बुधवार, 5 जनवरी 2011

उपन्यासांश -1.

*
प्रकृति की रचना का कितना सुन्दर दृष्य है -भाई-बहिन का जोड़ा !निर्मल हास से प्रकाशित दो अनुरूप चेहरे जिनमे कहीं कुछ आरोपित नहीं ,सहज-स्वाभाविक ।समाज ने नहीं निसर्ग ने जोडा है इन्हें।दुनिया की कुरूपताओं और विकृतियों से बेख़बर ,निश्चिन्त । माता- पिता- पुत्र,पति -पत्नी भाई-भाई सबके संबंधों पर कवियों की लेखनी चली है पर भाई-बहिन के संबंध की सहजता और सुन्दरता पर किसी कवि की उक्तियाँ याद नहीं आ रहीं तरल को ।


उस कोठी के मालिक ने पीछे की तरफ कई कोठरियाँ बनवा दी हैं ,एक मे महरी दूसरे मे माली और तीसरे मे एक रिक्शेवाला रहता है ।कोठी के मालिक और अडोस-पडोस के घरों में काम करते हैं ये लोग !नाटू रिक्शेवाला अधिकतर अकेला ही रहता है ।दिन भर रिक्शा चलाता है ,रात गये आता है तब उसकी कोठरी से खाँसने की आवाज सुनाई देती रहती है तरु को ।एकाद बार तरु को बैठा कर लाया है तब से पहचानने लगी है वह । गाँव में रह रहे अपने घर-परिवार के पास दो-तीन महीनों में चक्कर लगा आता है ।

महरी के दो बच्चे ब्रजमती और कन्हैया झिंझरीवाली ईंटों की दीवार पर चढ कर इधर ही झाँक रहे हैं ।ब्रजमती के रूखे भूरे बाल उसके साँवले-सलोने चेहरे के चारों ओर बिखरे हैं और आँखों मे काजल है-एक मे खूब गहरा ,दूसरी मे हल्का ।महरी के चारो बच्चे साँवले हैं पर सबसे अच्छी लगती है ये ब्रजमती ,खूब सुडौल नाक-नक्श और चेहरे पर भोलापन ,खूब सौम्य।तरु को देखते ही जाने क्यों काँशस हो कर झेंप जाती है और हल्के से मुस्करा देती है । पर कन्हैया उतना ही जंगली है ।चलेगा तो रास्ते के कंकडों को ठोकर मार -मार कर उछालता हुआ।साथ के लडकों से उसकी लडाई भी बहुत होती है ।अब तो किसी ठेलेवाले के साथ काम करने लगा है ,बडा चालाक हो गया है ।हमेशा कुछ-न-कुछ बोलता रहेगा । ब्रजमती तीसरे नंबर पर है ,उससे पाँच साल छोटी पर बडी शान्त। सबसे छोटी मुनिया बडी रूनी और जिद्दी है ,अक्सर ही जमीन मे लोट-लोट कर रोती रहती है ।और गोद का छोटावाला तो अभी किसी गिनती मे है ही नहीं ।

विवाह की धूमधाम ने कोठी की काया ही पलट दी है । पडोस के परिवार ने शादी के लिये उस कोठी का कुछ भाग महीने भर को किराये पर ले लिया है ।महरी यही है बिरजो की अम्माँ ।महरी की जडें भी गाँव मे ही हैं ,फसल कटने के दिनों मे महरा को छोड कर पूरा परिवार चला जाता है ।

इस कोठी की झाडियाँ रंगीन बल्बों की रोशनी मे चमक रही हैं।रंग-बिरंगी कनातें और पण्डाल ,कालीन और कुर्सियों की कतारें ,साइड मे लॉन से थोडा उधर मेजों पर खाने का प्रबंध -तीन सौ लोगों के खाने की ए-वन व्यवस्था वेज-नानवेज दोनो ।सजे सजाये बैरे ,हर मेज पर खाना गर्म रखने का पूरा इन्तजाम ।लोगों को कॉफी पहुँचाने और खाली कप बटोरने के लिये बैरे इधर उधर घूम रहे हैं ।

गेंदे और मोगरे की झालरों से मंच सजा है ,जयमाल पड चुकी है ।वधू मंच पर रखी सिंहासनाकार कुर्सी पर वर के पास बैठा दी गई है ।दोनो बहुत सज रहे हैं -सबके आकर्षण का केन्द्र।कैमरों की रोशनी बार-बार चमक उठती है ।दीवार के पार चेहरों की संख्या बढ गई है ।लोग खाने की मेजों की ओर बढ़ने लगे हैं ।मिसेज रायज़ादा ,जो मेज़बान घर की बहू हैं तरल से कह रही हैं ,'चलिये न ,खाना खा लीजिये ।"

इतने मे रायज़ादा आगे बढ आये ,' इनसे मिलिये तरल जी ,और ये हैं हमारे परम मित्र असित वर्मा ।'

दोनो के हाथ जुडते हैं ।

'आपको कहीं देखा है !'

'हाँ जरूर देखा होगा ।इसी शहर में रहती हूँ ।'तरल आगे बढ गई ।प्लेट हाथ मे उठाये किसी की पुकार सुन पीछे घूमी ,पता नहीं किसे बुलाया वह खाना परसने लगी ।

ट्रेन की घटना उसके ध्यान में फिर से आ गई ।स्लीपर मे अपनी सीट ढूँते समय अटैची किसी से टकरा गई थी । तेज सी आवाज आई -

'अभी हड्डी टूट जाती तो ..?'

'वह अचकचा कर देखने लगी ,'वेरी सॉरी !'

'हुँह, सॉरी !हमसे कुछ हो जाता तो आसमान सिर पर उठा लिया जाता ।और खुद ऐसे अंधाधुन्ध चलती हैं आगा-पीछा देखे बिना ।'

'देखिये बिगडिये मत ।ऐसा ही है आप मेरे पाँव पर अटैची पटक कर बदला ले लीजिये ,'वह रुक कर खडी हो गई ।

'जाइये,जाइये ,बस बहुत हो गया ।'

कह रहा है कहीं देखा है !देखा क्यों नहीं होगा !ट्रेन की बदमज़गी क्या इतनी जल्दी भूली जा सकती है!

'इन्तजार करेंगी तो करती ही रह जायेंगी ,आगे बढ चलिये ।'पास मे खडी एक सौम्य सी तरुणी ने तरल को आगे बढा दिया ।

'अरे असित दा ,आप यहाँ कहाँ से ?'

'सुमी तुम ?अकेली हो या वो भी हैं ?'

'आये हैं वो उधर ।'

तरु ने आगे बढ कर परसना शुरू किया ,और अपनी प्लेट लेकर साइड मे जाकर खडी हो गई ।अचानक उसकी निगाह दीवार के पार जा पडी ।एक साथ कई जोडी आँखें खाने की प्लेटों पर लगी हैं ।तरु का चम्मच पुलाव की ओर बढ रहा है ,शेरू की आँखों मे चमक आ गई है ,ब्रजमती और कन्हैया भी इधर ही देक रहे हैं । मेहमान चल फिर कर खाना खा रहे हैं बच्चों की और किसी का ध्यान नहीं है।

'अरे आप ये कोफ्ते लीजिये ,'किसी ने चमचा भर कोफ्ते उसकी प्लेट मे डाल दिये ।रसा बह-बह कह हलुये और सूखी सब्जी मे समाया जा रहा है ,घी उतराते शोरबे से सब कुछ सन गया है ।तरु को लग रहा है दीवाल पार से बच्चों की निगाहें खाने पर लगी हुई हैं ।सारी प्लेट कोफ्ते के चिकनाई भरे रसे मे डूबी है।।मुँह मे कौर रखना मुश्किल हो गया है ।

'अरे आप खाइये न।'

ढेर सा खाना सामने रखा है ,खाने की पूरी छूट है फिर बार-बार कहने की क्या जरूरत है !तरु को खीझ लग रही है पता नहीं लोग अपनी पसंद की चीजें दूसरों की प्लेटों मे क्यों भर देते हैं !

पास ही सुमी खडी है ।उसने सिर उठा कर तरु की ओर देखा ,'अपने हिसाब से अपने आप लेना अच्छा रहता है ।कोई परस न दे इसीलिये प्लेट लेकर मै दूसरी तरप खिसक गई ।"

दोनो की आँखें चार हुईं -यह कैसे मेरे मन की बात समझ गई तरल ने सोचा वह भी उसी ओर बढ गई ।

घी से तर शोरबे मे डूबी कोई चीज वह खा नहीं पायेगी ,एकाध कचौरी खाकर प्लेट को यों ही नीये रख देगी तरल ।और लोगों की प्लेटों मे भी आग्रहपूर्क जो डाला जा रहा है उसमे से भी बहुत सा वैसे ही फिंक जायेगा ,कुर्सी पर भरी प्लेटें लिये बैठे बच्चे थोडा खायेंगे और बहुत छोडेंगे ..और वे लोग दीवार के पार से देखते रहेंगे ।

'छोले मे थोडी चटनी और प्याज मिलाओ तो मजेदार लगेंगे ,दो बच्चे बातें कर रहे हैं ।दोनो उठे और अपनी-अपनी प्लेट लेकर मेज की ओर बढ गये ।दीवार के पार से आवाज आई ,'छोले हैं ,दहीबडे ,कचौडी ,पुलान...,'

'और चटनी भी ,'कन्हैया की आवाज ।

तरु को लगा उधर खडे बच्चे मुँह चला रहे हैं ।डेढ हाथ की दूरी पर दीवार के पार से शेरू ,कन्हैया ,ब्रजमती और दो और बच्चे सब देख रहे हैं ,मेज पर रखेी सामगरी ,को ,खाते हुये लोगों को ,और बर्बाद होते खाने को भी देख रहे हैं ।इस जगमगाती रोशनी मे सब साफ़ दिखायी दे रहा है ,बार-बार उनके मुँह चलने लगते हैं ।

महरी बीमार है छोटे बच्चे को लेकर कब की सो गई ।जब तरु इधर आ रही थी ,उसका छोटा बच्चा रो रहा था ब्रजमती कह रही थी ,'अम्माँ ,जे अऊर दूध माँगत है ।'

'अरे दुलाई मे दुबकाय के थपक दे ,भरक के अभै सोय जाई ।'

बडी देर तक बच्चा रिरियाता रहा था और महरी ब्रजमती को डाँट रही थी ,'धियान तो खेल मे लगा है ,नेक चुपाय नाहीं लेत है ।'



'भूखा है अम्माँ ,हमाल कपडन पे मुँह मार रहा है ।'

आग लगी है ओहिका पेट मे ।कहाँ से दूध लाई भर-भर के ?'

महरी बीमार है दूध उतरता नहीं ।बच्चा परेशान करता है तो गुस्सा उतरता है ब्रजमती पर ।

मिसेज कपूर साथ खडी महिला से कह रही हैं ,'बाबा रे बाबा ,हमारा बेटा तो मुश्किल कर देता है ।एक दिन पेपरवाला नहीं आया और ङी आसक्ड मी अ थाउजेन्ड क्वेश्चन्स ।हमें तो एक ही काफी है .वी कान्ट अफोर्ड अनदर।'

दूसरी बोली ,'बच्चे पैदा करना और पालना कोई आसान काम है ?हम तो इन दो में ही भर पाये भइया. उन्हे सम्हालते-सम्हालते रो देते हैं ।नौकर है,आया है फिर भी फुर्सत नहीं मिलती ।'

'पता नहीं लोग तीन-तीन चार-चार कैसे मैनेज कर लेते है ।'

'अरे आप ताज्जुब करेंगी ,हमारी कामवाली के छः हो चुके हैं और फिर फूली घूम रही है ,बिल्कुल तन्दुरुस्त।'

'लाइक वाइल्ड ग्रोथ ।,'मिसेज कपूर के शब्द थे ,'इन लोगों के हो भी जाते हैं पल भी जाते हैं ।नखाने को ,न पहनने को जाडे मे नंगे घूमते हैं ,फिर भी बीमार नहीं पडते ।' 'अरे कुछ पूछो मत ।हर साल एक पैदा कर के भी जस की तस धरी रहती हैं ।यहाँ तो पैदा करना मुश्किल और पालना तो और भी ..कुछ पूछो मत ।'

'यहाँ तो एक पैदा करके ही ढोलक सा पेट हो गया ,हुआ भी ऑपरेशन से ।अपनी तो अब हिम्मत नहीं ।'

मिसेज कपूर ने तीस की हो जाने के बाद शादी की है ।एक ही लडका वह भी सिजेरियन से ,बोलीं ,'हमे तो एक ही पालना मुश्किल है लोग जाने कैसे एफोर्ड कर लेते हैं ।आई वंडर ङऊ डू दे मैनेज ।'

'और बडी आसानी से इनके पैदा भी हो जाते हैं ,न तकलीफ़ ,न कोई खर्चा !बाबा रे बाबा, हमें तो देख कर ताज्जुब लगता है ।एक ही कुठरिया उसी मे बच्चे पैदा होते हैं ,,मरते हैं ,पलते हैं ।जिन्दगी के सारे काम उसी जगह मे ।ङऊ हॉरिबल!'वे सिर हिला कर काँपने का अभिनय करती हैं ।

यहाँ जितनी भी औरतें हैं उनने बच्चा पैदा करने में बडी तकलीफें उठाई हैं ।वैसे सब सुविधायें हैं उनके पास,नौकर ,वाहन ,बँगला ,फ्रिज .टीवी ।और ये महरी मालिन जो पैदा करनेऔर पालने मे माहिर हो गई हैं ,इनके अपने आप पैदा होते हैं ,बडे हो जाते हैं जैसे उन्हें किसी चीज कीअपेक्षा नहीं ।इतनी आसानी से जन्मते हैं जैसे धरती की कोख से अँकुर ।
*

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

पीला गुलाब - 3.

ससुराल में ननदें आईं उतारने .


एक ने ठिठोली की ,' वाह !चार साल पहले आनेवाली थीं ,अब आईं हैं आप ?'

दूसरी बोली ,'आना तो यहीं पड़ा न इसी घर में ?चलो अच्छा है पहले बड़ी बन कर आतीं अब छोटी बन कर आई हैं .'

एक लड़की बोली ,'क्या इनकी शादी चार साल पहले से तय थी ?''

ननद बोली ,तय क्या ?बरात तक चली गई थी इन्हें लेने ,तब.बड़के दादा के लिये .'

' बड़के दादा के साथ ?अच्छा !'

,'अरे ,बक-बक बंद करो अपनी ,और ले जाओ इन्हें अंदर ,' सामान उतरवाते बड़के दादा बोले।

*
परछन की तैयारियाँ हो रही हैं .अभी बहू को बाहर ही रोक कर रखना ,' जिठानी ने दरवाज़े पर आकर कहा .

पड़ोस के बाहरी कमरे में बहू के बैठने का इन्तज़ाम कर दिया गया.

' रातभर का सफ़र करके आई है बिचारी ।तनिक फ़्रेश होले ।चाय वगैरा वहीं पहुँचा देना .'

जिठानी ,बड़ी ठसकेदार ऊपर से कर्नल की बीवी .उनका कहा कोई टाल नहीं सकता .सारा प्रबंध उन्हीं को करना था .

बहू तैयार हो गई .

अरे ,अब छुटके दादा कहाँ ग़ायब हो गये ?

'शिब्बू ,पहले ही घर में घुस गये .नहाय रहे हैंगे .'

' अकेले घर में घुसने किसने दया उन्हें ?निकालो जल्दी बाहर .अब तो दुलहिन के साथ ही गृह-प्रवेश होगा .'

परछन के बाद मुँह-दिखाई होने लगी .किसने क्या दिया ,रुपया ज़ेवर सबका हिसाब रख रहीं थी पास बैठी बड़ी बहू .सब उठा-उठा कर चेक करती लिखती जा रही थी .बड़ा लंबी लिस्ट थी.

'पूछ तो सबका रही हैं ,आप क्या दे रही हैं बड़ी भाभी ?'

'मैने तो अपना देवर ही दे दिया .'

'हुँह ,ये भी कोई बात हुई ?'

देख लो ,लिखा है सबसे पहले .'

झाँक कर देखा - मिसेज़ अभिमन्यु के नाम पर लिखे हैं हीरे के टॉप्स ।मिसेज़ अभिमन्यु माने कर्नल साहब की पत्नी .

अगले दिन बात उठी सब रिश्तेदारों से बहू का परिचय करवा दो -पता नही कौन कब चल जाय .

परिचय अर्थात् खीर खिलाई .बहू अपने हाथों बनाई खीर परस-परस कर सबको देगी ,उनके पास जाकर जैसे ननदोई से ,'जीजा जी लीजिये .'कह कर चरण स्पर्श करती .

और वे खीर लेकर उसे कुछ भेंट देंगे .

'अरे इतनी सी खीर ?भई बड़ी मँहगी पड़ी .'

उसे भेंट या रुपये पकड़ा देते .वह सिर झुकाये झिझकते हुये ले कर साथ परिचय देती चल रही ननद को पकड़ा देती .

'ये तुम्हारे ससुर जी हैं ?क्या कहोगी पापा जी या बाबूजी ?'

'जो सब कहते हैं वही तो कहेगी ,'जिठानी बोलीं .

'बाबूजी' कह कर उसने पाँव छुये .
उन्होंने सिर पर हाथ रखा ,'आज को तुम्हारी सास होतीं तो ...'

'अरे बाबू जी ,' अम्माँ नहीं हैं तो क्या बहू बड़ी आदर्शवादी है .कुछ कहने समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी .'

उन्होंने एक जोड़ कंगन पकड़ा दिये .'तुम्हारी सास ने दोनो बहुओं के लिये एक से बनवाये थे .'

उसने झुक कर दोनों हाथों से विधिपूर्वक चरण छू कर माथे से लगाये .

ये ताऊ जी ,ये चाचा जी -ये जीजाजी , बरेलीवाले जे ,ताऊ जी के मँझले बेटे .'

अरे ,नाम बताओ ।ऐसे कैसे याद रखेगी ?'

'हाँ इनका नाम सुरेन्द्र बहादुर .क्यों लल्ला जी ,क्या बहादुरी दिखाई आपने
.'

कहाँ भौजी ,बहादुरी दिखाने का ठेका तो कर्नल साहब का है .हम तो आपके सामने कलेजा थाम कर रह जाते हैं .'

ज़ोरदार ठहाका .

लोग छँटते जा रहे हैं .

काहे भौजी , कंडैल साहब को कहाँ दुकाय दिया ?कंजूस कहीं के ..'

'काहे गँवारन की तरह कंडैल-कंडैल कहते हो .?नई बहू तुम्हें अपढ समझेगी .'

'समझन देओ .बस तुम हमे समझती रहो ,हम उसई में खुस .'

''ये तुम्हारे जेठ प्रिन्सिपल हैं ,अपढ-गँवार मत समझ लेना तुम्हें भी पढ़ा देंगे !.
।'

'चलो मनुआ हो !कहाँ खिसक लिये ?बड़े कंजूस आदमी हो भाई "' उन्होंने आवाज़ लगाई .

उसने सोचा था कर्नल साहब को अभि कहा जाता होगा पर घर उनका घर का नाम मनू है .



'हम तो आही रहे थे .'

'लल्ला जी वो खिसके नहीं थे माल लेने गये होंगे .'

' उन्हीं की ओरी लेंगी न!'

देख लो भाभी ,पहले तुम्हारी जगह यही आने वाली थीं .'

'तो हमने कौन रोक दिया था देवर जी !काहे नहीं आ गईं ?

' लिखी तो शिब्बू के नाम रहीं उन्हें कइस मिल जातीं ,' किसी बड़ी-बूझी की आवाज़ थी ,'तभी न दरवाजे से बरात लौट आई .'

'क्या बेकार की बातें लगा रखी हैं ' कर्नल साहब ने चुप कर दिया सबको .

'उन्हें ये सब बातें अच्छी नहीं लगतीं ,' जिठानी बोलीं ' क्या फ़ायदा ?जो हो गया खतम करो .'

खीर भरी कटोरी बहू के हाथ में पकड़ाती छोटी ननद बोली ,'तो भाभी ,अपने जेठ के पाँव छुओ कहो जेठ जी !'

'जेठजी कौन कहता है ?भाई साहब कहो ,नहीं तो दादा जी ...',जिठानी का सुझाव था .

सिर झुकाये ही खीर की कटोरी उसने उनके हाथ में पकड़ाई ,और झुक गई पांवों पर.कर्नल साहब ज्यों के त्यों सन्न से खड़े रह गये .

'अरे ,उसे खीर खिलाई तो दो ,'जिठानी ने टोका तो वास्तविक जगत में आये ।पत्नी ने जो हाथ में पकड़ा दिया लेकर उसकी ओर बढ़ा दिया और घूम कर चल दिये .लौटते-लौटते जेब से रूमाल निकाल कर पाँवों पर टपके दो बूँद आँसू उन्होंने धीरे से पोंछ दिये .

पीछे से आवाज़ आ रही थी ,'क्या दिया बड़के दादा ने ?

' जड़ाऊ पेन्डेन्ट.'

' वाह !'

आँसुओं से धुँधला गई आँखों से वह कुछ देख नहीं पा रही थी .

घूँघट से कितनी सुविधा हो जाती है.

*


!****

रविवार, 14 नवंबर 2010

पीला गुलाब - 2.

*
चार साल बीत गए.

उस दिन शृंगार किए बैठी रह गई थी ,आज फिर विवाह-मंडप में -किसी दूसरे के लिए .

वस्त्राभूषण का चढ़ावा सम्हालती भाभी रुचि को लिवा ले गईं.
कर्नल साहब फिर सोने नहीं गए .
वहीं साइड में पड़े काउच पर बैठ गए .किसी से कुछ बात-चीत नहीं .वैसे भी उनके  व्यक्तित्व से सब रौब खाते हैं .

दोनों पक्षों की हँसी ठिठोली चलती रही .उनके संयत गंभीर व्यक्तित्व के सामन किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि कुछ कहे .उन्होंने ने सूट की जेब से सिगरेट केस निकाल कर एक सिगरेट निकाली .छोटे बहनोई ने लाइटर से जला दी .वे चुपचाप शून्य में ताकते बैठे सिगरेट पीते रहे । ख़त्म होते ही दूसरी जला ली .

वर को लाकर बिठाया गया .रस्में पूरी की जाती रहीं . कन्या के पिता कन्या के भाई ,सबकी पुकार लगती रही ।सब आ-आ कर अपना रोल निभाते रहे .

'कन्या को बुलाइये .'

कन्या की सखियाँ उसे मंडप में ले आईं .

उन्होंने तीसरी सिगरेट जला ली थी .

'नहीं अभी कन्या वामांग में नहीं ,दाहिनी ओर बिठाइये .

फूल माला जल, अक्षत ,मधुपर्क ,खीलें ,कलावा -

सिगरेटें खत्म होती रहीं ,जलती रहीं .

पाँचवीं सिगरेट !

ट्रे घूमती रही ,कभी कोल्ड-ड्रिंक कभी चाय ,कॉफ़ी .

कर्नल साहब बिना देखे सिर हिला कर मना करते रहे .

इधर -उधर बैठे लोग शादी की मौज में रमे रहे .कन्य-पक्ष की लड़कियों को छेड़ते रहे .

छोटे -बड़े बहनोई अपने साथियों के साथ बैठे हँसी-ठिठोली करते रहे .कन्या-पक्ष की बहुयें और लड़कियाँ हँसती रहीं.

ये सातवीं सिगरेट है .
' हमारे लड़के से तो सब कहलवा लिया पंडिज्जी ,उनसे भी तो कहलवाओ .'

पंडिज्जी मुस्करा दिये -कन्या ज़ोर से कैसे बोलेगी ?'

'क्या पता उनने प्रतिज्ञा की या नहीं एक बार तो हाँ कहला दीजिये .'

'हाँ और क्या धीरे से ही कह दे हम कान लगाये हैं .'

'कह दो बिटिया - हाँ .'

आवाज़ नहीं आई .

'भई ,ये तो गलत है .एक से सब कबुलवाना ,दूसरे से कुछ नहीं ।'

'मौनं स्वीकृति लक्षणम् ',पडित जी ने व्यवस्था दी .

फिर हँसी मज़ाक हुआ .
सातवीं भी जल चुकी .
कन्यादान ,फेरे .दसवीं सिगरेट फुँक चुकी .

अभी रात के सिर्फ. दो बजे हैं .कितन सिगरेटें फूँकीं उन्होने उस रात ,गिनने की फ़ुर्सत किसे ?

*

रिश्तेदारों में वही चर्चा चल रही है .

चार साल पहले भी यही बरात आई थी इसी लड़की के लिए .

कोई कह रहा था -जा रही है उसी घर में ,पर चार साल बाद किसी दूसरे से गाँठ बाँध कर !

' अच्छा !'

'पर हो क्या गया था ?

हुआ क्या था बरात का स्वागत हो चुका था .जयमाल पड़ चुकी थी .पर बारात लौटा दी .

किसने ?

लंबी कहानी है -होता वही है जो किस्मत में लिखा होता है ।जाना उसी घर में था पर बड़े के बजाय छोटे से गाँठ जोड़ कर ।'

कहानी वही सुन्दर पढr-लिखी लड़की -ब्राह्मण परिवार की.किस्मत से संबंध तय हो गया अच्छे घर में,लरिका सेना में बड़ा आफिसर रहे -कोई माँग नहीं.काहे से कि लरिका के मन भाय गई थी.

हवाई जहाज़ से बारात आई .तब तक सब ठीक- ठाक रहै .

पर ऊ फौज के लोग ,उन्हें कहाँ खाने-पीने से परहेज़ .

बोतलें खोल लीं ,बाज़ार से नॉनवेज मँगा लिया मस्ती कर रहे थे.किसी ने जाकर घर की औरतों को फूँक दिया .बस,हल्ला मच गया ,शराबी-कबावी हैं .कैसे गुजर-होगा लड़की का .

शराब की लत में बर्बादी के जाने कितने किस्से याद किए जाने लगे .रोना-धोना मच गया.

और नतीजा ये कि कहला दिया लड़की ब्याह से मना कर रही है .

वो लोग पहले तो कहते रहे लड़की को सामने बुलाओ वो आकर कह दे .हम चुपचाप चले जायेंगे .

पर इन लोगों ने लड़की को सामने लाने से से साफ़ मना कर दिया .

क्या करते बिचारे !दो-दो पेग और चढ़ा लिए ,लौटने की तैयारी करने लगे .

*

*
पर होनी को कुछू और मंजूर रहै .
बड़ेन को   लगा बिना बहू बरात कैसे लौटे ,यहीं रिश्तेदारी में एक लड़की रही बिन माँ-बाप की,अच्छी रहै ,दहेज का भरना कौन भरे सो बियाह नाहीं होय पा रहा था . मामा के पास पली बढ़ी रहे ,उन्हई ने आगे बढके  के ब्याह दी ,उसके तो भाग खुल गए .आई है बरात में कर्नल पति के साथ

और इहका  जब एक धब्बा लगा लग गया.जहाँ जायें बात चलायें सब इहै पूछैं बरात काहे लौट गई? बस इहैं बात अटक जात रही .


चार बरस बाद एक लरिका की खबर मिली  लड़का  मामूली क्लर्क रहे ,वइसे कुल परवार सब दुरुस्त  था .सो का करते कब लौं लरकिनी बैठाए रखते .
बात चलाई ऊ तैयार हुइगे .कहे लाग हाँ,हाँ लरकिनी हमार देखी भई है .ई लरिका सराव छुअत भी नहीं .पक्का बिरहमन .
भवा का कि उहै आरमी ऑफिसर केर छोट भाई रहे .
अउर का !
' हाँ कर्नल साहब का छोटा भाई है ।'
उमर का कितना फ़रक है भाइयों में ?'
'डेढ साल का ।'
'अच्छा !पर जमीन -आसमान का फरक है दोनो में  ।'
'हाँ वो तो हई है ।'
वो थोड़े साँवले लंबे हर चीज़ के शौकीन .और ये रंग थोड़ा साफ़ है पर उनसे बित्ते भर छोटे .घर में बैठे रहेंगे कहीं आने-जाने से भी जी चुरायेंगे .
इसीलिये न खेलने में रहे न पढ़ने में ।इन्टरकॉलेज में पढ़ाने को मिल गया असमे परम संतुष्ट !
महतारी तबैं नाहीं रहीं थीं   ,कोऊ ध्यान न दिहा सो क्वाँरा रहै. उन्हका तो छप्पर फाड़ के मिला    सुन्दर लरकिनी, पढ़ी-लिखी जाने-बूझे घर की .काहे बारात लौटी रही सोऊ सब जान रहे ऊपर से कमाऊ .ई भी तो इन्टरै कालिज में पढ़ाती हैं पिछले तीन साल से .चट्ट हाँ कर दिहिन.
कहाँ कर्नल साहब और कहाँ ई किलर्कवा सब किस्मत की बात .

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-क्रमशः

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गुरुवार, 16 सितंबर 2010

राजा जोगी-

*
हमारे बच्चों को हर ग़लत बात बड़ी जल्दी समझ में आ जाती है और सही बात बिना बहस के गले नहीं उतरती . कही जाना हो तो सफ़र चाहे जितना छोटा हो ,उनका ख़याल है ट्रेन छूटने के बाद पूरियां खाना ज़रूरी  है.
वह कार्यक्रम पूरा होने के बाद के बाद हर पाँच मिनट पर एक पूछता है अब बीकानेर कब आएगा ?'

दूसरी फ़ौरन बोलती है ,'कितनी देर में पहुँचेंगे ?'

अब मुज़फ़्फ़र नगर से बीकानेर ,अभी तो सारी रात बितानी है,इन लोगों से कैसे निपटूँगी !

पर मैxने भी तरकीब निकाल ली है ,तुम डाल-डाल तो हम पात-पात.


बड़े प्यार से समझाती हूँ .'अगर तुम दोनों सो जाओगे तो झट्ट से आ जाएगा ,नहीं तो गाड़ी और देर लगाती .रहेगी .'

और दोनों के दोनों मज़े से सो जाते हैं .
उस दिन भी दोनों खा-पी कर सो चुके थे.

पता नहीं कब एक अंधा भिखारी डब्बे में घुस आया .

गाने लगा ,'भिक्षा दे दे मैया पिंगला ,जोगी खड़ा है द्वार ..

मइया पिंगला ...'

हरियाणा का एक जाट जिसकी कुछ देर पहले एक लड़के से तू-तू मैं-मैं हुई थी .बोल उठा ,' लोग तो बिना बूझे कहते रहवें .वो तो बात ही होर थी .'

सबकी निगाहें उसकी ओर घूम गईं .पास बैठा आदमी ने पूछ ही लिया ,'बात क्या ?वो किस्सा तो सबन को मालुम है .'

'ना जी ना .राजा भरथरी को जो कह्या के विसकी राणी मंतरी से फँसी थी ,यो बात ना थी .जिस खात्तर राजा जोगी बण्या ,वो तो मामला ही होर था .'

सामने बैठे लड़के से रहा नहीं गया ,'क्या? कुछ और बात रही थी क्या ? '

'इब जाण के क्या करोगे ?लोग तो ये ई माणते रहवें .'

'सुणा दो बाबा ,इब तो असली बात सुना ई दो .'

और दो-चार लोगं को उत्सुक देख जाट बाबा ने शुरू किया -'अच्छा सुणों . होया क्या --एक बार राणी पींगला राजा भरथरी को न्हवा री थी ..'

किसी ने विस्मय प्रकट किया -

'राणी न्हवा री थी?'

'अरे न्हवाने को तो बाँदियाँ भतेरी ,राणी तो खड़ी निगरानी करे थी . उबटन-सनान करा के जब बाँदी अंगौछा ले के राजा का बदन सुकावण लगी ,राणी पिंगला की नजर राजा के पेट पे जा पड़ी .देख्या .नजर गड़ा के देखा ,उसकी तो हँसी छूटगी .'

राजा ने पुच्छ्या् ,'राणी क्यों हँसण लग री ?'

'कुछ भी नी ,यूँ ई हँसी आग्गी .'

'नीं,तू कुछ छिपावण लग री म्हारे से .इब तो तू बताई दे .'

वो जित्ता-जित्ता टालती जावे ,राजा पिच्छो पड़ता जावे .तब विसने कही ,'एक बात म्हारा दिमाग में आग्गी तो हँसी छुट पड़ी .'

'एसी कुण सी बात के बतावण में झंझट?'

'पर राणी बोल के ना देवे .

सुसरी बताती भी ना ,राज्जा में मन में कही .फिर खुसामद करण लगा 'अरी बता भी दे भागमान .'

भौत मिन्नत करी तो बोल्ली 'राजा,तुमने कभी सुण्या कि बेटा माँ से ब्या करे ?'

'बावली होग्गी के ?एसा भी कहीँ होवे ?'

राणी फिर चुप .

'ठीक,ठीक बात कर राणी ,तू तो पहेली सी बुझावे .'

'वो बात नी राजा .ये तो मामला ही होर है .तुम तो जिद्द किए जाओ .कोई बात होवे तो बताऊं ,फालतू में..बात .

ये तो बताती भी नीं .

पर राजा कैसा जो कबुलवा न लेवे .

पीछोई पड़ गया ,'कोई बात तो जरूर से ,पर तू बतावण नीं लग री .'

हार के राणी बोली ,'इसका ज्वाब मेरी भैण देगी ,तुम उसके धोरे चले जाओ .'

**

राजा को कल ना पड़ी .वो पौंच गया उसकी भैण के धोरे .

राजघराने की छोरी ,राणी तो होनाई था जी .

खूब खात्तर की विसने अपने भैनोई की .'

सारे डब्बे कान उधऱ ही लगे हुए थे

पति महोदय की किताब एक ओर पड़ी थी.सारा ध्यान कहानी में.

इन्हें लगा मैं ऊँघ रही हूँ,बोले
'बड़ी मज़ेदार कहानी चल रही है ,'

'हाँ सुन रही हूँ .कहने का ढंग भी एकदम ओरिजिनल .'

जाट की बात चल रही है ,'...विससे भी वोई बात पुच्छी राजा नें . बोला थारी भैण ने म्हारे को न्हाते देखा और हँस पड़ी में पुच्छा बताती भी ना .इब तो तूई बता .'

भैन बोली ,'कँवर साब ,कोई बात विसके मूँ से भी ना निकल सके ,तुम समझो . राज-घराने की मरजाद भी तो हुआ करे .'

इब तो चक्कर में पड़ गया राजा, जब तक जाण न लूँगा म्हारे को कल नी पड़ेगा ,दिद्दी. ,'

वो बोल्ली ,'घोड़े चढ़े आए हो थक लिए होगे .कल बात करेंगे राजा .

आज तो न्हाओ खाओ,बिसराम कर लो .फिर तो ...'

बाँदियाँ भेज दीं राजा को न्हवाने को ,असनान होते-होते खुद राणी कोई बहाने से चक्कर लगा गी.



फेर उसणे राजा को कह्या ' सब बताऊंगी राजा सब बताऊंगी ,पर सबर से '

राजा चुप .

फेर वो बोल्ली ,'तुम छे माह बाद आइयो ,जब मेरे छोरा होवेगा , अचानक सीट के किनारे बैठी ऊँघती झटके खाती लड़की को हाथ से रोकता जाट बोला .

...ओ बिब्बी ,अभी जा,पड़ती निच्चे ,इँघे को आजा .'
'हाँ बाबा आगे ..'एक उत्सुक आवाज़ आई .
उसके छोरे की जनम की सुण के राजा फेर पोंच गया
राणी की भैण बोल्ली ,'इब मैं मर जाऊँगी और साहूकार के बेटे के जनमूँगी ,

जब सहूकार की पोत्ती बारा साल की होवे तब थारा ज्वाब मिल जावेगा .'

क्या करता राजा ,चुप लौट लिया .
फेर वो पता करवाता रह्या
,'जाटने उसाँस भरी ,'राणी की भैन का सुरगवास हुआ ,,साहूकार की
बऊ के छोरी जनमी.

 राह देखता रहा ,बारे साल बीते ,राजा फिर पोहोंच गया .

साहूकार की पोत्ती की सादी ,राजा के छोरे से होवण लग री थी .

राजा बाट देखता रह्या .

फिर वो नई बऊ के धोरे गया ,.

बऊ ने कहा ,'राजा ,मेरे मरद का पेट देखो.'

देखा राजा ने -जैसै मस्सा राजा के पेट पे वैसाई मस्सा ,वोई जगे बऊ के मरद के पेट पे .

'इब तो राजा तुम मानोगे के बेटा माँ से ब्या करें /'

उसकी समझ में सारी बात आ ग्गी .

राजा उदास हो गया ,लौट आया अपने सहेर में घर कू .

पिंगला से बात भी ना की .
वो बोल्ली ,'जो म्हारे को बताओ राजा ,क्या हो गया हे ?'

तू तो म्हारी माँ है पिंगला ,फिर भी पूछण लग री .इब तो नरक में ना धकेल .'
होर राजा राज-पाट छोड़ बैरागी हो गया .

राणी कुछ ना बोल्ली.

लोगों के तो जो दिल में उठे कहो जायँ.दुनिया है ये तो .

कुत्तों के भूकण से सज्जन आदमी रास्ता नी छोड्डा करते .'

कंपार्टमेंट में चुप्पी छा गई थी .

एक दूसरे से बोलने की इच्छा नहीं हो रही थी .अपनी-अपनी जगह बैठे रहे सब जैसे कुछ कहने को बचा ही न हो .

***

सोमवार, 13 सितंबर 2010

निर्वासिता --

(भूमिका )
महाकाल वन,जिसके क्षेत्र ने ब्रह्मा और विष्णु दोनों को निवसित किया है .साक्षात् महाकाल स्थित हैं यहाँ .इस क्षेत्र में सृष्टि का सृजन पालन और संहार समाहित हो गया है ..इसी धरती पर बहती है क्षिप्रा नदी ,दोनों ओर गहन घोर वन और बीच से बहती कल कल निनादिनी क्षिप्रा !समुद्र तल से बहुत ऊँचा समतल क्षेत्र .जिसकी मिट्टी काली है.जैसे माँ का काजल पुँछा ,नेहभरा आँचल .मालवा की धरती ,यह पुण्य क्षेत्र ,जहाँ से प्रत्येक युग में सृष्टि का पालन -परिचालन होता है .

काल और स्थान की परिकल्पना ,हमारी स्मृति के पहुँच से भी पहले यहीं से प्रारंभ हुई !

कितना सघन वन !सूर्य की किरणें ,जिसकी घन हरीतिमा की पर्तें पार करते-करते अपनी दमक खो कर सघन श्याम हो उठती हैं .इस उज्ज्वल श्यामलता से सारा वन प्रदेश उद्भासित हो उठता है .एक दूसरे होड लगा कर ऊँचे उठते पेड .लता जाल को अपने से लिपटाये आसमान टोहते खडे रहते हैं .)और हर-हर सर-सर करती हवायें..एक विचित्र सी सुगन्ध चतुर्दिक व्याप्त रहती है..ऋतुओं के साथ साथ वन गंध परिवर्तित होती रहती है .वसन्त में आम की बौराती और महुओं की मदमाती महक के साथ वन पुष्पों कीम मह-मह गंध .चैत में जाने कौन कौन सी अनाम अनगिन वनस्पतियाँ पुष्पित हो जाती हैं और मदहोश करती महक चारों ओर छा जाती है .पशु-पक्षी जोडे बाँधने लगते हैं ,धरती पर बिछे होते हैं ढेर के ढेर पत्ते ,पाँव रखते ही बालिश्त भर नीचे धँस जाते हैं ,जैसे धरती माँ ने अपनी सन्तानों की क्रीडा के लिये,सुख-सेज बिछा दी हो .

चिट्-चिट् करती गिलहरियां एक दूसरी के पीछे भागती हैं .तोतों के झुंड के झुंड वृक्षों पर टियू-टियू कर ऐसा शोर मचाते हैं जैसे पूरा वृक्ष कलरव कर उठा हो .वानरों की कूद-फाँद और हाथियों की पुकार भरी चिंघाड .शेर की दहाड गूँजती है वन में और एक सन्नाटा सा खिंच जाता है वन में .घनी अँधेरी रातें ,आकाश में झिलमिल करते सितारे और नीचे अलस वनस्पतियों में वन्य जीवों की साँसों के स्वर में स्वर मिला कर गहरी साँसें छोडता वन .रात्रि के अन्तिम प्रहर में गहरा सन्नाटा छा जाता है,सितारे ऊँघने लगते हैंऔर साँसों का संगीत भी थम जाता है,तब काल पुरुष, भी गहरी नींद सो जाता है- कुछ क्षणों के लिये .

उत्तर में है विन्ध्याटवी .यहाँ से वहाँ तक वन्य पशुओं का मुक्त आवागमन अबाध रूप से चलता है .सरपत और झाऊ के घने वन ,घासें इतनी ऊँची कि हाथी भी चलता हुआ दिखाई न दे ..बहुत ऊँचा है विन्ध्याचल .उत्तर और दक्षिण के बीच में एक ऊँची दीवीर ,कोई पार नहीं कर पाता .विंध्याटवी की कुछ भूमियाँ असूर्यंपश्या हैं .सूरज की किरणों ने भी नहीं देखा है -ऐसी कुँआरी धरती .

महुये टपाटप टपकते हैं और नशीली हवायें इस महाकाल वन में अपनी मादक गंध लिये घुस आती हैं.लगता है विन्ध्यवासिनी महाकाल का आवाहन कर रही है'आओ,आओ.चले आओ .अपनी समाधि भंग कर दो .'काल चंचल हो उठता है .कोई अट्टहास गूँजता है और वनप्रान्त चौंक जाठता है .

बारहों मास वृक्ष फलों या फूलों से लदे रहते हैं.,कभी आम तो कभी आमलक ,कैथ .बेर ,करंज काफल ,फलों की कोई गिनती है यहाँ ?कदली वन ऊँचे विशाल जात हिलाता,हरहराता डोलता अपनी महक उँडेल देता है.कौन खायेगा इतने फल ?पक्षी खाते है गिराते हैं .वानर कूद-फाँद मचाते खों-खों करते क्ीडा करते हैं .महाकाल और मुक्त प्रकृति दोनों मिल कर इस संसृति का संचालन करते हैं .

. बरसात की रातों का बीहड अँधकार धरती पर घनी वनस्पतियाँ ,आकाश में सजल मेघजाल ,और सबको घेरता सघन वन का अँधेरा .वृक्षों के पत्तों पर अविराम वर्षा की झडी ,धरती पंकिल हो गई है ,रह रह कर मेघों की गर्जना .कौंधती बिजलियों की चमक से पूरा वन क्षणांश को प्रकाशित हो उठता है .साँप-रेंग रेंग कर वृक्षों पर चढने को प्रयत्नशील,कहीं वृक्षों से लिपटे .सीत्कार करती उन्मुक्त हवा हरहराती चलती है ,लतायें वृक्षों से विच्छिन्न हो धरती पर गिरती हैं तरुओं को को झकझोरती  हवा4एं सारे अरण्य-प्रान्त को दहला देती हैं .लगता है साक्षात् महाकाल ताण्डव करने लगे हैं .
**
स्वच्छ निरभ्र आकाश !पूर्ण चन्द्र अपनी पूरी द्युति से चमक रहा है .उज्ज्वल किरणें चारों ओर बिखरी पडी हैं ..कहीं कोई हलचल नहीं .उन्चासों पवन जैसे शान्त दिशाओं के आँचल में दुबके सो रहे हों .जल स्तब्ध लहरें लेना भूल गया हो जैसे .गति हीन पवन ,मेघहीन आकाश ,सितारे भी टिमटिमाना भूल गये हैं. एकदम स्तब्ध सौंदर्य.,ऊँचे-ऊँचे वृक्ष चित्रवत् खडे हैं,धरती से आकाश को मिलाते इस चाँदनी के ज्वार में डूबे .

अकेले बैठे बैठे सीता की आँखें भर आती हैं .अनसोई ,लंबी रातों की तडपन ,वह एकाकीपन जिसे बाँटनेवाला कोई नहीं.

जीवन के प्रारंभिक क्षणों में ही जननी के स्नेह से वंचित कर शायद नियति ने यह पूर्वाभास दे दिया कि जीवन में तुम्हें कुछ नहीं मिलना है .जो नव शिशु का सहज अधिकार होता है,जीवन की अनिवार्य शर्त होती है ,वह सब मेरे लिये नकार दिया गया था .प्रारंभ से पटाक्षेप तक उसी वंचना के बीच भटकना है राम तुम्हारी विश्वास ,बहुत वल देता था ,तुमने मेरे अतिरिक्त किसी नारी को स्वीकार न करने का जो वचन भरा था .उसके लिये मैं आभारी हूं तुम्हारी .नहीं ,चिर ऋणी हूँ तुम्हारी ..तुम राजा हो .सत्कुलोत्पन्न,सत् के प्रतिष्ठापक और मर्यादाओं के रक्षक कहलाते हो .

और मैं अज्ञात् कुलोत्पन्न ,जिसे दूसरों के द्वारा पाला गया ,मेरी क्या मर्यादा है ,चिर -कलंकिता हूँ मैं .बचपन से मैं सोचा करती थी ,मेरे माता-पिता कैसे होंगे जो जन्म लेते ही त्याग दियामुझे ?कौन हूँ मैं ?क्या अपराध था मेरा ?

अब तो जिस मनस्थिति में मैं जी रही हूं उसमें सच भी सपना लगने लगा है .
मैं कभी सामान्य नहीं रह सकी .दुनियाँ में सब जैसा स्वाभाविक जीवन जीते हैं ,मेरे हिस्से में वह बिल्कुल नहीं आया .मन पर यह बोझ लिये सारा जीवन बीतेगा .जानकी हूँ मैं .राजा जनक की कन्या ,कन्या नहीं पालिता कन्या !

जन साधारण का मुँह कौन बन्द कर सकता है?वह नीच धोबीपर किसी को नीच कने का मुझे क्या अधिकार .मैं रावण -मन्दोदरी की पुत्री राक्षसी हुई मैं भी .देव योनि में नहीं हूँ मैं .

पर इन्द्र की पत्नी शची भी पुलोमा दैत्य का पुत्री है ,कितनी असुर दैत्य और दनुजों की कन्यायें देवों के कुल में ब्याही हैं .

इतना पूर्ण चंद्रमा ,दूर तक फैला गहन नील आकाश .इतनी पूर्ण ,इतनी विचित्र रात्रि आज तक कभी देखने में नहीं आई .-क्या होनेवाला है?कैसा षड्यंत्र चल रहा है यह/

सीता का मन जाने कसा कैसा हो रहा है .प्रकृति शान्त ,वनस्पतियाँ शान्त,धरित्री शान्त ,आकास शान्त सारी दिशायें स्तब्ध ,मूक .पर मेरे मन में शान्ति क्यों नहीं ?

आँधियाँ और तूफान इस वन प्रदेश में आते ही रहते हैं .सीता उनसे नहीं घबराती .घनघोर गर्जन प्रचण्ड हवायें जब पेडों को उखाडती ,अंधाधुन्ध दौडती चली आती हैं ,तब सीता निर्भय कुटिया का द्वार खोल कर है. खडी हो जाती है .मन उन्मत्त आनन्द से भर उठता है .जैसा तूफान मन में समाया है ,वैसा ही बाहर भी .दोनों में ताल-मेल बैठाने की चेष्टा करती रहती है वह .इतने लम्बे वनवास में प्रकृति की ये क्रीडायें बहुत देखी हैं.अब इनमें ऐसा कुछ नहीं जो भयभीत करे .

पर आज की रात्रि!यह पूर्ण और विलक्षण शान्ति मन को विचलित किये दे रही है.ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ .

जीवन में क्या कुछ नहीं घटा ? जन्म  की सुनी भर हैं ,पर वह सुनना ,समझना मन को गहन रिक्तता से भर जाता था .,फिर वनवास ,अपहरण ,कलंक ,परित्याग और अब यह चिर एकाकी जीवन .अब क्या शेष रह गया .?कौन सी विडंबना बाकी रह गई ?

राम ,मुझमें क्या कमी रह गई थी ,,अपना मन और तन तुम्हें सौंप दिया था मैंने ,मेरा प्रेम ,विश्वास सब व्यर्थ कर दिया तुमने .

सीता चुप बैठी है ,रात का गहरा अँधेरा .आँखों से आँसू टप टप गिरते हैं और धरती की माटी सोख लेती है .....
(उपन्यासांश)क्रमशः

सोमवार, 30 अगस्त 2010

स्वीकारोक्ति

*
ट्रेन का सफ़र कभी-कभी बड़ी यादगार बन जाता है . मुझे बहुत यात्राएं करनी पड़ी हैं और अधिकतर अकेले ही .पति अधिकतर टूर पर और फिर उन्हें इतनी छुट्टी भी कहाँ .
उस दिन भी विषय-विशेषज्ञ बन कर एक मीटिंग में जा रही थी.
पहले ही पता कर लिया था जिस कूपे में मेरा रिज़र्वेशन है उसमें एक महिला और हैं .मुझे सी ऑफ़ कर ये चले गए .
वे महिला समवयस्का निकलीं
चलो ,अच्छी कट जाएगी !
बातें शुरू -
'आप कहां जा रही हैं .'
'इंदौर ,और आप?'
'हमें तो उज्जैन तक जाना है ,आप भी अकेली हैं '
'म ?हां अकेली ही ,अक्सर जाना-आना पड़ा है ,आदत-सी हो गई है .'.

'हमारी भाभी बीमार हैं सो अचानक चल दिए आप तो इन्दौर रहती हैं शायद.
'नहीं अहिल्याबाई वि.वि में एक मीटिंग है ,बस अगले दिन  लौटना है .'
'हाँ हम भी दो दिन की सी.एल ले के '.
पता लगा मेरठ में पढ़ाती हैं ,और खूब घुल-मिल कर बातें होने लगीं .
कहां -कहां के सूत्र निकल आए .
 मज़ेदार बात यह कि दोनों ने एक ही कॉलेज से बी.एड. किया ,बस भावना जी एक साल पहले कर चुकी थीं,उस कॉलेज को खुलने का पहला साल ,तब वह पूरी तरह व्यवस्थित नहीं था .
हम अगले साल वहीं दाखिल हुए .
वार्डन -लेक्चरर प्रीफ़ेक्ट  सबकी बातें.मिट्ठू,जो ऊपर के काम कर देता था -दोनों होस्टलों में उसकी पूँछ थी.
'मिट्ठू ?'
'हाँ -हाँ ,था तो .पर ब्वाएज़ हॉस्टल में ज़्यादा रहता था .हमारे यहां तो कभी वार्डन के पास या किसी काम से नोटिस वगैरा ले कर आता था . '
' आपके सामने ब्वायजट हॉस्टल कहाँ था ?'
'उधर चौबीस खंभा रोड पर जो धरमशालावाली बिल्डिंग है वही किराए पर चल रही थी ,सुनने में आ रहा था कि अगले साल होस्टल शिफ्ट हो जाएगा ..''
'हूँ .'
'ये मिट्ठू  दोनों होस्टलों में काम करता था न,और एक मज़ेदार बात ,हम मिट्ठू के लिए टियू-टियू शब्द स्तेमाल करते थे और खूब हँसते थे .पर .उसके सामने नहीं .'
'हाँ ,वो तो शुरू से ही दोनों होस्टलों  के काम देखता था ,पास में हैं न .हमारे वार्डन ने भी कह रखा ता ,झाड़ू वगैरा लगा कर उधर चले जाया करो .उन दिनों खाना तो इकट्ठा वहीं बनता था .'

'और वह सामने की दूधवाली दूध में वात्सल्य रसकी मात्रा बहुत कर देती थी .'
'हम लोगों ने तो अपना अलग इंतज़ाम कर लिया था .'
रूम मेट कैसे हमारा घी चाट कर स्वास्थ्य बनाती थी,
और फिर मिट्ठू !
'वही तो ...'
'क्या वही तो ?'
'कुछ  नहीं यों ही '.
'सब टेम्परेरी इंतज़ाम थे तब.कोई ऐसा कमरा भी नहीं जहाँ यूनियन की मीटिंग कर लें .'
' वो तो हमारे सामने तक था .कैबिनेट की मीटिंग किसी के रूम में कर लेते थे और जनरल के लिए हॉल ,बस.'
'अब तो बढ़िया होस्टल बन गया है .आप नहीं गईं कभी फिर ?'
'नहीं जा नहीं पाए .मन तो करता था पर बात कुछ ऐसी हो गई थी कि जाने की हिम्मत नहीं पड़ी .'
'ऐसा क्या हो गया ?''
वे चुप हैं
'आप मुस्करा रही हैं .'
'हाँ ,एक बात मन में है .अब तक किसी से कहते नहीं बनी .पर अब उम्र के चौथे पहर में इच्छा होती है कि सब-कुछ .कह-सुन कर हल्की हो लूं . '
'हम दोनों तो बराबरी की हैं एक दूसरे को समझने में मुश्किल नहीं होगी.'
'हां,हां इसीलिए तो .आप भी तो वहीं पढ़ चुकी है ?'
*
थोड़ी भूमिका बाँधने के बाद बताने लगीं - छात्र चुनाव में एक काफ़ी बड़ा-सा  गंभीर सा लगनेवाला  लड़का सेक्रेटरा बना .काफ़ी रिज़ोर्सफुल था .
उसने अपनी कैबिनेट में हमें  भी ले लिया .कई क्षेत्रों में सक्रिय रहे थे न हम .
मैंने अपने होस्टल की दो लड़कियों और एक लड़के को ,जिसे मेरी रूम-मेट जानती थीं बोलीं  बहुत साहित्यिक रुचि का संस्कारी लड़का है - ले लिया .
'मैं चाहती थी मीटिंग्ज़ में अनुराग जाए ,मुझे न जाना पड़े.'
'क्यों , जब इन्चार्ज आप थीं .'
'हाँ ,थी .पर ..असल में जो सेक्रेटरी था वह मिट्ठू के हाथ मुझे पर्चियाँ भेजा करता था ,अकेले में मुझे देने के लिए .'
'फिर?'
उत्तर वह माँगता था . मैंने कभी दिया नहीं ,


'हाँ तो वो लड़का क्या नाम था उसका ?
'अब असली नाम बता कर क्या होगा  समझ लो- आलोक.'
'और पर्ची में संबोधन क्या ?'
 'इस सबसे क्या .बात तो कुछ और है जो बतानी है ..'
'नहीं ,यह तो बताना ही पड़ेगा नहीं तो इमेज कैसे बनेगी ?'
'संबोधन कुछ खास नहीं डियर फ़्रेंड ,या माई चम और अपने को क्वेशचन मार्क ,या ऐसे ही कुछ .'
'क्या लिखता था?'
'छोटी-छोटी बातें -तुम ध्यान में रहती हो वगैरा '.
'और क्या लिखा होता था .'
'बस साधारण सी बातें -कि तुम मुझे अच्छी लगती हो .कभी कोई परेशानी हो तो बताना .'
'बस यही ?'
'हां. कभी-कभी यह भी कि क्लास के बाद ऑफ़िस की तरफ़ आ जाना ,कुछ छात्रसंघ के बारे में सलाह करनी है .'
'तुम लिखता था ?'
'अरे ,अंग्रेज़ी में -क्या आप और क्या तुम !'
'सही कहा  , जो हिन्दी में कहना शोभनीय नहीं लगता अंग्रेजी मे अच्छी तरह चल जाता हैं ,  कभी वे तीन शब्द लिखे थे उसने?'
'अच्छा !अब आप मज़ा ले रही हैं?नहीं ऐसा कभी कुछ नहीं ?'
'हां तो और क्या ?'
'यही कि सुबह-सुबह तुम्हें देख लेता हूं तो दिन अच्छा बीतता है .'
'सुबह-सुबह कैसे ?'
'सब लोग इकट्ठे प्रेयर करते थे सात बजे लड़कों के होस्टल में -फिर नाश्ता और फिर क्लासेज़ शुरू .'
'नाश्ते  में क्या ?'
'ज़्यादातर पोहे ,चाय कभी-कभी और कुछ भी ,जलेबी वगैरा .. '
'वाह उज्जैन के पोहे !पानी आ गया मुँह में !'
' देवास गेट पर हम हमेशा खाते हैं .ऊपर से सेव डाल कर देता है .'
और आप क्या  क्या जवाब देती थीं ?
मिट्ठू हमेशा जवाब माँगता पर हम क्या लिखें और क्यों लिखे ?
कह देती  मैं खुद बात कर लूँगी , और उसके जाते ही पर्ची फाड़ कर फेंक देती .'
'आप जाती थीं ?'
हाँ ,जिन दो को साथिनों को मैनें अपनी समिति में लिया था उन्हे भी बुला लेती ,कि अच्छी सलाह हो जाए  ,एक तो साथ में होती ही थी .उसने एकाध बार कहा भी क्या मुझसे डरती हैं ,कुछ बातें सबसे कहने की नहीं होती और ये लड़कियाँ ऐसी हैं ख़ुद मुझे रोक लेती हैं  और  सबसे कहती फिरती हैं कि मैं उन्हें बुलाता हूँ .मैंने आपके सिवा किसी को नहीं बुलाया ..'
*
मैं चुपचाप  रुचिपूर्वक सुन रही हूँ .
अचानक वे पूछ बैठीं ' अगर आपसे कोई पूछे -तुम तो खाई -खेली हो तो कैसा लगेगा ?' .
'एक चाँटा लगा दूँगी ' .
'आज नहीं ,तब जब होस्टल में रह कर बी.एड. कर रहीं थी .तब क्या कहतीं ?'
'अब इतना तो नहीं बता सकती ,आजकल की लड़कियों में समझदारी हमलोगों से ज़्यादा विकसित है .हम लोग ये सब काफ़ी बातें देर में समझा करते थे. अब अब ये टी.वी. वगैरा ..'
हाँ वही तो ! और जब इसका मतलब मुझे पता चला तभी से   . मन पर एक बोझ सा आ गया .'
'पर क्यों ?'
वे बताने लगीं -
अक्सर ही बुलावा आ जाता था आलोक की ओर से -कल्चरल सोसायटी की इन्चार्ज जो बना दिया था मुझे
कभी पत्रिका कैसी हो इसके बारे में डिस्कशन ,कभी क्या प्रगति ,चल रही है ,मीटिंगे हो रही है .शुरू-शुरू में बड़ उत्साह से पहुँच जाती रही फिर जब रंग-ढंग समझ में आने लगे ,तो वह बचने की कोशिश कर जाती .एक अजीब -सी खिसियाहट घेर लेती .फिर भी जाना तो अक्सर ही पड़ता था.
एक बार खबर आई ,मीटिंग कामना लॉज के रूम नं. 7 में है .वहाँ जल-पान का बढ़िया डौल बन जाता है.अनुराग पिछले दो दिनों से गैरहाज़िर था और मीरा -निर्मला दोनों एक साथ किसी रिश्तेदारी में पार्टी खाने .
मैं पहुँच गई टाइम से ,समय से पहुँचना आदत में शुमार है .
पहुँची तो वहाँ कोई नहीं बस आलोक कुर्सी पर जमा बैठा है.
जाते ही कहने लगा ,देख लिया ?ये हाल हैं यहाँ के ,किसी को काम की चिन्ता नहीं .सब मौज कर रहे हैं .एक मैं ही हूँ जो मरा जा रहा हूँ'जैसे मेरा अपना इन्टरेस्ट हो !
,'क्या कोई नहीं आया ?'!
'आते ?अरे ,नोटिस पर साइन ही नहीं किये .भगा दिया होगा मिट्ठू को.'

'तो फिर तो कोई आयेगा भी नहीं ...मैं बेकार ..'
'वाह बेकार क्यों ?तुम्हीं तो एक समझती हो मुझे .तुम भी नहीं आतीं तो मैं तो बिल्कुल अकेला रह जाता ..मैंने तो नाश्ते का बढ़िया  दे रखा है ।'
'मुझे नहीं करना ,कर के आई हूँ .'
अरे बैठो ,बैठो ..अब मिले हैं तो कुछ बातें करही लें',उसने आगे जोड़ा ,तुमने भी तो कुछ सोचा होगा मेगज़ीन के लिये .'
वह कुर्सी से उठा और सोफ़े पर लेट- सा गया ,'क्या बताऊं कल ,बिल्कुल सो नहीं पाया..'
'क्यों क्या कुछ परेशानी है ?'
इधर बैठो न आराम से ..'
'नहीं ,ठीक हूँ यहीं .'
'हाँ तो ,क्या-क्या कर लिया है ?'
उसकी की आँखें उसे अपने चेहरे पर चुभती लग रही थीं .लंबा-चौड़ा था ही  जब  सामने बैठ कर अपनी नज़रें  पर गड़ा देता - लगता  भीतर तक पढ़ लेना चाहता है, बड़ी उलझन होने लगती थी.
खिड़की से बाहर देखते मैंने कहा,
 'मीरा और निर्मला की  रचनाएं ले ली हैं , कई लोग देने वाले हैं  और  अनुराग जी की कवितायें
भी,  सुन्दर लिखते हैं .'
एकदम बोला
'कब से जानती हैं आनुराग को ?''
'बस यहीं आकर .पहले एकाध कविता पढ़ी थी कहीं ..'
और वह  अनुराग को बिलकुल पसंद नहीं करता , एकदम मुझे याद आया..अनुराग भी उसकी मीटिंग में आना अक्सर टाल जाता है .
उस दिन की घटना याद आते  ही अपने लिए धिक्कार उठने लगती है  . कैसी बेवकूफ़ी ,उफ़
 रोम खड़े हो जाते हैं .. '
मैं बैठी सुन रही हूँ -विस्मित सी .
उसने मुझसे पूछा था ,'तुम तो खाई खेली हो ?'
मैंने बैठने की पोज़ीशन बदली थी .
वे कहे जा रहीं थीं -
'हाँ .बिलकुल .'मैं नेउत्तर दिया था .'
उसकी कौतुक भरी दृष्टि मुझ पर टिकी थी ,
'अच्छा !'
'और क्या !घर में छोटी थी ,छूट मिलती रही ,बचपन से खूब खाती-खेलती रही '.
'वाह !'
मैं उसे देख कर हँस दी .
वह चुप हो गया .फिर अचानक बोला
'अच्छा, अब तुम जाओ.'
मैं चौंक गई .उसका विचित्र व्यवहार समझ में नहीं आया  कैसे बोल रहा है यह .
मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था.
'तुम फ़ौरन यहां से चली जाओ.'
मैं हकबकाई सी उठी अपना पर्स उठाया और एकदम चल दी .अपने कमरे पर आकर ही दम लिया .
रूम-मेट लेटी हुई थी पूछने लगी .'क्या हुआ ?'
'कुछ नहीं ,बस अच्छा नहीं लग रहा है .'
'घर की याद ?'
'पता नहीं क्यों आँखों में आँसू भर आए .ऐसा व्यवहार किसी ने मेरे साथ नहीं किया था .
मैं भी लेट गई चुपचाप .किसी से कुछ कहने को था ही क्या ?'
तब तो कुछ खास नहीं लगा .एक्ज़ाम हो गए सब तितर-बितर हो गए .
 बाद में जब खाई-खेली का असली मतलब पता लगा तो मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया .'
मैं क्या बोलती !बैठी रही आगे का सुनने के चाव में
 'जब भी वह घटना ध्यान में आती मन ग्लानि से भर जाता ..पता नहीं क्या सोचता होगा मेरे लिए ,पता नहीं और लोगों से उसने क्या-क्या कहा होगा .
बाद में जितने दिन होस्टल में रही लोग कैसी निगाहों से देखते होंगे मुझे ,और मैं बेखबर .लोगों को लगता होगा इसकी आँखों में शरम है ही नहीं .
इसीलिये बाद में कभी किसी से मिली नहीं .और फिर तो सब इधर-उधर हो जाते हैं .सबको भूल जाना चाहती थी मैं. '
'और फिर कोई चिट नहीं भेजी ?'
'एक्ज़ाम पास आ रहे थे ,सब बिज़ी हो गए थे .
मेरी उस स्वीकारोक्ति के बाद .उसने कभी मिट्ठू के हाथ कोई चिट नहीं भेजी और कभी जब मौका पड़ा भी  बड़ी सभ्यता से बात करता था .
शादी के बाद भी सर्विस करती रही मैं
 पर सेमिनार ,आदि के अवसर पर यही डर रहता था कि कहीं वह सामने न पड़ जाय !
बहुत डर-डर कर रही हूँ .
मैंने आज तक किसी से नहीं कहा आज अपना मन हल्का कर रही हूं ,पर अब मन पर से वह बोझ उतर चुका है ,इसीलिए कह पाई हूँ .'
'और कहीं वह मिल गया तो ?'
वह हँसीं -निश्छल हँसी .
'पता नहीं कैसी स्थिति हो !पर अब घबराहट नहीं लगती .
उम्र के इस प्रहर में अपनी बेवकूफ़ी पर तरस  आता है .
अब वह सामने आ गया तो उससे भी हँसकर बोल लूँगी .'
'पूछ लीजिएगा उसने क्या समझा था . '
वे सिर्फ़ मुस्करा दीं .

उज्जैन आ गया था ,उन्हें यहीं तो उतरना था .
***

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

तार -

*
वह बड़ा उदास था।थोड़ी देर पहले ही उसे तार मिला था,उसके भतीजे की मृत्यु हो गई थी।जवान भतीजा,खूब तन्दुरुस्त,अच्छा ऊँचा पूरा,नाक के नीचे स्याह रेखाएँ बहुत स्पष्ट दिखने लगीं थी।डूब कर मर गया।ऐसी कोई बात तो थी नहीं ,बड़ी मस्त तबियत का था।किसे मालूम था जाकर वापस नहीं लौटेगा ? लौटी उसकी निष्प्राण देह!माँ-बाप कैसे सहन कर पायें,छोटे-छोटे भाई-बहिनो को कैसा लग रहा होगा !
उसे सहसा विश्वास नहीं हुआ कि हितेन मर गया है।अभी कुछ दिन पहले ही तो उसके पास आया था।एक हफ़्ते साथ-साथ रहे थे दोनो ।उम्र मे भी तो कोई खास अंतर नहीं था।घर मे कोई उसके सबसे निकट था तो बस हितेन ही।भतीजे से अधिक दोस्त था वह उसका। उसे बार-बार लगता अभी दरवाज़ा खुवेगा और बैग लिये हितेन कमरे मे घुस आयेगा,खूब जोर-जोर से हँसकर सारा कमरा गुँजा देगा। नहीं, वह अब कभी नहीं अयेगा!
वह धीरे-धीरे उठा,रोज़मर्रा के काम तो होंगे ही,देह के धर्म तो निभाने ही पड़ेंगे!बिना किसी उत्साह के उसने कपड़े बदले। चाय भी ते नहीं पी थी अभी,पर उसका मन नहीं हुअ कि चाय बनाये और पिये।उदासी और बढ़ गई।रेलवे टाइम-टेबल उठा कर देखा - पौने बारह बजे मिलेगी पहली गाड़ी,तब तक क्या किया जाय?खाना खा ले?फिर तो कहीं आधी रात को पहुँचेगा। मौत के घर मे जाते ही खाने-पीने का डौल नहीं बन पायेगा।यह सब अच्छा भी तो नहीं लगेगा।फूछनेवाला होगा भी कौन?भइया भाभी बेचारे जाने किस हाल मे होंगे!पता नहीं कौन-कौन होगा वहाँपर !
 भूख- प्यास ? शरार अपनी माँग करेगा ही।
उसने उठ कर कमरे का ताला लगा दिया।पाँव होटल की ओर बढ़ चले।रास्ते मे भी वह हितेन के बारे मे सोचता रहा।बड़ी छेड़ने की आदत थी,'चाचा,चाची के और बहने होंगी ?','यार,चाचा तुमने कुछ सूट-ऊट के कपड़े नहीं खरीदे?' वह कह देता , 'अब मै लेकर क्या करूँ,सब वहीं से आ जायेगा।' जब से शादी तय हुई थी ,कुछ-न-कुच परिहास करता ही रहता था।'हाँ,चाचा,अब तो कुछ नामा इकट्ठा कर लो।'बात बड़े पते की कहता था।बीच-बीच मे उसे भाई का ग़मगीन चेहरा और पछाड़ें खाती भाभी के चित्र दिखाई देते रहे।एक मन हुआ खाना खाने न जाय! लेकिन मेरे न खाने से क्या होगा?वहाँ जाकर पता नहीं कब क्या हो!दौड़ भाग भी तो सारी उसी को करनी पड़ेगी।पता नहीं क्या-क्या होगा !उसका मन बड़ा भारी हो आया।भूख बड़े ज़ोर की लग रही थी।खाना खा लेना ही ठीक है ,चाय भी तो नहीं पी है!इस तरह न खाने को देखेगा भी कौन?
रास्ते मे गुप्ता दिखायी दे गया।उसने कतरा कर निकल जाना चाहा,जैसे देखा ही न हो। पर गुप्ता आवाज़ दे बैठा ,'क्या मुँह लटकाये चले जा रहे हो?   शादी क्या तय हुई, दुनिया-ज़माने का भी होश खो बैठा, मेरा यार।'
उसने सोचा कह दूँ भतीजा मर गया है,वही हितेन ,जो यहाँ आया था- पर वह रुक गया।यह भी क्या सोचेगा ,सगा भतीजा मर गया और चले जा रहे हैं खाना खाने!
'आज पता नहीं माइंड बड़ा अपसेट हो रहा है,' वह गुप्ता की ओर हल्के से मुस्करा दिया।
'यह बात!पेट मे चूहे कूद रहे होंगे।चलो ,तुम्हें कुछ स्पेशल खिलायें!'
उसने होटल के नौकर से दाल और फुल्का ले आने को कहा,गुप्ता ने बीच मे टोक दिया,'कहाँ बहक रहे हो आज?ओ शंभू, कबाब और टमाटर प्याज़ की प्लेट बाबू के आगे लाकर रख।'
'लहीं यार, आज मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं।'.
'तो खाने से क्या दुश्मनी है?चल, बिल मेरी तरफ!तू क्यों फ़िक्र करता है? आखिर ,दोस्ती किस दिन के लिये है?'
वह इन्कार नहीं कर सका।बढ़िया खाना और चार जनो के बीच हा-हा-हू-हू मे उसके ध्यान से सब उतर गया।जितना उदास और भारी मन लेकर वह आया था ,उतना ही हल्कापन और भरा पेट लेकर बाहर निकला।उसे लगा खाली पेट मे हर दुख बहुत बड़ा लगा करता है।
मेरे अफ़्सोस करने से होगा भी क्या!जो होना था हो चुका ,उसके लिये कुछ किया भी तो नहीं जा सकता! मेरे पास आता था तो मुझे इतना भी लगा नहीं तो किसी के मरने पर किसी और को कौन सा फ़र्क पड़ता है? सुनकर चच्-चच् सभी कर देते हैं,एकाध बात खोद कर पूछ लेते हैं और अपना रास्ता लेते हैं।अपनी-अपनी व्यस्तताओं मे दूसरे के सुख-दुख का ध्यान किसे रहता है?
गुप्ता को नहीं बताया अच्छा ही किया ,उसने सोचा ,दुख तो केवल उन्हीं लोगों को होता है जिनका कुछ सम्बन्ध होता है।अन्य लोगों के लिये उसका महत्व ही क्या!और सब  ऊपरी दिखावा करते हैं।होँ भाई को तो दुख होगा ही,बहुत दुख,घर का बड़ा बेटा था,उसी पर सारी आशाएँ केन्द्रित थीं।पाले-पनासे की ममता,घर के एक बहुत खास सदस्य की दुखद हानि!और किसी ,किसी बाहरवाले को क्या फ़र्क पड़ता है उसके होने या न होने से?यों मुँह देखी सभी कह देते हैं।
गुप्ता को मेरा चुप रहना अजीब लग रहा होगा ,सोच कर उसने उसकी ओर मुस्करा दिया।दोनो ने साथ-साथ सिगरेट पी फिर वह अपने कमरे पर चला आया।अन्दर कदम रखते ही उसे वही तार दिखायी दे गया।घड़ी देखी ,गाड़ी जाने मे अभी बहुत देर है।चलो दफञ्तर चल कर ही एप्लीकेशन दे देंगे यहाँ बैठ कर भी क्या होगा।उसने तार उठा कर जेब मे डाल लिया - एप्लीकेशन के साथ नत्थी दर दूँगा  - हो सकता है,बाद मे छुट्टी बढ़ाने की ज़रूरत पड़ जाये।
उसे एकदम ध्यान आया - कल तो छुट्टी है सेकन्ड सेटर डे की,और परसों संडे!आज छुट्टी लेता हूँ तो ये दोनो बेकार जाएँगी।आज और तार न आता!फिर उसके दिमाग़ मे विचार आया,आजकल तो तार भी अक्सर साधारण डाक से भी देर मे मिलते है।मै ठहरा अकेला आदमी!कोई जरूरी नहीं तार के टाइम कमरे पर ही मिलूँ!तो ये दिन निकाल दूँ,तीन छुट्टियाँ एकदम बच जायेंगी।और आब वहाँ धरा ही क्या होगा,शुरू का सारा काम निबट चुका होगा!
उसके पाँव ऑफ़िस की ओर चल पड़े।अच्छा हुआ गुप्ता से कहा नहीं ,और छुट्टी की एप्लीकेशन भी नहीं दी।एक बड़ी बेवकूफ़ी से बच गया।उसने चैन की साँस ली।
हाँ,बेकार की भावुकता मे क्या घरा है?आज ऑफ़िस करके रात की ट्रेन से चला जाऊँगा,हद -से-हद कल सुबह!यह भी तो हो सकता था ,मै पहले ही कहीं निकल जाता और फिर तार आता! मै खाना खाने होटल जा चुका होता,फिर वहीं से दफ़्तर चला जाता,तब तो शाम को ही कमरे पर पहुँचता!वह काफ़ी निश्चिन्त हो गया।
ऑफ़िस  मे उसका मन काफ़ी हल्का रहा,खाया भी तो खूब पेट भर के था!चार जनो के साथ ही तो हँसने-बोलने की इच्छा होती है ,नहीं तो चला जा रहा होता ट्रेन मे मोहर्रमी सूरत लिये!
लेकिन हितेन था बड़ा हँसमुख!जब भी आता भाभी से काफ़ी-सा नाश्ता बनवा लाता था।मट्ठियाँ तो उसे बहुत पसन्द थीं औऱ उनके साथ आम का अचार!चचा-भतीजे वहीं कमरे मे चाय बनाते और मिल कर खाते थे।अब कौन लायेगा मट्ठियाँ!वैसे तो कभी भाभी ने भेजी नहीं,वो तो ये कहो अपने बेटे के साथ भेजती थीं,सो मै भी साथ खा लेता था!पर भाई !भाई के लिये उसके मन मे बड़ी करुणा उपजी।पिता के बाद उन्हीने गृहस्थी का भार सम्हाला था। उसे पढ़ाया-लिखाया,और अब तो शादी भी तय कर दी थी- वहीं कहीं।पर अब साल भर तो उसकी शादी होने से रही!
'कैसे ,चुपचाप बैठे हो आज यार?नींद आरही है क्या?'
वह एकदम चौंक गया,फिर चैतन्य हो गया।
'कल रात नींद ठीक से नहीं आई,' फिर उसे लगा जवाब कुछ मार्के का नहीं बन पड़ा तो उसने जोड़ दिया,'जब दिल ही टूट गया....'और बड़े नाटकीय ढंग से सीने पर हाथ रख लिया।
'छेड़ो मत उसे। अपनी होनेवाली बीवी के वियोग का मारा है बेचारा!'
सब लोग खिलखिला उठे।
अपनी प्रत्युत्पन्न मति के लिये उसने मन-ही-मन अपनी पीठ ठोंकी।
किसी को पता नही लगने देना है अभी।बताने से और दस बातें निकल आयेंगी।अजीब-अजीब बातें जिनका जवाब देने मे उसे और उलझन होगी।अभी तार ही तो मिला है कैसे क्या हो गया कुछ भी तो पता नहीं।बहुत पहले पढ़ा हुआ रहीम का एक दोहा उसे याद आ गया-'रहिमन निज मन की बिथा मन ही राखो गोय' रहिमन बिचारे भी कभी ऐसी परिस्थिति मे पड़े होंगे-क्या पते की बात कह गये हैं!
घर पर उसकी प्रतीक्षा हो रही होगी!पर उसके होने न होने सेफ़र्क क्या पड़ता है?दुख तो वास्तव मे उसी को भोगना पड़ता है,जिस पर पड़ता है बाकी सब तो देखनेवाले हैं ,तमाशबीन की तरह आते है चले जाते हैं।'हाय.,ग़जब हो गया','बहुत बुरा हुआ', ये सब तो व्यवहार की बातें हैं।ग़मी मे जाना भी तो लोगों की एक मजबूरी है।कैसे घिसे-पिटे वाक्य कहे-सुने जाते हैं।....पर भइया-भाभी बड़े दुखी होंगे।दुख तो होना ही है,इतना बड़ा जवान लड़का ,जिस पर ज़िन्दगी की आशायें टिकी हों,देखते-देखते छिन जाये!कैसा लग रहा होगा उन्हे!
'सेकिन्ड -सेटर डे'भनक उसके कानो मे पड़ी।मुँह से निकल गया ,' क्या बात है?'
'पूछकर मना मत कर देना।'
उसकी जगह उत्तर गुप्ता ने दे दिया ,'अरे ,हम लेग क्यों मना करेंगे?मना करे तुम लोग ,जो दो-दो,चार-चार बच्चों के बाप हो। ला मिला हाथ1 '
गुप्ता ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।उसने बिना सोचे-समझे अपना हाथ दे दिया।
'दो दिन की छुट्टियाँ हैं तो पिकनिक का प्रोग्राम बना रहे हैं।'
'नहीं,नहीं ,मै तो कल घर जा रहा हूँ।'
'अब धोखा मत दे यार!फिर यहाँ क्या मज़ा आयेगा,ख़ाक?' गुप्ता फिर बोल दिया।
'नहीं यार गुप्ता, मुझे ज़रूरी जाना है।ता....खत आया है..।'वह कहते-कहते सम्हल गया।
कहते-कहते उसका हाथ फिर पैन्ट की जेब मे चला गया जिसमे तार पड़ा था।उसने फ़ौरन हाथ बाहर खींच लिया। उसकी अस्वाभाविकता पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
'तो, कौन वहाँ बीवी इन्तज़ार कर रही है तेरी?'
'अरे वही तो चक्कर है',क्या बोले यह सोचने का मौका उसके पास नहीं था।
उत्सुकता मे दो-चार जने उसके पास खिसक आये।
यह क्या कह दिया उसे पछतावा होने लगा।
' तो यह कह ससुर जी ज़ेवर चढ़ाने आ रहे हैं ? '
'और हमारी मिठाई?'
उसने मन-ही मन स्वयं को धिक्कारा।कुछ उत्तर सूझ न पड़ा। मुँह से निकला ,'अब तो घपले मे पड़ गई ...साल...साल..' कहते-कहते रुक गया ।'
'जाने दे यार ! जब कह रहा है जाना जरूरी है।'
'तो एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा?'
' वह चुप रहा ,हाँ एक दिन मे क्या फ़र्क पड़ जायेगा -उसके भी मन मे आया। न हो कल शाम को चला जाऊँगा ,रात की गाड़ी सो! परेशान लोगों को रात मे न जगाना ही ठीक रहेगा । उसने हामी भर दी ।
अपने आप ही फिर उसका हाथ जेब मे चला गया और तर के कागज से फिर छू गया।उसका मन फिर दुविधा मे पड़ गया।पिकनिक पर जाना अच्छा नहीं लगता,क्यों न लोगों को बता दूँ? पर ये लोग क्या सोचेंगे ?गुप्ता तो सुबह से ही पीछे लगा है.सहसे कहता फिरेगा! नहीं-नहीं ,बेकार है कहना।
कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? एक भाई ग़मी मे पड़ा है दूसरा पिकनिक पर जा रहा है। पर किसी को क्या पता कि मुझे तार मिल गया है१उसने अपने मन को संतुष्ट कर लिया ।
इतनी जल्दी उस वातावरण मे जाने मे उसे उलझन हो रही थी।भाई के बाद वही घर का बड़ा है।उस स्थिति मे वह स्वयं को बड़ा असहाय अनुभव करने लगा।उसे स्वयं पर बड़ी दया आने लगी।उस दृष्य की कल्पना कर वहफिर विचलित हो गया।
'क्यों शादी क्यों टल गई?लड़की मे कुछ...।'
'नहीं,नहीं उसकी रिश्तेदारी मे मौत हो गई है,'उसने अपना पिण्ड छुड़ाया।
' वाह मरे कोई और शादी किसी की रुके ?'
बड़ि शायराना अन्दाज़ मे रिमार्क पास किया गया था।उसे फिर उलझन होने लगी पर वह चुप रहा।
'इसीलिये ऑफ़ है मेरा यार ?' गुप्ता ने फिर टहोका
उसका मन समाधान खोज रहा था-जब कल जाना है तो आज बेकार परेशान हुआ जाय!उसने स्वयं को तर्क दिया-दुख किसी को दिखाने के लिये थोड़े ही होता है ,वह तो मन की चीज़ है ।ये ऊपरी व्यवहार तो चलते ही रहते हैं ।चलो ,बिगड़ी बत सम्हल गई!
सुबह खाने का बिल गुप्ता ने दिया था।क्यों न आज शाम को उसका उधार उतार दूँ!वह गुप्ता की ओर मुड़ा।
'ऐगुप्ता, भाग मत जाना ,साथ चलेंगे ।'
'भागूँगा कहाँ?हम दो ही तो हैं फ़िलहाल अल्लामियाँ से नाता रखनेवाले ।'
बेकार कमरे पर जा कर क्या करूँगा ,उसने सोचा,यहीं से घूमने निकल जोयेंगं,फिर खाना खाकर पिक्चर चले जायेंगे ,रात भी कट जायेगी ।
उसे फिर भूख लगने लगी थी और ग़म फिर उसके मूड पर छाने लगा था। जल्दी से जल्दी वह होटल पहुँच जाना चाहता था। खाली पेट मे उलझने और बढ जाती हैं ।
भतीजे की मृत्यु अब उसके लिये पुरानी बात हो गई थी ।घर पहुँच कर फिर रिन्यू कर लेंगे उसने सोचा ।
उसका हाथ फिर जेब मे चलागया और उस काग़ज  से टकरा गया । जैसे बिच्छू छू गया हो ,उसने झटक कर जेब से हाथ निकाल लिया और गुप्ता के साथ होटल की ओर बढ़ गया ।
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