकिट ! '
उसने झुक कर जमीन से कुछ उठाया ,फ्राक से उसकी मिट्टी पोंछी और दोनो हथेलियों से दबा कर सीने से लगा लिया ।
'देखें तो क्या है ,' हम दोनों उत्सुक होकर एक साथ भागे ।
उसने खोल कर दिखाया -
सिगरेट का एक खाली पैकेट ,जिस पर लालटेन की तस्वीर बनी हुई थी !
*

शनिवार, 27 मार्च 2010

खिलौने

' वहाँ की यहाँ से क्या बराबरी ?वहाँ की चीजों की बात ही और है ।क्या फ़िनिश ,क्या बारीकियाँ ,जैसे असली ही छोटी कर के रख दी हो ।'
' भाई कब से अमरीका में है?' सुदीप के पापा कनु के खिलौनों की हाथ में उठा उठा कर तारीफ़ कर रहे हैं ।
कनु के लिये चाचा ने भेजे हैं अमरीका से !
' कौन? कमल ?वह गया था दो साल के लिये ,पर वहीं जॉब ले लिया ।एक बार आया था बीच में ,पर यहाँ कहाँ मन लगता उसका !' विमल गर्व से बता रहे हैं -' अब शादी करवाने आयेगा अगले साल ।'
' सच में ! क्या परफ़ेक्शन है ?' सुधा उत्फुल्ल भाव से सोच रही है ।
सुदीप के माता-पिता आये हैं । उन्हें चाचा के भेजे खिलौने दिखाये जा रहे हैं ।कनु और सुदीप रेलगाड़ी चला रहे है,' देखो , कैसे पटरी पर दौड़ती है ।'
सुदीप की माँ छोटा सा वायलिन उठाती हैं -' ये बजाना सीखना पड़ता होगा ?'
' अरे नहीं ,इसमें सात ट्यूने भरी हुई हैं -देखिये ,ऐसे बजाते हैं।'
विमल वायलन की ट्यून सुनवा रहे हैं ।
' वाह ,क्या बात है !'
सत्ते आ कर खड़ा हो गया ,चन्दो का बड़ा बेटा ।कनु से दो साल बड़ा ।
कई साल हो गये हैं चन्दो को इस घर में काम करते । यहीं पास में रहती है ।साफ़-सुथरी समझदार महिला है ।रंग-ढंग देख कर कोई नहीं कह सकता कामवाली है ।वो तो समय ने काम करने पर मजबूर कर दिया नहीं तो खाता-पीता परिवार था ,ससुर की दुकान थी, अच्छी चलती थी ।पर तीनों भाइयों के बँटवारे में सब चौपट हो गया ।
चन्दो का आदमी सबसे छोटा था ।पढने लिखने में मन नहीं ,दुकान पर बैठने लगा ।बँटवारे के बाद पनप नहीं पाया ।ठेला लगा कर गृहस्थी पालता है ,चन्दो दो घरों में काम कर लेती है ।बड़ा बेटा सत्य नारायण उर्फ़ सत्ते का इस घर में अबाध रूप से आना-जाना है ।कनु से अच्छी पटरी बैठती है उसकी।
चन्दो का व्यवहार ही ऐसा है कि वह कामवाली नहीं घर की सी लगती है ।उस पर बहुत निर्भर है सुधा ।
सत्ते खिलौनों का प्रदर्शन देखता रहा ,फिर कनु की ओर बढ गया ।
कोई घर मे आ जाये तो विमल को सत्ते का कनु के साथ होना भाता नहीं ।इसका यहाँ क्या काम !
' क्या सत्ते, अम्माँ ने किसी काम से भेजा है ?'
' नहीं ।हम तो ऐसे ही चले आये ।कनु भैया के पास ।'
' सत्ते ,वो वायलिन इधर लेते आना ,' कनु ने कहा ।
वह वायलिन लेने बढ़ा ।
विमल ने टोका , ' देखो इसके तार वगैरा न दब जायें ,कनु तुम क्यों नहीं ले जाते ?'
' पापा, उसे सब पता है ।वो अच्छी तरह बजा भी लेता है ।सत्ते बजा कर दिखाओ तो।'
विमल का मुँह बिगड़-सा गया ।
' ठीक है ,ठीक है ।पर जरा सम्हाल कर ।'
' बच्चों ,तुमलोग उस तरफ़ जाकर गाड़ी और प्लेन चलाओ वहाँ खुली जगह है ।'
सुधा चाय की व्यवस्था करने जाते जाते बोली ।
वे लोग दूसरी ओर चले गये
सत्ते के उधऱ जाते ही सुदीप के पिता ने पूछा ,' यह लड़का पड़ोस में रहता है क्या ?'
' हाँ ,' विमल कह नहीं पाये कि कामवाली का बेटा है ।
वे एक-एक की बारीकियाँ बता रहे हैं ।बच्चों से ज्यादा उछाह तो उनमें है ।
सुदीप की मम्मी बड़ा सा टैडी बियर उठाते हुये कह रही थीं ,' और ये स्टफ़्ड वाले भी तो देखो ।कितने सुन्दर एकदम मुलायम !'
' वहाँ बच्चे इन्हें साथ में लेकर सोते हैं ।'
' हैं ही इतने प्यारे !'
' पेंग्विन तो लग रहा है ,अभी चल पड़ेगी ।'
' और सबसे अच्छी बात, गंदे हो जायँ तो वाशिंग मशीन में डाल कर धो लो ,फिर एकदम साफ़ ,जैसे के तैसे !'
उनकी बेटी उससे गाल सटा कर खुश हो रही है ।
' ये मिकी माउस है ,वहाँ डिज़नी लैंड हैं न वहाँ का खासमखास ।'
' सुना है बिल्कुल परीलोक है ।'
' हमारे पास एल्बम है ।वहाँ की तस्वीरें देख के अंदाजा मिल जायेगा ।'
विमल एल्बम निकाल लाये ।
बड़े लोग तस्वीरों पर झुक आये ।
' ये मिकीमाउस-मिनीमाउस हैं ।ये इनका घर ।ये कॉसल है ,परियों के महल जैसा ।लेक बनाई है ,एक ट्रेन पूरा चक्कर लगवाती है,और खूब सारे राइड्ट !.अरे, एक दिन में तो आधे भी नहीं ले पाते ! ..रात को फ़ायरवर्क्स.. ..वंडरफ़ुल.।
***
दोस्त आते हैं तो कनु उन्हे बड़े चाव खिलौने से निकाल कर दिखाता है ।
बताता हैं यहाँ थोड़े ही मिलते हैं ,चाचा ने अमेरिका से भेजे हैं ।
बच्चों के माता-पिता भी उत्सुक हैं ।कभी कभी ख़ुद पूछ देते हैं -' विधु बता रहा था देखें तो कौन सा खिलौना है अमरीकावाला ।'
कनु ला कर दिखाता है बड़े लोग हाथ में लेकर घुमा फिरा कर देखते हैं । परम संतुष्ट भाव विमल के चेहरे पर! वे उनकी आँखों में प्रशंसा देख तुष्ट होते हैं ।
इधर सुधा एक चीज़ नोट कर रही है - चंदो का वह बेटा जिसका मुँह ' भइया भइया ' करते नहीं थकता था ,बड़े सहज रूप से घर में खप गया था , अलग-थलग रहने लगा है । अभी तक कनु और सत्ते दोनों मिल कर खेलते थे ।सत्ते कनु का पूरा-पूरा ध्यान रखता था ।अब चुप-चुप रहता है ,पहले की तरह हँसना -बोलना खत्म हो गया है ।पहले जो सहज रूप से घर के सामान की सम्हाल करता था अब तटस्थ -सा देखता रहता है ।विमल होते हैं तो बाहर -बाहर से चला जाता है ।
**
पिता ने कनु को समझाया था ,' ज़रा सावधान रहा करो ।'
' क्यों ,पापा ?'
' सबके सामने निकाल कर बैठ जाते हो और सत्ते वहीं मँडराया करता है,ज्यादा सिर मत चढाओ उसे ।
वह तो उपत कर वहीं जाता है जहाँ खिलौने रखे हैं ।'
फिर एक दिन -
विमल के ऑफ़िस के तनेजा सपरिवार आये थे ।
बातों-बातों में कमल की शादी की चर्चा -
' बढिया नौकरी है ।वहाँ के ठाठ के क्या कहने !'
' हाँ ,हमारे साढू का भाई भी वहीं है । जाकर आने का नाम नहीं लेता ।क्या फटाफट अंग्रेजी बोलते हैं बच्चे ।
वहाँ के कपड़े भेजता है ।क्या मेटीरियल ,क्या सिलाई ।सालोंसाल खराब नहीं होते ।'
'एक हमारे यहाँ !एक टाँका निकले तो उधड़ता चला जाये ।क्वालिटी पर कोई ध्यान नहीं देता ।'
' और खिलौने यहाँ के ऐसे कि पानी पड़े रंग उतर जाये ।एकाध बार खेलें तो कोरें निकल आती हैं ।नोंके और कोरें चुभने लगती हैं। .और वहाँ के खिलौने !नन्हा बच्चाभी मुँह में दे ले तो भी कोई डर नहीं ।अभी कमल ने भेजे हैं ,कनु के लिये ।बस , देखने की चीज़ है ।'
' अच्छा ,कमल ने भेजे ? .वहाँ से ?'
कनु की पुकार हुई ।
'वह के सत्ते के साथ बाहर खेल रहा था ।साथ-साथ सत्ते भी चला आया ।'
खिलौने मँगाये गये ।
' उत्साह में सत्ते कनु के साथ उठा-उठा कर लाने लगा । '
'रेलगाड़ी औऱ पटरी दोनों एक साथ उठाये चला आ रहा था ।
' अरे ,सम्हालकर,' जोर से विमल ने टोका ।
सत्ते चौंक गया ,सब उधऱ देखने लगे ।
'दोनो एक साथ उठा लिये ?उसे क्यों दे दिये कनु ?कहीं गिरा दिया तो यहाँ तो ठीक भी नहीं होगा ,',विमल ने एकदम कहा ।
' पापा. इतना वह समझता है ।वह तो मुझे भी बताता रहता है।'
इस बीच सत्ते एकदम सहम गया था गाड़ी उसके हाथ से छूट गई ।
' देखो कनु कुछ टूटा तो नहीं ।मैंने पहले ही कहा था ।'
सत्ते जड़-सा खड़ा। फिर धीरे से बाहर निकल गया ।
**
उस दिन कनु का उड़नजहाज नहीं मिल रहा था ।सारा घर छान डाला ।बाहर झाड़ियों में पड़ा मिला ।फिर तो आये दिन खिलौने कहीं के कहीं मिलते ।एक तो कूड़े में पड़ा दिखा । सुधा कहीं से आ रही थी उसने देख लिया ।
टूटा हुआ था । हारकर सुधा ने अल्मारी में रख दिया ।
विमल का शक सत्ते पर है ।
उस लड़के को इतनी छूट मिलेगी तो यही होगा ।
कनु को दस बार समझाया लेकिन उससे थोड़ा दूर -दूर रहे पर उसके साथ खेले बिना इसका जी नहीं भरता ।
' पर कहाँ खेलता है अब सत्ते साथ ?सुस्त सा घर में बैय़ा रहता है ।और उसके साथ खेलने में बुराई क्या थी ?मैं तो निश्चिंत हो जाती थी ।कनु तो लापरवाह है उसकी चीजों की वही तो ध्यान रखता था ।'
'क्यों, कनु से खुद नहीं रखा जाता ?अब देख लिया न नतीजा ।पता नहीं क्या-क्या चुरा ले गया हो ।'
' बस करो उन लोगों पर सारा घर छोड़ जाती हूँ ।कितने साल हो गये ।बेकार तोहमत मत लगाओ किसी पर ।'
' मैं तो लड़के की बात कर रहा हूँ ।अपने पास नहीं है तो इसका उड़ा दिया ।'
' माँ-बाप ऐसे नहीं कि ऐसी चीज़ घऱ में रख लें ।फिर खेलना तो यहीं है न '!
विमल भुनभुनाते रहे ।
उसने कनु से पूछा था -सत्ते अब तुम्हारे साथ नहीं खेलता ?
उसे इन चीजों से खेलने का ढंग नहीं है ।पापा कह रहे थे गिरा देगा तो खराब हो जायेगा ।यहाँ तो ऐसा मिलेगा भी नहीं ।उसकी नियत मेरी चीजों पर लगी रहती है। अकेले में मेरी चीजें छूता है ।'
जिस दिन खिलौने आये थे सुधा को याद है ,सत्ते का उत्साह कनु से कम नहीं था ।दौड़-डौड़ कर पैकिंग खुलवाने में चीज़ें उठाने-धरने में मदद करता रहा ।कनु से किसी घट कर नहीं था उसका चाव और खुशी । उमंग और कौतूहल से भरे दोनों एक -एक चीज़ को समझने की कोशिश करते रहे ।
कितना परायापन आ गया है अब ! कुण्ठित-सा अलग-थलग खड़ा रहता है ।कनु से दूरियाँ बढती जा रही हैं । उसकी नज़रों में अक्सर ही क्या होता है -द्वेष .घृणा ,प्रतिहिंसा ?वह समझ महीं पाती ।
परेशान है वह भी ।पति कहते हैं उसी सत्ते के कारनामे हैं ।सुधा कुछ बोल नहीं पाती। कुछ कुछ शक उसे भी है ।
पर कैसे हो गया यह सब ?सत्ते तो कभी ऐसा नहीं था! कनु उस पर कतना निर्भर रहा है ! उससे ज़्यादा सावधान वह रहता था कि कनु को या उसकी चीज़ों को कोई नुक्सान न पहुँचे ।कनु के लिये दूसरों से लड़ जाता था ।उसके लिये कोई कुछ कह दे तो उसे सहन नहीं होता था । और दोस्त हों या न हों, सत्ते के साथ मगन रहता था कनु । और अब क्या हो गया कि किसी काम से आता भी है तो रुकता नहीं , फ़ौरन चला जाता है ।चेहरे पर न मुस्कराहट न खुशी ,जैसे अपरिचित लोगों के बीच आ गया हो ।

सुधा जानती है अब वह पहले जैसा पास नहीं आता पर तृषित निगाहों से कनु के खिलौने देखता है ।कई बार उसने देखा है उसकी माँ जब उसे कुछ कहने -बताने या किसा और काम से भेजती है तो वह वहीं जाकर खड़ा होता है जहाँ कनु खेल रहा होता है ।कनु उधर न भी हो तो वह खिलौनों के पास ही जाकर खड़ा होता है ।
अकेले में छू कर देखता है ,किसी के आते ही डर कर अलग हो जाता है ।पहले खिलौने पड़े होते थे तो खूब इत्मीनान से समेट कर डब्बे में रखकर अल्मारी में रख देता था ।इससे पहले भी सत्तेहमेशा कनु के बाहर पड़े खिलौनों को सम्हाल कर लाताथा ,' देखिये , कनु भैया ये बाहर ही छोड़ गये थे '-कह कर अल्मारी में जमा देता।पर अब ..अब कितना बदल गया है ,जैसै उसे कोई मतलब ही न हो ।
**
मैंने तो पहले ही कहा था कि उन लोगों को मत दिखाओ ,उनके सामने निकालो ही मत खेलो ही मत ,।कैसी ललचायी निगाहों से देखता रहता है ...!
' तो खिलौने बंद कर रखने को होते हैं ?'
सुधा को अच्छा नहीं लगता कही है ,'बस बस रहने दो।खिलौने खेलने को हैं कि सेंत कर रखने को ?।दूसरों को तरसा कर क्या खुशी बढ जाती है ?ज्यादा संतोष मिलता है? "..

' क्या फ़ायदा कि मिल कर मन भऱ के खेल भी न पाये। ।आपस में मेल रखाने के जगह भेद डालें ! अकेले में निकालो और बंद करके रख दो ये भी कोई खेलना हुआ ?'
' अपने दोस्त आयें उनके साथ खेले ।'
' हाँ , खेले तो पर उन्हें भी ईर्ष्या होती है । और हमारा बच्चा कैसा खुश होता है कि मेरे पास है और किसी के पास नहीं ।यह क्या खेलना हुआ ?
' तो उन्हें मना किया है किसी ने ? वे भी मँगा लें ।'
' औरों के बल पर दिखावे की जरूरत नहीं ।कोई हमारे यहाँ का तो है नहीं कि कोई चाह कर भी ले ले ।
अभी से कनु को ये सब मत सिखाओ ।खेलने में सब बराबर ।पर यहाँ तो एक सबसे खास बनना चाहता है ।
खिलौने भी दिखावट की चीज़ हो गये !और लोग तरसें और एक खुश हो।
सब मिल कर नहीं खेलें तो खेल काहे का ?
वह सोचती रही पता नहीं कैसे खिलौने जो निर्मल आनन्द की जगह दूसरे के अभाव पर खुश हों ।खेल की भावना तो मर गई, रह गया दिखावा कि ,देखो ,हम ऐसे हैं ।
एक दूसरे से सहयोग की जगह साथ मिल कर खुश होने के दूसरे की मजबूरी का मज़ा लेना ।.मिल कर रहने की तो बत ही नहीं ।बस हम खास बने रहें बच्चों में यही भर दो ।आपसी दूरियाँ और हीनता की भावना पनप रही है जो किसी को चैन से नहीं रहने देगी ।
खिलौने थोड़े ही हैं दिखौने हैं !कोई तरसे किसी को खुशी हो ।

कई दनो से सुधा नोट कर रही है सत्ते की भाव-भंगिमा बदलती जा रही है ।।पहले कनु के लिये दौड़ कर आता था ,उसकी आँखों में प्यार और सम्मान था ,हमेशा मदद को तैयार ।।लापरवाह कनु की चीज़े सम्हालता था जैसे उसकी जुम्मेदारी हो उसके लिये। हमेशा मुस्तैद रहता था कि कहीं कोई नुक्सान न हो जाये ।कितना मानता था कनु को ।दोनों खेलते ।वह भी निश्चिंत रहती थी कि वह है तो कनु का पूरा ध्यान रखेगा ।चन्दो कहती थी कनु भैया बुलायें तो इसका खाने में भी मन नहीं लगता ,तुरंत दौड़ता है।
अब तो कनु घर में ही ज्यादा रहता है पहले मौका मिलते ही बाहर खुली हवा में दौड़-भाग के खेल खेलने निकल जाता था।अब अंदर घुसा रहता है ।कहो तो कह देता है बाहर कोई खेलता ही नहीं ।एक-दूसरे को देख कर चेहरे खिल जाते थे -चाहे सत्ते ही क्यों न हो ।
कभी-कभी वैसे ही खाली -खाली सा। खिलौनो में भी रुचि कम हो गई हो जैसे ।पहले की चपलता-चंचलता समाप्त हो गई ,खिन्न-सा रहता है ।सारा उछाह खत्म हो गया हो जैसे । दोस्त आते हैं वे बाहर खुली हवा मे न खेल कर उसके खिलौनों से ही खेलना चाहते हैं । पहले खूब कर भागते-दौड़ते हँसते खिलखिलाते थे ।कूदने -फाँदने गेंद खेलने का किसी को ध्यान ही नहीं आता ।
' जाओ मैदान मे खेल लो ,' वह कहती है ।
वे सब कह देते हैं,' बाहर से ही तो खेल कर आ रहे हैं ।'
कनु नहीं उसके खिलैने इन्हें खींच लाते हैं ।
कैसी कुंठाये पनप रही हैं जो संबंधों को सहज नहीं होने देतीं ।
**
चन्दो उदास रहती है ।आती है काम करके चली जाती है ।बहुत कम बोलती है -सिर्फ़ काम की बात ।
सुधा परेशान है ।क्या करे कुछ समझ में नहीं आता ।घर में चन्दो हँसती-बोलती थी तो कितना अच्छा लगता था ।
सुधा ने उसे कभी नीचा नहीं समझा -उसमें ओछापन बिल्कुल भी नहीं, नियत की अच्छी है माँगने की आदत बिल्कुल नहीं ।अपनी सीमायें समझती है ।
सुधा से रहा नहीं गया ।
'चन्दो ,क्या हो गया है आजकल ?तबीयत खराब चल रही है क्या ?'
'क्या कहें बीबी जी ,कुछ कहते नहीं बन रहा ।आज कल घर में बड़ी अशान्ति चल रही है ।'
'क्यों ?'
उसने ठंडी साँस भरी ।कुछ बोली नहीं ।
' बताती क्यों नहीं ,क्या हुआ ?'
'क्या बतायें ?सत्ते को का जाने क्या हो रहा है ?'
'हाँ , मुझे भी आज कल बड़ा बदला-बदला लगता है ।'
'न अपना खुस रहे न कसी को रहने दे ।कलेस मचाये रहता है घर में ।'

वह रोने लगी ,' बीबीजी भइया के खिलौने आये ।पहले कई दिन ये भी बड़ा खुस रहा ।आये-गये सबको चाव से बताता रहा -ऐसी रेलगाड़ी है पटरी पर भागती है ।उड़न जहाज उड़ता है और उसे एक बटन दबा कर मनचाही तरफ घुमा दो ।और बहुत बातें । बड़ा मगन रहता था -कनु भइया का खिलौना ऐसा है जैसे सचमुच का हो ।
पर फिर जाने का हुइ गया ।अब कैसा होता जा रहा है ,चुप चुप रहता है।किसी काम मे मन नही लगता उसका ।
।उखड़ा-उखड़ा रहता है ।छोटे भाई बहनों को जरा सी बात पर पीट देता है।'
ऐसा तो नहीं था ।क्या होता जा रहा है सत्ते को ।कभी-कभी चन्दो बड़ी दुखी हो जाती है ।
दुखी तो सुधा भी हो जाती है ।
चन्दो कहे जा रही ,' पहले कभी ऐसा नहीं था। अब तो बाप के सामंने-सामने बोलने लगा है ।बहस करता है ।'
' अच्छा !क्यों ?'
' कहता है मुझे भी खिलौने दो लाकर ।'
सुधा को कैसा-कैसा लग रहा है ।
' हमने समझाया ।कनु भैया के साथ खेल तो लेते हो ।पर उसकी समझ मे नहीं आता ।कहता है अपनी चाहिये ।
कुछ दिन से हल्ला मचाये है -मुझे भी ऐसी गाड़ी ला दो जो पटरी पर भागती है ।बस एक चीज़ ला दो ।
एक रेलगाड़ी ला कर दी तो उसने उठा कर फेंक दी ।इसी बात पर बाप को गुस्सा आ गया ,पीट दिया । रोते रोते सो गया ।अब बीबी जी ,सुबह का गया गया दिन भर मेहनत कर शाम को आता है। उस दिन सीधा बाज़ार होता हुआ उसके लिये रेलगाड़ी ले कर आया। पर इसके मिजाज मिलेंतब न !अब बीबी जी, मँहगी चीज़ें हम कहाँ से खरीदें ?उसकी समझ में कुछ नहीं आता ।बाप झींक जाता है ।
परसों तो बाप ने इसी से पीटा ।हम ग़रीब आदमी कहाँ से लायें ऐसे मँहगे खिलौने ।'
सुधा क्या कहे ।सुनती रही ,अपना काम करती रही ।
***

और फिर एक दिन पटरी पर दौड़नेवाली रेलगाड़ी गायब हो गई ।
घर मे से कहाँ चली जायेगी ।उसके सिवा और कौन घर में आता है ?
विमल का गुस्सा सत्ते पर है ,' पहले ही कहता था उसे सर मत चढाओ । पर तुमन लोग मानो तब '
' देखो ,जब से रेलगाड़ी ग़ायब हुई है उसने शकल भी नहीं दिखाई है ।'
' कनु के दोस्त ?नहीं वो ऐसा नहीं कर सकते !और इत्ती बड़ी रेलगाड़ी छिपा कर कैसे ले जायेंगे !
वही ले गया है ।मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।उसकी निगाहें लगी थीं गाड़ी पर ।'
चंदो से पूछा गया ।
' अभी तक तो कभी चोरी की नहीं ।बीबी जी ,घर जाकर पता लगाऊँगी।हाँ, और कोई तो आया भी नहीं दो दिनों से। फिर गई कहाँ?।इस लड़के के लच्छन आजकल समझ में नहीं आते ,पर लाता तो घर में ही लाता ।उसका कसूर होगा तो बाप जान से मार देगा ।मिलनी चाहिये रेलगाड़ी कहीं तो ,आप चिन्ता मत करो ।जायेगी कहाँ घऱ में से ?
परेशान सी चन्दो चली गई ।
सुना रात में बाप ने खूब मारा,बदन में नील पड़ गये पर सत्ते साफ़ मना करता रहा ।
दो दिन से सत्ते बाहर नही निकला ।

तीसरे दिन चन्दो दोपहर में आई ।
छिपा कर लाई हुई रेलगाड़ी निकाली और मेज़ पर रख दी ।
अरे ये कहाँ मिली ?
चन्दो रोने लगी ।
'माफ़ करना बीबी जी ,हमें पता नहीं था ।घर में लाने की हिम्मत तो थी नहीं सो उसने बाहर भूसे के ढेर में छिपा कर रखी थी ।आज कंडे लेने गई तो दिखाई दे गई । उसके बाप ने चमड़ी उधेड़ दी ,उस दिन से खाना भी नहीं दिया है ।वहीं भूसे की कोठरी में पड़ा है । सारा बदन नीला पड़ा है ।
सुधा सिहर उठी ।
चन्दो कह रही है,' कहीं सिर उठाने लायक नहीं रखा ।इससे तो मर ही जाता अभागा !
अब आपको भी जो सजा देना हो दे दो ।उसे भी और हमें माँ-बाप को भी !'
सुधा सुन रही है ।
सुधा सुन रही है ,कानों में जैसे कोई लावा उँडेल रहा है ।कान मूँद कर भाग जाना चाहती है , पर सब सुनना पड़ रहा है ।
'जो जो कुछ खराब हुआ है सबके पैसे काट लो ।मैं क्या करूं ,मैं तो हार गई ।'

कितने प्रयास से मुँह से बोल फूटे ,' बस ,बस चन्दो ,बहुत हो गया ।'
पल्ले से मुँह दबाये चंन्दो सिसक रही है ।
' रो मत चन्दो ,गलती तेरी नहीं है ।बड़ों-बड़ों को अपने पर काबू नहीं रहता ।वह तो बच्चा है ।जैसा तेरा ,वैसा मेरा ।...मैं भी दुखी हूँ चन्दो !
बड़ी मुश्किल से समझा कर चन्दो को भेजा ।
अब मारना-पीटना नहीं ,ऐसे तो लड़के बिगड़ जाते है ।जाकर खाना खिलाओ उसे ।
सुधा का मन खराब हो रहा है ।दिमाग में क्या क्या खयाल आ रहे हैं - कभी कनु को तरसना पड़े तो ? तो क्या गुज़रेगी उस पर.?क्या गुज़रेगी हम पर ?
जो नहीं खरीद सकता वह क्या करे ?और फिर बच्चे ?उन्हे कैसे समझाया जाय ?
कितने सवाल उठ रहे हैं ,खूब पिटा है भूखा पड़ा है सत्ते ?
ऐसा तो नहीं था !क्या हो गया उसे ?
दो दिन से भूखे बच्चे का बार-बार ध्यान आ रहा है । रह-रह कर तिलमिला उठता है मन ।
भूखे शरीर पर क्रोध से पागल बाप की लगातार पड़ती मार- सुधा झेल नहीं पा रही ।
**
क्या हो गया ? सब समझ रही है सुधा !
अब तक सिर्फ सोचती थी ।अब समझ में आ रहा है ।
यह कैसा खेल हैं ? आपस में असंतोष पलता रहे ,सब अलग-अलग पड़ते जायें, संवेदना -सहानुभूति रहित ? कनु जब खेलने बैठता है तो औरों को कैसे देखता है जैसे कह रहा हो -जो मेरे पास है तेरे पास कहाँ !तू कहाँ से लायेगा !और बच्चों पर जैसे कृपा कर रहा हो अपने साथ खिला कर ।कैसा खेल है यह ?
जहाँ की है वहीं रहें ऐसी चीज़ें ।वहाँ सबके पास होंगी ,दूसरों के बच्चों को तरसना नहीं पड़ता होगा !यहाँ ये खेलने के लिये थोड़े ही, हम कुछ खास है ये दिखाने के लिये आये हैं ?
या फिर सबके साथ खेले, मिल बाँट-कर । सो नहीं ।
सुनने को मिलता है,' हरेक के सामने मत निकाला करो ।खराब हो जायेंगे ।'
हरेक ?माने साधारण लोग !
और कनु तो खास बन गया है ।
खिलौने ?बच्चों के खेलने की निर्दोष चीज़े । को आनन्द देने के साधन !और ये मँहगी मँहगी मशीनों जैसी चीजें सिर्फ अपना बड़प्पन के दिखावे के लिये ! औरों को दिखा कर उनके मन में तृष्णा जगाने के लिये !चार जनो के साथ मिल कर खेलने के बजाय पड़ते जाने के लिये ! इसीसे बड़प्पन पता लगेगा ।इसीसे संतुष्टि होगी ?
तो रख लो सम्हाल कर सहेज कर !सबसे हटा कर। संदूक में बंद कर दो ।

***
एक झोला हाथ में पकड़े सुधा चन्दो के घर जा रही है ।
' अरे बीबी जी ,आप ?मुझे बुला लेतीं ।'
' क्यों? मैं नहीं आ सकती ?'
' आइये ,कही जा रही हैं क्या ?'
' नहीं । सत्ते कहाँ है ?'
' फिर कुछ किया क्या उसने ?'
' नहीं ।उसने कुछ नहीं किया । बुलाओ तो ।'
सत्ते कहीं से आ रहा है- चेहरा दुर्बल,सूखा-सा ठीक से चल नहीं पा रहा है ,हाथों पर नीले निशान ।
सुधा को देखा ,चौंक गया ।चाल थम-सी गई ।
' बीबी जी तुम्हें बुला रही हैं ।'
' रुक क्यों गये सत्ते ?आओ ,मैं तुम्हीं से मिलने आई हूँ ।'
कहीं शिकायत का स्वर नहीं , आवाज़ सहज स्नेहमय ।
सुधा खुद बढी ।उदास खड़े सत्ते का कंधा पकड़ अपने से सटा लिया ।
साथ लाये झोले से खिलौने निकालने लगी -वही पटरीवाली रेलगाड़ी !दो-तीन-और चीजें हैं ।
' ये ,तुम्हारे लिये !'
चन्दो चौंक गई है ।
' बीबी जी,ये क्या कर रही हो ?हम कहाँ इन खिलौनों के लायक।।कनु भइया के हैं। ले जाइये ।'
सत्ते अवाक् खड़ा है ।
' नहीं । अब सत्ते के हैं ।कनु के पास और भी हैं । इन से खेलना होगा तो सत्ते के साथ खेल लेगा ।'
सत्ते ने सिर झुका लिया है ।
किसी की समझ में नहीं आ रहा क्या बोले ।
'क्यों, मैं सत्ते को कुछ नही दे सकती ?'
सत्ते विमूढ !क्या कहे ,क्या करे !अंदर से गले-गले तक कुछ उमड़ा आ रहा है ।बड़ी मुश्किल से बोल निकले -
' माफ़ कर दीजिये १गलती हो गई ।'
आवाज़ बिल्कुल ऱुँधी है ।
' पागल है क्या ?खुशी से खेल ।'
चन्दो की ऑखों में द्विविधा है ,' और बाबूजी ?'
' मैं चुरा कर नहीं दे रही हूँ । बाबूजी की चिन्ता मत कर ।मैं हूँ न ?'
सत्ते फूट-फूट कर रो उठा है । आँखों से धाराधार आँसू बह रहे हैं ।
उसने आगे बढ कर सिर पर हाथ रखा -हथेली से गालें पर बहते आँसू पोंछ दिये ।
' अब कभी नहीं आंटी जी ।'
'मुझे मालुम है अब कभी नहीं ! गलती किससे नहीं होती ? '
'चन्दा ,तुम लोग उससे कुछ मत कहना ।'
विमल को वह समझा लेगी ।
पर ये चन्दो क्यों रो रही है ?
उद्वेलित लहरों को सहज होने में थोड़ा समय तो लगेगा ही ।
- प्रतिभा सक्सेना .

पुनर्नवा

अपू अपने कमरे में गुमसुम बिस्तर पर लेटी है।
घर-भर की चिन्ता रखनेवाली,संयत ,शिष्ट ,कर्तव्यपरायण ,बड़ी बहू, आज सुबह से उठी नहीं। हमेशा मुस्तैद रहकर ,खुशी-खुशी सारे काम निपटानेवाली,अपर्णा चुपचाप लेटी हुई है ,जैसे किसी से कोई मतलब ही नहीं।
मुँह से कुछ बोलती नहीं ,बस आँखों से आँसू बह आते हैं।कमरे में लोग आ रहे हैं ,जा रहे हैं। उसे किसी का भान नहीं ।आँखें बन्द किये पड़ी है, बेख़बर!
पत्नी के माथे पर हाथ रखा प्रबोध ने , उसने हल्के से पलकें उघारीं ।
'अपू ,तुम्हें क्या हो गया है ?'
उसने आँखें बन्द कर लीं उत्तर कुछ नहीं ।
'बोलो न ।तुम्हें क्या होगया, अपू ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं मुझे नहीं मालूम ।'
विस्मित से प्रबोध उसे हिलाते हैं ,'क्या कह रही हो ?'
कैसी निगाहों से देख रही है जैसे पहचानती न हो ।
'अपू,अपू, क्या कह रही हो तुम ?'
' मुझे कुछ नहीं मालूम ,कितने लोग हैं।'
'कैसा लग रहा है तुम्हे ,अपू ओ अपू ?'
देवर सुशील कमरे मे आया ,'भैया , क्या हो गया भाभी को ?'
'कुछ समझ मे नहीं आता । बुख़ार तो नहीं है।'
'भाभी, कैसी हो ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं , मुझे कुछ नहीं मालूम ।'
बालों मे कंघा लगाये शोभना कमरे मे आ रही थी ,बिस्तर की ओर आते-आते उसने अपू की बात सुनी,और ज़ोर से खिलखिला उठी ।
हँसी की आवाज़ ,कमरे की उदास स्तब्धता को चीरती चली गई। दोनो भाई चौंक कर उसकी ओर देखने लगे।
'कॉलेज जाना है ,' घबराकर शोभना बाहर निकल गई।
' क्या बड़ी भाभी की तबीयत कुछ खराब है?'
छोटी बहू ,ललिता ,कटोरी से चावल नाप कर थाली मे डाल रही थी ।
उसने सिर उठाकर शोभना को देखा ,बोली ,' कल रात पिक्चर से लौट कर मै उनके कमरे मे गई थी,तब तो ठीक थीं। ' फिर मुड़कर रसोई से बाहर निकलती शोभना को आवाज़ लगाई ,' अरे,कहाँ जा रही हैं ,सुनिये तो...सब काम लेट हुए जा रहे हैं जरा ये चावल तो बीन दीजिये। '
'मुझे तो ख़ुद देर हो रही है,पता नहीं कॉलेज टाइम से पहुँच पाऊँगी कि नहीं .... अच्छा लाओ,बीन दूँ।'
बे-मन से शोभना ने चावल की थाली पकड़ ली ,हथेली से चावल समेटती बीनने का उपक्रम करने लगी। बड़ी मुश्किल है।अभी नहाना है, तैयार होना है,नाश्ता करना है और ये चावल बीनने को पकड़ा दिये! शोभना को बड़ा नागवार गुज़र रहा था।
सास आवाज़ लगा रही थीं,' अरे, बड़ी बहू कहाँ है?आज सुबह से नहीं दिखी।'
सब एक-दूसरे से पूछ रहे हैं , ' अपू को क्या हो गया/'
आज सुबह से कमरे से बाहर नहीं आई ।
रोज़ तो मुँह अँधेरे से उठकर कितना काम निपटा डालती थी ! अब तक किसी को पता ही नहीं था कि घर मे ये काम भी होते हैं।इस बेला तक नहा-धोकर माथे पर बिन्दी लगाये चौके मे लगी दिखाई देती थी।
सुशील ने ललिता से कहा ,'तुम जाकर देखो, भाभी को क्या हो गया।'
गैस पर चाय का पानी रख कर देवरानी पहुँची अपू के पास ! छूकर देखा ,' नहीं देह तो बिल्कुल नही तप रही ,'दीदी,माथे मे दर्द है ?'
अपू ने शायद सुना नहीं।
'दीदी ,कैसी तबीयत है ,कुछ बताओ न। '
उसने आँखें खोलकर नहीं देखा ।
घऱ भर मे शोर मच रहा है ,सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
सास झींक रही हैं ,'मै मरूँ चाहे जिऊँ ,परवाह किसे है ? कब से नहा कर बैठी हूँ किसी ने एक कप चाय को नहीं पूछा । ठिठुरते हाथों पूजा के बर्तन माँजे ,सामग्री जुटाई । बुढ़ापे मे किसी का आसरा नहीं...। '
ससुर को शिकायत है ,'मेरा अब कोई पुछवैया नहीं। गुसलखाने मे न गरम पानी पहुँचा न तेल!मेरा ध्यान रखनेवाला कोई नहीं इस घर मे ....।'
ऊपरवाले कमरे मे ननद शोर मचा रही है ,' मेरा सलवार-कुर्ता बिना प्रेस के पड़ा है ....अब तो इतना भी टाइम नहीं कि खुद प्रेस कर लूँ ।....अरे छोटी भाभी..।'
और छोटी भाभी ललिता,रसोई में धीरे-धीरे कुछ कर रही है। सुबह बेड-टी मिली नहीं सिर दर्द कर रहा है।दिन भर का रुटीन बिगड़ गया, सो अलग !
बरामदे मे प्रबोध परेशान- से बैठे हैं। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था । उनकी समझ मे नहीं आ रहा है क्या करें । किससे शेव का पानी मागे , कहाँ से अपने कपड़े निकालें !
सुशील ललिता पर झल्ला रहा है ,' तुम एक दिन भी सम्हाल नहीं सकतीं ?'
अपू पर इस सबकी कोई प्रतिक्रिया नहीं । जैसे कान तक कोई आवाज़ पहुँच ही न रही हो ! रुचि एकटक माँ का चेहरा ताक रही है,कार्तिक उदास दरवाज़े के पास खड़ा है।
हरेक को एक ही शिकायत है- घर में इतने लोग है,किसी को मेरा ध्यान नहीं।
हाँ, कितने लोग हैं घर मे ,पर हरेक को कुछ-न-कुछ परेशानी है । किसी का अपना काम ही नहीं हुआ दूसरे को कौन देखे ?
सब बार-बार पूछ रहे हैं ,'अपू को क्या होगया है ?','बड़ी बहू को क्या हो गया है?'
उत्तर किसी के पास नहीं कि उसे क्या हो गया।
ताज्जुब तो यह है कि अब तक किसी को ध्यान नहीं आया कि पूछे ',अपू ,तुम्हे क्या हो रहा है ?'
***
बिदा करते समय माँ ने कहा था ,'बेटी अपनी कोई इच्छा नहीं ,अपना मन कुछ नहीं होता ।वहाँ सबका मन देख कर चलना ।सबको सन्तुष्ट करने मे ही अपना सुख समझना।'
शुरू-शुरू मे बहुत मुश्किल लगा था अपू को।नई ब्याही आई थी ।नये लोग ,नया वातावरण !
सुबह से शाम तक कुछ-न-कुछ काम चलता रहता है।और जब कुछ काम नहीं होता तो सास का घुटनो का दर्द मुखर हो जाता।हर व्यक्ति अपने मन से रहना चाहता है ,और सारी सुविधायें भी । ऐसे कैसे जीवन बितायेगी जहाँ अपना मन ही खत्म हो जाये ।
इतनी चौकस बनी रही , अपू कि कभी टोके जाने की नौबत नहीं आई।गृहस्थी की मशीन चलती रही .उसी का एक पुर्ज़ा बन गई अपर्णा - ऐसा पुर्ज़ा जो मशीन के साथ चलता रहता है ,अविराम !
फिर बच्चे हुए ,रुचि और कार्तिक !पालन - पोषण अपू की जुम्मेदारी ,सास-ससुर की सेवा ,देवर-ननद का ध्यान और घर की व्यवस्था सब अपू की जिम्मेदारी -प्रबोध को हर सुविधा देना तो उसका धर्म है ही ,सबसे प्रथम कर्तव्य !
अपू न दे तो पति को पहनने को कपड़े नहीं मिलते । वह न हो तो सास की पूजा ,ससुर का स्नान भोजन न हो ! देवर कैसे चुस्त - दुरुस्त ऑफ़िस जाये,ननद कैसे कॉलेज मे पढ़े ?
सोचती है कभी,अपू कि वह कपड़े न दे तो पति बनियान पहने ऑफ़िस चले जायेंगे ? कभी-कभी सब-कुछ अपरिचित लगने लगता है उसे । बच्चे मेरे हैं ,पति मेरे हैं ,घर मेरा है - सब कुछ मेरा है ।पर मै कहाँ हूँ ?
अम्माँ ने कहा था मन कुछ नहीं । मन कुछ नहीं तो भीतर-भीतर क्या उमड़ने लगता है ?क्यों होती है इतनी अशान्ति ?कभी ऐसा क्यों लगने वगता है जैसे कोई कलेजे को मुट्टी मे भर-भर कर निचोड़ रहा हो ?बड़ा अजीब लगने लगता है अपू को! पति को,बच्चों को चुपचाप देखती रहती है ।पढ़ने की कोशिश करती रहती है, इनमे कहाँ मेरा अपनापन है?ये मुझे जानते -समझते हैं ? पहचानते हैं मुझे ?
ललिता ने कहा था ' दीदी ,तुम्हारे जैसी आदर्श नारी नहीं बन सकती मै !तुम कैसे कर पाती हो इतना सब ? इतनी ठण्ड मे मुँह- अँधेरे उठ जाती हो ,तुम्हे जाड़ा नहीं लगता ? गर्मी मे तुम घन्टों चौके मे काम करती हो -पसीने से तर-बतर ।तुम्हे कष्ट नहीं होता ?तुम्हे क्या सर्दी-गर्मी नहीं लगती ?'
' मुझे..?मैने कभी सोचा ही नहीं।और जो करना है वह तो करना ही है,सर्दी-गर्मी लगने से क्या फ़र्क पड़ेगा ?'
शरीर तो शरीर है।सर्दी मे हाथ-पाँव ठिठुरते हैं ,अँगुलियाँ सुन्न पड़ने लगती हैं: गर्मियों मे पसीने से लथपथ कपड़े चुभते हैं घमौरियाँ काटती हैं ,पर अपू के मन तक यह सब कुछ नहीं पहुँचता ।
सब काम नियमित चलते रहते हैं ,वही क्रम साल के साल ,बारहों महीने ,तीसों दिन !
देर से उठनेवाली ललिता कहती है,'तुम्हारा मन कभी नहीं करता दीदी, कि सुबह देर तक रजाई ओढ़ कर सोओ ?'
मन ?
फिर मन की बात !यह ललिता हमेशा मन की बात लेकर बैठ जाती है । कहती है जिस लड़के से मेरे पिता ने मेरी शादी तय की थी , वह मेरे मन का नहीं था।
हाँ, उसका मन मिला था अपू के देवर से ! घर मे सब ने ग़ैर जात मे शादी का विरोध किया।ख़ूब झंझट हुआ । पर इधर सुशील अड़ गया उधर ललिता ने जान देने की धमकी दी । झख मार कर दोनो परिवारों को मानना पड़ा।
बेकार मे किया इतना विरोध, झगड़ा- झंझट दोनो घरों के लोगों ने! अरे, किसी से भी शादी हो कौन फर्क पड़ता है! फिर इन्ही दोनो को कौन अंतर पड़ गया!जिन्दगी का ढर्रा तो बदल नहीं जायेगा।चाहे कोई चाहे जिससे शादी करे ! रहना जब उसी तरह है तो इस आदमी या उस औरत से क्या बनना-बिगड़ना है -अपू ने सोचा था पर कहा कुछ नहीं।
गृहस्थी की मशीन, कल शाम तक दुरुस्त थी।रात पिक्चर से आकर ललिता अपू के पास गई थी । खुशी से फूली नहीं समा रही थी । दीवाली के लक्ष्मी-पूजन के लिये सबकी साड़ियाँ आई थीं , वही लेकर आई थी ललिता ,इस कमरे मे । शोभना कहाँ पीछे रहनेवाली थी।तुरन्त हाज़िर हो गई ,पैकेट से निकाल कर चारों साड़ियाँ बिस्तर पर डाल दीं।
'देखना यह अम्माँ की है।' क्रीम कलर की साड़ी अलग हो गई।
रुचि उठा कर साड़ियाँ देखने लगी।उसके हाथ मे हरी साड़ी है-सुनहरा बॉर्डर !अपू की आँखों मे चमक आ गई निगाहें उसी साड़ी पर अटक गईं।
ललिता ने बढ़ कर हाथ मे ले ली,'यह हरीवाली तो मै लूंगी।'
शोभना ने फ़ौरन टोका ,'छोटी भाभी ,तुम्हारे लियो तरबूज़ीवाली आई है,हरी तो बड़ी भाभी की है।'
'ना,ना मुझे नहीं चाहिये तरबूज़ी।इस तरह का शेड मेरे पास है, मै तो हरी लूँगी।'
आज फिर हरा रंग हाथ से निकल गया ! आँखें बुझ-सी गईं अपू की।रुचि समझ रही है।मन-ही-खीझ रही है।सब अपनी कह लेते हैं ,माँ क्यों नहीं बोल पातीं ?कभी नहीं बोलतीं !
'यह पहन कर टीका करने जाऊँगी' मगन सी ललिता बोल रही है ,'दीदी आज पिक्चर मे बड़ा मज़ा आया।'
फिर वह अपू से पूछने लगी ,' दिन-रात घर मे रहते ऊब नहीं लगती तुम्हें ?तुम्हारा मन नहीं करता - बाहर निकलो ,घूमो , फिरो पिक्चर देखो?'
अपू चुपचाप बैठी है।
ललिता ने आकर कहा ,' खाना खाने चलो ,दीदी।'
'भूख नहीं है। '
. ' कुछ भी नहीं खाओगी क्या ?' शोभना ने पूछा था ।
' नहीं। '
बिल्कुल चुपचाप बैठी है अपू ।
मन था क्या कभी ?कब कहाँ चला गया ?खोई सी बैठी है वह।वर्तमान अतीत की गहराइयों मे डूबता जा रहा है --

आठ-नौ बरस की बच्ची है अपू ।
अम्माँ के सामने मचल रही है - धोबन की मुनिया ने जैसी गोटेदार हरी चुन्नी ओढ़ी है ,उसे भी चाहिये ।
अम्माँ समझा रही हैं,' तेरी यह लाल चुन्नी बढ़िया है ,देख मोती जैसी बूँदें चमक रही हैं।'
'नहीं वह चुन्नी अच्छी है ,मुझे तो वही चाहिये ।'
'धत् ,कैसी सस्ती सी चुन्नी है ।और गोटा भी बिल्कुल देहातियों जैसा।'
'नहीं मुझे वैसी ही चाहिये।हरी चुन्नी चाहिये। '
'अरी ,तू धोबन है क्या ?उसकी तो गन्दी है ,तेरी कितनी सुन्दर है।'
' नहीं ,यह खराब है ।यह उसे दे दो।'
रोते-रोते ज़मीन पर लोट रही है।सब समझा कर हार गये।उसे धुन लग गई है- हरी चुन्नी चाहिये गोटेवाली।बहलाये -फुसलाये किसी तरह नहीं मानती अपू। चुन्नी उठा कर ज़मीन पर फेंक दी उसने।समझाने-बहलाने से काम नहीं चला तो दो झापड़ रसीद कर दिये अम्माँ ने।
उसने खाना लहीं खाया ,रोते-रोते सो गई ।
महीनो हरी चुन्नी को भूली नहीं अपू।जब-जब बाज़ार गई उसी के लिये ललकती रही,पर वह न मिलनी थी ,न मिली!फिर वह भूल गई उसे या शायद कहना बन्द कर दिया।अम्माँ कहती हैं यह लड़की हमेशा झिंकाती है मुझे!पराये घर जाकर पता नही क्या करेगी!
भाई बड़े है और छोटी बहिन ना-समझ। अपू की हम- उम्र पड़ोस की दो लड़कियाँ हैं श्यामा और बेबी।उनके साथ खेलने अपू नीचे उतर जाती है।एक बार उतर जाये तो उसे भूख-प्यास कुछ नहीं लगती।इच्छा होती है खेलती रहे ,बस खेलती रहे!
अम्माँ ने ऊपर से झाँक कर देखा,' देखो कब की निकली है खेलने !अरी अपू ,ओ अपरना, आ ।'
श्यामा और बेबी के साथ इक्कल-दुक्कल चल रहा है ,सामने के मैदान मे खड़िया से लाइने खींची गई है।श्यामा और बेबी खड़ी हैं ,अपू एक टाँग से कूद रही है।माँ की पुकार सुनाई नहीं दे रही अपनी धुन मे मस्त है।
बेबी ने बताया ,' अपू ,तेरी अम्माँ बुला रही हैं।'
'आ रही हूँ ' अपू ने आवाज़ लगाई ,' देखो, मै अभी आ रही हूं । मेरी बारी है, तुम रुकी रहना। '
वह ऊपर दौड़ गई।
'क्या कह रही हो अम्माँ ? '
'उन्हीं लड़कियों के साथ सड़क पर खेलना रह गया है ?जुएँ भर लाओगी सिर मे फिर कौन बीनेगा ? '
'जुएँ नहीं भरूँगी । अलग-अलग खेलूँगी।'
'नहीं घर मे खेलो। वहाँ जाने की जरूरत नहीं।'
'अच्छा ,जरा-सी देर ।अपनी बारी पूरी कर दूं।'
'नीचे जाकर तो तुम सब कुछ भूल जाती हो।काफ़ी खेल लिया।अब नहीं।'
'बस अभी आ जाऊँगी।'
अपनी गुड़िया खिलौने बर्तन ले लो ,घर मे खेलो।'
जिद करती रही वह,किसी ने नीचे नहीं जाने दिया।गुस्से मे गुड़िया फेंक दी खिलौने बिखेर दिये और रोने बैठ गई।
पिता ने पूछा ,'क्यों रुला रही हो उसे ?खेल आती जरा देर।'
'ज़िद पूरी कर-कर के सिर चढ़ाना है क्या ?ऐसी ही अड़ियल बनी रही तो कहीं निभाव नहीं होनेवाला।'
फिर स्कूल मे पढ़नेवाली अपर्णा! डिबेट मे पुरस्कार जीतनेवाली,क्लास सबसे अधिक नंबर लानेवाली -अपर्णा !टीचर कहती अपर्णा जैसी लड़कियाँ आगे चल कर जरूर कुछ कर दिखाती हैं।
साथिने ईर्ष्या से देखतीं ,उससे पूछतीं ,' अपर्णा ,तू डाक्टर बनेगी या कलक्टर ?हमे भूल तो नहीं जायेगी? '
और खूब पढ़-लिख कर कुछ कर दिखाने के स्वप्नो मे डूब-डूब जाती अपर्णा । मन ही-मन योजनाएँ बनाती ,ये विषय लेने हैं ,ख़ूब आगे बढ़ना है!
होम साइन्स का तो नाम सुनकर हँसी आती अपू को । उसने देखा है कैसे परीक्षायें होती हैं।स्टोव,कड़ाही,बर्तन लाद-लाद कर लड़कियाँ कुकिंग की परीक्षा देने आती हैं।अपू भी पहुँची थी,अपनी सहेली की बड़ी बहन के साथ ! सामान उठवाने,पानी लाकर देने ,रखवाली करने और इधर-उधर के कामो के लिये छोटी बहिनो का उपयोग ,और किसी-किसी के तो भाई भी साइकिल लिये बाहर खड़े रहते कि कोई ज़रूरत हो त झट् बाज़ार से खरीद कर ला दें।
हुँह,ऐसी होती है परीक्षा ? घर से सारा सामान तैयार करा के ले आईं औऱ गर्म करके सजा दिया; लूट लिये नम्बर !हँसी उड़ाते हुये कहती वह ,'खाना बनाने को घर ही काफ़ी नहीं क्या ?अब स्कूल मे भी यह सब चलेगा !'
'हमारी क्लास मे जाओगी तो तुम्हे भी यही सब करना पड़ेगा।'
' मै लूँगी ही नहीं ऐसा विषय ।'
'फिर सीखोगी कैसे ?'
' सीखूँगी ! हूँह ...यहाँ सीखा किसने है ?सब तो घर से तैयार करवा लिया।ये सिलाई-कढाई भी कौन अपनी बनाई हुई है! दूसरों से बनवा कर नमूने टांक दिये कापी मे ..और किसी-किसी की तो कॉपी भी माँगे की हैं ।मुझे नहीं करना यह सब।'
और घर पर घोषणा कर दी उसने ,मुझे होमसाइन्स नहीं साइन्स लेनी है.।
'अरे साइन्स किस काम आयेगी तुम्हारे ?आगे तो होमसाइन्स ही काम देगी ।'
' मेरे तो अंग्रेज़ी और गणित में सबसे बढ़िया नम्बर आये हैं।आगे कुछ करने के लिये...।'
'आगे करने के लिये ?कौन तुम्हें लाट-गवर्नर बनना है!घर-गिरस्थी मे सब भूल जाओगी।'
अपू के सारे तर्क बेकार गये ।वहाँ कोई सुनने - समझनेवाला नहीं था।हफ़्ते भर का विरोध प्रदर्शन भी काम न आया और हार कर होमसाइन्स लेकर अपू पिछले साल की लड़कियों की कापियाँ लाकर नकल उतारती रही।
सच मे आज वह सब भूल गई है।
समझ मे नहीं आता सुख किसे कहते हैं , दुख किसे । मन क्या होता है ? क्या बनना चाहती थी बिल्कुल याद नहीं रहा?सब विस्मृत हो गया हो जैसे !
***

ललिता आकर पास बैठ गई ।
वह क्या बोल रही है अपू की समझ मे नहीं आ रहा। कभी हाँ कर देती है कभी हूँ।शब्द कानो से टकरा कर लौट जाते हैं।भीतर-भीतर क्या कुछ हो रहा है,यह भी समझ नहीं पा रही।लगता है कोई दनादन घूँसे लगा रहा है - सीधे कलेजे पर।भीतर से मरोर सी उठ रही है।
पता नहीं ललिता कब चली गई।सुशील बैठा है पास मे।
'भाभी, आज शीतल आया था ।याद कर रहा था ,तुम्हे।'
शीतल -सुशील का दोस्त!अपू की बनाई कचौड़ियाँ बहुत पसन्द हैं उसे। बिना भाभी के हाथ की कचौड़ियों के इन लोगों को पिकनिक मे ज़रा मजा नहीं आता।और फिर घर पर चाय-नाशते के साथ चलता है प्रशंसा का दौर!
'मेरे दोस्त कहते हैं भाभी हो तो अपू भाभी जैसी।इतना ध्यान तो उनकी अपनी भाभियाँ नहीं रखतीं ।'
सगा तो अपू को शोभना की सहेलियाँ भी सबसे ज्यादा मानती हैं । उन्हे ज़रा सी भी ज़रूरत हो अपू के पास दौड़ी चली आती हैं।कहती हैं,'शोभना ,तू कितनी सौभाग्यशाली है ,ऐसी प्यारी,हमेशा मदद को तैयार भाभी है तेरी।'
अपू के मन मे सन्देह सिर उठाने लगते हैं - अगर कभी वह उनकी फ़र्माइशें पूरी न कर पाई तो ? तो ये सारा प्यार-प्रशंसा ताश के पत्तों की तरह ....आगे सोच नहीं पाती वह । बस तारीफ़ के रास्ते पर चलती जाती है-चलती जाती है।न चलने पर आलोचना होगी ,शिकायतें होंगी, तिरस्कार होगा ,कटुता बढ़ेगी और जीना मुश्किल हो जायेगा।बड़ी बहू बन कर आई इस घर मे, सबको अपेक्षायें थीं और वह अकेली १ घबरा गई थी पहले तो । प्रबोध किसी बात मे कभी बोलते नहीं ,अपने काम से काम !
पर यह सब पहले की बातें है ,उन पर भी सोच-विचार नहीं कर रही अपू ,बस गुमसुम लेटी है।
' पापा , माँ को क्या अच्छा लगता है ?'
'मुझे नहीं पता ,रुचि ,'अख़बार तहाते हुए प्रबोध ने कहा ।
'आपको कुछ भी नहीं पता ?'
अख़बार मेज़ पर रख दिया उन्होने , कुछ क्षण चुप रहे फिर बोले , ' उसने मुझे कभी कुछ नहीं बताया ।'
' उन्हें तो सब पता है , आपको क्या अच्छा लगता है ,और किसे क्या अच्छा लगता है।'
'तुम्हारी मम्मी ने अपने मन की कोई बात मुझे आज तक नहीं बताई।'
' वे तो हम सबका मन बिना बताये ही समझ लेती हैं।'
कुछ देर खड़ी रह कर रुचि निराश लौट गई । कमरे के दरवाज़े पर कार्तिक उदास खड़ा है।रुचि को आते देख बोला ',जिज्जी ,माँ को क्या होगया? उनका कोई ध्यान नहीं रखता।'
आवाज़ से लगता है अभी रो पड़ेगा । रुचि से एकदम कुछ बोलते नहीं बना ।
फिर कुछ सोचती सी बुदबुदाई,' किसी को क्या पड़ी है ? जब अपने आप कोई अपने लिये न सोचे तो दूसरा क्यों सोचे? मैने माँ से कित्ती बार कहा ,वे सुनती ही नहीं । देखूँ ,क्या कर रही हैं...।'
रुचि कमरे मे घुस गई। अपू सीधी लेटी छत को ताक रही थी।रुचि पलँग की पट्टी पर ठोड़ी टिका कर ज़मीन पर बैठ गई,एक हाथ मे अपू का हाथ पकड़ लिया , 'मोँ,तुम्हारी तबीयत कैसी है ?'
कोई उत्तर नहीं।
'ठीक है मत बोलो ।हमारी बात सुननेवाला हई कौन ? सबको अपनी-अपनी पड़ी है।भैया- हम दोनो फ़ालतू हैं इस घर मे ।'
रुचि को रोना आ रहा है।उसे लगा माँ ने उसका हाथ थाम लिया है , वह और पास खिसक आई।अपू के हाथ पर सिर टिका दिया उसने ।
'सब चाहते हैं हम उनके मन से चलें , और तुम कुछ बोलोगी नहीं...' रुचि चुपचाप रो रही है ,सिर टिकाये ।
अपू का हाथ उसके सिर पर आ गया ।
' घर मे बड़ी होकर अपने लिये नहीं बोलतीं तो हमारे लिये क्या बोलोगी.. ?.'
अपू रुचि की तरफ़ देख रही है - उसे लग रहा है,रुचि नहीं स्वयं अपू पलँग की पट्टी से सिर टिकाये रो रही है।अभी तक ऐसा नहीं लगा था उसे ।
रुचि का स्वभाव बहुत भिन्न है-वह धीरे नही बोलती,गुस्साती है तो चार कमरों तक आवाज़ जाती है।दादी टोकती हैं तो कहती है,'यह घर है या कैदखाना , अपनी बात भी नहीं कह सकते हम ?'
अभी तक अपू को लगता था एक छोर वह स्वयं है,,दूसरा रुचि । बोल-चाल स्वभाव मे बिल्कुल भिन्न ! आज लग रहा है सिक्का एक ही है - एक तरफ़ ऱुचि ,दूसरी तरफ़ वह!अलगाव कहीं है ही नहीं।रुचि के बहाने स्वयं को पहचान रही है वह !
अपू का हाथ रुचि के सिर पर थपकी-सी दे रहा है।माँ का प्यार पाने की आशा मे कार्तिक भी आ कर पलँग पर बैठ गया,अपू की गोद मे झुक आया और उसका दूसरा हाथ उठाकर अपने सिर पर रख लिया।
अपू के चेहरे पर शान्ति-सी छा गई।
***

'माँ,देखो क्या लाई हूँ तुम्हारे लिये...!'
अपू के पास बैठ कर पैकेट खोल दिया रुचि ने ,' देखो माँ ,कैसी है यह ?'
सुआपंखी साड़ी,ज़री का बॉर्डर और बूटियाँ !
'तुम्हारीवाली साड़ी बदलवा लाई हूँ मै ,यह तुम्हारे ऊपर ज्यादा अच्छी लगेगी।'
निर्निमेष देखे जा रही है अपू । मन की किस तह मे छिपी पड़ी थी यह इच्छा ? बचपन की गोटेवाली हरी चुन्नी, स्मृति मे लहरा गई। अपू ने हल्के से सिर हिलाया - स्वीकृति मे ।
रुचि ने साड़ी खोल कर फैलाई और ज़रीवाला पल्ला माँ के सिर पर उढ़ा दिया ।
'देखो न, कितनी सुन्दर लग रही है १'
अपू की आँखों मे सितारे झिलमिला उठे ,जिसे मै खुद भूल-बिसर गई, इसने कैसे जाना ?
प्रबोध रुचि को आवाज़ देते कमरे मे आये हैं।
' रुचि बेटे,तुम यहाँ हो ?दादी को बुरा लग रहा है तुमने उनसे क्या कह दिया ?'
'आप तो पापा , हर बात मे कह देते हैं दादी से पूछ लो । उन्हे कुछ पता भी है ? दुनिया की सारी लड़कियां स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन रही हैं । बेवकूफ़ बनने को एक मै ही रह गई हूँ ?'
रुचि की आवाज.ऊँची हो गई है।
ललिता अपनी सफ़ाई देने आगई ,' मुझे क्या पता था ज़रा-सी बात पर अम्माँजी हल्ला मचा देंगी। रुचि का मन था मै खरीद लाई।'
वह जाकर अपू के पास बैठ गई,' अम्माँजी को तो हर बात बुरी लगती है।उनका बस चले तो,अभी से इसे साड़ी पहना दें...।'
प्रबोध उलझन मे पड़े हैं,'उधर अम्माँ नाराज़ हो रही हैं।
' ललिता ,तुम पहले उनसे पूछ लेतीं । '
जेठ के सामने कुछ नहीं बोलती ललिता।उसने सिर्फ़ रुचि की ओर दृष्टि डाली,फिर अपू को देखने लगी।
'तुम्हे लगता है अपने मन का कर लेने से बड़ी हिंसा हो जयेगी ,क्यों माँ ?स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
उसी समय अम्माँ जी ने कमरे मे पैर रखा ,' सोचा, देख आऊँ बड़ी बहू को..क्या हो गया है?....यहाँ तो पंचायत जुड़ी है।'
प्रबोध बाहर चले गये,ललिता ने खिसक कर अम्माँ के लिये जगह बना दी।
'मै पूछ रही हूँ ,मेरे स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
'सो बात नहीं है ,बिटिया,..ज़माना बड़ा खराब है । तुम समझती नहीं हो।'
'ज़माना सिर्फ़ मेरे लिये ख़राब है ?'
ललिता ने रुचि को चुप रहने का इशारा किया।
'अम्माँ जी , इतनी बड़ी-बड़ी लड़कियाँ स्कर्ट-ब्लाउज़ पहनती हैं आजकल।रुचि तो अभी छोटी है।'
' छोटी है १इत्ते बड़े पे हमारी शादी होगई थी।'
'दादी तुम अपनी लेकर बैठ जाती हो । अब ज़माना बदल गया है।अच्छा माँ , तुम बताओ। ये पहनना तुम्हे बुरा लगता है?'
' मुझे क्यों बुरा लगेगा ?'
अम्माँ ने ताज्जुब से बड़ी बहू को देखा। बड़ी बहू ने उन्हें प्रश्न भरी दृष्टि से देखा,' वह कोई दुनिया से निराली तो नहीं है !'
ललिता का चेहरा हँसी से भरा है।
अम्माँ कुछ तेज पड़ीं.' हमे क्या ! अधनँग नचाओ, तुम्हारी बिटिया है । हम होते कौन है ?'
बोलते-बोलते उन्हे लगा तीन जोड़ी आँखें उन्हे विचित्र निगाहों से देख रही हैं।उनका सुर फ़ौरन बदल गया, ' पहनो ,बिटिया पहनो । हमे लगा सो कह दिया । अरे, हमे का पता दुनिया मे क्या हो रहा है।और तुम्हारी उमर ही क्या है अभी।'
उसके बाद रुचि को किसी ने नहीं टोका। सब चुप हो गये।
चुप्पी और सहमति एक दूसरे से बहुत दूर नहीं होतीं।
अपू को लगा उसके भीतर एक नई अपू करवट ले रही है।
अम्माँ को शिकायत है इतने दिन हो गये छोटी बहू को आये इस घर मे!अभी यहाँ के ढर्रे पर नहीं आई। कभी चटनी मे लहसुन डाल देती है कभी दाल मे करी पत्ता १अब तक नहीं समझ पाई किस चीज़ मे यहाँ क्या पड़ता है।अरे, पता नहीं तो पूछ तो सकती है !
छोटी का कहना है - ' उसी ढर्रे पर चलते-चलते ऊब नहीं लगती ।मैने तो चेन्ज के लिये किया था !'
जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुये आये और सामने-सामने बोलने लगीं - सास के असन्तोष का पार नहीं । ये अपने आगे किसी को नहीं गिनेगी ! एक हमारी बड़ी बहू को देखो,मजाल है बिना पूछे कुछ भी करे!सत्रह साल हो गये ब्याह को -कभी जो अपने मन की की हो!ऐसा ढाला है अपने आप को कि बस पानी ! जिधर चाहो ढलका दो,कभी चूँ तक नही। हरेक के लिये करने को हमेशा तैयार ! और एक ये आई हैं...! पर सुशील के सांमने कुछ कह नहीं पातीं।जानती हैं अपने मन से ब्याह किया है,उससे कुछ कहने से पहले दस बार सोचेगा । ललिता का घूमना-फिरना ,हँसना-बोलना भी उन्हें सुहाता नहीं । लेकिन कहने से क्या फ़ायदा ? अपनी इज़्ज़त अपने हाथ - न मुँह बाओ न उत्तर पाओ।
रुचि का रिज़ल्ट आ गया है । बड़े अच्छे नंबरों से पास हुई है ! वह साइन्स -मैथ्स लेना चाहती है।
अम्माँ पूछती हैं इन्टर के बाद क्या लड़कों के स्कूल मे पढेगी?
प्रबोध को भी लगता है,यह विषय लड़कियों के कॉलेज मे तो हैं नहीं,रुचि को समझा रहे हैं। वह ज़िद पर अड़ी हुई है,'मुझे पास कर के सिर्फ़ घर पर नहीं बैठ जाना है।आगे कॉम्पटीशन मे बैठना है।'
'लेकिन ,बेटे ,ज़रा सोचो तो,इन्टर के बाद...।'
'मै ने सब सोच लिया है पापा,पहले इन्टर का एक्ज़ाम तो दे लूं।आगे का रास्ता फिर देखा जायेगा ।'
उनका कोई तर्क रुचि के गले से नहीं उतर रहा । अपू चुपचाप सुने जा रही है।
प्रबोध झल्ला उठे ,' तो,अपने ही मन का करोगी तुम ?अपू तुम क्यों नही समझातीं उसे ?'
'कोई ग़लत काम तो कर नहीं रही।पढ़ना उसे है ,अपने मन का पढ़े तो क्या हर्ज है ?'
कभी निर्णय न देनेवाली बड़ी बहू बोल रही है,प्रबोध ने आश्चर्य से देखा।
'हियर,हियर,'सुशील ने ताली बजाई , ' बिल्कुल ठीक कह रही हो भाभी ।अरे, लड़कों के कॉलेज मे पढ़ लेगी तो कौन गज़ब हो जायेगा। नहीं तो होस्टल मे रख देंगे हम अपनी बिटिया को।'
फिर किसी ने आपत्ति नहीं उठाई।किसी को नहीं लगा, लड़की उद्दंड हो रही है।
कोई एक जन भी लड़की की तरफ़ बोले तो सहारा पा जाती है.नहीं तो निपट अकेली रह जाती है वह...अपू ने सोचा। वह उठ कर बैठ गई।
'अब कैसी तबीयत है भाभी?'
' बहुत ठीक।'
रुचि बाहर निकल रही थी,अपू ने उसकी ओर देख कर कहा , ' ललिता से कहो एक कप चाय बना दे।'
अपनी ही धुन मे तेज़ी से बाहर निकल रही रुचि के कानो मे उसकी आवाज़ नहीं पहुँची । प्रबोध उठ कर चल दिए। रसोई के दरवाज़े पर जाकर बोले,' ललिता ,एक कप चाय है क्या?'
'अभी बनी जा रही है ,दादा जी आप पियेंगे?'
'नहीं ,अपू को चाहिये।'
यह कैसी नई बात !
विस्फारित नेत्रों से देख रही है ललिता!दादा जी चौके के दरवाज़ पर पत्नी के लिये चाय ले जाने को खड़े हैं ? अभी तक तो पानी का गिलास तक ख़ुद उठाते नहीं देखा था।
ट्रे लगा कर पकड़ा दी उसने।
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सुबह-सुबह अपू को उठने से रोकते हुए प्रबोध ने कहा, ' क्या करोगी इतनी जल्दी उठ कर ?और लोग भी तो हैं।'
नये दिन की हलचल शुरू हो गई है।रसोई से ललिता ने शोभना को पुकारा। थोड़ी देर मे हाथों मे चाय की ट्रे लेकर आती हुई शोभना ने देखा रुचि पढ़ाई मे लग गई है।एक कप उसके सामनेवाली मेज़ पर रख आगे बढ़ शोभना ने अपू के कमरे का उड़का हुआ दरवाज़ा खोला और दो चाय के कप अन्दर दे कर निकल गई।
' चलो अपू , बग़ीचे मे चलकर चाय पियेंगे । '
अपू की दृष्टि मे अचरज है।
'तुम्हे पेड़ के नीचे बैठना अच्छा लगता है न।'
'तुम्हे कैसे मालूम?'
'समझने की कोशिश कर रहा हूँ।'
अम्माँ ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई ,' छोटी बहू,पूजा के बर्तन निकाल कर रख दो,महरी ही माँज देगी। अरे वह भी तो इन्सान है ,बर्तनों में क्या ?''
दो दिनो से जो चल रहा था लोग उसे शुरुआत समझ रहे थे । पर रुचि जानती है वह क्लाइमेक्स थी जो बीत गई । अब सब उतार पर आ रहा है।
गृहस्थी के ढर्रे ने करवट बदली है , दो-चार दिन तो लग जायेंगे नये क्रम को सहज गति पकड़ने मे ।
बरामदेवाली कुर्सी पर कोहनियाँ मेज़ पर टिकाये , हथेलियों पर ठोड़ी जमाये रुचि परम संतुष्ट भाव से बैठी है।
- प्रतिभा सक्सेना.






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सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

काग भगोड़ा

[काग-भगोड़ा - उस डरावने पुतले को कहते हैं जिसे किसान अपने खेत की फ़सल को कौवे-तोते आदि पक्षियों से बचाने के लिये खड़ा कर देते हैं। एक मिट्टी की हाँड़ी को काला रँग कर उस पर सफ़ेद आँखे और नाक - मुँह बना कर, दो बाँसों को पाँव का रूप दे, उनके ऊपर सिर की तरह लगा देते हैं। हाँड़ी के नीचे बाँसों पर पेट के लिये फूस आदि लपेट दिया जाता है दोनो ओर दो डंड़े हाथ के लिये लगा कर, फटे-पुराने कपड़ों से सजा, खेत के बीच में खड़ा कर देते है। हवा के साथ पुतला हिलता है तो पक्षी डर कर उड़ जाते हैं।]
मनका ने घास का गट्ठर दरवाजे पर पटक दिया, उसमे घुरसी हथौड़ी निकाल कर चौखट की सँध में अटका दी, मोटी धोती के पल्ले से पसीना पोंछते हुए उसने ससुर के खटोले पर निगाह डाली, खाली था। पिछवाड़े गए होंगे, उसने सोचा। दिन भर की पत्थर-तोड़ मेहनत के बाद उसकी इच्छा हो रही थी दो घड़ी बैठ कर सुस्ता ले। लेकिन बैठ गई तो रोटी सेंकने में और देर हो जाएगी। ससुर वैसे ही बीमार ठहरे, समय से बकरी के दूध में रोटी मींज कर खा लेंगे।
चार कदम आगे बढ़कर उसने मुकले पर धरी ढिबरी उठाई और चूल्हे की राख में दबी आग पर घास के तिनके रख कर फूँकने लगी। राख के कण उड़-उड़ कर चेहरे पर आने लगे, उसने आँखे आधी मीच लीं। लपट आते ही दूसरे हाथ से बत्ती पर आया गुल नोच कर, जला दिया उसने। दीवारों पर परछाइयाँ नाचने लगीं।
पत्थर तोड़ते समय बदलू बार-बार उसी को तके जा रहा था। कितनी बार अनदेखी की, कड़ी निगाहों से देखा पर वह बाज़ नहीं आया। अबकी बार बोलने की कोसिस करेगा तो अच्छी तरह झिड़क दूँगी, मनका ने सोचा। वह आकर देहरी पर बैठ गई - बटलोई में दाल चुरने रख आई थी।
अभी तक नहीं आया, उसने सोचा, कहीं यार-दोस्तों में बैठा तमाखू पी रहा होगा। गुरदीन के बारे में सोच रही थी वह।.. अरे, वही ढंग का होता तो काहे का रोना था।
सास बकरी को झाड़ तले बाँध रही थी, सिर घुमाकर उसने मनका को घर में घुसते देख लिया था। अभी तक गुरवा नहीं आया उसने भी सोचा। कैसे सम्हाले लड़के को ? जब बचपन में नहीं सुनी तो अब क्या सुनेगा? और अब तो संगत भी ऐसी मिल गई - तम्बाकू और गाँजे का दम लगाए बिना चैन नहीं पड़ता! बड़ी चिन्ता में पड़ जाती है नथिया। इकलौता पूत और वह भी ऐसा! कभी निश्चिन्त होकर नहीं रह पाई।
मेहरुअन के साथ बैठकर बताती है वह – ,' पहलौठी की बिटिया ब्याही-ठाही आपुन घर की भई। उसके बाद के तीन बच्चे सौरी में ही दम तोड़ गए, तब ई भवा। किसी औघड़ की कृपा से गुरवा जीया-जागा। वह कहती है, “ ई भवा तो सनकै ना ! हम तो मार डेराय गए । दाई गरे माँ अँगुरिया डारिस । कुछू न भवा। फिन दुई धौल धरे ई की पीठै पर, तब ई रोवा। गुरु की किरपा ते जिवा-जागा तौन नाम धरि दिहिन - गुरदीन।”
ममता की मारी नथिया ने सौरी में ही नाक-कान बिंधवा दिए - छोरा सुरू से बिंधा रहेगा तो कउनो बाधा नहीं न बियापेगी! लाड़ - प्यार में बिगड़ गया गुरवा ! बड़ी साध थी, स्कूल में जा के चार आखर पढ़े, ढंग का मनई बने।
” पर जौन चाहो कहाँ होइत है,” ठण्डी साँस खीच कर कहती है, “ किस्मत में लिखाय के तो कुछू और आवा रहा।”
तम्बाकू की लत तो बचपन से ही लग गई। ' न जनै कहाँ-कहाँ ते बीड़िन के टोंटे बटोर लावत रहा, छिप-छिपके धुआँ निगलत रहा। हम तो बहिनी, बहुत देर में जान पाइन कि ई का करत हैं।'
देह पनपी नहीं, छोटा-सा कद और हाड़-हाड़ देही। मिरगी के दौरे भी पड़ते हैं , यह तो मनका ने इसी घर में आकर जान पाया।
“काम - धाम में कबहूँ ई का मनै नहीं लगा।” बाप की डाँट- फटकार सब बेकार। कभी सन्टी उठाई तो नथिया बीच में आकर खड़ी हो गई -
“उइसेई गिरा-परा रहित है मार-मार के हड्डी तुड़िहौ का?”
कभी रूठ कर कहीं भाग जाता तो ममता की मारी नथिया ढूँढती फिरती। नशे में धुत कहीं पड़ा मिलता। किसी तरह लाती, सम्हालती। बेटे को बिना खिलाए उसके गले से कैसे कौर उतरता ? बड़ी साध थी, बिटवा का बियाह होगा, बहुरिया आएगी, अँगना में पोता खेलेगा। पर गुरदीन को देखकर लड़की वाले बिचक जाते - ऐसे से कौन अपनी बिटिया ब्याहे ?
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पर नथिया कहाँ हार मानने वाली।
पार गाँव में बहिन की ससुराल थी। वहीं उसके ममिया-ससुर को लकवा मार गया।
' घर में कोई कमाएवाला नहीं। जवान -जहान दुई-दुई लौंडियाँ क्वाँरी बैठी हैं। लरिका छोट अहै दस बरिस का, निरा नासमुझ। कैसे पार लगेगी जिन्दगी ? 'बहिन से सहानुभूति दिखाती रही नथिया, पूछती-बताती रही। लड़कियन का भी देख-परख लिया।
महीने भर में तीन चक्कर लगा आई। सारी खबरें लेती रही। गाँववालो ने दुनिया भर की बातें शुरू कर दी हैं। इत्ती जवान लौंडियाँ भईं, घर में बिठाए हैं। कल को कुछ ऊँच-नीच हुई गया तो सारी बिरादरी की नाक कटेगी। बियाह करो, नहीं ती बिरादरी से बाहर कर देंगे। मामी बिचारी को मामा की तीमारदारी से कहाँ छुट्टी ? फिर कहाँ बहाय दे लड़कियन का ? बड़ी को तो एक तीन बच्चन का बाप बियाहन को तैयार है, दु साल से रँडुआ बैठा है। मामी चाहती हैं एकै मण्डप में दूनौ की भँवरी पड़ जायँ।
नथिया तरस खाती रही। बहिन से पूछ लिया कि लड़कियों के लच्छन कैसे हैं, बहिन का उत्तर था, “दूनौ नीक अहै, मुला छोटी केर रंग नेक सँवरा अहै, पर छब ऐसी कि चेहरे से निगाह ना हटे। दूनौ बहनी घर- बाहर सब सम्हारे है, गाँव भरै का कुटान-पिसा कर के, सिल्ला बीन के, घर खरच केर जुगाड़ किए हैं।”
“तौ बहिनी, नीक लौंडियन का लड़िकन की कमी थोरै है।”
“कौनो निगाह में होय तो तुही बतायो।”
“काहे नहीं, काहे नहीं।”
बहिन से मन की बात कह डाली मनका ने। पहले तो वह चौंकी, पर पलड़ा नथिया का भारी रहा - बहनौते की बात जो थी।
लड़का मिल रहा है यही कौन कम है, “बियाह- सादी में लड़िकन की सकल देखित है कोई ?”
नथिया ने गुरदीन को बदलू के साथ अपनी बहिन के घर भेजा, “आपुन रिस्तेदारी में हारी-बीमारी होय तो जरूर जाए क चाही। तुमका भेजित है ,काहे से कि अब तुमका ई सब सीखै क परी।.. जाओ बिटवा, हुअन के हाल - चाल लै आओ।” मौसी के साथ दोनों मनका के पिता को देखने गए। मौसी ने बात सम्हाल ली। दोनों को आदर से बैठाया गया। गुरदीन तो बिलकुलै चुप्प रहे, बदलू बोलत-बतियात रहे। चाय-पानी हुआ। गुरदीन की तो हिम्मत नहीं पड़ी, बदलू ने मनका से आँखें मिलाकर चलती-फिरती बातें कर लीं। मनका की माँ को लगा - इहै है लड़िका।
चट्ट बात पक्की हो गई और पन्द्रहवें दिन बड़ी लड़की की बारात के साथ गुरदीन की बारात पहुँच गई, मनका को ब्याहने।
“ई कइस लड़िका है? बात तो दूसर की हुई रहै ?”
“कइसी बात करित हो मामी ? ऊ तो लड़िके का दोस्त रहा। मुला लड़िका तो इहै है। इहै के महतारी बाप ते रिस्ता पक्का किहिन है। ऊ तो कौनो गैर जात होई।”
तेल चढ़ चुका था, कंगन बँध चुका था। अब बारात लौटा दें तो लड़किनी कहूं की नहीं रहेगी। महतारी-बाप का जीना मुस्किल हो जाएगा..। कौन मुह दिखाएँगे दुनिया को? पिता ने बिस्तर पर पड़े-पड़े कहा, “अब अपने हाथ में कुछ नहीं –जौन लिखाय के लाई है तौन..........।”
माँ रो कर रह गई, और मनका गुरदीन को ब्याह दी गई।
नथिया का पाँसा सही पड़ा।
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ऊँची-पूरी तन्दुरुस्त, जीवन की ऊर्जा से पूर्ण, यौवन से भरपूर, खिली-खिली फूल जैसी मनका !और गुरदीन - निस्तेज, मुरझाया-सा, हाड़- हाड़ देह, मिचमिचाती आँखें और झुकी कमर, जिससे छोठा कद और छोटा लगता था। मनका किससे क्या कहे ? रामजी के इहां से इहै लिखा कर लाई है तो अम्मा- बप्पा को कइसे दोस दे?
“ काहे भौजी, दिखावा तो हमका रहे। तुम्हार माई तो हमका दुलहा बनाए खातिर राजी रहे।”
“तो बरात लैके काहे नाहीं आएउ ? भौंरी की बेला काहे मुँह चुराए रहे ?”
“गुरदीन की अम्मां की हुसियारी ! ..अउर का ? हमका कउनो पता रहे कि का हुइ रहा है ? काहे से.., ऊ हमका बतावा नहीं कि का चाहित है। हमका कहिस कि गुरदीन का सरम आवत है, एहि का साथै तुमका जाए का परी। हम का जानी उन केर मन माँ का है।”
मनका सिर झुकाए पत्थर तोड़ती रही। हथौड़ी की ठाक्-ठाक् और पत्थर टूट-टूट कर गिरने की आवाजें। ऊपर तपता सूरज, सामने पत्थरों का ढेर। बीच-बीच में पत्थरों के छर्रे उछल जाते हैं, चिन्गारियाँ बिखर जाती हैं। पल्ला सिर से अच्छी तरह लपेट लिया है मनका ने। हथौड़ी लगातार चल रही है -ठाक्- ठाक्,ठाक्- ठाक्......।
रंग उड़ी मोटी-सी धोती, जिसका रंग कभी नीला रहा होगा, लगातार की धूप और मिट्टी से धूसर हो गई है। किनारी से जगह-जगह तागे निकल रहे हैं। लाँग लगाकर बाँध रखी है मनका ने। पल्ला ऊपर ले जाकर माथे और चेहरे पर लपेट लिया है -आँखें और नाक का हिस्सा भर खुला है।
नाक में चवन्नी बराबर चाँदी का फूल, हाथों में मोटी-मोटी चूड़ियाँ, कमर में चौड़ी गिलट की करधनी नाभि के नीचे धोती को कसकर बाँधे हुए, और पाँवों में मोटे-मोटे गिलट के कड़े। हथौड़ी उठा कर पत्थर पर मारती है तो चूड़ियों की हल्की -सी खनक उस कठोर आवाज़ में मिल जाती है। माथे पर आई लटों को ऊपर कर, मनका ने ढीला पड़ गया पल्ला समेट कर पसीना पोंछा और फिर से लपेट लिया।
“ भौजी इत्ता अन्याव मत करो आपुन ऊपर। ”
“ अच्छा, न्याव-अन्याव क बिचार तुम कब ते करै लागे? ”
“ हमका माफ करो भौजी, हम कित्ती बेर गुरदीन का समुझावा, मुला ऊ सुनतै नाहीं। हमार हिया बहुतै जरत है। ”
“ चुपाय जाओ बदलू, देख लिहिन हम सबका। इहै खातिर आपुन दोस्त का बियाह करावा रहे कि मउका पाय के......? ”
“ ई मतबल नाहिन हमार। भौजी, हम बहुतै पछताइत हैं। आपुन गलती सुधारै के मउका मिलै तौन हम नाहीं चूकब। ”
“ मउका ढूँढत हौ,” गहरी साँस खींची मनका ने, “तुम्हार निगाह खूब पहिचानित है हम। इत्ते दिनन से तुम इहै कोसिस में लगे हो? तुम का समुझत हौ, सिगरी दुनिया अन्हरी है? तुम्हारे कारन हमका का- का सुनन का परित है.......? ”
“ ऊ गुरवा का छोड़ देओ, हमार साथै चलो भौजी, हम तोहार पाँव परित हैं। कहूं अनतै जाय के गिरस्ती बसाय लेबै।”
“ बस बस, चुप्पै रहौ। इत्ती बात बोलै का मुँह है तुम्हार ? हम का कउनो कूकर-बिलार समुझै हो कि जौन मिले तिसके साथ लग लेई?”
डपट दिया था मनका ने। बदलू चुपचाप चला गया। पर एक बदलू ही तो नहीं। कितने लोग उस पर कैसी-कैसी निगाहें डालते हैं ? मनका सब समझती है। पर क्या करे ? अपना आदमी ढंग का होता तो काहे ई सब झेलना पड़ता।
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सास कहती है, “सुसरी बाँझ है। चार साल हुई गए, मुला एक बच्चा नहीं जन पाई। कैसी मुटाई चढ़ी है । आग लगे ऐसी जवानी में। ”
अपने बेटे को चढ़ाने से कभी नहीं चूकती वह।
“ कैसी इठलाय के रहित है। सरीर तो देखो, कपड़न में समाय नहीं रहा है। एक ई पहलवानिन , अउर हमार बिटवा मार झुराय रहा है।”
सचमुच मनका की कठोर श्रम से पकी हुई देह के सामने गुरदीन मरगिल्ला लगता है। नथिया बहू के चरित्र पर आक्षेप करती है तो बेटा तमक जाता है।
“ स्साली, जाने का समुझती है अपने आप का। इसे ठीक करना ही पड़ेगा।”
गुरदीन को बड़ा मलाल है - मेहरिया नब कर नहीं चलती, हमेसा सिर उठा कर बात करती है। अरे, अउरतजात है अउरतिया की तरह रहे का चाही।
नथिया और उकसाती है - “ इसके लच्छन ही खराब हैं। ऐसी महरारुन के औलाद भी नहीं होवत है। ”
दो दिनों से मनका शाम को आकर रोटी सेंकती है तो तीनों खा लेते हैं - ससुर तो अपनी खटुलिया पर ही दूध में रोटी मींज लेते हैं। और खाकर उठते ही सास कूकर के लिए रोटी निकालकर बाहर चल देती है। मनका के लिए एक-दो से ज्यादा नहीं बचतीं। नथिया जानबूझ कर अनदेखी कर जाती है। सोचती है - कैसी गदराय रही है, मेहरियाँ तो खाती ही बचा- खुचा हैं। दुइ दिन कम खाय लेगी तो मर नहीं जाएगी।
और तीसरे दिन मनका की खाए की बेला खूब हाय-हाय मची।
सास एकदम भड़क कर बोली, “ हुआँ काम करने जाती है कि दीदे लड़ाने ? किसउ को मुँह दिखाने लायक नहीं रखेगी।......अरे, तू कैसा नालायक है। आपुन मेहरिया को बस में नहीं रख सकता?”
गुरदीन संटी लेकर खड़ा हो गया, “ काहे हरामजादी, तू कौनो तरह समझेगी कि नाहीं ? ”
मनका उसकी तरफ देखने लगी।
“ कईसे दीदे फार-फार के घूर रही है,” सास कहाँ पीछे रहनेवाली।
गुरदीन ने आगे बढ़ कर चूल्हे के पास बैठी मनका को धक्का दिया और तीन-चार संटियाँ लगा कर चूल्हे से सुलगती चैली खींच ली।
जलती लकड़ी देख मनका झटके से उठी, एक हाथ से उसका हाथ पकड़ा और दूसरे से चैली छीन ली।
“ अब बोल, का करेगा ? “
गुरदीन के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। वह घबरा गया - कहीं मनका उसी को दागने न लगे! पत्थर तोड़-तोड़ कर कठोर पड़ गए उसके हाथों से अपने दुर्बल हाथ छुड़ा नहीं पाया वह। मनका ने झटका देकर उसे छोड़ा और जलती चैली चूल्हे में फेंकी। गुरदीन सम्हल नहीं पाया, गिरते-गिरते दीवार से सधा, बाप के खटोले से सिर टकराते बचा।
“अरे , मार डारिस रे,” सास चिल्लाई, “अरी, डाइन मोरे पूत को खाकर छोड़ेगी का ? अरे, दौरा पड़ि गवा ओहिका।”
मनका ने घूर कर देखा, सास चुप हो गई। दौरे का कोई लक्षण नहीं था।
गुरदीन की भयभीत आँखों पर वितृष्णा भरी दृष्टि डाल वह बाहर निकल गई। थाली की रोटियाँ चूल्हे की राख में बिखर गई थीं, उनकी ओर उसने देखा तक नहीं।
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एक दुलारी है , जिससे मनका अपने मन की बात कह लेती है । पर आज कुछ कह नहीं रही, बडी चुपचाप है । बीच मे दो बार पानी पीने उठी है , फिर आ बैठी है । हथौडी लेकर , पत्थरों पर चोट करती - लगातार , अनवरत । दुलारी छिपी निगाहों देख रही है । उसे कुछ अजीब लग रहा है । आज इसे हो क्या गया है ? मनका का सोच कर बडा दुख होता है दुलारी को ,पर ये भी एक ही जिद्दी है । दुलारी लाख समझाए वह समझती नहीं ।
घर पर मां-बेटे चैन नहीं लेने देते , एक बुढऊ हैं कुछ सहानुभूति रखनेवाले पर उनकी सुनता कौन है ।
जब गुरदीन के हाथ से जलता चैला छीनकर उसे धकिया कर मनका ओसारे मे निकली थी तब भी बूढे ससुर बडबडा रहे थे , " मत पराई जाई का जी जराओ , दो टिक्कड तो खा लेने दो...।" झिलँगे खटोले से उठने की कोशिश कर रहे थे । मनका ओसारे मे जा खडी हुई थी , ससुर की आवाज सुनी थी उसने ," अरे काहे अनियाव करते हो । कहीँ छोड के निकल जाई तो कौनो पूछने नहीं आएगा.।..रोटिन के लाले पड जाएँगे....तोर बिटवा कौनो काम का नाहीं । काहे उसकाती रहती है ?"
सास ने कुछ कहा , मनका सुन नहीं पाई ।
थोड़ी देर बाद शान्ति होगई थी घर में ।
मनका घुसी और चुपचाप अपनी जगह लेट गई । सब आँखें मूदे पडे रहे, जैसे गहरी नींद सो रहे हों । और सुबह फिर काम पर जा पहुँची थी - एकदम चुपचाप ।.
" काहे, आज का मऊन बरत साधै हो ?"
" नाहीं ,जी ठीक नाहिन । कुछू नीक नाहीं लागत है ।"
" सो तो हमका दिखात है । खाली पानी मत ना पियो , नुसकान करित है ।"
" मार कडू-कडू गरे तक आय रहा है, देह पिराय रही है ।"
"कउनो बात है का ?" दुलारी ने भेदभरी दृष्टि डालकर छेडा , " ई तबियत काहे ढीली है ? कुछू कमाई किहिस लागत है ?"
"अरे , न कहूँ । ऊ कोई मरद है ? बस खाए भर का है । हमार मन बहुतै उचाट है ।"
"तो काहे दिनैमान हाड - तोड काम करित हउ ? जरी-कटी सुनित हौ अऊर ऊपर ते । काहे क रहित हऊ ओहि का साथे ?"
कुछ देर चुप्पी रही फिर दुलारी समझाने लगी ," निकर जा बदलू के संगै - तेरी जोड का मरद है । तोहरे साथे जउन भवा ओहिका बहुतै पछतावा अहै ओह केर जिव मां ।"
" बदलू केर तरस खाए से हमार जिनगी पार ना होई । हमार देही त पत्थर तोडि तोडि के पथराय गई है....अब केहू केर बिसबास नाहीं ।"
" आपुन देही पे अन्याव न कर ।जिउ नीक नाहीं त काम करै काहे चली आएउ ? "
"ई देही क का होई,जेहि का देखि के लोगन केर जी जरत है ?"
" तोहरी सास आपुन बिटवा केर दोस न मानी , हमेसा तुह का दोस देइत है । कहित हई तू बाँझिन है ।"
मनका तमक गई ," ऊ हरामी , मरद सा मरद होतेउ तौन चार बरिस मे चार बच्चा जन देइत। फिन कहाँ रहित ई देही जेहिका देखि के सभै केर हिया मे आग बरत है ?"
" फिन काहे परी है हियन ? आपुन रास्ता देख । कमीली मेहरारू हन , आपुन जिनगी काहे बरबाद करे का बैठी है ?"
हथौडा चलाते-चलाते उसका हाथ रुक गया , दुलारी की ओर देखा बोली , " अऊर ऊ बुढवा-बुढिया का मरन के लै छोड देई ? भूखन मरि जाब त हत्या हमका लगी । हमार मरद ?' उसने लंबी साँस छोड़ी, ' ऊ त कौनो काज का नाहीं , ऊपर ते चिलम -गाँजा कउनो ऐब बाकी नाहिन बचा । एक दिन रोटी ना मिली त बिलकुलै मर जाई । हत्यारी होये क पाप हम ना करी ।"
और भी बोलती रही ,' उहि जलम केर पाप तो इह माँ भुगताय रहे हैं ....।'
"बस कर भवानी । हाड तोड आपुन ,अउर खा गारी ।"
यह बात तो उसकी सभी साथिने कहती हैं ," सास हमेसा गरियात है , कोसत है । तोहार मुहै मे जिबान नाहिन का ?"
" है काहे नाहीं ,मुला कहन ते का फायदा । ऊ जनती हैं कि उन केर बिटवा मे कमी अहै , तौन खुनिस हमते निकरती हैं ।"
सास के शब्द मनका ने सुने थे ," अईस ठीक न होई , ऊ मेहरिया तोहार बस की कहाँ ?"
गुरदीन का वह खिसियाया चेहरा बार-बार मनका के सामने डोल जाता है । अचानक ही क्या हो गया यह ? मन ही मन पछताती है ,पर जलती हुई लकडी ! इसके सिवा कोई रास्ता नहीं था बचने का । हे , राम जी छिमा करना ।
हम तो जनम के पापी हैं रामजी । पापी ना होइत तो काहे अइस जिनगी मिलती । जौन पडी तौन झेलब.। अरे,अभी न भोगी तो आगे कउनो जलम मा भोगन का परी । इससे अच्छा है इसी मे निपट जाए । सास कोसती है , कोसती रहे क्या फरक पडता है । छोड कर भागे भी तो बुढऊ-बुढिया की छीछालेदर हो जाएगी । कमाना तो किसउ के बस का नहीं । अउर ऊ मरद - ओहिका कौनो ठिकाना नहीं । मिर्गी का दौरा पडे ,कहीं गिर पडे । कित्ती बार तो लोगन से खबर पाकर मनका दौडी है, घर लाकर सम्हाल की है । मुला ऊ मानुस जलन मे फुंका जाय रहा है ।
काहे की जलन ? मनका समुझ नहीं पाती । उसने तो मेहरारू बन के रहने मे कोई कसर नहीं छोडी - आपुन धरम से विचलित नहीं हुई । माँ-बेटे चाहे जितनी तोहमतें लगाएं - मै तो कोरी हूँ , हे रामजी । एक बुढवा है , जिसका जिउ दुखता है मनका के कारन, पर बेबस है बिचारा । कभी कुछ कहता है तो माँ-बेटे दूनौ मिल कर गरियाते हैं ,चुप कर देते हैं ।
" आज हमार चित्त कैसेउ थिर नाहीं हुइ रहा दुलारी ,का करी ?"
एक वही है जो उसके हिरदै की पीर समुझती है । दुलारी के ध्यान मे एक ही उपाय आता है - बदलू !
पर मनका तैयार नहीं होती । मरदजात का कउन भरोसा - आज को खुस है तो सबई अच्छा , कल को गुस्साय जाय तो बाही-तबाही बकने लगे । और उस पर दूसरे की मेहरिया होने का दोस लगाया तो उससे सहन नहीं हो पाएगा । वह तो कहीं की नहीं रहेगी । सास के लांछन सह जाती है वह , जानती है कि आपुन जी की जलन वह मनका पर निकालती है।असलियत वह भी जानती है और मन ही मन बहू से डरती है.।आपुन बियाहे मरद की बात और है चाहे मिट्टी का ढेला ही होय - मनका सोचती है ।
सास कहती है ," बडी मुँहजोर लुगाई है ।"
मुँहजोर न होय तो का करी ?" मनका अपनी वेदना दुलारी से कहती है ," कमजोर की लुगाई को सिगरी दुनिया आपुन लुगाई बनाना चाहे ।
दुलारी भी जानती है, मनका को क्या- क्या झेलना पडता है.। ठेकेदार कहता है , " तू सबसे ढंग की है री , कभी - कभार पैसा- टका चाहिए तो मुझसे कह दिया कर..!..हाँ , तेरा मरद कहाँ रहता है;उसे भी ले आ , हल्का-फुल्क काम दे दूंगा ।"
मनका खूब समझती है । काम और वह आदमी ? उसके बस का कुछ भी है क्या ? नाम का मरद है और लुगाई पर मरदानगी दिखाना चाहे.। मनका के मुँह मे थूक भर आता है । पर मै तो नाम की औरत नहीं न हूँ १
हे , रामजी, ई मन कइसा पापी अहै !
.*****
उधर मैदान मे पण्डाल लगा है . लोगें की आवाजाही , वाद्य-यंत्रों के साथ भजन के स्वर वातावरण मे गूँज रहे हैं ।. मनका और दुलारी काम से लौट रही हैं ।
" ई का हुइ रहा है इहाँ ?"
" कोई बडे पण्डित आय भए हैं ,कथा हुइ रही है ।"
सुबह से उचाट मनका की घर जाने की इच्छा नहीं हो रही , भीतर-भीतर मन की अशान्ति से जूझ रही है ।
"कए दुलारी , हमहूं कुछुक बेर कथा-कीर्तन सुन लेई , थोरा तो पुन्न मिली ।"
कथा समापन की ओर अग्रसर थी । कीर्तन मे मनका ने भी अपने स्वर मिला दिए । देवी की स्तुति के साथ-साथ व्याख्या भी करते जा रहे थे पण्डितजी - जगत की सारी विद्यायें उसी परम चैतन्यमयी देवी के भेद हैं , संसार की सारी नारियाँ उस परम शक्ति के भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं । एक वही है जो सारे जगत् मे समाई हुई है...........।
कुछ समझ रही है , कुछ उलझन मे हैं - चकित-सी सुन रही है दोनो ।
.अचानक मनका की नजर पण्डाल मे सजे चित्रों पर पडी । ये किसकी छाती पर विकराल रूप धरे देवी खडी हैं ? शिवजी हैं का ?चारों ओर देवता-मुनि स्तुति कर रहे हैं ।
अचकचा गई वह । "ई कइसे हुइ गया " सब तो कहित हैं कि महरारू क दब के रहा चाही १ औचक-सी खडी है वह। पण्डित बोल रहे हैं , मनका सुन रही है । न समझ कर भी बहुत-कुछ समझ रही है । अपना दुख-दर्द भूल कर एक नई उलझन मे पड गया है उसका मन ।
दोने मे मिला हलवा-पूरी का प्रसाद भी खा लिया उसने.। भूखा तन और उद्विग्न मन कुछ शान्त हो चला था।
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सोते-जागते कुछ चलता रहता है उसके मन मे । क्या सोचती है वह खुद नहीं समझ पाती। भीतर-भीतर जैसे कुछ करवट ले रहा है , जागने को तैयार हो रहा है ।
पर गुरदीन को चैन नहीं पड रहा है । बस रोटी खाने और सोने घर आता है । वैसे ही घर से उसे कौन सा लगाव था ? अब तो मनका सामने पडती है तो मुँह फेर कर निकल जाता है । एक दिन बदलू रास्ते मे मिल गया , " काहे बदलू , अब हमार तुम्हार दोस्ती खतम हुई गई का ? सकलै नहीं दिखात हो । कहाँ रहत हो ?"
"अईस बात नहीं भइया , ई ससुरा ठेकेदार बहुतै कस के काम लेइत है , साम तक देही के जोड-जोड पिरान लगत हैं । खाय के जो परित हैं तौन सुबह ही नींद टूटत है । पइसा देइत है त जान निकार लेइत है ।"
फिर वह गुरदीन से बोला ," तुमहू काहे नहीं आय जाते भइया, कौनो हलुक काम मिल जाई - पइसा थोरा कम मिली त का । कुछू तो हाथै मे आई ।"
काम के नाम से जूडी चढती है गुरदीन को । कभी कुछ करने की आदत ही नहीं । हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है या यार-दोस्तों मे निकल जाता है । बदलू का उपदेश उसे अच्छा नहीं लगा , पर पचा गया ।
" एक बात पूछित हैं बदलू , मुला सच्ची-सच्ची बतायो ।"
बदलू ने सिर हालाया ।
" ई जौन हमार मेहरारू है , इह का बारे मे कुछू बात सुनित है - उह केर चाल-चलन.. । काहे से........। "
" भउजी केर बात पूछत हो ? निसा खातिर रहो । कउनो खोट नाहीं ।" फिर कान को हाथ लगा कर बोला, " नाहीं ,भइया , नाहीं । किसउ का मुँह नहीं लगउतीं । आपुन काम से काम । मुला कब हूँ हमै चाही कि भउजी से हँस-बोल लेई, तौन गुस्साय जाती है । "
ई साला कौन दूध का धोया है , सोचा गुरगीन ने - मिली भगत होगी दोनो मे । कुछ-न-कुछ तो करना पडेगा । अम्मा के सामने सिर नहीं उठा पाता । अरे , कमाती है तो का हुआ , मरद की इज्जत नहीं करेगी ? देह कइसी मुटाय रही है १ उसकी देह पर छिपी-छिपी दृष्टि डालता है, पर आँख नहीं मिला पाता । सुसरी की सारी जवानी एक दिन मे झाड दूँगा । कितना तीखा देखती है !
बहुत हिम्मत इकट्ठी करता है पर सामने बात नहीं कर पाता । भीतर ही बीतर घुट रहा है गुरदीन ! खिलावन से बहुत पटरी बैठा रखी है आजकल ! कई बार घर भी बुला चुका है । एकाध बार तो मनका के सामने ही । खिलावन आता है , उसकी आँखें मनका पर लगी रहती हैं , भौजी कहकर हँसी-ठिठोली करना चाहता है पर वह उखडी-उखडी रहती है.।
***. . . . . . . . . .
अपने आप मे डूबी मनका , शाम को लौटी तो दुआरे कोई नहीं था,दरवाजा उड़का हुआ था । चौखट की सँध मे उसने हथौडी घुरसी और दरवाजा खोल कर अन्दर घुसी । अँधेरे की अभ्यस्त होने में आँखों को कुछ समय लगा , वह अन्दाज से ढिबरी उठाने बढी । ससुर के आने से पहले बत्ती जलाना चाहती थी वह । अचानक किसी ने उसका बढा हुआ हाथ पकड लिया ।
"को है ?"उसे लगा गुरदीन आज कहीं गया नहीं , घर मे पडा है ।
"ई का करत हो.....",नहीं यह गुरदीन का हाथ नहीं हो सकता , कोई उसे पकडने की कोशिश कर रहा है ।
" कोऊ नहीं है इहाँ।चुप्पै रहो..." खिलावन की आवाज ।
' तुम इहाँ काहे घुसे बइठे हो ?" मनका बराबर धकियाने की कोशिश कर रही है ।
"हम हैं खिलावन !अउर केऊ नहिन है इहाँ , " सोर मचावन ते तुम्हार बदनामी होई ,भौजी । तुम्हार मरद त बेकार हन........।"
"अच्छा ,तो ई बात है ! निकर हियाँ ते....। अच्छा..ले..ले....। "चटाचट-चटाचट चाँटे मारे जारही है , ठौर-कुठौर जहाँ हाथ पडे । क्रोध मे भर पीटे जा रही है.अंधियारे मे नाक- मुँह कुछ सुझाई नहीं दे रहा , नाक पर एक झन्नाटेदार झापड पडा.। खिलावन बिलबिला गया.। इतने मे बाहर कुछ हलचल हुई , सुनकर वह चिल्लाया , " अरे , गुरदीन ! ई देखो तुम्हार मेहरिया का करत है ?"
गुरदीन हाथ मे जलती ढिबरी लिए अन्दर घुसा ।
सामने पिटाकुटा खिलावन और तमकी हुई मनका ।
" ई का हुइ रहा है ? इहै लीला करन को बाकी रहि गई ? इहाँ अँधियार मे आपुन यार को बुलाए मूं काला कर रही है , हरामजादी ! अउर खिलावन तुम्हऊ .......। "
" इहै हमका बुलावा रहै गुरदीन , हमते कहित रही.......।"
मनका फिर हाथ उठा कर झपटी , खिलावन तेजी से पीछे हटा , गुरदीन बीच मे आ गया ।
"काहे री बेसवा , ई सब करै का यू घर ही बचा रहै ?"
" हरामी कुत्ता ,झूठ बोलित है । हम या ते कबहूँ बातौ नाहीं करी ।"
"काहे ? हमका कसम न दिलाई रहे..इत्ती बेरा आवन की ? हम ईका बहुत समझावा...ई कहिन हमार मरद कउनो मरद नाहीं.....हमार भी मत मारी गई....।"
इतने मे नथिया आ गई और हल्ला सुनकर लडखडाते पैरों बुढऊ भी आते दिखे ।
" देख ले अम्मा इहका ! आज रँगे हाथ पकड लिहिन । बडी बदमास मेहरिया है ।"
नथिया भडक उठी , " इहै लच्छन हैं कलमुही केर ......"
गुरदीन और नथिया बाही-तबाही बक रहे हैं , बुढऊ अवाक् खडे हैं , खिलावन मुँह सहला रहा है ।
सब तरफ से घिर गई मनका । एकदम विमूढ !
" ई कसम नाही धराती तो हम काहे आते.?....अब तुम लोगन को देख के उलटी चाल चलित है ।"
चुप खडी मनका एकदम आगे बढी , सामने खडे खिलावन को जोर से धक्का दिया , वह दीवार से टकराया , आगे बढ दोनो हाथों से उसका सिर धाड़ से दीवार से दे मारा ।
"बोल , हरामी ! हम तोहका बुलाए रहे ? बोल कूकर , नाहीं अभै जान निकार के दम लैहौं..।"
खिलावन की कुछ कहने की हिम्मत नहीं पडी ।
सब भकुआए खडे रह गए ।
मनका फिर उसका सिर दीवार पर मारने को उद्यत हुई खिलावन की आँखे सफेद पड गईं ।
" बोल,सच्ची बोल ! नहीं तो ले...।"
वह भयभीत चिल्ला उठा ," नाहीं , हम सच्ची बात बताइत हैं.......।"
" अरे ,चण्डी..ओहि का मार डारै का काहे तुली है ? छोड दे ओहिका , " सास आगे बढी तो मनका ने एक हाथ से उसे परे कर दिया ।
"तुम सब चुपाय जाओ , आज हम निपट लेबै । बोल कूकर,नाहीं तो ले.....।"
वह बुरी तरह डरा हुआ,पीछे हटते हुए बोलने लगा,"हमका माफ करो...पहिले हमका छोड दे......।"
"नाहीं छोडब ," मनका गरजी , " पहिले कबूल...कबूल हरामी..." फिर झकझोरा उसने ।
" तुम नाहीं बुलावा । तुम कबहूँ नहीं बुलावा.....।"
" फिन तू काहे इहाँ घुस के बइठा , हरामी की औलाद ?" मनका ने उसे छोडा नहीं , फिर जोर से उसका का सिर झकझोरा , जैसे दीवार से भडीक देगी ।
"सब सच्ची बताइत हैं ," वह बेतरह घबराया बोलने लगा , " गुरदीन हमका कहे , हमार मेहरिया अईस नहीं दबेगी...ओहिका रँगे हाथ पकडना है । सो तुम हमार मदत करो....हम इहै के कहे ते...।. .तोहार पाँव परित हैं , भौजी..,"वह मनका के पाँवों की ओर झुकने लगा , " हमका माफ करो । "
मनका आग्नेय नेत्रों से घूर रही है , अपने पाँव नहीं छूने दिए उसने - एक ओर हट गई । ससुर ने कानो पर हाथ रख लिए हैं , सास ने सिर झुका लिया है और गुरदीन का चेहरा राख जैसा फक्क !
"बोल ,सिगरी बात बता , " उसने तुर्श स्वर मे आज्ञा दी ।
"बस , इहै बात रहे । हम इहका बहुत समुझावा त ई मार गुस्साए लाग,...फिन हमका कसम उठवाय दिहिस........।"
वह विचार करती-सी बोली , " काहे ई सब.....।"
खिलावन एकदम कबूलने लगा , " ई कहित रहा एक बेर औरतिया क ऐब लग जाई त सारी जिनगी सिर उठावन की हिम्मत ना करी । हमार भारी गलती रही जौन ईका कहे मे आय गए । हमका माफी देओ ," वह अपने गालों पर चटा-चट चाँटे मारने लगा ।
"चल भाग हियन ते ।आगे सकल न दिखायो अपनी..।"
वह एकदम दरवाजे से निकल भागा ।
मनका गुरदीन की ओर घूमी , वह एकदम लडखडा गया । भयभीत नेत्रों से मनका की ओर देखते हुए वह गिरते-गिरते दीवार से टिक कर जमीन पर बैठ गया ।
पाँव से उसे सीधा कर झकझोर दिया मनका ने , " आज तो जी करत है तोर छाती पे दूनौ पाँव धर के खडी हुइ जाऊँ । मरदुए , आपुन मां दम नाहीं त दूसर का न्यौत लाएउ....भडुए.., " मनका ने अपना एक पाँव उसकी ओर बढा दिया ।
"हाय,हाय ! मर जाई , " सास चिल्लाई , " अरे ,गल्ती हुइ गई , माफ कर दे ओहिका । रहै दे बहुरिया......अरे मर जाई ।"
"मर जाई त रोय के जिनगी काट लेबै , मुला अइस मरद से राँड भली...।"
वह फिर बढी । भय-त्रस्त सास दौड कर आडे आ गई , " नहीं-नहीँ , ओहिका छिमा कर दे बहुरिया । हम हाथ जोडित हैं , तोहार पाँव परित हैं....देख ऊ भी हाथ जोड क माफी माँग रहा है । छोड दे बहुरिया ।"
" ई कौनो आदमी है ," हिकारत से कहते हुए मनका ने ठेल दिया उसे, " जा-जा भाग ! दूर हो इहाँ ते । हमार एक हाथ पड जाई त चार गज दूर गिरी.....नेक ऊ सरम होय त चुल्लू भर पानी महियाँ डूबि मर...जा..हटि जा ,हमार सामै न ..।"
वह लडखडाता हुआ उठा और कोने मे ढेर हो गया ।
"अब सान्त हो जा । ओहिका कसूर माफ कर दे....." सास गिडगिडा उठी । उसकी हिम्मत नहीं हुई कि गुरदीन के पास जाकर देखे कि उसे दौरा तो नहीं पड गया ।
मनका ने तीखी दृष्टि सास पर डाली ।गला बिल्कुल खुश्क हो रहा था। झटके से घडे मे से पानी उँडेल कर पीने लगी ।
मन का ताप किसी तरह शान्त नहीं हो रहा ।झुक कर लोटा रखने के बजाय वहीं लुढ़का दिया उसने ।गुर दीन पड़ा था , देखती रही कुछ क्षण उसकी ओर ।नहीं, आज दया नहीं आ रही ,बिल्कुल नहीं ।
'ई सुसरा कोई मरद है ?

. एकौ लच्छन है मरद केर ? तन से तो निरा हिजड़ा रहा सुरू से ,मन भी मानुस केर नाहीं । मेहरिया की इज्जत बचावे का तो दम नाहीं ,औरन के हाथन लुटावै का उतारू है ।'
बोलने में आज किसी की शरम नहीं मनका को, किसी का लिहाज़ नहीं। ससुर मुँह ढँके पड़े सुन रहे हैं सास आँखें फाड़े देख रही है ,और मनका बोले जा रही है ,'एकौ लच्छन नाहीं , मरद समुझत है आपुन का ,,ई से का होई ,खड़े होवन का दम नाहीं ,मरो सो डरो रहत है ।... मइया .. ई पूतर केर  धोखे ते..बियाह कराय लाई ..अब हमका दोस लगाइत है,..हमका बाँझ बताइत है । औलाद चाहित है ?... बस हुइगा ।... जी फाटि गा हमार.. . अब नाहीं ..हम नाहीं निभाव सकित.. ना होई हम ते...एकर सकल ना दिखिबे कबहूँ ,,अब ना .नाहीं रहिबे इहाँ .. .।'
स्वर अस्फुट होता गया, वह बाहर निकल गई ।
ससुर थोड़ी देर आहट लेते रहे फिर बोले ,' अरी देख, ऊ कहाँ गई ?अब का होई ...?
सास की बाहर जाने की हिम्मत नहीं पड़ी ।
ससुर फिर बोले ,'अरी जा ,हाथ-पाँव जोड़ि के मनाय ला ।ऊ न होई तो का होई हमार ?
दरवाज़े पर खड़ी हो झाँक कर देखा - बाहर आधी रात का सन्नाटा पसरा था । सब तरफ़ सूनसान ।इधर-उधर निगाह दौड़ाई।
पेड़ के नीचे घुटनों में मुँह दिये मनका हिलक-हलक कर रो रही है । सास कुठ क्षण देखती रही फिर अंदर चली गई ।
' ऊ कहाँ गई ?'
' रोय रही है पेड़ तर बैठी ।'
ससुर बड़बड़ा रहे थे - ऊ घर माँ रहे तौ चैन नाहीं , निकरि जाय तौ हूँ चैन नाहीं !
' आँसू बहाय के जिउ पटाय जाई तौन फिन चली आई ।जाई कहाँ इत्ती बेरा ?
**
कोठरी का दरवाज़ा सुबह तक खुला पड़ा रहा ।
सुबह उठते ही बुढ़िया ने निगाह डाली । जगह खाली थी ।
झपट कर बाहर आई । मनका कहीं नहीं थी ।
सिर पीट लिया उसने ।
लुटी-सी खड़ी रही कुछ देर ।
अंदर आते ही कोने में पड़े गुरदीन को देखा ,कुछ क्षण देखती खड़ी रही । मन विरक्ति से भर उठा ।
' ई के बस का कबहूँ कुच्छौ न रहा। ...कइस-कइस जोड़-जतन कर सादी कराय दिहिन ...,अइस ढंग की लुगाई केऊ सम्हार न पावा ।' गुरदीन को कोसने लगी ,' अरे , हम का जानित रहे ! तो से तो ऊ कागभगोड़ा नीक अहै ... कौआ पंखिन ते आपुन खेत तो रखावत है ।तू तो बेहया ससरा खुदै न्यौत लावा ।...कुछौ न बचा ...।अब हम का कही ?..का करी.. कहाँ जाई ?.. लोगन का कईस मूँ दिखाई। ...सौरी में काहे न मरि गवा ..
जौन अऊर लरिकन का रोय-पीट के सबुर करि लीन इहै का करि लेतिउ .. ।'

कीचड़ भरी आँखें मिचमिचाता गुरदीन चुपचाप पड़ा था ।

**

फुलमतिया


*
रोज़-रोज़ उसका वही ढर्रा देख मैं खीज उठी थी .उसके आते ही बरस पड़ी ,'साढ़े पांच बज रहे हैं और अब तुम आ रही हो ?मैं तो तुम से कहते-कहते थक गई . तुम्हारे ऊपर असर ही नहीं पड़ता !'
आँगन के कोने में अपना डंडा टिका कर उसने चप्पलें उतारीं और नल के नीचे लगाने को बाल्टी उठाई .
'का करी बहू ,सुबू चार बजे उठित हैं.तऊ काम नहीं सपरत .आज पप्पू के बप्पा का मिल पठै के हम उद्यापन में लगी रहिन .'
'काहे का उद्यापन ? '
'सुक्करवार का .चहा तक नाहीं पियेन ,दउर-भाग करत-करत इत्ती बिरिया भई .बुढऊ हरामजादा तो फली नाहीं फोरत हैं .हम बनावा सबका खबावा तौन सीधी हियाँ आइत हैं .'
'अरे उद्यापन तो आज हुआ .तुम्हारा तो रोज़-रोज़ का यही ढंग है .'
कहती हुई मैं कमरे मेँ आकर धम्म से पलँग पर बैठ गई .
न बहुओं को काम करने देगी ,न खुद से सम्हलेगा !छोड़ती भई तो नहाॉीं ,जो दूसरी ही ढूं लूं .जब कह-सुनी तो वदो एक दिन साढे तीम बजे आ जायेगी ,नहीं तो वही चार-साढे चार -पाँच. भला यह भी कोई चौका बर्तन करने का टाइम है !
और कुछ कहो, तो अपना दुखड़ा लेकर रोने बैठ जायेगी .श्यामू की ससुराल यहीं शहर में है . पर उसकी सास बिदा नहीं करती बेटी को .श्यामू गये तो कह दिया ' नहीं बिदा करेंगे हम !'
' घर की खेती हो गई .फिर ब्याह क्यों किया था बिटिया का ! घर बैठाये रखते ! तुम लोग भी अजीब हो ,कह क्यों नहीं देते रख लो, हम भी नहीं बुलायेंगे .'
हम लोगन में ये सब नहीं चलता है बहू ,ऊ आपुन बिटिया केर दूसर सादी करन को तैयार हुइ जाई तो का होई ?ऊ तो कहती हैं एक महीना हमार बिटिया एक महीना ससुरारै रही तौन एक महीना पीहर माँ रही .'
'और वहाँ उससे चार घर का चौका-बर्तन करवाया जाता है .तुम क्यों नहीं उसे काम पर ले जातीं ?'
'का करी ! हमार घर के मरद नाहीं निकरन देत हैं .बुढ़ऊ हरामजादा तो हमऊ से कहित हैं -घर में बैठ के बहू की रखवारी करौ .'
मैं खिसिया उठती हूँ .
'तो तुम भी छोड़ो काम-धन्धा और बैठ जाओ घर . वो बैठालते हैं तो तुम्हें क्या परेशानी है ?और फिर अब तो बुढ़ऊ, पप्पू ,श्यामू सब कमाते हैं .'
'कमाइत तो हैं बहू ,बाकी हम जिनगी भर काम करत रहीं तो अब खाली बैठ जाई का ?'
'बुढ़ापे मे आराम करो .'
'आराम कबहूँ ना मिली बहू ,' वह हाथ हिला कर कहती है ,' घर केर काम करो ,बाहरऊ का करौ तऊ हजरामजादा गरियात है .जवान-जहान लरिकन का सामै जौन मुँह मे आवत तौन बकत है .
कहत है -साली को घर में चैन नहीं पड़ता .सच्ची बहू,हम तो कह दिहिन , कबहूँ हमका एक धोती लाय के पहराई है ?तुम्हारी सबकी उतरन पहिन के जिनगी गुजार दिहिन .'
शुरू-शुरू में उसके मुँह से 'बुढ़ऊ हरामजादा' सुनती तो हँसी भी आती और गुस्सा भी .
पहले समझ में नहीं आया तो पूछना पड़ा,'कौन ?'
बोली ,'और किसउ का काहे कहि हैं .'
और दो-एक गालियाँ सुना दीं उसने बुढ़ऊ के नांम पर .
देखा तो नहीं है अभी, पर वही बताती रहती है .उसका आदमी उससे बालिश्त भर छोटा है . बड़ा दुबला-पतला ,पक्के रंग का - पक्के रंग से उसका मतलब होता है चमकता गहरा काला रंग .
महरी खूब लंबी है .अब तो कमर भी झुक गई है. डंडे के सहारे बिना, सीधी होकर खड़ी नहीं हो पाती .एड़ी भऱ-भऱ महावर लगाती है और माथे पर बड़ी-सी कत्थई प्लास्टिक की बिन्दी .गेहुआँ चेहरे पर अब भी सलोनापन है .अपनी उमर में तो बहुत आकर्षक रही होगा !
कहती है ,'सामू पप्पू हम पे गये हैं बड़कऊ बुढऊ जइस छोट रह गये .'
क्या पप्पू से बड़ा भी है कोई ?'

'दुइ हैं बहू !एक तो गाँव में रहित है और जे हरस राम फऊज की डिरैवरी से रिटाइर हुई के आय गये हियन .'बाबू के आफिस मां डिरैवर की कौनो नौकरी होय तो लगवाय देओ .'
'अब कहाँ है नौकरी ? पिछले साल जरूरत थी, तब तुमने कहा नहीं .उसे तो पेंशन मिलती होगी ?'
' मिलत तो है ,मुला सब उड़ाय देत है .कल्ह दस रुपैया लै गई रहिन ऊ पाँच की मछरी लै आये .तब रात में मसाला पीसेन ,मछरी धोय-धाय के बनाइन .खावत-उठाइत बारह बजिगा .'
'क्यों देती हो तुम ?महीने भर मेहनत तुम करो और वो मछली में उड़ा दें !'
'माँगत हैं ऊ ! हाथ मे रुपैया होय तो नाहीं कइस करी ?कुछ दिनन में गाँव चले जइ हैं तब काहे हम से माँगन अइहैं ?'
सुबह के चौके निपटाते - निपटाते उसे दस बज जाते है .फिर थोड़ी देर गोड़ सीधे करती है ,तब खाना बनाने का लग्गा लगाती है .
पप्पू की बहू की अभी बिदा करानी है ,रामू की यहीं शहर में है. पर उसकी माँ उससे चौके करवाती है ससुराल नहीं भेजती .
बड़ा सब्र है महरी में . कहती है , ' देखित रहो बहू , दुइ-चार बरिस में बच्चा-कच्चा हुइ जाई तब देखी महतारी केतने दिन रखती हैं .अभै तो अकेल दुइ परानी हैं.बिटिया चाकरी करिके हाथ में पइसा धरत है घरउ केर धंधा करत है . तौन ऊ काहे भेजी ?'
महरी बताती है बुढ़ऊ डेढ-दो बजे आते हैं तब वह खाना बनाती है . अपने घर के कच्चे आँगन में उपलों की धुआँती आँच पर धारे-धीरे रोटियाँ सेंकती है. सूरज सिर पर आ जाता है तो छतरी लगा लेती है .
अरे,मैं तो ऐसे कहे जा रही हूँ जैसे महरी की राम-कहानी कहनी हो !
परेशानी तो मुझे है कोई क्या समझे .
सुबह सब लोग ग्यारह बजे तक निकल जाते हैं .खाना निपट जाता है .ये जाते हैं साढ़े नौ पर लंचबाक्स लेकर . रवि-छवि दस-सवा दस तक और मन्टू का तो स्कूल पास है. एक बजे तक लौट भी आता है .खाना खा कर सोता है तो चार बजे तक की छुट्टी .ग्यारह बजे भी आये तो चौका खाली हो जाता है .शाम तक जूठे बर्तन फौले रह़ें, कितना बुरा लगता है !गंदी रसोई और जूठे बर्तनों में चूहे दौड़ लगाते रहते हैं . उधर निगाह डालने की इच्छा नहीं होती .
वैसे तो महरी रसोई धो कर कपड़े पोंछ कर सुखा देती है .पर मुझे तो ये शिकायत है कि यह जल्दी आती क्यों नहीं !
जब इससे तय किया था, तो पहली बात मैंने यही कहा थी कि काम दुपहर ग्यारह-बारह कर कर लेना है.इसी बात पर मैंने मुँह माँगे पैसे दिये थे - साठ रुपये महीना !मैंने तो ये भी कह दिया था कि फिर पाँच बजे तक कोई घर में नहीं मिलेगा .
लेकिन वह तो जानती है न कि चौका-बर्तन कराये बिना मैं जाऊंगी कहाँ ! वह अपने उसी समय पर आती है और मैं इन्तज़ार करती मिलती हूँ ,जैसे उसकी नौकर होऊं .मैं तो बल्कुल बँध गई हूं -कहीं जा भी तो नहीं सकती .जानती हूँ वह चार बजे से पहले नहीं आयेगी पिर भी बैठी-बैठी बाट जोहती हूँ . बीच में निश्चिनत होकर सो भी नहीं सकती .ज़रा झपकी आई और कुंडी खटकी तो फ़ौरन उठना पड़ेगा.नींद तो हिरन हो जायेगी और सिर दर्द करता रहेगा शाम तक .ऐसा कई बार हो चुका है .
बार-बार घड़ी देखती हूं -इतने बज गये अभी तक नहीं आई -सोच-सोच कर झींकती हूँ उसके नाम को .
उस दिन तो हद हो गई !
मैने सुबह ही कह दिया था का कि ग्यारहृ-बारह बजे तक आ जाना .पर नहीं आई .पप्पू आया -पौने चार बजे .पूछा तो बोला,' अम्माँ ने कहा ही नहीं .'
'तुम्हारी अम्माँ के बस का काम नहीं है पप्पू ,तुम अपनी दुल्हन को क्यों नहीं बुला लेते ?'
'हम अपने मुँह से कैसे कहें बहू जी ?घरवालों की मर्जी होगी तब वही बुलायेंगे .'
घरवाले भी अजीब हैं .पप्पू की बहू का मायका यहीं धरा है क्या ? इतनी दूर गोंडा से बुलाने में किराया खर्च होता है .पप्पू का ससुर भी बड़ा जबर आदमी है 'कहता है नौकरी करके पेट भर सको तब बिदा करा ले जाना .'
**

'क्यों तुम इतनी लंबी और तुम्हारा आदमी बालिश्त भर छोटा ! तुम्हारे पिता ने नहीं देखा था पहले ?'
'अर् बहू ,अब ऊ सब मत पूछो .का बताई ...बाप का सराब की लत रही और हमार बियाह की अइस जल्दी पड़ी रही कि महीना भऱ माँ जइस मिला तस कर दिहन .'
'इतनी जल्दी क्यों पड़ी थी ,क्या उमर थी तुम्हारी ?'
'उमिर ?उमिर हम का जानी बहू .सुरू से डील अच्छा रहा हमार .महतारी करत रही तेरह बरिस की उमिरमें पूरी जवाल लगत रहीं .'
बाद में कई बार धीरे-धारे करके उससे पता चला था ---
तब वह महरी नहीं फुलमतिया थी .ऊँची-पूरी ,जीवन भरा तन और सपनों भरा मन .एक दिन किसना ने उसके बाप से कहा था - 'फुलमतिया से बयाह करूँगा .'
बचपन का साथी था वह फुलमतिया का .दूसरे टोले में रहता था बचपन के खेल बंद हो गये आपस की बोल-चाल बंद नहीं हुई .चुपके-चुपके कचौरियाँ लाता था वह ,उसके लिये इमली की चटनी के साथ .
एक बार फूलमती के बाप ने देख लिया ,किसना को पकड़ लाया घर के अन्दर .
किसना जरा नहीं डरा .उसने तन कर कहा ,''विवाह करूंगा फुलमतिया से .'
फूलमती की ऊपर की साँस ऊपर नीचे की नीचे .
बाप ताव खा गये .लौंडे की इतनी हिम्मत !
बोले ,'फुलमतिया से बियाह करन को गज भर का कलेजा चाही ....फिर तुम हो का ?न हमारी जात के न बिरादरी के ! हम कहार हैं तुम काछी ,हमारा तुम्हारा क्या जोड़ा .'
बस यहीं मात खा गया था वह !
फिर भी मन का मोह नहीं टूटता था .रास्ते में मिल जाता तो चाव भरी आँकों से देखता कहता हुआ निकल जाता था ,'कब तक तड़पायेगी फुलमतिया ?'
'मैंने उत्सुकता से पूछा था ,'कैसा था किसना ?'
'अब पूछि के का होई बहू ,हमार तो जलम इनहिन के हाथ बिकिगा .'
फूलमती रोती रह गई पर अपने मन का नहीं कर सकी.बाप तो वैसे ही माँ को पीटता था.कहता था ,'तू ही लड़की को बेकाबू छोड़ रही है . कुछ आगा-पीछा हो गया तो न माँ को छोड़ूँगा न बेटी को ,और न उस हरामी की औलाद किसना को . फिर चाहे फाँसी ही काहे न लग जाय .'
एक बार फूलमती के भाई लाठियाँ लेकर खड़े हो गये थे .बात कुछ नहीं थी .रास्ते में किसना मिल गया और फूलमती जरा-सा रुक गई थी -दो मिनट बात करने में ऐसा क्या बिगड़ जाता ? पर भाइयों को लगा उनकी इज़्ज़त का सवाल है .
फूलमती आड़े आ गई थी ,'तुम्हार सिर नीचा न होई भइया ,हम अइस कबहूँ न करी .मला किसना को जाये देओ .'
'अब कहाँ है वह ",मैं पूछती हूँ वह कुछ जवाब नहीं देती गहरी साँस छोड़ कर बर्तन माँजने चल देती है .
***

कितनी तेज़ धूप है !अचार मर्तबान छत पर रखने गई इतनी देर में ही सिर चटक गया .ढाई बज भी तो गया है .मिन्टू कब का सो गया .पर मुझे नींद कहां ?दिन में ज़रा-सी सो जाऊं तो कोई-न -कोई आकर दरवाज़ा भड़भड़ाने लगेगा .सबसे बड़ा झंझट है महरी का . जिस समय झपकी लगेगी उसी समय ये ज़रूर दुपहरी में आकर जगायेगी .
वैसे तो चार से पहले रवि-छवि आते नहीं और इनका लौटने का तो ठिकाना ही नहीं साढ़े पाँच से पहले तो सोचना ही बेकार है ,कभी-कभी छः-सात भी बज जाते हैं .मैं तो ऊब जाती हूं . दिन भर घर में करूँ भी क्या ? थोड़ी-बहुत सिलाई या इधर उधर का काम कर लिया बस . गर्मी में कुछ करने की इच्छा नहीं करती .कढ़ाई करने का शौक है पर रोज़-रोज़ उससे भी जी ऊबता है .
सिर अभी तक गरम है .पाँच मिनट और धूप में खड़ी रहती तो चक्कर आ जाता .
अरे , महरी अभी तक नहीं आई .आँगन में छाता लगा कर उपलों की धुयेंदार आँच में रोटी सेंक रही होगी .उपलों की आग फूँकते-फूँकते राख उसके बालों में भर जाती है आँखें लाल हो जाती हैं .ढाई तीन तक खा-खिला कर सफ़ाई करती है बर्तन माँजती है ,फिर गोड़ सीधे करते-करते चार बज जाते हैं, रोज़ .
लेकिन मैंने जब पहले ही तय किया था तो 'हाँ-हाँ' क्यों कर लिया था इसने ? एक-दो दिन तीन बजे आई भी पर आकर कमरे में पंखे के नीचे पसर गई .काम करने उठी वही चार बजे .
लकड़ी का सहारा लेकर तेज़ धूप में धीरे-धीरे चल कर आती है .कहती है ,'मूड़ तचि गवा .'
मैं क्या करूँ ?बहू को क्यों नहीं बुला लेती ?लड़के भी तो घऱ का कुछ काम नहीं करते .सुबह खुद दूध लाकर चाय बनाती है और हरेक को उसकी जगह पर जाकर पकड़ाती फिरती है .लड़के भी मजे के हैं .एक तो बीस का होगा -श्यामू ,दुकान पर काम करता है .दूसरा पप्पू उससे दो साल छोटा -ठेला लगाता है पर आलू उबालना छीलना समलना गोलियाँ बनाना .बेसन घोलना चटनी पीसना -सब काम मां से करवाता है .फिर टाइम से खाना चाहिये .बुढ़या झींकती जाती है और सब काम करती जाती है .
ऊँह , मुझे क्या ?मुझे तो रोज़ झिंकाती है -चौका जूठा पड़ा रहता है शाम के पाँच बजे तक . जितना मैं देती हूँ कहीं से नहीं मिलता होगा !होली-दिवाली पर -नकद दस-दस रुपये ,खाना अलग .कपड़े भी पा ही जाती है दो-चार जोड़े . काफ़ी मज़बूत होते हैं ,मेरी साड़ियाँ वैसे भी घिसी हुई नहीं होतीं .ब्लाउज़ उसके नहीं आते इतनी लंबी जो है .
दो-चार,दो-चार रोटियाँ रोज़ ही बचती हैं और कभी-कभी आठ-दस भी .सब उसी को मिलता है .सुबह बासी दाल या तरकारी के साथ एकाध रोटी खा लेती है बाकी बाँध लेती है -पप्पू नास्ता कर लेई .
एक बार दाल कुछ महक गई थी .मैंने उससे कह दिया था ,'दाल खराब हो गई है ,फेंक आना .'
जब नहा कर मैं आँगन में निकली तो देखा जल्दी-जल्दी दाल सड़ोप रही थी वह .मुझे देख कर सकुचा गई .
मुझे जाने कैसा लगा .
'दाल खराब थी इसलिये मैंने सब्ज़ी रख दी थी ,वह क्यों नहीं खाई ?'
'तुम्हार घर की तरकारी बुञऊ का बहुत परसंद है .घर लै जाइबे .'
'और तुम सड़ी दाल खाकर बीमार पड़ोगी ?'
'सबाद खराब नहीं रहा बहू ,जरा-सी महक गई रहे .नुसकान ना करी .'
अब तो ऐसी चीज़ मैं खुद फिंकवा देती हूँ -खायेगी तो बेकार बीमार पड़ेगी .
महीने में दो-एक बार तो पड़ ही जाती है .कभी पेट-दर्द कभी पेचिस .दो-तीन दिन में बुढ़िया का चेहरा बिल्कुल उतर जाता है .
मैं भी कहाँ बुढ़िया पुराण ले कर बैठ गई !सवा चार बज गये हैं अभी तक आई नहीं है .
***
''बहू,चक्करदार ऊँचावाला झूला लगा है उधर का पारीक में . झूल आओ बाबू केर साथे .'
'मुझ से झूले पर झूला नहीं जाता है . जब नीचे आता है तो लगता है दिल डूबा जा रहा है .'
वह छेड़ती है ,'बाबू केर साथ बैठिहो ,उन केर कंधा का सहारा लै लिहो . दिखियो कइस साध लेत हैं तुमका .'
मुझे हँसी आ गई .मैं उसके चेहरे को पढ रही हूँ -क्या अपना अतीत देहरा रही है !
'आज अपने दिन याद आ गये हैं तुम्हें ?'
वह चौंक गई .
'कहाँ ? दुई बार बैठे रहे . सामू केर बप्पा को केऊ को सौख नाहीं .'
'कहाँ झूला था ,वहाँ या यहाँ ?'
' हियाँ कउन बैठाईन हमका ?'
रंग में आने पर गाँव के गीत और मेले के किस्से फुलमतिया खूब सुनाती है .रंग-बिरंगी चूड़ियाँ ,फुँदनेदार चुटीले ,बालों की क्लिपें और जाने क्या-क्या मिलता था .मेले में ऐसी भीड़ होती थी कि कई बार फुलमतिया माँ-बाप से अगल हो गई .
उसका बताया गाँव के मेले का दृष्य मेरी कल्पना में साकार हो उठता है . रंग-बिरंगी चुनरियों से सजी ग्रामीणाओं की भीड़ - दुकानों पर खरीदारी की होड़ लगी है .चाट के , जलेबी के ठेलों पर लोग जमा है . झुंड-केझुंड लुगाइयां, पगड़ी बाँधे मनई, मचलते बच्चे ,उड़ती धूल ,बैलों के गले में घंटियाँ और गाड़ियों की चरमर ध्वनि के बीच उठती ग्राम्य गीतों की ताने !
फुलमतिया ने पहले ही तय कर लिया है -- माँ-बाप सोचेंगे मेले में हिराय गई .कहीं रो रही होगी अकेली !
देवी के थान के पीछे खड़ा किसना बाट देख रहा है . फुलमतिया पहुँच जाती है . दोनों चाट खाने पहुँचे .खाती जा रही है ,सी-सी करती जा रही है और ही-ही करके हँस रही है .आँखों में पानी भरा आ रहा है .किसना सब-कुछ भूल कर उसकी ओर देख रहा है .मगन हैं दोनों !
माँ सोच रही है -बिटिया किसी दुकान पर होगी या सहेलियों से बातें कर रही होगी .बाप को अभी कुछ पता नहीं है . काफ़ी देर बाद जब पता चलेगा कि वह हेराय गई ,तब खोज-बीन होने से पहले वह पहुँच जायेगी .
पर एक बार सचमुच ही ढूँढ पड़ गई -- बड़ी देर कर दी फूलमती ने .
'हियाँ सहर में मेला नहीं लागत है ?"
गाँव के मेले की बात करते-करते वह वर्तमान को भूल जाती है --- आँखों में सपने छलक उठते हैं .चेहरा माधुर्य से दीप्त हो उठता है .
उस दिन वह झूला झूलने में समय का भान भूल बैठी थी .जहाँ झूला नीचे आता वह घबरा कर किसना का बलिष्ठ कंधा पकजड़ लेती .वह मुस्करा कर उसे साध लेता .फूलमती को लगता यह समय कभी समाप्त न हो .
किसना ने उसे रुपहले सितारों वाला रेशम का चुटीला और चमकीली बिन्दी दिलाई थी . जलेबी और कचौड़ी खिलाई थी बातों-बातों में यह सब उसने कबूला है .
गाँव उसे बहुत याद आता है -झूला ,मेला चटपटी चाट और जाने क्या-क्या . सब वहीं रह गया .
इधर फूलमती की ढूँढ पड़ गई थी
तभी वह किसना के साथ आती दिखाई दी .भागती -सी आई और माँ से लिपट गई ,'अम्माँ ,तुम कहाँ चली गई रहीं .हम चुटीलावाली दुकान देखित रहेन और तुम हमका छोड़ दिहन ...हम सारे मेला माँ खोजत फिरेन .'
'ई हुआँ इकल्ली रोय रही रहे ,तौन हम कही डरो ना ,चलो हम ढुँढवाय दें ,' किसना ने आगे बढ़ कर बताया .
माँ उसे असीसें दे रही है ,'तुम नाहीं रहत तो हमार फुलमतिया हेराय जाती ...जुग-जुग जियो बिटवा .'
बाप चुप है गंभीर .
फूलमती के चेहरे पर खोनेवाली क्लाति नहीं -- दमक है पानेवाली .
ओफ़्फ़ोह , इस बुढ़िया के मारे चैन नहीं .एक तो इतना इन्तज़ार करवाती है और जब तक आ नहीं जाती ,मेरा ध्यान उसी के चारों ओर घूमता . नहीं तो मुझे क्या करना ,वह जाने उसका काम जाने !

***
' बहू, बाबू का कोई पुरान-धुरान सूटर होय तो हमका मिल जाय .'
'उनका स्वेटर तुम्हारे कहाँ आयेगा ? कार्डिगन दया तो था .'
'हमका नाहीं ऊ हरामजादा बुढ़ऊ ठंड माँ कँपकँपात रहत है .कहत रे साली अपने लिये माँग लाई और किसउ का धेयान नहीं .'
मुझे ताव आ गया ,'तुम तो हमारा काम करती हो ,बुढ़ऊ क्या करते हैं ?'
'करत तो कुच्छो नाहीं बहू,पर ऊ हरामजादा हमार मनई है . हमका गरियात है .दु इ दिन हुइ गये मुला खाँसी के मारे रोटी नहीं खाय पाइत है .हमार ऊपर दया हुइ जाय बहू .'उसने हाथ जोड़ दिये हैं .
मन नहीं करता पर उसकी बहुत विनती पर इनका एक पुराना, पूरी बाहों का स्वेटर निकाल देती हूँ आखिर को मेरा काम तो वही करेगी
-- बेकार कपड़ों का करूँगी भी क्या ?
***
ठंड में सिकुड़ती रहे पर मेरा दिया कार्डिगन सहेज कर रख देती है बर्तन माँजते समय . इसे क्या ?बीमार पड़ेगी तो परेशानी तो मुझे होगी .
'क्यों कार्डिगन क्यों नहीं पहनतीं ?'
' ऊ लंबा अहै नीचे लटक आवत है . पल्ला कइस घुरसी ?'
'अरे, ऊपर से पहनो ,धोती के ऊपर से .जैसे मैं पहनती हूँ .पल्ला भी सधा रहेगा .'
'अब का फैसन करी बहू ! जवान-जहान रहे तबहूँ कोई सौख पूरा नाहीं कियेन.अब का ....'
'बुढऊ खुश हो जायेंगे देख कर ,कहेंगे -आज बड़ी अच्छी लग रही हो .' मैं हँसती हूँ .
'खुस नाहीं ,जल मरिहैं . कबहूँ कुछू लाय के नहीं दिहेन .माँग-जाँच के रंगीन कपरा पहिर लेय हम तो खौखियाय के दौरत हैं हमार ऊपर .चिल्लाइत हैं ,कहतहैं ,दुनिया को दिखाने जाती है साली ,यारी जोड़ती फिरती है इधर -उधऱ .'
'अरे ! मैं विस्मित रह जाती हूँ ,' सुन्दर पत्नी के हज़ार नखरे आदमी सह लेता है ,यहाँ ये कैसी उल्टी बात .
महरी का आदमी ?बालिश्त भर छोटा तो है ही ,शक्ल-सूरत भी अजीब.गहरा काला रंग ,मुँह कुछ आगे को निकला-सा ,सींकिया शरीर .शुरू-शुरू में लोग छींटाकशी करते थे -मेहरिया अइस जइस गुलाब क फूल और मगद जइस काँटा !'
आसके आदमी को हमेशा यही खटकता है कि मेहरिया उससे कहीं बढ़कर है .खुद को घटिया अनुभव कर अपनी भड़ास निकालता रहता है .
यह भी जानता है कि किसना इससे ब्याह रचाना चाहता था ,और खुद को उसके पासंग भी नहीं पाता .पर यह तो शादी के पहले सोचना था .
मनुष्य का स्वभाव विषेश रूप से इन स्त्रियों का, चक्कर में डाल देता है .कुछ-कुछ समझ रही हूँ - पर अनसमझा बहुत कुछ छूटा रह जाता है .
ब्याह कर यहाँ आई, तो फूलमती को लोग अपनी ओर आकृष्ट करना चाहते थे . एकाध ने अकेले में कहा भी ,'तेरे जोड़ का मरद नहीं है रे फुलमतिया , हमारी चूड़ियाँ पहन ले फिर हम सब निपट लेंगे ...उस आदमी में दम कितना !'
'अच्छा !' मैं थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करती हूँ .
हमारे इहाँ ई सब चलता है बहू,पर धन्न है हमार छाती किसउ पर मन नहीं डोला .रूखा-सूखा खाय के जलम बिताय दिहिन .अब का बहू,बुढ़ापा है .फिर भी मरद चैन नाहीं लेन देइत .सक के मारे मरा जात है हरामजादा .हमसे कहित है -आदतें सुरू से बिगड़ी हैं मरदों से आँख लड़ाती फिरती है .
' हम बियाह के बाद किसउ को गलत आँखिन से देखा होय तो हमार आँखी फूट जाय, बहू .'
वह रोटी हाथ में पकड़े है .कह रही है ,'अन्न देवता हाथ में हैं बहू,कबहूँ जौन मरद से छल किया होय तो ई साच्छी हैं.मुला उहका हमार बिसबास नाहीं .
'हमार किस्मत फूटी अउर का . हमसे कहित है तू तो किसना के फेर में पड़ी रहै . ओहि का भागै का तैयार रही . तेरे बाप ने जबरन तेरा बियाह हमसे कर दिया .'
'तुम ?...क्या ऐसी कोई बात थी ?'
शायद बताना नहीं चाह रही थी ,पर मुँह से निकल गया था उसके .
संकुचित हो कर बोली ,'ऊ कहत रहा ,पर उससे का होत है .'
'कौन ?किसना ?'
वह अपनी सफ़ाई देने लगी ,'हम तो नाहीं भागेन .ऊ कहत रहा -चल फुलमतिया ,कहूं दूर भाग चली .मेहनत-मजूरी करके गुजर कर लेंगे .पर हम नाहीं गयेन .
'ऊ करत रहा -हमारे साथ नेपाल चल ,ऊ मुलुक अइसा नहीं है .पर हम जवाब दै दिहिन -हमका माफ करो किसना .ई हमसे ना होई .'
इच्छा हो रही है उससे पूछूँ ,'न जाकर तुमने कौन-सा कमाल कर दिखाया ,फूलमती ?तुम किसना के साथ भाग जातीं तो कौन सा इतिहास बिगड़ जाता ,और नहीं भागीं तो कौन सा बन गया है ?'
पर वह यह सब समझेगी नहीं .उस दिन वह गोल कर गई थी, पर आज मझे उत्तर मिल गया है -कि उसके ब्याह की इतनी जल्दी उसके बाप को क्यों पड़ गई थी .'
यह जो इसका आदमी है इससे ब्याह की बात फूलमती के बाप ने की थी ..यह कुछ दिन को देस गया था .उसके बाप के साथ उठना-बैठना हुआ ,बात-चीत हुई .एक बिरादरी थी ,दोनों ने आपस में तय कर लिया .
बाप ने पहले तो रौब से बताया ,' लड़का सहर में रहता है ,मिल में नौकरी करता है .राज करेगी लड़की .'
माँ ने विरोध किया था ,' ई मरद हमार बिटिया के जोड़ का नहीं .ऊ से नाहीं करिबे .'
बाप दहाड़ा था ,'ऊ काछी से कर दे हरामजादी .'
'हमने सादी पक्की कर दी है,उहीं होयगी .'
वह तो माँ को पीटने को तैयार हो गया था .
किसना को जब इस सब का पता चला तो वह उसके सामने खड़ा हो गया था ,'साले ,तू इसके लायक है ?'
'तू कौन होता है कमीने, दूसरन के मामले में बोलनवाला ?'
उसने आगे बढ कर इसकी गर्दन पकड़ ली .यह गिड़गिड़ाने लगा ,'ओही का बाप कह रहा है बियाह करने को .हम थोड़े ही कहन गये रहे .
किसना भैया, तुम बेफालतू में बिगड़ रहे हो .'
' हमार बाप उइसेइ सराब पी के महतारी को मारत रहा .हम भाग जाइत तो हत्या हुइ जाती .अम्माँ से कहत रहा ,तूने ही लौंडया को मूड़े पे चढ़ाया है .मैं तो इह के लच्छन देख के गर्दन काट के फेंक देता .फिर चाहे फाँसी हुइ जाती .'
मां ने फूलमती से पूछा था ,'तू का कहती है फुलमतिया ,ई मरद तो हमका जरा नाहीं सुहात है .'
फुलमतिया क्या कहती ,उसे तो डर था बाप और भाई मिल कर किसना की हत्या न कर दें .
बाप ने ज़िद पकड़ ली थी .महीने भर के अन्दर लड़का ढूँढने से लेकर शादी के फेरे तकसब निपटा दिया .
माँ ने रोते-रोते कहा था 'भगवान मेहरारू का जलम काहे दिहिन जौन सपनेहुँ मां सुख नाहीं .कबहूँ चैन नहीं - चाहे बाप होय चाहे खसम ,जिनगी भर मरद की ताबेदारी करो .'
बिदा होती पूलमती ने समझाया ,'हमका हमार कस्मत पे छोड़ देओ अम्माँ .हमरे लिलार जौन सुख-दुख बदा होई तौन जहाँ जाइब तहाँ पाइब .तुम सबुर करौ .'
'अब तो हमार आँखिन तरे कोऊ नहीं आवत है बहू .'
छीक कहती हो .अब तुम्हारी आँख तले कोई आयेगा भी नहीं .
' किस्मत है बहू,भाग तो ई मरद से जुड़ा रहा ....'
मुझे हँसी आ रही है .'जो हो गया वही किस्मत .भाग गई होतीं तो किस्मत वैसी होती.'
'काहे मजाक करतिउ बहू ?'
उसे कैसे समझाऊं कि मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ .लेकिन वह इन सब बातों को नहीं समझती .उसे लगता है सब उस पर हँसेंगे ,उसका मज़ाक उड़ायेंगे .उसका चेहरा बड़ा दयनीय, बड़ा निरीह हो उठा है .
**
आज मेरा जन्मदिन है.मनाती तो नहीं पर इन लोगों ने पिक्चर का प्रोग्राम बनाया है .इन्होंने मुझे पिंक कलर की साड़ी गिफ़्ट की है .
तैयार होकर आँगन में निकलती हूँ .महरी चाह-भरी निगाहों से मेरी साड़ी की ओर देख रही है .
'बड़ा नीक रंग है .'
अच्छा लगा तुम्हें ?'
'हाँ बहुत नीक है .हमार लै भी आई रहे ऐसई रंग की चुनरी .'
'कौन लाया था पप्पू के बप्पा ?'
वह बिगड़ उठी ,'ऊ हरामजादा का लाई ?कबहूँ एक नई धोती लाय के पहिराई है ?हम तो चउका-बरतन करि के आप लोगन से माँग-जाँच के तन ढाकित हैं .'
'फिर कौन लाया तुम्हारी पसन्द की चुनरी ?'
'हमार परसंद ते का होत है ?हमार बप्पा चिंदी-चिंदी करि के मुँह पे फेंक मारिन .हम का एकौ बार तन से छुआय पायेन ?'
कौन लाया होगा मैं सोच रही हूँ - भाई अपनी बहिन के लिये लाता तो बाप क्यों फाड़ के फेंक देता ?माँ भी नहीं लाई होगी ,बाप के लाने का सवाल ही नहीं उठता .
जो लाया उसे बाप पसंद नहीं करता था .
तब से फूलमती ने शादी के अलावा नये कपड़े ही कहाँ पहने ,गुलाबी रंग की तो बात ही दूर की है .
फूलमती की आँखों का मोह भरा सपना टूट गया है - हमेशा के लिये .उसके बाप ने गुलाबी चूनर की धज्जियाँ उड़ा दी हैं .पर जाने क्यों मुझे लगता है उसकी भटकती दृष्टि अब भी वही रंग खोज रही है .
मुझे याद आ रहा है कुछ दिन पहले पड़ोस के घर में शादी हुई थी .हमलोग बाहर बारात देख रहे थे .महरी पहले तो रोशनी और बाजे-गाजे देख खुश होती रही पर जब दूल्हा देखा तो चुप हो गई .फिर अन्दर जाकर बड़बड़ाने लगी थी ,'अईस सोने की मूरत अस लौंडिया और दुलहा जइस बबूर !गालन पे चकत्ता अउर माता के दाग .'
'तो क्या हुआ पैसा तो खूब है उनके पास ,लड़की का बाप भी नहीं है भाई लोग कर रहे हैं .'
'जोड़ ना मिली तो जिनगी भर लरकिनी के मन माँ काँटा अस चुभत रही .ऊ कहे चाहे न कहे .'
मैं अवाक् उसका चेहरा देखती रह जाती हूँ !'
**
रामू की दुलहिन अपने मैके में बीमार पड़ी है .उसकी अम्माँ कहती हैं ,'समधिन देखन नहीं आईं .'
हमका कहाँ फुरसत है बहू,जौन घंटा भर हुअन जाय के बैठी .'
'क्या बीमार पड़ गई ?'
'दुद्दुइ घरन के बियाह मां रात दिन बत्त्तन माँजिन है , फिन अढ़ाई सेर आटा की रोटी इह जून पोई ,अढ़ाई की उह जून -छोटी-छोटी पतरी-पतरी .तौन बीमार हुइ गई .उनहिन का पीछे तो ...हम का करी?जेह केर अम्माँ ने पइसा वसूल किहिन ओही दवा करी .
कउन आपुन कमाई हमाये हाथ में धर दिहिन .
'हमार हियन रही तौन ऊ खाली रोटी सेंकि लेत रही ,बत्तन हम कबहूँ मँजवावा नाहीं रहे .नई बहुरिया रहे तौन ....'
'ये तो बुरी बात है ,बहू तुम्हारी और काम का पैसा लें वे लोग .'
उसने बताया ,'रामू की सास कहती है ,' उन केर बिटिया होय तौन बिटिया की कदर जानें .हम नाहीं भिजिबे .
महरी के कोई लड़की नहीं है न !
' ऊ आवा चाहित है पन ऊ लरकिनी केर मन नाहीं देखित हैं .'
वह बताती है -
दुइ बिटियाँ मर गईं तब रामू भे .बड़ी मुसकिल उठाई रही .जब ई भवा तो सनकै ना ,सब मार घबराय गये बहू .फिर दाई इह केर हिलावा-डुलावा ,पीठ पे थप्पड़ मारेन ,तब ई रोवा . फिन हम कान छिदाय दहिन .'
नहीं भेजेगी रामू की सास अपनी लड़की को तो महरी क्या कर लेगी ?पप्पू के ससुर ने अपनी सड़की डेढ़ साल से नहीं भेजी तो क्या कर लिया इसने ?वे पैसेवाले हैं तभी इतना गुमान है . पर पप्पू को कुछ नहीं देते ,सीधे मुँह बात भी नहीं करते .लड़की काली है और खूब तंदुरुस्त .वे तो कहते हैं नहीं जायगी ससुराल ,न होगा दूसरा व्याह कर देंगे ..बड़े जबर हैं लड़कियों के बाप !
ऊँह, होते रहे अपन को क्या ?अपना ते बस काम चलता रहे .पर फिर तरस आ जाता है .कोई ढंग की मिलती भी तो नहीं . यह ईमानदार भी बहुत है .
चो-तीन बार आटा गूंदते पर अँगूठी चौके में रख कर भूल गई ,उठा ले जाती तो क्या कर लेती मैं उसका ?आटा सनी अँगूठी . चूहे खींच कर ले गये होंगे यही लगता !चौके में कोई देखनेवाला था भी नहीं .
पर उसने छुई तक नहीं आवाज़ लगा कर बोली ,'ई आटा सनी तोहार अँगूठी धरी है का ?मूस उठाय लै जाई तौन हमार नाम आई .'
हाथ जोड़ कर सिर तक ले जाती है वह ,कहती है ,'माँग के लै लेई बहू ,चोरी करि के पाप न चढ़ावे .ऊ जलम का भुगतान तौन ई जलम में करित हैं ,और अवगुन करी तौ आगिल जलम नसाय जाई .'
औगुन-गुन की परिभाषा उसकी अपनी है .मेरा दखल तो वहाँ भी नहीं चलेगा .
पिछली महरी तो बड़ी चोर थी .हमेशा कुछ-न-कुछ माँगती रहती थी -कभी रोटी दे दो पानी पीना है ,कभी मिर्चें देदो कभी प्याज.चाय पीने तो रोज ही बैठी रहती थी .बच्चों के कपड़े भी हमेशा चाहियें.ऐसी महरी थी कि दो नये पेटीकोट आँगन से गायब कर दिये और अफनी लड़की को दे आई .एक तो मैंने पहचान भी लिया -वही लेस लगी थी जो मैंने जोड़ कर सिली थी .पर उसकी ब्याही लड़की से रहती भी क्या ?और लट्ठे के पेटीकोट में कोई पहचान मानेगा ही क्यों ?
जब से ये आई है ,सुई तक गायब नहीं हुई . अपने काम से काम .हाँ, मुँह से बड़बड़ करती रहती है .मन हुआ तो हाँ हूँ कर देती हूँ नहीं तो चुपचाप किताब पढ़ती रहती हूँ . इसके साथ बच्चों का झंझट नहीं और लालच बिल्कुल नहीं है इसमें .तभी तो निभाये जा रही हूँ .
और वह कहती क्या है ?
'बहू,तुम्हार आँखिन से अइस लागत है के मन की बात पढ़ि लेत हौ .तुम से हम कुछू छिपाय नाहीं सकित हैं .'
कसम भी दिला जाती है 'तुम्हार सामुहै हमका जाने का हुइ जात है जौन सब बकि देत हैं .मुला तुमका कसम भगवान की जौन किसउ के आगे कह्यो .'
एक बार यों ही मैंने पूछा ,'किसना तुम्हारे लिये क्या-क्या लाता था ?'
बुढ़िया मुस्करा दी .चेहरे पर अपूर्व माधुर्य छलक उठा .
'का फायदा बहू ,ई जलम तोन गवा ,ऊ जलम काहे बिगारी ?'
बेवकूफट हो तुम !पहुँच में आये हुये से हाथ खींच कर अपना यह जन्म तुमने खुद बिगाडा .अब अगला नहीं बिगड़ेगा ,इसकी गारंटी दी है क्या किसी ने ?
लेकिन उससे ऐसा कुछ कहना बेकार है . वह समझेगी नहीं .
शादी के बाद उसका आदमी इसे लेकर यहाँ चला आया . फिर इसे मायके नहीं जाने दिया .चार बच्चे हो गये तब गई थी बाप के मरे पर. दस साल में कितना बदल गये था गाँव ,गाँव के लोग !
वह कहती है ,'अब हुआँ जाय के का करी ? न बाप रहे ,न संग-साथ को लोग .हमारे लै तो गाँव उजड़िगा .'
आदमी ने कसम धरा दी थी कभी किसना से बात भी करे तो बाप-भाई ,आदमी सबका मरा मुँह देखै क मिलै !'
छःबरस बाद जब दो बच्चों की माँ बन गई तब गाँव जाने का हठ पकड़ा था इसने .पर नहीं जाने दिया ,माँ मर गई तब भी नहीं .
गई तब जब बाप भी मर गया तब भी आदमी के शब्द थे ,'जौन किसना की सकल भी देखी तौन चारों लरिकन और हमती लहास तोहरे सामने एक ही दिन में उठ जाये !'
जाने क्या-क्या कसमें दिलाईं थीं उसने फुलमतिया को .वह लाचार हो गई थी -गाँव गई और वह मिल गया तो ?...एकदम सामने ही पड़ गया तो !
'फिर मिला था कभी ?'
नहीं फिर कभी नहीं मिला ,फुलमतिया की शादी के बाद कहीं चला गया था वह .
'नेपाल गवा होई ' इसका अन्दाज है ,' हुअन जान की हमेस कहचत रहा .अच्छा भवा जौन नहीं मिला ....'
क्या सात फेरे घुमा देने से और कसमें धरा देने से मन भी बस में हो जाता है ?
इसने कुछ सुख दिया होता ,कुछ मन पूरा किया होता तो शायद उसे भूल गई होती .पर यहाँ मिलते हैं हमेशा किसना के नाम के ताने --भूले भी कैसे उसे ?
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कभी-कभी मैंने देखा है,कही हुई बात सुनाई नहीं दे रही उसे , ऐसी गुम-सुम बैठी रहती है .
पूछती हूँ ,'क्या आज बुढ़ऊ से झगड़ा हो गया ?'
' इत्ती-इत्ती-सी बात पर हरामजादा ताना मारत है --कहत है जौन किसना होत तौन तन-मन से सेव करती .हमका कऊन पूछित है ?'
हम कबहूँ छिपाव नाहीं कियेन बहू,किसना कहाँ होई कइस होई हमारा ऊ से कौनो मतबल नाहीं .मुला ई दईमारा विसवास न करी .'
'बाबू लोगन से आँखी लड़ाये बिना चैन नहीं पड़ता सुसरी को ,'उसका आदमी उससे कहता है .
जब वह जवान थी उसका घर से निकलना आदमी को अच्छा नहीं लगता था .पर उसकी यह बात फूलमती ने नहीं मानी .
'घर माँ घुसे-घुसे तो हमार जी घबरात है ,थोरा बाह-भीतर तो होय का चही .'
गाँव की उन्मुक्त हवा में पली लड़की शहर के कमरे मे बंद होकर जियेगी कैसे ?
तभी वह कहती है ,'थोरा तुम पंचै से बतियाय लेइत है जी और हुई जात है .पइसा-कौड़ी का सहारा हुइ जात है .घर माँ बंद हुइ के मर जाई का ?'
'हम कमाइत हैं तौन आपुन ऊपर तो खरिच नाहीं लेइत ,उनहिन का पूरा करत है .पर ऊ दईमारा कबहूँ ना समझी .'
हज़ार विरोध के बाद भी वह उसे काम करने से नहीं रोक सका
वह चिल्ला-चिल्ला कर कहती थी ' कौनो ऐब करा होय तो सबका सामने बताय देओ .हम काम काहे न करी ?'

पहले कभी-कभी उसके काम वाले घरों में चक्कर भी लगा आता था .अब बंद कर दिया है . सोचता होगा बूढी हो गई है . पर उलाहना देने से फिर भी नहीं चूकता .
कभी-कभी उसकी आप बीती सुनी नहीं जाती तो उठ कर चली जाती हूँ .
कुछ देर पहले तुलसी के चौरे में जो दिया जलाया था उसका घी चुक गया है .एक धुँधुआती हुई बाती सुलग रही है ..जरा देर में यह रुई में चमकती चिंगारी धुय़ें की गहरी लकीर छोड़ कर विलीन हो जायगी .
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ये अच्छी रही ! हारी-बीमारी में काम करने तो कोई न आये ,कपड़े सबको चाहियें .सब के सब कमाते हैं पर सब खा-उड़ा डालते हैं - कभी माँस ,कभी मछली कभी और कुछ .और फिर जैसे के तस !
अब फिर मुझसे कमीज़ माँग रही है ,बुढऊ के लिये .मैं जानती हूँ ,उसी ने कहा होगा ,'साली अपने लिये माँग लाती है ,और किसउ की चिन्ता नहीं .'
वैसे तो दे भी दूँ पर यह सब सुन कर देने की इच्छा खतम हो जाती है .
उस दिन कह रही ती ,'बहू,दस रुपैया चाही .'
मैं कुछ नहीं बोली .कठोर मुद्रा देख कर चुप हो गई.
कुछ देर में बोली ,'दस नाहीं तो पाँचै मिल जाय.'
'काहे के लिये ?'
'बुढ़ऊ बीमार पड़े हैं .तवा अइस तचि रहे हैं बहू . दवा-दारू कइस करी ?'
श्यामू ,पप्पू ,और खुद बुढ़ऊ ,सब कहीं न कहीं काम करते हैं ,पर उधार देने के लिये हूँ सिर्फ़ मैं ! कोई महीना ऐसा नहीं जाता जब उधार न माँगती हो ,और फिर भी दो - चार दिन काम पर नहीं आती .
'क्यों ? सभी तो कमा रहे हैं ,तुम्हीं क्यों उधार माँगती हो ?'
वह बताती है ,' बुढ़ऊ तो हफ्ते भर से काम पर नहीं गये .पप्पू ने कमीज़ का कपड़ा खरीद लिया और श्यामू घर में रोज़ दो रुपये देता है बस !'
मैं खिसिया उठती हूँ .ये तो बेवकूफ़ है ही और मुझे भी उल्लू बना रखा है .'
वह गिड़गिड़ाने लगी 'बहुत कमजोर हुई गये हैं .तीन दिन हुइ गवा अन्न का दाना मुँह में नहीं डालेन बहू ,.चहा पी-पी के चेहरा उतरि गवा है .रुपैया मिल जाय तो डबलरोटी मुसम्मी के साथ खबइबे .मुला ताकत न होय तो मिल में काम कइस करी ?'
हार कर मैं दस रुपये लाकर पटक देती हूँ
'और किसी को फ़िकर नहीं तो तुम्ही क्यों मरी जाती हो ?'
'हमार मन नहीं मानत है, का करी !'
'जब कोई हारी-बीमारी में भी तुम्हारी नहीं सोचता ,तो तुम्हें भी क्या करना ?'
'नहीं बहू ,सब हमार है .हमार मनई ,हमार लरिका .हम मर जाई तौन हमारी मिट्टी कउन ठिकाने लगाई .'
मरने के बाद ठिकाने लगने के लिये ही जिन्दगी के सरंजाम किये हैं तुमने ! सिर्फ़ उसी दिन की प्रतीक्षा में संबंधों को निभाया है .यही इनकी सार्थकता है तो इतने लंबे जीवन का तात्पर्य क्या ? लेकिन उसका दिमाग इन उलझनों से परे है .
मैं चुप हूँ .चुपचाप चाय बनाती हूँ ,उसे भी देती हूँ .हम दोनों चाय पी रही हैं.वह चौके में पट्टे पर मैं कमरे में पलँग पर .
उदास-सी चुप्पी हमलोगों के बीच पसर गई है .
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