रविवार, 13 जून 2010

फिर वह नहीं आई -

*
मुझे लगा वह जा रही है विलक्षणा ,वही कद ,वही पीठ पर झूलती ,लम्बी-सी अधखुली चोटी ,वही साड़ी जो अक्सर उसे पहने देखा है ,वही चलने का ढंग ,निश्चय वही है !मुझे विश्वास हो गया ।मैने चाल तेज़ कर दी ,आवाज़ लगाई ,' विलक्षणा -- बिलू !'
रास्ता चलते कुछ लोगों ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा ,पर मुझे उन की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत नहीं थी । मै जल्दी से उसके पास पहुँच जाना चाहती थी ।
'बिलू ,-- विलक्षणा ,-- ओ बिलू !'
'बिलू' अनायास मेरे मुँह से निकला जा रहा था जैसे मै उसे युगों से 'बिलू' कहकर बुलाती होऊँ । इसके पहले यह शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला था ,मन मे आया था पर मुँह से मैने निकलने नहां दिया था।
आगे जानेवाली युवती मेरे पीछे से आगे निकलते समय ध्यान से मुझे देख गई है -ऐसा मुझे आभास हुआ था ,उसके पग कुछ ठिठके ,कनखियों से उसने मुझे देख लिया और आगे बढ़ गई। मैने अपनी चाल और तेज़ कर दी । मै उससे मिलना चाहती थी ,अब तक जो उसे नहीं दे पाई ,वह देने को मै उतावली हो रही थी ,पर अब लेनेवाली रुक नहीं रही थी । अचानक ही उसने पीछे से आती हुई एक टैक्सी को हाथ दिया ,वह उसके पास जाकर रुकी और फिर उसे लेकर आँखों से ओझल हो गई। अब विलक्षणा नहीं मिलेगी ,देख लेगी तो भी नहीं आएगी मेरे पास ,कतरा कर चली जाएगी । क्यों ? लेकिन क्यों ?
*****
'कौन ?'
'दीदी , मै !'
अच्छा ,विलक्षणा है ।आओ ,आज बहुत दिनो मे दर्शन हुए ।'
'कहाँ ,दीदी, बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर आई हूँ,जरा देर के लिये। वहाँ सारा काम पड़ा होगा !'
मुझे बड़ा सन्तोष हुआ ,चलो ,चाय-नाशते का झंझट नहीं करना पड़ेगा ! फिर मन-ही-मन इस विचार के लिए मैने स्वयं को धिक्कारा ,वह तोइतनी दूर से रिक्शा लेकर मिलने आई और मै ये सोच रही हूँ !
यह तो मुझे काफ़ी बाद मे पता लगा था कि पीठ पीछे लोग उसकी बुराई करते हैं ।अपने साथियों मे भी वह लोक-प्रियता की सीमाओं से दीर रह गई थी । सामने-सामने तो सब अच्छी तरह बोलते पर पीठ फिरते ही मुँह बिचकाने लगते थे ।
मेरी एक साथिन ने एक दिन मेरे कान मे भी फूँका ,' देखना इससे चौकन्नी रहना !सबमे घुली रहकर सबसे भली बनने की कोशिश करती है ,और साधती है अपना मतलब !'
'कौन विलक्षणा ?'
और कौन है हमारे यहाँ जो सबसे मीठा बोलता फिरे ?'
'अच्छा --!'
और दो दिन बाद ही विलक्षणा मुझसे कह रही थी ,' दीदी ,मै कल एबसेन्ट थी । आपने जो नोट्स लिखाए वह मुझे दे दीजिए ।'
'वो तो मै घर छोड़ आई हूँ ।'
' अच्छा ' उलके मुख पर निराशा छा गई ।
'क्लास की किसी लड़की से ले लो ।'
'हाँ ,अच्छा ले लूँगी ।' उसका चेहरा बुझ गयाथा ।
अपने ग्रुप की लड़की को छोड़कर कौन अपने नोट्स किसी को देता है ,और विलक्षणा किसी ग्रुप मे नहीं है ,यह भी मै जानती थी ।
'घर से चाहो तो ले लेना ।'
आश्वस्त होकर वह प्रसन्न हो गई । पर एकदम मेरे दिमाग़ मे आया -ये कहां का झंझट पाल लिया !
'पर घर पर पता नहीं मै कब पहुँचूँ ?खैर मै देखूँगी फिर !' दूसरा आश्वासन दिया मैने ।
घर पहुँचने पर अम्माँ ने कहा ,' कोई लड़की आई थी ,तुझे पूछ रही थी ।'
'लड़की । क्या नाम था ?
'विलक्षणा ।'
मैने चैन की साँस ली .चलो अच्छा हुआ जो घर पर नहीं मिली मै ! अब बार-बार कौन आता है ?
' और वो तेरा सफ़ेद कार्डिगन मैने बिनने को दे दिया है ।'
'बड़ा अच्छा किया ! मै कहाँ तक करती !'
कुल एक हफ़्ता रह गया था शादी मे जाने को । एक तो मुझे समय ही कम मिलता था फिर कार्डिगन के अलावा और भी तो बहुत काम पड़े थे मेरे लिए ! इतनी जल्दी कैसे बुन पाता ,मोल बुनवाना ही सबसे ठीक रहा !
'किसे दिया है ?'
'वोई ले गई , वो जो आई थी ।'
' ऐं ,उसे क्यों दे दिया ? तुम काहे को सबसे कहने बैठ जाती हो ?'
' मैने कहाँ कहा ?उसी ने पूछा ।तू ही तो ऊपर सब छोड़ गई थी । वो पूछने लगी तो मैने बता दिया - काम इत्ता करने को पड़ा है और तेरी दीदी के पास टाइम ही नहीं है ,तो उसने कहा लाइए मै चार दिन मे बुन दूँगी ।'
अम्मा के ऊपर बड़ी खीझ लगी । हरेक के सामने अपना दुखड़ा रोने दैठ जाती हैं ।
किसी डाक्टर ने तो कहा नहीं था कि शादी मे सफ़ेद कार्डिगन पहनो ही ,दूसरी ओर थोड़ी खुशी भी हुई कि चलो बिना मेहनत के बुन जाएगा ।
'और ला के कब देगी ? कहीं रख के बैठ गई तो और मुश्किल ?'
'ऐसा भी कहीं हो सकता है ?तेरे कालेज मे तो पढ़ती है । वो तो बड़ी सीधी लड़की थी । खूब दीदी-दीदी करके बात कर रही थी तेरे लिए। '
अम्माँ बड़ी जल्दी सबसे सगापा जोड़ लेती हैं ! अब एहसान मेरे सिर चढ़ गया ! दूसरों को बेटी बना लेना इन्हें बड़ा आसान लगता है ,मेरी पोज़ीशन का ज़रा ख़याल नहीं ! पर मेरी झुँझलाहट सुनने को अम्मां वहाँ रुकी ही कब थीं !
तीसरे दिन शाम को अचानक विलक्षणा फिर टपक पड़ी । कार्डिगन का पिछला पल्ला और बाँहें उसने बड़ी सफ़ाई से बुने थे । नोट्स मैने ख़ुध लाकर उसे पकड़ा दिये । इतना काम कर रही है किसी मतलब से ही तो ! अम्माँ ने उसे चाय-वाय पिलाई और 'बेटी-बेटी' कर बात करती रहीं । वह मगन हो खाती-पीती रही और मुझे नमस्ते करके चली गई ।
फिर एक दिन घर पर देखा विलक्षणा बैठी मेरी साड़ी के पल्ले तुरप रही है । मुझे देख कर वह सकुचा सी गई ।अम्माँ झट् से बोल दीं ,' देखा ,मेरी नई बेटी मेरा कितना ध्यान रखती है । '
'अरे ,विलक्षणा ! तुम क्यों बेकार परेशान हो रही हो ?'
'आप मेरी दीदी हैं तो ये मेरी भी तो अम्माँ हैं ,अकेली आपकी थोड़े ही हैं ।'
'क्यों नहीं ,विलक्षणा ,तुम मेरी छोटी बहन हो ' एकदम मेरे मुँह से निकल गया ।
उसने अपनी तरल हो-आई पलकें झुका लीं ।
'कभी भी कोई डिफ़ीकल्टी हो तो चली आया करो ।'
मानो मैने उसे बहनत्व का पूरा अधिकार दे दिया !

फिर तो घर मे अक्सर ही उसका नाम सुनने को मिलने लगा । अम्माँ को तो जैसे उसने मोह लिया था ।घर की जो थोड़ी-बहुत सिलाई-बुनाई कर देती थी अब मुझे नहीं करनी पड़ती थी ।छोटी बहन के बर्थ -डे पर सुबह से शाम तक जुटी रही थी वह ।बड़े उत्साह से सारा काम निपटाया था और जब उसके खाने का समय आया तो बहुत सी वस्तुएं समाप्त हो चुकीं थीं । अम्माँ के बार-बार पछताने पर उसने जवाब दिया ,' अम्माँ ,अपने हाथों से पराँठे बना कर खिला दीजिये , म्रेरे लिये तो वह मिठाई से भी बढ़ कर होंगे !'
और वह पराँठों से पेट भरकर चली गई थी।
वह जो फ़्राक का पीस प्रेज़ेन्ट मे लाई थी वह लौटाने को मैने अम्माँ से कहा तो उन्होने साफ़ मना कर दिया कि ऐसे प्यार से लाई गई चीज़ वे वापस नहीं कर सकतीं । मैने वापस करना चाहा ,मेरे बर-बार कहने पर वह कुछ रुआँसी हो आई ,' दीदी ,इतना पराया समझती हैं आप ?'
फिर आगे मैने कुछ नहीं कहा था ।
सब अपने मतलब के लिये ,सोचा था मैने । चलते समयकह दिया था ,' कोई भी किताब चाहिये हो तो मुझसे ले लेना ।'
'जी ? मेरे पास हैं सब !'
'नहीं कोई लाइब्रेरी से न मिलती हो ,या मेरी कोई चाहिये हो तो -- ' मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया !
अम्माँ के लिये तो विलक्षणा 'बिलू' बन गई थी ,थोड़े दिन नहीं आती तो मुझसे पूछतीं ,' बहुत दिनो से बिलू नहीं दिखी । बीमार है क्या ?'
' नहीं कालेज तो रोज़ आती है ।'
'कह देना उससे आने को । तुम्हारे बस का तो है नहीं ,वही सिल जाएगी टेरिकाटवाली फ़्राक !'
मै स्वयं उससे अपने घर आने को कहूँ इसमे मुझे अपनी हेठी लगती थी । मेरा कोई काम उसके बिना थोड़े अटकता था । फिर भी मुझे साड़ियों मे फ़ाल लगे और बार्डर टँके मिलते थे ।मै भी जानती थी कौन करता है यह सब , पर मैने कभी कुछ नहीं कहा ।
गर्मियों की छुट्टियों मे भी उसका हफ़्ते मे एक चक्कर लग ही जाता था ।उस दिन विलक्षणा आई तो अम्माँ घर पर लहीं थीं । मुझे बड़ी उलझन होने लगी । अब क्या मै इसे चाय बना कर पिलाऊं ,अम्माँ ने भी खूब तमाशा लगा रक्खा है ! नहीं पिलाऊँगी तो सोचेगी अम्माँ तो इतनी ख़ातिर करती हैं ,और मैने यों ही टरका दिया ! पर मै काहे को ख़ातिर करूँ मेरी तो स्टूडेन्ट है ?मै पसोपेस मे पड़ी थी । मुझे लगा वह भी उलझन मे है । कुछ देर बैठी किताबें पलटती रही, फिर उठकर खड़ी हो गई ।
' दीदी ,अब चलूँ ?'
'क्यों बैठो चाय पीकर जाना ।'
पर कह कर मै मन ही मन पछताने लगी । चली जाती तो कौन सा गज़ब हो जाता ! हमेशा तो खा-पी कर ही जाती है एक बार नहीं ही सही !
'अच्छा आप अपना काम कीजिय़े ।मै बना लाती हूँ चाय ।'
वह उठ कर रसोई मे चली गई ।
चलो अच्छा हुआ ।बिना बनाए चाय पीने को मिल जाएगी ।बना भी लेगी तो क्या हुआ ,स्टूडेन्ट है मेरी ! और मै भी तो हमेशा उसकी डिफ़ीकल्टी दूर करने को तैयार रहती हूँ ,और कौन करता है उसके लिये इतना भी ?
चाय पीते-पीते मुझे लगा विलक्षणा बड़ी परेशान है । होगी ,मुझे क्या करना ? पर फिर रहा भी नहीं गया ।
' क्या बात है ,विलक्षणा ?'
मेरी आँखें अपने चेहरे पर जमी देख वह कुछ अस्थिर हो उठी । मेरी इच्छा हुई प्यार से उससे कहूँ 'बिलू ' जैसे मेरी अम्मा कहती थीं ,जैसे उसके घर के लोग कहते होंगे ! पर मैने कहा नहीं ,उससे दूरी जो बनाए रखना चाहती थी ।
'मै यदि तुम्हारे कुछ काम आ सकूँ तो कहो ?'
' नहीं दीदी ,आप कुछ नहीं कर सकतीं । मेरी माँ बीमार हैं ।'
उसकी माँ सौतेली थीं अधिकतर बीमार ही रहती थीं ,एक बड़ा भाई घर छोड़ कर कहीं चला गया था ,यह भी अम्माँ ने ही बताया था । यह उन्हें भी नहीं पता कि वह चला क्यों गया। दूसरे के घर की बात ,हमे करना भी क्या था ?
एकदम से मुझे लगा विलक्षणा भी स्वस्थ नहीं है । मैने ध्यान से देखा काफ़ी दुबली लग रही थी । बड़ी दया आई मुझे उस पर, !विलक्षणा शायद समझ गई मेरी दृष्टि को ! उठ कर खड़ी हो गई। फिर वह रुकी नहीं चसी गई ।

इसके बाद भी वह कई बार आई थी पर मेरी उपस्थिति मे नहीं । मेरी साड़िय़ाँ भी संवारी उसने बहिन की फ़्राकें भी सिलीं ,अम्माँ के जाने क्या-क्या काम भी करती रही । पर उसने कभी मुझसे किताबें नहीं माँगी ,न कोई सहायता ली । फ़ाइनल की परीक्षा दे दी उसने ।
सेकिण्ड डिवीज़न पास हो गई विलक्षणा ! बी.ए. की बाईस छात्राओं मे से केवल चार की सेकिण्ड डिवीज़न आई थी ,उन्ही मे एक वह भी थी ।
बीच ने कई बार वह अम्माँ से मिल गई थी ,मेरे लिए मिठाई भी रख गई थी , पर मेरा उसका सामना फिर नहीं हुआ । मुझे लगा ,अब उसकी परीक्षा हो गई है ,वह पास हो गई है ,अब उसे मेरी ज़रूरत भी क्या है ! और वह मेरे ध्यान से उतर गई ।
*****
छुट्टियाँ समाप्त हो चुकीं थीं ,कालेज खुलने ही वाले थे । घूम-घाम कर मै वापस घर लौट आई थी ।बड़ी उत्सुकता से अपनी डाक देख रही थी ,एक पत्र विलक्षणा का भी था - कहीं सर्विस कर ली थी उसने । खोल कर पढ़ा और देखती रह गई ! उन पंक्तियों से आँखें नहीं हट रहीं थीं। उन अक्षरों से परे और जाने क्या-क्या पढ़े जा रही थी मै । उसने लिखा था --
'आपके साथ से मैने अनुभव कर लिया कि माँ और बहिन का स्नेह कैसा होता होगा ! आपकी आभारी सदैव रहूँगी , धन्यवाद देकर सहज ही उऋण होने का साहस मै नहीं कर सकूँगी । वह स्नेह तो चिर- काल मेरे जीवन मे प्रकाश और स्फूर्ति भरता रहेगा --।'
स्तब्ध रह गई थी मै ! पता नहीं उसके मन मे कितने अभाव थे जिन्हे मुझसे भरने का व्यर्थ प्रयत्न करती रही वह । मेरी कितनी साड़ियाँ उसने सँवारीं ,कार्डिगन बुने और ब्लाउज़ सिल कर रख गई ।और अब वह चली गई ।मेरे पास था भी क्या उसे देने को ?
पूरा वर्ष बीत गया ।बीच मे ही उसके पिता ने सट्टे मे हार कर आत्महत्या कर ली ,कई मुखों से कई तरह की बातें उसके लिए सुनने मे आईँ । फिर सुना सौतेली माँ और बहनों को विलक्षणा अपने साथ ले गई । मेरी उससे मुलाकात नहीं हुई । मैने कई बार मिलने की कोशिश की पर ऐसा मौका आया नहीं ।

कालेज का टूर जा रहा था ।शरद-पूनम की रात मे ताजमहल देखने का कार्यक्रम बना था । तीन दिन जी भर कर आगरा घूमे । दूसरे दिन की शाम को चचेरी बहिन बीना के पति मुझे बुलाने आगये । बीना जीजी किसी तरह लौटने नहीं दे रहीं थीं पर 'ड्यूटी पर हूँ ,लड़कियों के साथ हूँ 'आदि कह कर बड़ी मुश्किल से आने की अनुमति ली । लौ़ते सम. रास्ते मे देखा विलक्षणा जा रही है ।किसी तरह मिल जाय वह ! उसके लिये इतना व्याकुल हो जाऊँगी ,मैने स्वप्न मे भी नहीं सोचा था।सोयी स्नेह-भावना जाग उठी थी ,मन उमग रहा था देने के लिये ! पर अब वह लेगी नहीं ।पड़ा रहेगा व्यर्थ जड़ सा होकर !
मै भी कैसे धोखे मे पड़ी रही ।नारी होकर एक नारी के हृदय का सहज स्नेह न ले सकी ,न दे सकी । उलकी सरलता मे मुझे दुनियादारी की गन्ध आने लगी थी ? धिक्कार है मेरी सावधानी ! उसने मुझसे लिया ही क्या ? पर मुझे बहुत कुछ दे गई । विश्वास ,जीवन का सबसे बड़ा संबल उसके पास था ,और मै धोखे की टट्टी मे अपने को उलझाए बैठी हूँ । अमृत उसके पास था पानी मेरे पास ! पानी ,जिसकी प्यास कभी बुझती नहीं ! और अमृत पिला गई वह ,जिसे पीकर मै आकण्ठ तृप्त हो गई हूँ ।
तेरी चिर ऋणी हूँ मै ,ओ विलक्षणा ,एक बार आ जा !
पर अब वह कभी नहीं आएगी ! मुझे देखकर कतरा जाएगी । मुझसे मिलेगी नहीं वह ,कभी नहीं मिलेगी ! अपना जो अभाव मेरे अनजाने वह मुझी से भरती रही, अब जान- बूझ कर उसे भरने नहीं देगी । कैसी विषम प्रकृति है ! विलक्षणा अब देखेगी तो मुँह फेर लेगी मुझसे ।अब वह कभी नहीं आएगी मेरे पास । कभी नहीं !

*

पाकिट

स्कूल से लौटते ही उसने बस्ता सोफ़े पर फेंका और मेरे गले मे हाथ डाल कर पीठ से झूलते हुए बोली ,'मम्मी... ! '
' क्या बात है?'
'मम्मी ,हमे भी पाकिट मँगा दो ।'
'अच्छा,अच्छा ,मगा दूगी ! पहले कपड़े बदलो और खाना खाओ ।'
खाना खाते-खाते भी वह पाकिट की बात करती रही उसकी डिब्बी भी बन जाती है ,हवाई जहाज़ भी । कैंची से काटें तो लालटेन निकल आए । रीना के, मन्टू के पास तीन-तीन हैं ।
' अ, पापा से कहना बाज़ार से ला देंगे ।'
'पापा से तो हमने कहा था । वो कहते हैं हमे नही पता ।'
'कब कहा था ?'
' कल भी कहा था ,पहले भी कहा था ।'
' अच्छा , अब मै भी कह दँगी ।'
पर पता तो मुझे भी नहीं था कि वह काहे के लिए कह रही है । मैने पूछा ,'अच्छा पाकिट क्या चीज़ है ?'
'पाकिट है।'
' पाकिट क्या ?'
'पाकिट है पाकिट ,जैसा सुधीर के पास है ,मोना के पास है और सब के पास है ।'
चार साल की बच्ची को मै कैसे समझाऊँ कि जो चीज़ सिर्फ़ उसने देखी है ,मै नहीं जान सकती ।
'किसी के पास से लाकर दिखाओ ,देखूँ कैसा है ।'
' कोई नहीं देगा मम्मी , अपना पाकिट ।'
'अच्छा कितना बड़ा है ?'
उसने अपनी छोटी-सी गुलाबी हथेली खोलकर नाप बता दी । सफ़ेद रंग का है ,ऊपर लालटेन का फ़ोटू है और लिखा भी है ।क्या लिखा है ये पता नहीं -अभी जितना पढ़ना आता है उसे ,वह तो मजबूरी मे जितना पढ़ना पड़ता है उतना ही पढ़ती है ,बिचारी !
शाम को खेलने गई तो थोड़ी देर मे वापस लौट आई । सबके पास पाकिट हैं उनसे खेल होता है रीनी के पास हई नहीं ।वह उदास होकर घर लौट आई ।उसका चेहरा देखकर मुझे बड़ा तरस आया ।
' नानक की दूकान पर मिलता है ?'
'पता नहीं ।'
' और लोग कहाँ से लाए ?'
'सब अपने घर से लाते हैं ।'
मैं चक्कर मे पड़ी - सब के घरों मे पाकिट हैं ,हमारे घर मे नहीं और हम जानते तक नहीं कि यह क्या चीज़ है , कैसी होती है ।
'अच्छा अबकी से सुधीर आए तो तुम उसका पाकिट दिखा देना हम तुम्हारे लिए भी ला देंगे ।'
इनके बाज़ार जाते समय भी उसने याद दिलाई ,' पापा ,हमारे लिे पाकिट जरूर लाना है ।'
'बेटे , हमें पता नहीं पाकिट कैसा होता है ।'
'पापा सबके पास तो है ।'
मैने बीच में दखल दिया ,' कैसा पाकिट कह रही है ? ला क्यों नहीं देते -इतने दिनों से रट लगाए है ।'
' पर है क्या, कुछ पता भी तो चले ।'
' तो ऐसा कीजिये ,इसे अपने साथ लेते जाइये ।अपने आप देखकर ले लेगी ।'
अच्छा चलो। रीनी बेटे कपड़े बदलवा आओ ।'
ढाई घन्टे बाद बाप-बेटी दोनो मुँह लटकाए लौट आए ।
'क्यों मिल गया पाकिट ?'
रीनी तो रोने-रोने को हो आई ।ये झल्लाए हुए थे ,बोले अब तुम्हीं जाकर खरिदवा दो ।हम तो सारी बाज़ार ढूँढ फिरे , कहीं मिला नहीं ।'
इनसे डाँट खाती है तो मेरे पास आ बैटठती है ,ये उसकी पुरानी आदत है ।
मैने सिर सहलाकर कहा ,'जाओ अपना स्कूल का काम कर डालो ,मै तुम्हारे लिए पाकिट मँगा दूँगी ।'
वह आश्वस्त होकर चली गई ।

सौदा लाने में इन्होने हमेशा मुझे झिंकाया है ।एक से दूसरी दूकान देखने ंमे इनकी शान घटती है ।जिस दूकान पर ठहर जायेंगे उसी से सारा सामान खरीद लेंगे - चाहे सड़ा हो, गला हो , देखेंगे तक नहीं । घर पर आने के बाद कुछ कहो तो कह देंगे ,'मै क्या करूँ उसके यहाँ और था ही नहीं ।'
अरे ,आदमी दो-चार दुकाने देख कर पूरी तसल्ली कर सामान लेता है ! पर मजाल है जो ये एक दूकान से दूसरी तक बढ़ भी जायँ ।कभी-कभी तो ऐसा सामान लाकर पटका है कि पड़े-पड़े सड़ता रहा और अंत मे कूड़े में फेंक देना पड़ा । मै तो इनकी खरीदारी जानती हूँ ,रीनी का पाकिट ठीक से ढूँढा थोड़े ही होगा !
मैंने रीनी से पूछा ,' क्यों रीनी ,पापा ने कहाँ-कहां ढूँढा था पाकिट ?'
'खूब सारी दुकाने देखी थीं ,' आशा के विपरीत उत्तर मिला ।
बाप-बेटी देने एक से हैं !
दुकानदार को अपनी बात समझा नहीं पाए होंगे ,नहीं तो सबके पास जो चीज़ है ,वो इन्हे ढूँढे नहीं मिलती ! अब मुझे ही जाना पड़ेगा ।
अगले दिन उसके स्कूल में छुट्टी थी। मैने रीनी से कहा ,'नानक की दुकान पर देख आओ ,पाकिट है ?'
नानक मोहल्ले की परचून की दूकानवाला है , बच्चों के मतलब की चीज़ें भी रखता है थोड़ी-बहुत ।
वह दौड़ी-दौड़ी चली गई पर आधे रास्ते जाकर लोट आई ,' मम्मी ,पैसे तो दिये ही नहीं ।'
'पहले तुम देख तो आओ जाके ।'
' ऐसे तो वो देगा भी नहीं और कह देगा भाग जाओ यहाँ से ।'
मुझे हँसी आ गई - बड़ी समझदार हो गई है मेरी बिटिया ! मैने पाँच रुपए का नोट उसे पकड़ा दिया ।
पर पाकिट उसे नानक की दूकान पर भी नहीं मिला ।

सब बच्चे अपने पापा से पाकिट लेते हैं ,बस रीनी के पापा के पास नहीं है ,उसके लिये शरम की बात है !
इनके आने पर फिर वही रट ! दो-तीन बार इन्होने उसे समझाया , देखा , नहीं समझती ते बुरी तरह डाँट दिया ।वह चुपचाप रोने लगी ।
बच्चों का चुपचाप रोना मन को कितना बुरा लगता है !मुझे बोलना ही पड़ा ,'इस बुरी तरह झिड़क दिया लड़की को ! ज़रा सी चीज़ लाकर दे नहीं सकते ?'
'तुम तो उसी की तरफ़ बोलोगी ! हर बखत पाकिट-पाकिट-- हमारी तो समझ मे नहीं आता आखिर है क्या चीज़ !'
मैने उसे पाँच रुपए का नोट दिया पाकिट के लिए , पर उसने फेंक दिया और रोती रही ।.

*
मेरी अच्छी मुसीबत है ! ये तो डाँट फटकार कर छुट्टी पा लेते हैं ,वह रोती हुई मेरे पास आती है । इन बापों का ढंग भी बड़ा अजीब होता है - कभी तो उसे इतना प्यार करेंगे और कभी एकदम फटकार देंगे ।इनके आगे वह अधिक बोल भी नहीं पाती ,डाँट खाते ङुए सहम जाती है ।पर मुझे तो उसका मन रखना ही है ।
रीनी तीसरे पहर फिर खेलने नहीं गई ।सब बच्चे जान गए है कि वह पाकिट नहीं मगा पाई .-उसे दिखा-दिखा कर और चिढ़ाते हैं ।इसलिए वह खेलने ही नहीं जाती ।उदास अकेली बैठी देखकर मेरा मन कचोटता है ।दो साल छोटे टोनू से उसकी बिल्कुल नहीं पटती ,वह तो कभी उसके रिबन खींचता है कभी बाल नोचता है ।

'रीनी , कल सुबह स्कूल जाते समय सुधीर से पाकिट लेकर मुझे दिखा देना फिर मैं तुम्हारा खरीद दूँगी ।'

सुबह का समय क्या किसी तूफ़ान से कम होता है ।रीनी तो फिर भी सीधी है ,दो साल का टोनू तो ज़रा सा मन के खिलाफ़ होते ही आसमान सिर पर उठा लेता है - उस पर न बाप की फटकार का असर , न मेरी पुचकार का ।अपनी पूरी बात बोल नहीं पाता तो क्या हुआ बे-मन की बात होने पर ऐसा धमकाता है ।पहली स्टेज होती है नीचे का होंठ सिकोड़ कर पूरा बाहर निकाल कर छ: कोने का मुँह बना कर रोने की तैयारी ।इस पर अगर कोई ध्यान न दे तो दूसरी और आखिरी स्टेज है -खूब ज़ोर से रोने की और वह भी आँखें बन्द करके कि कहीं किसी की पुचकार से रोने की मुद्रा भंग न हो जाए ।रुदन पूर्व की छ: कोने के मुँह और होंठ बाहर फुलाने की आदत तो तब की है जब वह तीन महीने का था ।पहने तो ऐसा मुँह देखकर मुझे बड़े ज़ोर की हँसी छूटती थी - दो चार बार सास वगैरा ने टोका तो अब हँसने पर काफ़ी कंट्रोल कर लिया है । मेरी रीनी ने ऐसा कभी नहीं किया वह सीधे-सीधे रोती है ।
सात बजे रीनी का रिक्शा आ जाता है ,छ: बजे से उसे जगाकर उसके पीछे लगती हूँ - बीच-बीच में टोनू की इमरजेन्सियाँ पूरी करती हूँ और जब वह खा - पी कर समय से तैयार होकर रिक्शे पर बैठ जाती है तो मुझे लगता है एक किला फ़तेह कर लिया । इस सब के बीच दूध गर्म करना , ठण्डा करना ,टोनू की शीशी भरना , शूशू कराना चलता रहता है ।
रीनी को रिक्शे पर भेज कर मैंने चैन की साँस ली ही थी कि रीनी की आवाज़ आई ,' मम्मी --मम्मी--'
'क्या हो गया ?' हाथ मे सँडासी लिए मै दौड़ी-दौड़ी ज़ीने पर आई ।
' मम्मी ये रहा सुधीर का पाकिट --' वह रिक्शे ंमे से चिल्लाई ,'सुधीर ,जल्दी दिखाओ मेरी मम्मी को --।'
सुधीर अपने बस्ते मे कुछ ढूँढ रहा था ।
मेरे पीछे-पीछे टोनू घिसटता चला आया था । मेरी साड़ी की चुन्नटें पकड़ कर वह ऊपरवाली सीढी पर खड़ा उछल-उछल कर नीचे रिक्शे पर ,रीनी को देख किलक रहा था ।नीचे को बढता उसका पाँव देखकर मैने एक हाथ से उसे सम्हाला ,आवाज़ लगाई ,' रीनू, जल्दी दिखा पाकिट ।'
सुधीर ने अपने बस्ते ंमे से कोई सफ़ेद सी चीज़ ऊपर उठाकर दिखाई ,इतने मे दूध जलने की महक आई ।
अरे , मै तो सारा दूध आग पर छड़ा आई थी !,सड़सी से उतारने जा रही थी कि रीनी की आवाज़ सुनी ।इधर टोनू एक साथ सारी सीढियाँ फलाँगने ने की कोशिश में ।मैने खींचा तो उसने बड़ी जोर से होंठ निकाल कर मुझे धमकाया , तभी रीनी का रिक्शे वाला चिल्लाया ,' जल्दी करो ।'
'मम्मी देख लिया पाकिट ?'
'हाँ,हाँ--' करती मै एक हाथ से टोनु को खींचती ,दूसरे हाथ में सड़ासी सम्हाले अन्दर भागी -दूध उतारने ।मैने सोचा लौटकर आएगी तब देख लूँगी ,पर उस दिन किसी कारण हाफ़ डे मे ही छुट्टी हो गई , वह जल्दी ही लौट आई । मुझे पाकिट देखने का मौका नहीं मिला ।
*
शाम को बाज़ार जाने का प्रोग्राम बना ,बना क्या मैंने जान-बूझकर बनाया ।वैसे मुझे बज़ार जाने का कोई शौक नहीं है । पर अब तो पाकिट लेना था ।
हमलोगों ने सारा बाज़र छान मारा । दूकानदारों को समझाना मुश्किल हो गया कि पाकिट है क्या ।रीनी अपने ढंग से समझाती थी और वे समझ न पाकर उसे ही बहलाने की कोशिश करते थे ।वे अपनी ही कोई चीज़ भिड़ाने के चक्कर मे रहते ।पर बहल जाय तो रीनी कैसी !हम लोगों ने भी उसे समझाया ,कई खिलौने दिखाए - 'कहा तुम ये लेलो ये पाकिट से भी अच्छे हैं ,और किसी के पास ऐसा है भी नहीं ।'
पर उसकी एक ही रट '-हमें तो पाकिट चाहिए ,स बके पास है हमे भी चाहिए ।'
अब तो मैं भी परेशान हो गई, 'जो चीज़ कहीं मिलती ही नहीं ,तुम्हारे लिए कहाँ से ला दें ?हमने तो कभी देखी भी नहीं ।'
'सुधीर की दिखाई तो थी ।'
'कहाँ देख पाई मै !टोनू नीचे कूदा जा रहा था उधर दूध उबल गया -- ।'
रीनी फिर उदास हो गई ।मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था ।
शाम हो गई थी । मौसम सुहावना था । मैने सोचा जल्दी घर पहुँच जाएँगे तो ये अकेली चुपचाप बैठी रहेगी खेलने भी नहीं जाएगी ,रास्ते में ही थोड़ा समय निकाल दें ।
'चलो पैदल ही घर चलें रिक्शा लेकर क्या करेंगे ?'
'तुम्ही थक जाओगी , मुझे क्या -- ।'
हम लेग लौट पड़े ।
आज तो हद हो गई !बीस पच्चीस दूकानो पर पूछा पाकिट किसी के पास नहीं  !ऐसा क्या अजूबा है ?

नुमायश ग्राउण्ड की सफ़ाई हो गई थी ,उधर से निकल चलेंगे तो काफ़ी चक्कर बच जाएगा । हम लोग नुमायश की तैयारियाँ देखते हुए चलते रहे । पूरा मैदान एकदम साफ़ है ,जगह-जगह फाटक लग रहे हैं ,बिजलीवालों के तम्बू गड़े हैं बिजली की फ़िटिंग चल रही है क्यारियों में फूलों की पौध तैयार हो रही है ।हप़्ते भर बाद यहाँ खूब रौनक रहेगी ,शहर के लोग इधर ही उमड़ पड़ेंगे ।लाउड-स्पीकरों के शोर के मारे एक-एक बजे तक सोना मुश्किल हो जाएगा !
गर्मियों की सुहावनी शामें बड़ी जल्दी ढल जाती हैं । नुमायश ग्राउण्ड की इक्की-दुक्की बिजलियाँ जल गईं थीं ,बिजलीवलों के तम्बुओं से हम जरा आगे बढ़े ही थे कि दैड़ती हुई रीनी चिल्लाई ,'मम्मी ,मम्मी , वो रहा पाकिट ! '
उसने झुक कर जमीन से कुछ उठाया ,फ्राक से उसकी मिट्टी पोंछी और दोनो पथेलियों से दबा कर सीने से लगा लिया ।
'देखें तो क्या है ,' हम दोनों उत्सुक होकर एक साथ भागे ।
उसने खोल कर दिखाया -
सिगरेट का एक खाली पैकेट ,जिस पर लालटेन की तस्वीर बनी हुई थी !
*