*
घर में घुसते ही सुदीप ने पूछा -
' क्यों रमा वह कौन था ,जो बस में तुम्हें नमस्ते कर रहा था ?'
' मुझे नहीं पता ।'
' उसने तुम्हें नमस्ते की ।ऐसे कोई किसी को नमस्ते करता है ?'
रमा को हँसी आ गई -' पता नहीं कौन है ।मुझे खुद ताज्जुब होता है ।'
' हाँ, पिछली बार भी की थी ,मैं तो वहीं खड़ा-खड़ा देख रहा था ।'
' हाँ, मुझे मालूम है ।तुम मेरे साथ ही थे ।'
' मुझे तो कभी नहीं करता ।'
' अच्छा ! हो सकता है ।मैंने ध्यान नहीं दिया ।'
कुछ दिन बाद फिर वही ।वह बस में मिला उसने रमा को देखा फ़ौरम नमस्ते की ।
' आज फिर उसने तुम्हें नमस्ते की ?'
' हाँ ।'
' और तुमने जवाब दिया ?'
' कोई नमस्ते करे,तो जवाब कैसे न दूँ ?'
' हुँह,।न जान न पहचान । फिर नमस्ते का क्या मतलब ?'
' जब कोई नमस्ते कर रहा है तो जवाब में अपने सिर हिल जाता है ।आदत ही ऐसी पड़ी है ।न करूँ तो बड़ा अजीब लगेगा ।'
' अजीब क्या ?और जब वह अकेली तुम्हें नमस्ते करता है ,मैं उल्लू सा खड़ा देखता रहता हूँ ,तब तुम्हें अजीब नहीं लगता ?'
चौथे-पाँचवें दन फिर वही ।
बस में सवार होते ही देखा वह बैठा है ।
एकदम रमा को हाथ जोड़े ।रमा के पीछे सुदीप आगे-पीछे हो रहा है ,फिर रमा के कंधे पर हाथ रख जताने की चेष्टा की कि वह भी उपस्थित है ।तब तक वह खिड़की से बाहर देखने लगा था ।
*
बस से उतरते ही सुदीप ने कहा- ' देखा ?'
सुधा ने धर-उधर देखा - ' क्या ?'
' आज फिर उसने नमस्ते की और सिर्फ़ तुम्हे । जब कि साथ में मैं भी था ।'
' अच्छा , की होगी ।तुम पीछे थे मैंने देखा नहीं ।'
' अच्छा क्या ?तुम भी तो खूब मुस्करा कर जवाब देती हो उसे। तभी तो हिम्मत बढ़ रही है उसकी ।
' कैसी बातें करते हो ।तुम तो पीछे थे ,तुमने कैसे देख लिया मैं मुस्करा रही हूँ ?'
' साइड से अन्दाज़ नहीं मिलता जैसे ।कैसे बन रही हो जैसे तुम्हें पता ही नहीं ।तुम्हें मज़ा आता है ।और मुझे वह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ।'
'अच्छा-बुरा लगने का सवाल ही कहाँ ?न हम लोग उसे जानते हैं न उससे कोई मतलब है ।'
' कम से कम मैं तो नहीं जानता ।तुम्हारी तुम जानो ।और मतलब कैसे नहीं ?'
फिर उसने और जोड़ दिया - ' जानती नहीं तो उसकी हिम्मत कैसे बढती ?'
' हिम्मत से क्या मतलब तुम्हारा ?'
' किसी अनजान महिला को इस तरह नमस्ते करना !'
' हो सकता है वह मुझे जानता हो ,मुझे ध्यान न आ रहा हो ।'
' और सिर्फ़ तुम्हें ! हर बार .तुम्हारा ही ध्यान है उसे ?वह भी जब पति साथ में हो ?'
' उफ़्ओह ,तुम तो तिल का ताड़ बनाते हो ।
' तुम तो ऐसे कहोगी ही ।'
' बेकार बात मत करो !जानती होती तो छिपाने से मुझे क्या फ़ायदा ?जैसे और पचास लोगों को जानती हूँ ,उसे भी जानने से क्या फ़र्क पड़ता !'
' अचछा-अच्छा रहने दो ।अब इतनी भी सफ़ाई देने की क्या ज़रूरत है ?'
*
सुदीप कुछ खिंचा-खिंचा सा रहता है, और काफी गंभीर भी ।
कुछ दिन बाद सब सहज हो गया ।
पर उस दिन फिर -
सुदीप और रमा खरीदारी कर रहे थे ,कि सुदीप के कानों में रमा की आवाज़ पड़ी -' अरे, वह यहाँ है ।'
सुदीप भी उसकी ओर देखने लगा और उसने झट् से रमा की ओर हाथ जोड़ दिये -सिर्फ़ रमा को ।रमा ने सिर झुका कर प्रत्य्त्तुर दिया ।
सुदीप का चेहरा कठोर हो गया ।
*** 2
बस में जगह नहीं एक हाथ में बंडल पकड़े कोहनी में पर्स लटकाये ,दूसरे से ऊपर का रॉड थामे रमा बार-बार हिचकोले खा रही है ।
दोनो में से किसी ने देखा नहीं पाया कि उधर वह बैठा हुआ है ।
वह तुरंत अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ ,रमा से बोला ' आप यहाँ बैठ जाइये ।'
रमा ने एक क्षण सोचा नहीं बैठूँगी तो उसका अपमान होगा सबके सामने ।और ऐसे हिचकोले खाते लोगों से टकराते रहना ! यह तो औऱ भी तमाशा बनना है ।
वह बंडल सम्हाले छड का सहारा लेती हुई ,उसकी सीट पर जा कर बैठ गई - ' बहुत बबुत धन्यवाद !'
' सुदीप के चेहरे पर तनाब की रेखायें खिंच गईं ।'
भीड़ बढती जा रही है। पर रमा ने सुदीप की प्रतिक्रिया देख ली ।
सोच रही थी ऐसे तो अनजाने आदमी भी महलाओँ को सीट दे देते हैं । क्या बैठने से मना कर देती ?कोई खास बात तो है नहीं । पर सुदीप ?
मन में क्या है साफ़-साफ़ नहीं कहेगा । निगाहों से बता देगा और व्यवहार से कोंचता रहेगा ।
सीट देनेवाला जाने कहाँ उतर गया । सुदीप को भी बैठने को जगह मिल गई है ।
आगे -पीछे लोग खड़े हैं ।रमा अपने ही सोच में कि पीछे से तुर्श आवाज़ आई - ' उतरना भी भूल गईँ क्या ?'
वह चौंक कर उठ खड़ी हुई ।
चुपचाप घर पहुँचे ,चुपचाप खाना हुआ ।
अंत में सुदीप ने कहा- ' देखो रमा बात हद से आगे जा रही है ।'
' क्या मतलब है तुम्हारा ?'
' अब भी मतलब पूछ रही हो ? जैसे समझती नहीं हो ।'
' क्या कहना चाहते हो ,साफ-साफ़ कहो ।'
' ज्यादा भोली मत बनो !कैसे उठ कर उसने जगह दी ,कैसे प्यार से तुमने धन्यवाद दिया । मैं भी तो खड़ा था मेरी तरफ़ देखा भी नहीं ।'
' हिचकोले खाती महिलाओं को भले लोग अक्सर अपनी सीट दे देते हैं ।'
' तो वह भला लोग भी हो गया ।बस में भी जब मिलता है ,अकेली तुम्हें नमस्ते । बेशर्म कहीं का ! मैं साथ में हूँ पर उसके लिये तुम्ही सब कुछ । मैं तो कुछ हूँ ही नहीं जैसे । और तुम्हें इसमें मज़ा आता है ।'
' बात का बतंगड़ मत बनाओ ।उसके जगह देने पर उठने पर न बैठना तो असभ्यता होती ।बस में तमाशा करना मुझे ठीक नहीं लगा ।'
'और धन्यवाद देने के बहाने बोलना भी जरूरी था ।एक बार मना कर देतीं आगे उसकी हिम्मत नहीं पड़ती । न नमस्ते करने की न कुछ और की ।'
' मैं कोई गँवार औरत नहीं हूँ जो साधारण सी औपचारिकता भी न निभा सकूँ ।'
' गँवार नहीं हो शहर की पढ़ी-लिखी हो इसीलये तो ज्यादा कलाकार बनती हो ।'
' बस करो सुदीप ! इससे ज्यादा सुनना मेरे बस का नहीं ।'
' तो क्या करोगी ,बुला लोगी उसे ,चली जाओगी उसके पास ?'
' बात मत बढाओ ।जब तक कोई सुबूत न हो बेकार तोहमत मत लगाओ ।'
' तोहमत ?सुबूत ?सामने -सामने सब हो रहा है ।'
रमा की समझ में नहीं आता कैसे सुदीप को विश्वास दिलाये कि वह उसे जानती तक नहीं ।वह हमेशा नमस्ते ही तो करता है ।क्या करूँ मैं ?
उत्तर में अनदेखी करना उससे नहीं होता अपने आप सिर हिल जाता है ।कहीं कुछ ऐसा नहीं जो मन को खटके ।वह खाली रमा को नमस्ते करता है तो रमा क्या करे ?लौट कर कहे कि इन्हें भी नमस्ते करो ,ये मेरे पति हैं ?
और चार दिन निकल गये ।सुदीप गंभीर रहने लगा । आपस में बस जरूरी बातें ।
** 3
उस दिन काम से लौटा तो बड़ा खुश था ।सीटी बजाता घर में घुसा ।गनगुनाता रहा ।
चलो ठीक हो गये रमा ने सोचा ।
सुदीप ने ही चुप्पी तोड़ी -
' रमा, तुमने उसे कभी अपने घर में देखा था ?वही जो तुम्हें नमस्ते करता है ।'
अब यह कैसी बात ?
' पिता जी के पास कॉलेज के इतने लड़के आते हैं ।मैं किसे-किसे देखती फिरूँ ?'
' हूँ ।ठीक है ।'
' देखो , मैंने एक बार कह दिया कि मैं उसे नहीं जानती ।अब तुम नई-नई बातें मत निकालो ।'
' हाँ हाँ ,तुम कैसे जानोगी उसे ?'
' यह कैसी टेढी बात?क्या मतलब है सुदीप ?'
रमा को बड़ा अजीब लग रहा था ।
सुदीप कहने लगा ,' तुम्हारे पिता जी का स्टूडेंट रहा है वह ।दो-एक बार तुम्हारे घर गया तभी देखा था उसने तुम्हें।'
' अच्छा !'
' आज पता चल गया ।'
' क्या ?'
' कि वह कौन है ।'
' कैसे पता चला ?'
' मुझे मिल गया था । तुम्हारे भाई के साथ था ।उसने परिचय कराया ।बात-चीत होने लगी । मैने कहा बस में कई बार आपको देखा है ।कौन सी बस में यह भी बताया ।
उसने कहा उस बस से तो वह अक्सर जाता है ।
' मैंने कहा उस बस में मैं भी होता हूँ कभी-कभी अपनी पत्नी के साथ। पर आपको कभी मेरी ओर देखने की फ़ुर्सत कहाँ होती है ?
पर आप कब मिले मुझे ?
फिर मैने याद दिलाई ।बस की बात भी ,अपनी सीट दे देने की बात ।
' फिर बताया -वही है मेरी पत्नी रमा !?
तो आप उनके पति हैं ।
पता होता रमा बहन के पति हैं तब तो ..ध्यान जाता । आपको तो आज जाना है ।
अब समय आ गया है मिलने का ।उसने एकदम कहा -हाँ मैं तो आनेवाला था दीदी को निमंत्रण देने ।
' मैंने पूछा औऱ मैं? मुझे निमंत्रण भी नहीं ?
फिर उसी ने बताया मुझे । हाँ रमा ,अगले हफ़्ते उसकी शादी है ।बहन का रोल तुम्हें ही निभाना है ।'
रमा बल्कुल चुप रही ।
*** 4
रमा बड़ी चुप-सी है ।सुदीप बार-बार बात निकालता है ।
' मैने तो सोच लिया था किसी तरह पता करना है कि ये है कौन। फिर मौका भी खूब लग गया ।असल में कैंटीन में तुम्हारा भाई मिला था ।और यह उसके साथ था ।'
' तो तुमने सबसे पहले उससे क्या पूछा ?'
' मैंने कहा मैंने कई बार आपको बस में देखा है ।पहले सोचा कह दूँ मेरी बीवी से परचित हो मुझसे नहीं ,पर कहा नहीं ।और अच्छा हुआ जो नहीं कहा ।नहीं तो वह क्या सोचता !'
' हाँ ,वह क्या सोचता उसकी इतनी चिन्ता है ,और मैं क्या सोचती हूँ सका कुछ नहीं लगता तुम्हें ?नहीं तो क्या मुझसे इतना कहते रहते ? ।कभी सोचा मैं क्या समझूँगी तुम्हें ?'
' अरे ,तुम्हारे समझने से क्या फ़रक पड़ता है ?अब तुम्हारे साथ भी सोच-विचार कर बोलूँ ?सही-गलत कुछ भी कह लूँ ।पत्नी हो मेरी !पर सुनो तो ..जब विकास ने परिचय कराया ...।'
' तो तुमने क्या कहा ?'
मैंने पूछा था ,' आप मेरी मिसेज़ को जानते है ?
वह बोला , आपको ?आप कौन हैं मैं तो यह भी नहीं जानता उन्हें कैसे जानूँगा ?
' फिर मैने जब याद दिलाया - कहा मैं भी वहीं खड़ा था ।
और जानती हो उसने क्या पूछा ?पूछने लगा -आप रमा बहिन को जानते हैं ?
कैसे नहीं जानूंगा ,मुझे हँसी आ गई, मैंने कहा , अच्छी तरह जानता हूँ ।पर आप कैसे ?
' विकास ने बताया ,' हाँ क्यों नहीं जानेगा !मेरे साथ प्रोफ़ेसर सा.. के यहाँ कई बार गया है ।
वह बोला था -रमा बहन को जानता ही नहीं मानता भी हूँ ।मुझे उनमें अपनी बहन दिखाई देती है ।
वो भी आपको जानती होंगी ?
एकाध बार उनके घर गया था । कभी परिचय या बात की नौबत नहीं आई ।वे जाने चाहे न जाने, मेरे गुरु की पुत्री हैं मेरे दोस्त की बहिन ,इतना काफ़ी नहीं है क्या मेरे लिये ?समय आने पर वह भी जान लेंगी ।
' मुझे हँसी आई ,मैंने पूछ वह कैसे ? आप तो बस में ही मिलते हैं ?मैंने विकास से भी कहा था । किसी दिन हमारे घर पर आओ ।. इनको लेकर ।'
' अगर ये सफ़ाई तुम उससे नहीं माँगते तो क्या हो जाता ?' रमा की आवाज़ जाने कैसी हो गई थी ।
'अरे, तो क्या फ़र्क पड़ गया ?'
' फ़र्क तुम्हें नहीं पड़ता ,मुझे तो पड़ता है ।'
' मैं सफ़ाई काहे को माँगता । वो तो बात पे बात निकलती गई ।उसकी बहन दो साल हुये एक्साडेन्ट में मर गई ।उसे लगता है वह तुम्हारे जैसी थी ।'
' तो तुम्हारा समाधान हो गया ? अब तो तुम खुश हो ?'
' अरे, निश्चिंत हो गया मैं तो ! .खुशी- नाराज़गी की बात ही क्या !जब पता नहीं हो तो मन में कितनी तरह की बातें आती है - यह तो आदमी का दिमाग़ है ।'
' हाँ ,आदमी का दिमाग़ !शक करना बहुत आसान है ।प्रमाण पा कर विश्वास किया तो क्या किया ?'
' तुम तो बात का बतंगड़ बनाती हो । पता लगाने में क्या हर्ज ?'
तुमने मुझमें कोई दुर्बलता या उसमें कोई कुत्सा देखी जो तुम्हारे मन में तमाम बातें.... ?
' अब ये तो मन है ।दस तरह की बातें होती हैं दुनिया में ।सोचने में तो आती हैं ....?'
' तुम्हारे मन में अविश्वास था । उस पर तो था ही जिसे जानते तक नहीं , लेकिन मुझ पर भी .?'
' अब तो सब साफ़ हो गया ।'
' जासूसी पूरी कर ली ,जब कोई कारण नहीं मिला तो मजबूर हो कर ..।'
' तो क्या हुआ ?मेरा मन बहुत हल्का हो गया ।'
' पर वह बोझ मेरे मन पर आ गया ।अगर मैं कहती वह मेरा प्रेमी है तो तुम मान लेते ?विश्वास कर लेते कि वह मेरा यार है ।'
' यह मैं कब कह रहा हूँ ।पर पिछली कई बार से जो देखता रहा चुभा करता था मुझे ।'
रमा चुप है ।
' अब जब सब ठीक हो गया तो तुम बेकार तमाशा कर रही हो !'
'मैं तुमसे तो कुछ कह नहीं रही ।'
' तुम्हारे मन में गुस्सा है ,कहती नहीं तो क्या हुआ ।'
फिर वह रमा को समझाने लगा -
' अरे ,क्या फ़र्क पड़ता है वह तो वैसे भी अपने घऱ आता ।उसकी शादी होनेवाली है ,बहिन रही नहीं तुम्हें ही तो बुलायेगा ।उसने कहा है ?'
' सुदीप हँसने लगा उसने क्या कहा पता है -हम तो आपके बुलाने से पहले ही निमंत्रण-पत्र ले कर आनेवाले थे ।'
' सब कुछ जानने के बाद बुलाया था तुमने न ?'
' हाँ ,तभी तो ।पहले बुलाने की कौन सी तुक थी ?'
' संशय तुम्हें व्याकुल किये था अब तुम्हे चैन पड़ गया लेकिन मैं ....? '
' लेकिन -वेकिन क्या ?मैं खुश हूँ तो तुम भी खुश रहो ।फ़ालतू बातों से क्या फ़ायदा ?'
कैसी अजीब है रमा, बिलकुल चुप है !
*
सोमवार, 12 जुलाई 2010
बुधवार, 7 जुलाई 2010
रामी -
*
जाने कब सूरज डूब गया ,दूर के हरे-हरे वृक्ष काले पड़ने लगे ,आसमान के एक छोर से शुक्र - तारा झाँक उठा।सड़क के उस पार छप्परों से लहराता हुआ धुआँ आसमान की ओर उठने लगा ।
मुझे लगा रामी छप्पर के ऊपर खड़ी है - वैसा ही भूरा सा लँहगा,मटमैली ओढ़नी,वही सफ़ेद बाल झुर्रियों से भरा चेहरा ;सब कुछ वैसा ही था! ओढ़नी से दोनो हाथ ढँके काँपती-सी आकृति ! वही तो रामी है -हमारी चौका-बर्तनवाली रामी ! वह उस छप्पर से उतर कर सड़क पर जा रही है ,और बिजली के खम्बे पास कमर झुकाये खड़ी हो गई है ।धीरे-धीरे आकृति अँधेरे मे विलीन हो गई। चली गई रामी !
स्मृति की रेखाएँ उभरने लगी हैं। सेठानी ने कहा था,' ये बुड़िया बड़ी मँगती होगई है।तुम्हीं ने सिर चढ़ा रक्खा है ,मुझसे माँगने की हिम्मत नहीं है उसकी।'
रामी के मुझसे परिचय का किस्सा बहुत छोटा,बहुत साधारण है।इस कस्बे मे नई-नई आई ,तब एक बर्तनवाली की जरूरत पड़ी। किसी से जान-पहचान हुई नहीं थी।एक दिन छत पर सूखते हुए कपड़े नीचे जा गिरे और रामी उन्हे उठाकर देने के लिए ऊपर चली आई। मुझे जैसे मुँह-माँगी मुराद मिल गई-उसके बाद से ही वह हमारे यहाँ चौका-बर्तन करने लगी।
रामी ,हाथ की सच्ची थी ,सेठानी के शब्दों मे ,' बड़े डरपोक दिल की है ,कुछ उठाने की हिम्मत नहीं है उसकी!'
उसके काम करते समय जब मै चाय बनाती तो एक प्याला उसके लिये भी रख देती। वह आभार प्रकट करती जाती और चाय के प्याले से अपने ठण्डे हाथ सेंकती जाती। कभी-कभी वह खुद भी फर्माइश कर देती ,'बहूजी, हाथन की अँगुरियाँ अईस ठिठुराय गई हैं..... एक पियाली चाह मिल जाइत तो......।'
यह अच्छी ज़बरदस्ती है, मै सोचती ,अब उठकर इसके लिये चाय बनाऊँ ? मन-ही मन भुनभुनाती पर बुढिया के काँपते हाथ देख कर कुछ कह नहीं पाती और गैस जलाकर चाय का पानी रख देती।वह फिर कहना शुरू करती, 'औरन से तो कबहूँ नाही माँग सकित हैं बहू,मुला तोहार आगे आपुन हिरदै की बात कहि डारित हैं। आज सुबह ते चाय नाहीं पिये रहे ,मूड पिराय रहा है।'
कभी-कभी तो मै चिढ़ उठती कि दुनियां भर के खाँसी - ज़ुकाम के लिये मैने ही चाय बनाने का ठेका ले रखा है! रामी बर्तन समेट कर चौके की देहरी पर चाय का कप लेकर बैठ जाती और मुझे इस भारी उपकार के लिये असीसने लगती। बातें करने मे रामी कभी थकती नहीं।मोहल्ले भर की ख़बरे अपनी बातों मे लपेट कर मुझ तक पहुँचाती रहती।वह सेठानी के घर भी चौका-बर्तन करती थी।सेठ का लड़का और चारों लड़कियाँ उसी की गोद मे खेल कर बड़े हुए थे।वहअपना अधिकतर समय सेठानी के घर ही बिताती थी।एक तो सेठानी का बड़ा-सा खुला-खुला घर ,धूप मे या छाया मे वह बैठ सकती थी,दूसरे बच्चों का मोह ! सेठानी से असंतुष्ट होने पर भी वह बार-बार वहीं खिंची चली जाती थी।
उसने शुरू से थोड़े ही महरी का काम किया था।उसका बाप दर्जी था ,आदमी की अपनी दुकान थी।शादी मे चाँदी के जेवरों से लद गई थी,आठ चीज़ें तो उसके चढावे मे आईं थीं।विगत जीवन की कथा कहते-कहते उसकी आँखें चमक उठती थीं वाणी मे वेग आ जाता था। मै उसकी कल्पना करती -नव वधू का वेश ,गोरा-गोरा, छोटे कद का तन्दुरुस्त शरीर ,घेरदार गोटे-किनारी से सजा लहँगा ,सितारों जड़ी ओढ़नी और जेवरों से लदी , रामी ! वह कहती जाती ,'हमार घर मां चार गउयाँ रहीं !खूब दुकान चलत रही।'
उसके चेहरे की झुर्रियाँ तन जातीं और उस ढलती बेला में भी बीते हुए रंग अपनी झलक दिखा जाते! फिर वह कहती,'पर हमार तो करम फूटे रहे बहू न जने का हुइगा हमार मरद का! बिलकुलै चुप्पा हुइ गवा ,दुकान -मकान सब गिरवी धर दिहिन ,और ऊ जाने कहाँ चला गवा।'
उसे शक था कि किसी ने टोना-टोटका करवा दिया उसके आदमी पर ।कुछ रिश्ते के लोग जहुत जलते थे उन्हें देख-देख कर। अपने आदमी की खोज मे वह कहाँ-कहाँ नहीं भटकी ,फिर हार कर जिन्दगी से समझौता कर लिया। वह सजी-धजी युवती लुप्त हो गई ,रह गई रँग- उड़े घिसे कपड़े पहने लोगों की नजरों मे प्रश्न चिह्न बनी एक लाचार औरत ! कहाँ वह वधू और मेरे सामने बैठी, झुर्रियों भरे चेहरेवाली ,भूरा-भूरा लहँगा और मटमैली ओढ़नी ओढ़े यह वृद्धा! वास्तविक रामी तो यही है ,वह सजी-धजी युवती तो एक छलना थी जो विलीन हो गई।
फिर एक दिन हम लोगों के प्रस्थान की बेला आ गई । जिस तरह एक दिन आ पहुँचे थे उसी तरह बोरिया-बिस्तर बाँध कर चल देना था। परिचितों को छोड़ अपरिचितों के बीच जा बसना ,नये-नये परिचय बनाना और फिर आगे बढ़ जाना ,सरकारी नौकरी मे यही जीवन का क्रम बन गया था । मिलनेवालों का आवागमन चलता रहा ,कितनी बार चाय बनी और समाप्त हुई। उस हलचल -कोलाहल मे मुझे याद ही न रहा कि रामी के लिये भी एक कप चाय चाहिये होगी। सब को बिदाकर जब घर मे शान्ति हुई तो देखा ,वह आँगन मे बैठी हुई है - जाने कब से !
'अरे तुम बैठी हो ,मुझे पता ही नहीं चला ! '
'थोड़ी देर हुई ,बहूजी । तुम तो अब हियन से टिकस कटाय लिये...., हमार कहूँ मन नाहीं लगा तौन फिन इहाँ आय के बइठ गईँ ।'
'मैने तुम्हे देख नहीं पाया। तुम्हीं कह देतीं .. इतनी बार चाय बनी और तुम बैठी ही रह गईं?'
उत्तर मे उसने सिर झुका लिया। अभ्यागतों के स्वागत-सत्कार के बीच उसकी चाय की माँग कितली शोभती इसे रामी भी समझती थी।
दूध का बर्तन खाली पड़ा था। मैने अठन्नी देकर कहा,' रामी,दूध ले आओ ,मै अभी बना देती हूँ।'
उसे गये काफी देर हो गई।मैने छत पर से झाँक कर देखा ,गली उस ओर , सड़क पर सेठ के दरवाज़े के पास रामी खड़ी थी। आवाज़ देने पर आई।
'दूध नहीं लाईं तुम?'
उसके चेहरे पर क्या भाव परिवर्तन हुए,उस धुँधलके मे देख नहीं पाई। रोने के से स्वर मे उसने कहा ,' बहू ,पइसा जाने कहाँ गिर गवा। हम बहुत ढूँढत रहे....।'
'तो वहाँ क्यों खड़ी थीं?'
'हम सोचित रहे सेठ जी लौटत होंई तौन उनसे माँग लेइत, सेठानी से माँगन मे डरात रहे।'
'अरे,वाह ,' मेरे मुह से निकला।
उसे लगा मै उस पर विश्वास नहीं कर रही हूँ। कहने लगी,' हमार जी बहुत दुखी रहे ,बहू । हम आँसू पोंछित रहे ,हाथन पता नाहीं कहाँ छूट परे। ..अँधियार मे सूझ नाहीं परत है ...टटोल-टटोल के ..।'
उसने मिट्टी भरी उँगलियां सामने कर दीं।
'खो गये तो जाने दो।तुम यहाँ क्यों नहीं लौट आईं? चलो मै और दे रही हूँ।'
वह बहुत लज्जित थी और मुझे विशवास दिलाने का पूरा प्रयत्न कर रही थी ।मै समझ रही थी पर उसे समझा पाती ऐसा दिमाग़ कहाँ था मेरा?
' गिर गये तो जाने दो ।मेरे हाथ से गिर जाते तो ....।'
फिर वह कुछ नहीं बोली। चाय लेते समय कहने लगी ,' अकेल हमारे कारन?तुम बिलकुल न लिहौ?'
'अभी उन लोगों के साथ पी थी ,इसलिये नही बनाई।'
अस्फुट स्वर मे उसने कुछ कहा ,मै सुन नहीं पाई ,थकी हुई थी मैने जानने की कोशिस भी नहीं की।
चलते-टलते वह फिर बोली ,' आज हमार हाथन से तुम्हार नुसकान हुइ गा ,बहू।'
उसे आश्वस्त करने को कहा ,' चिन्ता मत करो ,यह पैसे मै तुम्हारे महीने के पैसों मेसे काट लूंगी।' कहते-कहते मुझे जरा हँसी आ गई।
कुछ देर बाद खिड़की की ओर आई तो दिखाई दिया,सड़क पर लगे बिजली के खम्बे के दूसरी ओर धुँधली आँखोवाली रामी ,अपनी झुकी हुई कमर को और झुकाये सड़क की धूल हाथों मे उठा-उठा कर कुछ ढूँढ रही थी।मुझे जाने कैसा लगा ,मै वहाँ से हट गई।
कुछ समय बीत गया।एक बार फिर उसी कस्बे मे लौटी।मकान वहीं सेठ की हवेली के पास मिल गया। पहचाने हुए लोग थे ,कोई विशेष परिवर्तन नहीं।सब उसी पुराने ढर्रे पर। नहीं मिली तो एक रामी!
दूसरी बर्तनवाली मिली ,वह बुढिया नहीं थी।काम खूब अच्छी तरह करती थी ,पर मेरा उसका वह सम्बन्ध नहीं रहा जो रामी से था।
एक दिन यों ही बात निकली तो मैने कहा ,'पहले भी हम यहाँ रहते थे ,उधरवाले मकान मे..।'
'अच्छा ,तभी आपकी ,सबसे पहचान है।'
'हाँ,पहले एक बर्तनवाली भी थी यहाँ।पता नही कहाँ है अब?तुम क्या यहाँ नई आई हो?'
' नहीं ,डेढ़-दो साल हो गये।शादी के बाद यहाँ आए न।'
तुम उसे जानती हो?रामी नाम था उसका।'
'हाँ,हाँ,थी तो एक बुढ़िया।'
'कहाँ है वह।?'
'अब यहाँ कहाँ?भगवान के गई ,'उसने ऊपर इशारा कर दिया।
' क्या हो गया था उसे?'
'अरे बीबी जी ,ऐसे लोग होते हैं पैसे के पीछे जान की परवाह लहीं करते।'
मै सबकुछ जानने को उतावली हो उठी। जो सुना उसका मतलब था -एक दिन शाम को धूल मे गिरे पैसों को उठाने के उपक्रम मे वह सामने से आती हुई बस की चपेट मे आ गई।
मुझे जाने कैसा होने लगा , कुछ हौल सा उठ रहाथा भीतर-ही- भीतर ।उसकी मृत्यु के लिये क्या वही स्थान बचा था - बिजली के खम्भे आगे,साँझ के धुँधलके मे,वैसे ही झुक कर पैसे उठाते हुए और वह भी ,मेरे जाने के एक सप्ताह के अन्दर!
उस दिन रामी के साथ चाय पी लेती तो उसे इतना अफसोस न होता!आगे नई बर्तनवाली ने क्या कहा मुझे कुछ समझ मे लहीं आया। मैने समझने ,समझाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। जो कहा गया समझा गया वह झूठ था ।असली बात ,सही बात सिर्फ़ रामी जानती थी और मै जानती हूँ। और कोई उसे जान भी नहीं सकता!
और शाम को जब लोग गली के उस पार आग तापते हैं या गाँव से आए यात्री उपले जला कर दाल-बाटी बनाते हैं तो धुआँ लहराता हुआ आसमान की ओर उठने लगता है.। मुझे लगता है - भूरा-भूरा लहँगा और मटमैली ओढनी ओढ़े अपनी झुकी हुई कमर को और भी झुकाये , रामी की काँपती हुई आकृति धूल मे कुछ ढूँढ रही है। धीरे-धीरे गहरी कालिमा उसे ढक लेती है। मुझे पता है अठन्नी उसे अभी तक नहीं मिली ,क्योंकि मिलनेपर वह उसे अपने पास नहीं रक्खेगी !
*
जाने कब सूरज डूब गया ,दूर के हरे-हरे वृक्ष काले पड़ने लगे ,आसमान के एक छोर से शुक्र - तारा झाँक उठा।सड़क के उस पार छप्परों से लहराता हुआ धुआँ आसमान की ओर उठने लगा ।
मुझे लगा रामी छप्पर के ऊपर खड़ी है - वैसा ही भूरा सा लँहगा,मटमैली ओढ़नी,वही सफ़ेद बाल झुर्रियों से भरा चेहरा ;सब कुछ वैसा ही था! ओढ़नी से दोनो हाथ ढँके काँपती-सी आकृति ! वही तो रामी है -हमारी चौका-बर्तनवाली रामी ! वह उस छप्पर से उतर कर सड़क पर जा रही है ,और बिजली के खम्बे पास कमर झुकाये खड़ी हो गई है ।धीरे-धीरे आकृति अँधेरे मे विलीन हो गई। चली गई रामी !
स्मृति की रेखाएँ उभरने लगी हैं। सेठानी ने कहा था,' ये बुड़िया बड़ी मँगती होगई है।तुम्हीं ने सिर चढ़ा रक्खा है ,मुझसे माँगने की हिम्मत नहीं है उसकी।'
रामी के मुझसे परिचय का किस्सा बहुत छोटा,बहुत साधारण है।इस कस्बे मे नई-नई आई ,तब एक बर्तनवाली की जरूरत पड़ी। किसी से जान-पहचान हुई नहीं थी।एक दिन छत पर सूखते हुए कपड़े नीचे जा गिरे और रामी उन्हे उठाकर देने के लिए ऊपर चली आई। मुझे जैसे मुँह-माँगी मुराद मिल गई-उसके बाद से ही वह हमारे यहाँ चौका-बर्तन करने लगी।
रामी ,हाथ की सच्ची थी ,सेठानी के शब्दों मे ,' बड़े डरपोक दिल की है ,कुछ उठाने की हिम्मत नहीं है उसकी!'
उसके काम करते समय जब मै चाय बनाती तो एक प्याला उसके लिये भी रख देती। वह आभार प्रकट करती जाती और चाय के प्याले से अपने ठण्डे हाथ सेंकती जाती। कभी-कभी वह खुद भी फर्माइश कर देती ,'बहूजी, हाथन की अँगुरियाँ अईस ठिठुराय गई हैं..... एक पियाली चाह मिल जाइत तो......।'
यह अच्छी ज़बरदस्ती है, मै सोचती ,अब उठकर इसके लिये चाय बनाऊँ ? मन-ही मन भुनभुनाती पर बुढिया के काँपते हाथ देख कर कुछ कह नहीं पाती और गैस जलाकर चाय का पानी रख देती।वह फिर कहना शुरू करती, 'औरन से तो कबहूँ नाही माँग सकित हैं बहू,मुला तोहार आगे आपुन हिरदै की बात कहि डारित हैं। आज सुबह ते चाय नाहीं पिये रहे ,मूड पिराय रहा है।'
कभी-कभी तो मै चिढ़ उठती कि दुनियां भर के खाँसी - ज़ुकाम के लिये मैने ही चाय बनाने का ठेका ले रखा है! रामी बर्तन समेट कर चौके की देहरी पर चाय का कप लेकर बैठ जाती और मुझे इस भारी उपकार के लिये असीसने लगती। बातें करने मे रामी कभी थकती नहीं।मोहल्ले भर की ख़बरे अपनी बातों मे लपेट कर मुझ तक पहुँचाती रहती।वह सेठानी के घर भी चौका-बर्तन करती थी।सेठ का लड़का और चारों लड़कियाँ उसी की गोद मे खेल कर बड़े हुए थे।वहअपना अधिकतर समय सेठानी के घर ही बिताती थी।एक तो सेठानी का बड़ा-सा खुला-खुला घर ,धूप मे या छाया मे वह बैठ सकती थी,दूसरे बच्चों का मोह ! सेठानी से असंतुष्ट होने पर भी वह बार-बार वहीं खिंची चली जाती थी।
उसने शुरू से थोड़े ही महरी का काम किया था।उसका बाप दर्जी था ,आदमी की अपनी दुकान थी।शादी मे चाँदी के जेवरों से लद गई थी,आठ चीज़ें तो उसके चढावे मे आईं थीं।विगत जीवन की कथा कहते-कहते उसकी आँखें चमक उठती थीं वाणी मे वेग आ जाता था। मै उसकी कल्पना करती -नव वधू का वेश ,गोरा-गोरा, छोटे कद का तन्दुरुस्त शरीर ,घेरदार गोटे-किनारी से सजा लहँगा ,सितारों जड़ी ओढ़नी और जेवरों से लदी , रामी ! वह कहती जाती ,'हमार घर मां चार गउयाँ रहीं !खूब दुकान चलत रही।'
उसके चेहरे की झुर्रियाँ तन जातीं और उस ढलती बेला में भी बीते हुए रंग अपनी झलक दिखा जाते! फिर वह कहती,'पर हमार तो करम फूटे रहे बहू न जने का हुइगा हमार मरद का! बिलकुलै चुप्पा हुइ गवा ,दुकान -मकान सब गिरवी धर दिहिन ,और ऊ जाने कहाँ चला गवा।'
उसे शक था कि किसी ने टोना-टोटका करवा दिया उसके आदमी पर ।कुछ रिश्ते के लोग जहुत जलते थे उन्हें देख-देख कर। अपने आदमी की खोज मे वह कहाँ-कहाँ नहीं भटकी ,फिर हार कर जिन्दगी से समझौता कर लिया। वह सजी-धजी युवती लुप्त हो गई ,रह गई रँग- उड़े घिसे कपड़े पहने लोगों की नजरों मे प्रश्न चिह्न बनी एक लाचार औरत ! कहाँ वह वधू और मेरे सामने बैठी, झुर्रियों भरे चेहरेवाली ,भूरा-भूरा लहँगा और मटमैली ओढ़नी ओढ़े यह वृद्धा! वास्तविक रामी तो यही है ,वह सजी-धजी युवती तो एक छलना थी जो विलीन हो गई।
फिर एक दिन हम लोगों के प्रस्थान की बेला आ गई । जिस तरह एक दिन आ पहुँचे थे उसी तरह बोरिया-बिस्तर बाँध कर चल देना था। परिचितों को छोड़ अपरिचितों के बीच जा बसना ,नये-नये परिचय बनाना और फिर आगे बढ़ जाना ,सरकारी नौकरी मे यही जीवन का क्रम बन गया था । मिलनेवालों का आवागमन चलता रहा ,कितनी बार चाय बनी और समाप्त हुई। उस हलचल -कोलाहल मे मुझे याद ही न रहा कि रामी के लिये भी एक कप चाय चाहिये होगी। सब को बिदाकर जब घर मे शान्ति हुई तो देखा ,वह आँगन मे बैठी हुई है - जाने कब से !
'अरे तुम बैठी हो ,मुझे पता ही नहीं चला ! '
'थोड़ी देर हुई ,बहूजी । तुम तो अब हियन से टिकस कटाय लिये...., हमार कहूँ मन नाहीं लगा तौन फिन इहाँ आय के बइठ गईँ ।'
'मैने तुम्हे देख नहीं पाया। तुम्हीं कह देतीं .. इतनी बार चाय बनी और तुम बैठी ही रह गईं?'
उत्तर मे उसने सिर झुका लिया। अभ्यागतों के स्वागत-सत्कार के बीच उसकी चाय की माँग कितली शोभती इसे रामी भी समझती थी।
दूध का बर्तन खाली पड़ा था। मैने अठन्नी देकर कहा,' रामी,दूध ले आओ ,मै अभी बना देती हूँ।'
उसे गये काफी देर हो गई।मैने छत पर से झाँक कर देखा ,गली उस ओर , सड़क पर सेठ के दरवाज़े के पास रामी खड़ी थी। आवाज़ देने पर आई।
'दूध नहीं लाईं तुम?'
उसके चेहरे पर क्या भाव परिवर्तन हुए,उस धुँधलके मे देख नहीं पाई। रोने के से स्वर मे उसने कहा ,' बहू ,पइसा जाने कहाँ गिर गवा। हम बहुत ढूँढत रहे....।'
'तो वहाँ क्यों खड़ी थीं?'
'हम सोचित रहे सेठ जी लौटत होंई तौन उनसे माँग लेइत, सेठानी से माँगन मे डरात रहे।'
'अरे,वाह ,' मेरे मुह से निकला।
उसे लगा मै उस पर विश्वास नहीं कर रही हूँ। कहने लगी,' हमार जी बहुत दुखी रहे ,बहू । हम आँसू पोंछित रहे ,हाथन पता नाहीं कहाँ छूट परे। ..अँधियार मे सूझ नाहीं परत है ...टटोल-टटोल के ..।'
उसने मिट्टी भरी उँगलियां सामने कर दीं।
'खो गये तो जाने दो।तुम यहाँ क्यों नहीं लौट आईं? चलो मै और दे रही हूँ।'
वह बहुत लज्जित थी और मुझे विशवास दिलाने का पूरा प्रयत्न कर रही थी ।मै समझ रही थी पर उसे समझा पाती ऐसा दिमाग़ कहाँ था मेरा?
' गिर गये तो जाने दो ।मेरे हाथ से गिर जाते तो ....।'
फिर वह कुछ नहीं बोली। चाय लेते समय कहने लगी ,' अकेल हमारे कारन?तुम बिलकुल न लिहौ?'
'अभी उन लोगों के साथ पी थी ,इसलिये नही बनाई।'
अस्फुट स्वर मे उसने कुछ कहा ,मै सुन नहीं पाई ,थकी हुई थी मैने जानने की कोशिस भी नहीं की।
चलते-टलते वह फिर बोली ,' आज हमार हाथन से तुम्हार नुसकान हुइ गा ,बहू।'
उसे आश्वस्त करने को कहा ,' चिन्ता मत करो ,यह पैसे मै तुम्हारे महीने के पैसों मेसे काट लूंगी।' कहते-कहते मुझे जरा हँसी आ गई।
कुछ देर बाद खिड़की की ओर आई तो दिखाई दिया,सड़क पर लगे बिजली के खम्बे के दूसरी ओर धुँधली आँखोवाली रामी ,अपनी झुकी हुई कमर को और झुकाये सड़क की धूल हाथों मे उठा-उठा कर कुछ ढूँढ रही थी।मुझे जाने कैसा लगा ,मै वहाँ से हट गई।
कुछ समय बीत गया।एक बार फिर उसी कस्बे मे लौटी।मकान वहीं सेठ की हवेली के पास मिल गया। पहचाने हुए लोग थे ,कोई विशेष परिवर्तन नहीं।सब उसी पुराने ढर्रे पर। नहीं मिली तो एक रामी!
दूसरी बर्तनवाली मिली ,वह बुढिया नहीं थी।काम खूब अच्छी तरह करती थी ,पर मेरा उसका वह सम्बन्ध नहीं रहा जो रामी से था।
एक दिन यों ही बात निकली तो मैने कहा ,'पहले भी हम यहाँ रहते थे ,उधरवाले मकान मे..।'
'अच्छा ,तभी आपकी ,सबसे पहचान है।'
'हाँ,पहले एक बर्तनवाली भी थी यहाँ।पता नही कहाँ है अब?तुम क्या यहाँ नई आई हो?'
' नहीं ,डेढ़-दो साल हो गये।शादी के बाद यहाँ आए न।'
तुम उसे जानती हो?रामी नाम था उसका।'
'हाँ,हाँ,थी तो एक बुढ़िया।'
'कहाँ है वह।?'
'अब यहाँ कहाँ?भगवान के गई ,'उसने ऊपर इशारा कर दिया।
' क्या हो गया था उसे?'
'अरे बीबी जी ,ऐसे लोग होते हैं पैसे के पीछे जान की परवाह लहीं करते।'
मै सबकुछ जानने को उतावली हो उठी। जो सुना उसका मतलब था -एक दिन शाम को धूल मे गिरे पैसों को उठाने के उपक्रम मे वह सामने से आती हुई बस की चपेट मे आ गई।
मुझे जाने कैसा होने लगा , कुछ हौल सा उठ रहाथा भीतर-ही- भीतर ।उसकी मृत्यु के लिये क्या वही स्थान बचा था - बिजली के खम्भे आगे,साँझ के धुँधलके मे,वैसे ही झुक कर पैसे उठाते हुए और वह भी ,मेरे जाने के एक सप्ताह के अन्दर!
उस दिन रामी के साथ चाय पी लेती तो उसे इतना अफसोस न होता!आगे नई बर्तनवाली ने क्या कहा मुझे कुछ समझ मे लहीं आया। मैने समझने ,समझाने की ज़रूरत भी नहीं समझी। जो कहा गया समझा गया वह झूठ था ।असली बात ,सही बात सिर्फ़ रामी जानती थी और मै जानती हूँ। और कोई उसे जान भी नहीं सकता!
और शाम को जब लोग गली के उस पार आग तापते हैं या गाँव से आए यात्री उपले जला कर दाल-बाटी बनाते हैं तो धुआँ लहराता हुआ आसमान की ओर उठने लगता है.। मुझे लगता है - भूरा-भूरा लहँगा और मटमैली ओढनी ओढ़े अपनी झुकी हुई कमर को और भी झुकाये , रामी की काँपती हुई आकृति धूल मे कुछ ढूँढ रही है। धीरे-धीरे गहरी कालिमा उसे ढक लेती है। मुझे पता है अठन्नी उसे अभी तक नहीं मिली ,क्योंकि मिलनेपर वह उसे अपने पास नहीं रक्खेगी !
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रविवार, 4 जुलाई 2010
कोफ़ी अन्नान की बीवी
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कोफ़ी अन्नान !संसार प्रसिद्ध हस्ती !कौन नहीं जानता उन्हें!कोई बिरला ही ऐसा मूढ होगा जिसने उनका नाम न सुना हो ।पर उनकी बीवी !उनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता ।कौन हैं, कहाँ की हैं, क्या नाम है किसी को नहीं पता ।अगर उनके बारे में भी सूचनायें दी जाती रहतीं तो ऐसा अनर्थ नहीं होता ।मेरा विचार है कि सीता-राम ,राधा-कृष्ण,गौरी -शंकर आदि में पति के साथ पत्नी नाम लेने की परंपरा इसीलिये शुरू की गई होगी कि इस प्रकार के गजब न होने पायें ।पर अब पुरानी बातों को कौन मानता है !माने-जाने लोगों की पत्नियाँ अनजानी ही रह जाती हैं।वैसे प्रसिद्ध हस्तियों के साथ उनकी पत्नियों के नाम अवश्य होना चाहिये -सभी लोग तो अपने वाजपेयी जी जैसे कठ-कुँआरे नहीं होते !
पर क्या किया जाय?कौन रोक सका है होनी को !जो होना था हो गया ।मेरे सामने होता रहा ,होता क्या रहा ,मैं खुद ,परोक्ष रूप से ही सही उस होने का माध्यम बन गई: और बन गई उसकी एक मात्र साक्षी भी ।अभी तक मैं कुछ नहीं बोली थी ,पर अब बातें सहन शक्ति के बाहर जा रही हैं।अब नहीं चुप रह सकती ।किसी से रिश्ते बिगडें ,बिगड जाय़ँ ,तोहमतें लगें ,लगती रहें ,पर अब मैं अकेली सहन नहीं करूँगी ।जो कुछ हुआ ब्योरेवार सब कह डालूँगी ।
इन्टर कॉलेज में पढा रही थी तब ।प्राइमरी से लेकर डिग्री कॉलेजों तक के इन्टर व्यू दिये हैं मैने ।और बडे बोल न समझें तो लगभग हर जगह सेलेक्शन हुआ है मेरा ।बहुत अनुभव है मुझे साक्षात्कारों का।हाँ तो तब मैं इन्टर कॉलेज में पढा रही थी ।खाली समय में पुस्तकालय में जा बैठना मेरी पुरानी आदत है ।पुतकालय सहायिका रूबी से मेरी अच्छी पटरी बैठने लगी वह हर नई पुस्तक ,मेरे मतलब की ,मेरे लिये चुन कर रख देती ,और उसके कामों में मैं उसकी भरसक सहायता कर देती थी ।
तो मैं बता रही थी हम दोनों एक दूसरी की मदद करते थे ।स्कूल में खरीदी गई ,किताबों की लिस्ट अक्सर ही अँग्रेजी में आ जाती थी ,और अंग्रेजी में लिखे हिन्दी नामों मे कन्फ्यूजन होने पर वह मेरा सहारा लेती थी । शुरुआत ऐसे हुई कि एक किताब का टाइटिल 'अंग्रेजी में था टाम काका की kutia'वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे 'कुतिया' पढे या 'कुटिया' ।मैंने समाधान दिया टाम काका का कुतिया /कुटिया लिख दो ,जिसे जो समझना होगा समझ लेगा ।।उसने जब लिखा तो उसक 'ट' 'र' की तरह लग रहा था ।बाद में 'राम' और 'टाम' की समस्या और खडी हो गई ।पर वह बाद ती बात है ।कमल कमाल ,हसन हासन तमाम शब्दों में असने यही पद्धति अपनाई । 'राग दरबारी' संगीत की किताबों में देख कर मुझे ताज्जुब हुआ ।मैंने उससे कहा यह हिन्दी का प्रसिद्ध उपन्यास है ,इसे उपन्यासों के शेल्फ़ में रखो ।पर वह हमेशा संगीत की पुस्तकों में शामिल रहा ।मैं क्या करती चुप लगा गई ।
रोज नई-नई साडियाँ पहन कर लडकियों के बीच इठलाती टीचर्स ,सीमित समय, गिने हुये पीरियड् लडकियों में सम्मान ,देख- देख कर उसका मन लेक्चरर बनने को मचलने लगा ,पुस्तकालय से उसका मन उचाट होने लगा ।उन्हीं दिनों इस डिग्री कॉलेज की वांट्स् निकलीं ।मैं एप्लाई कर रही थी ।उसका मन देख कर मैंने उसे भी बता दिया ।
ंमैने उससे पहले ही पूछ लिया था ,तुमने कभी पढाया है ।उसकी स्वीकारोक्ति थी किसी लीव-वेकेंसी पर कुछ महीने पढाया था ।मुझसे कुछ नहीं छिपाती थी ,उसने यह भी बता दिया कि कुञ्जी किताब में दबा कर रख लेती थी वही पढा देती थी ।
उसने भी आवेदन कर दिया पर इन्टर व्यू के नाम से उसे घबराहट हो रही थी ।मैंने उसे आश्वस्त किया ।मैने इतने इन्टर व्यू झेले हैं कि मुझे वह तमाशा लगने लगे हैं ।जो लोग इन्टर व्यू लेने बैठते हैं विशेष कर प्राइवेट मैनेजमेन्ट वाली संस्थाओं में उनमें से अधिकाँश विषय का ए.बी.सी.डी भी नहीं जानते पर सवाल करते रहते हैं ।दो एक लोग ऐसे होते हैं जो समझते-बूझते हैं पर उनकी वहाँ शायद चलती न ही ।मैं उनकी मुद्राओं को कौतुक से देखती और उनका विश्लेषण करती रहती ।मुझे पता था वे जो पूछ रहे हैं उसके सही उत्तर खुद नहीं जानते ।पता नहीं लोग इन्टरव्यू सो क्यों घबराते हैं !यही मैं उसे समझा रही थी -हमारे यहाँ इन्टरव्यू लेने वालों के लिये योग्यता का कोई मान निर्धारित नहीं है ,विशे,कर प्राइवेट सेक्टर में ।मैनेजिंग कमेटी में संस्थापक और सदस्य चाहे अँगूठाछाप हों उम्मीदवार के आगे ऐसे रौब से बैठते हैं जैसे साक्षात् बुद्धिदाता गणेश के अवतार हों ।और पता है ?वास्तव मे होते हैं वे गोबर गणेस ।एक -दो जो ढंग के लोग होते हैं वे दुबके बैठे रहते हैं क्योंकि पैसा तो उन्हीं का लगा है -लक्ष्मीवाहनों का !लक्ष्मी का वाहन उल्लू है ,ऐसे ही एक अवसर पर मेरे गले से उतर गया ।मेरे पति ने अपना किस्सा सुनाया था ।एक बार वे एक इन्टर कॉलेज के साक्षात्कार में फँस गये थे ।एक मोटे-तोंदवाले ने उनसे पूछा ,'तो आपने एम,एस सी किया है ।?'
'जी,हाँ ।डिवीजन भी ...'
बीच में ही उन्होंने टोक दिया ,'और बी एस सी भी किया है ?'
'हाँ पहले ही ...'
'तो आपको यह पहले बताना था ।'
पढे-लिखे मेम्बर चुप बैठे रहे ।
डिग्रियाँ और सार्टिफिकेट अँग्रेजी में थे, सामने रखे थे ,बिचारा क्या देखता !
मैं पूरी रौ में उसे सुना रही थी कि उसने कहा ,'बडी अच्छी बातें हैं पर जरा रुकिये ,मैं बाथरूम कर आऊँ।'
वह चली गई ।मैं सोचती रह गई ये 'बाथरूम करना ' क्या होता है।अगर सभी लोग यों बाथरूम करने लगें तो एक दिन सारी धरती पर बाथरूम ही बाथरूम दिखाई देंगे ।इससे अच्छा हो लोग किचन और ड्राइँगरूम किया करें ।
उसका मनोबल काफी बढ गया ,उसने भी एप्लाई कर दिया ।
इस बीच नई आई हुई किताबों की बौछार कर दी उसने मुझ पर ।सबसे बचा कर ,सबकी नजर बचा कर वह मेरी पसन्द की सारी किताबें मेरे लिये रिजर्व रखती थी । मेरे और निकट हो गई वह ,और मुझसे अपनी कोई बात नहीं छिपाती थी ।उसने मुझे सब बता दिया था कि उसने गाइडें और कुंजियों से पढ-पढ कर परीक्षायें पास की थीं ।और उसके पिता के किरायेदार स्कूल के टीचर होने के कारण ,परीक्षाओं में उसे नकल करने की सुविधा दी जाती थी ।उसकी पढ़ने में रुचि नहीं थी पर उसके पिता अपनी बेटी को एम .ए .पास देखना चाहते थे।उन्होंने उसे आश्वस्त कर दिया था ,'बिटिया ,तुम डरो मत ।भर दो फार्म ।हमारे ब़े ऊँचे- लंबे सोर्स हैं ।बस तुम इम्तहान दे डालो ।'और अपनी उसी पहुँच की बदौलत इस कॉलेज में नौकरी भी दिलवा दी थी ।
कुछ समय बाद हम लोगों के इन्टर-व्यू लेटर्स आ गये ।और एक दिन हम उपस्थित हो गये साक्षात्कार कमेटी के सामने अपने को प्रस्तुत करने ।काफी लोग थे ।लोग क्या महिला कॉलेज की रिक्तियाँ थीं ,उम्मीदवार महिलायें ही थीं ।हम दोनों भी वहीं जम गये ।
'अपने यहाँ भी हमलोग होल में बैठते हैं ,'उसने कहा ।'
'कहाँ,अपने घर में ?'
'नहीं घर में होल कहाँ?इस्कूल में ।'
मुझे विस्मय हो रहा था -यह कोई कीडा-मकोड़ा ,चिड़िया ,चूहा ,या छछूँदर तो है नहीं जो होल में समा जाये ।
'तुम होल में घुस कैसे पाती हो ?'
'अरे, बहुत बडा कमरा होता है होल ।अभी भी तो बैठे हैं ।'
मै समझी थी होल छोटा सा होता है ,पर इसका होल तो हॉल है ।
'दीदी ,मुझे तो बडी घबराहट हो रही है ।कैसे क्या होगा !'
'घबराओ मत अपने पर विश्वास रखो ।जो पढा है मन ही मन दोहरा जाओ।'
'पढा !हमने तो कभी कोर्स की किताबें खरीदी नहीं ,गाइड से तैयारी की थी बह कबकी बेंच दी ।'
'कभी तो कुछ पढती होगी ?'
'हमें तो मनोहर कहानियाँ ,सच्ची कथायें अच्छी लगती हैं ,या फिल्मी पत्रिकायें।कुछ तो तत्व होता है ।ये प्रसाद-पंत वगैरा तो जाने कहाँ-कहाँ की हाँकते हैं कुछ पल्ले नहीं पडता ।उपन्यास भी काफी पढे हैं ,गलशन नन्दा ,आवारा ...।'
'बस बस काफी है ।'
'हाय राम ,मेरा क्या होगा ?'
भरोसा रखो ।जो होगा ठीक ही होगा ।'
'नाम के हिसाब से पहले आपका नंबर आयेगा ,मेरा तो बहोत बाद में ..'आप बताइयेगा ,उसी हिसाब से हम सोच लेंगे ।'
'देखो ,किसी तरह उन्हें अपनी लाइन पर ले आओ ,तो समझो किला फतह ।मतलब ,वे अपने हिसाब से सवाल न कर तुम्हारे हिसाब से करने लगें ।'
वह कुछ देर चुप रही ।पासवाले ग्रुप की महिलायें अपनी चर्चा में लगीं थीं ,पॉलिटिक्स पर कुछ बात हो रही थी ।
'दीदी,कोफी !वो लोग भी कोफी पीने की बात कर रही हैं ?
'नहीं ,वो कोफी अन्नान की बात कर रहे हैं ।'
' कोफ़ी अन्नान ?''ये क्या होता है ?मैं तो पूछ रही हूँ कोफी पियेंगी ?थोडा फरेश हो जायेंगे ।'
'नहीं, मेरा मन नहीं है ।'
'ये कोफी अन्नान क्या था ?'
अब इसे बताने से क्या फायदा ।फिर भी मैंने कहा,'एक नाम है बस ।'
कुछ रुक कर मैंने पूछा ,'रूबी ,तुम अखबार तो पढती होगी ?'
'अखबार ?हाँ पढते हैं न। पर पोलिटिक्स में हमें बिल्कुल रुचि नहीं ।और खबरों में भी हत्या ,लूट-पाट,वगैरा ,और क्या होता है अखबार में ।क्या फायदा उस सब को पढने से ?'अपने शहर का पेज पढ लेते हैं ,बिजली पानी का हाल ,छुट्टी बगैरा ..।'
'संयुक्त-राष्ट्र-संघ के बारे में जानती हो ?'
'पहले जरनल नोलेज में पढते थे ,अब तो सब भूलभाल गये ।जरनल नोलेज में सबसे खराबी ये है कि हर बार नई चीजें आ जाती हैं ।पहले का पढा-लिखा बेकार ।आखिर कहाँ तक पढें! ..हाँ वो क़ोफी अन्नान क्या है?'
क्या फायदा बताने से -सोचा मैने -अभी फिर दिमाग चाटेगी ,'कोफी अन्नान ,एक नाम है ,आजकल चलन में है ।'
मेरा नाम पुकारा गया था
लौट कर आई तो कई महिलाओं ने घेर लिया ।
'क्या क्या पूछा ?'
'सब इन्टरव्युओं में एक से लोग होते हैं ।दूसरे की समझते नहीं ,बस अपनी लगाये रहते हैं ।'
'पर हुआ क्या ?'
'साहित्य के बजाय भूगोल पर उतर आये ।प्रसाद के भूगोल-ज्ञान की बात कर रहे थे।मैंने इतना समझाने की कोशिश की कि वे कवि थे पर वे अपनी धुन पूरे रहे ।
'क्या?
'कहते हैं हिमालय के शिखर पर वट का वृक्ष कहाँ से आ गया ?'
'और कुछ नहीं पूछा ?'
'अरे पूछेंगे क्या वे ?जो पूछ रहे थे वे कोई खास पढ्-लिखे लगे नहीं।एकाध ठीक-ठाक लगे पर उनने कुछ पूछा नहीं ।'
'आपको देर तो इतनी लगी,और कुछ पूछा नहीं ?'
'पूछा! और क्या पूछेंगे वे ?ये पूछा पति का क्या नाम है ?कै बच्चे हैं ,वगैरा वगैरा ।'
'अच्छा !'
'हाँ पति का नाम-धाम-काम पूछ कर सेलेक्शन करते हैं ।ठीक से याद करके जाना ?'
रूबी ने पूछा ,'और क्वाँरी ..?'
'क्या फर्क पडता है !कहीं-न-कहीं तो कोई होगा ही । कोई अच्छा सा नाम ले देना ।'
'अरे वाह !'
'हाँ ,और क्या ?कोई ढंग का सवाल करें तो ढंग का जवाब दिया जाय !एक से एक ऊल-जलूल सवाल ।'
'तो आपने कैसे समझाया उन्हें ?'
'वहाँ समझनेवाला था कौन ?बस उन्हें अपनी लाइन पर लाना था ,उन्हें घेर-घार कर वहीं ले आई ,प्रसाद पर ।और दूसरे सज्जन भूगोल पर उतर आये ।
हूँ ! अपनी लाइन पर ले आओ ,तो बात बन जाये ,' रूबी विचार पूर्ण मुद्रा में थी ।
इधर मैं पसोपेश में थी कि रूबी का क्या करूँ ।इसका सेलेक्शन कैसे होगा ,पहले सवाल में ही धराशायी हो जायेगी ।कहीं ऐसा न हो कि बाहर आये और मुझसे चिपट कर रोने लगे ।मुझे तो उसके लिये रुकना ही था ।और कुछ लोगों की बुलाहट हुई ,फिर रूबी का नंबर आया ।मैं कलेजा थामे बैठी रही ,पछताती रही कि इसे लेक्चररशिप के ख्वाब दिखाकर क्यों एप्लाई करवा दिया इससे।हॉल में एकाध महिला थी बाकी सब जा चुकीं थीं ।आधे घंटे से भी अधिक समय बीत गया । मैं परेशान हो उठी ,पता नहीं क्या हो रहा है अन्दर ?थोडी देर में वह आती दिखाई दी ।आँखें कुछ लाल थीं पर बड़ी आश्वस्त थी ।
मैं दौडी ,'क्या हुआ रूबी ?'
सब ठीक हो गया ।मैं उसका मुँह तके जा रही थी ।
'चलो दीदी ,यहाँ रुक कर क्या करेंगे!रास्ते मे सब ब्योरेवार बताती हूँ ।
उसने जो बताया वह इस प्रकार था -
'आपने मुझे अच्छा आगाह कर दिया था ।अभिवादन कर ,नम्रतापूर्वक धन्यवाद देकर मैं धीमे से कुर्सी पर बैठ गई ।छः लोग थे कागज पत्तर खोले बैठे थे ..।'
'पता है आगे की बात बताओ ।'
'आपने बताया था ,कि अपनी लाइन पर ले आओ तो सब ठीक हो जाता है ।मै उन्हें अपनी लाइन पर ले आई ।'
'अच्छा !कैसे?'
'आपने कहा था पति का नाम पूछते हैं ।मैं तो क्वाँरी हूँ , सोचा पहले से पति का नाम बता दूँ तो झंझट कटे।पर बताने लगी तो 'मेरे पति का नाम' बोलते-बोलते घबराहट में सोचा हुआ नाम ही ध्यान से उतर गया ।हड़बड़हट में थोड़ी देर पहले सुना हुआ कोफ़ी अन्नान याद आया वही मुँह से निकल गया ।आपने थोडी देर पहले बताया था न ।'
विस्मय में मेरे मुँह से निकला ,'कोफ़ी अन्नान ?'
'हाँ कोफी अन्नान !सोचा था अच्छा सा कोई बताऊँगी ,पर मेरे साथ हमेशा यही होता है ।एक तो पति का दूर-दूर तक पता नहीं फिर सोचा हुआ नाम दिमाग से गायब। लेकिन क्या फरक पडता है कोई नाम बता दो ,आप ही ने तो कहा था ।'
'कोफी अन्नान !'फिर मेरे मुँह से निकला ,मेरा तो दिमाग चकरा रहा था ।
'पहले ही नाम बता दिया तो वे प्रभावित हो गये .सब मेरी ओर देखने लगे ।'
अच्छा !फिर क्या कहा उन्होने ?'
'उन्होने भी ऐसे ही दोहराया ,जैसे आप दोहरा रही हैं ।आपस मे किसी से यू.एनो. यूनो कह रहे थे ।उसने सुन नहीं पाया होगा तो यू नो कह कर बता रहे होंगे । मैंने सिर हिला कर हाँ कह दिया और चुपचाप सिर झुकाये बैठी रही ।कुछ देर तो वे लोग बिल्कुल चुप रहे जैसे साँप सूँघ गया हो ।' ...फिर एक ने पूछा ,'तो आप अकेली यहाँ रहती हैं ?'
'क्या करूं रहना पड रहा है ।'
'वे तो आते होंगे ?'
'दुनिया भर से छुट्टी मिले तब न मेरा ध्यान आये ।'
'शादी कैसे हो गई आपकी ?'
कुछ मत पूछिये ,सर !कुछ नहीं बता पाऊँगी ।मैं तो वैसे ही बहुत परेशान हूँ ।'
'तो आप नौकरी करेंगी ?'
'करनी पडेगी और कोई रास्ता नहीं ।'
'लोगों को पता है कि आप उनकी ...'
मैं किसी से कुछ नहीं कहती ।बताती भी नहीं ,झूठ बोलने की आदत नहीं पर आपसे मजबूरी में कहना पडा ।'
'बडा भारी रिस्क लिया आपने ।'
'हाँ ,बडा रिस्क है पर अब क्या करूँ !मेरी कुछ समझ मे नहीं आ रहा ..'
दूसरेवाले ने पूछा ,'लेकिन ये हुआ कैसे ?'
'कैसे हुआ, क्यों हुआ ,मैं कुछ नहीं बता पाऊँगी ,सर !आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकती ।आप चाहे नौकरी मत दीजिये पर कुछ पूछिये मत ...'मैं तो रोने-रोने को हो आई ।
'नहीं आप परेशान मत होइये ,दुखी मत होइये ,हो जाता है ऐसा ..!'
'सच्ची ,उनकी सहानुभूति पाकर मेरी आँखों में आँसू भर आये । बडे सहृदय थे वे लोग !एक ने अपना पानी का गिलास आगे बढा दिया,बोला नहीं,नहीं रोइये मत ,लीजिये पानी पी लीजिये ।दूसरे ने जेब से रूमाल निकाला पर सबके सामने देने की हिम्मत नहीं पडी होगी '
उस ने कहा ,'आप चिन्ता मत कीजिये ,हम सब सम्हाल लेंगे ।'
मोटेवाले ने पूछा , बच्चे भी हैं ?'
'पति के बिना बच्चे कैसे ..' एकदम मेरे मुँह से निकला ।
साइडवाले ने कहा,'जब वे रहते ही नहीं ..।'
' यों ही नाम बता दिया.नहीं कहना था . मैं बिलकुल अकेली हूँ ।'
'सच है ,सच है ।..चिट्ठी -पत्री तो आती होगी ?'
कुछ मत कहिए .बस अब माफ़ करिए मुझसे नहीं होगा .
कोनेवाले से रहा नहीं गया उसने पूछा ,'आप लोगों की मुलाकात कहाँ हुई ?'
'वह सब मैं नहीं बता पाऊँगी ।मुझे तो इतना कहना भी भारी पड रहा है ।क्या करूँ लाचारी में कह बैठी ।'मैंने बह आये आँसू पोंछ लिये ।
'होता है ,ऐसा भी होता है ,'उधरवाले ने ढाढस बँधाया ,'किसी के साथ भी हो सकता है ।'
'हाँ सर, मेरी ही गल्ती है ।.ऐसा कह बैठी कि आगे बढा नहीं सकती ।पर मुँह से निकल गया ,अब कुछ नहीं हो सकता ।आप को गलत लग रहा हो तो मैं चली जाती हूँ सर ।'
'मैं उठ कर खडी होने लगी उनके प्रश्नों के उत्तर देना कठिन हो रहा था ,भाग आना चाहती थी ।पर उनने रोक लिया ।कहने लगे ,'अब उस बारे में कुछ नहीं पूछेंगे ,बैठिये आप ।बस इतना बता दीजिये कि आप कभी उनके साथ गईं हैं ?'
'किनके ?उनके साथ ?नहीं ,कभी नहीं ।किसीका कोई ठिकाना नहीं ।मुझे यहीं रहना है अपने देश में ।'
उन्होंने प्रशंसाभरी दृष्टि से देखा ,'इसे कहते हैं अपनी धरती से लगाव ।जाइये ,जाइये निश्चिंत रहिये ,सब ठीक हो जायगा ।हम लोग हैं न ।
और मैं धन्यवाद देकर चली आई ।'
और वह लेक्चर के पद के लिये चुन ली गई ।उसे लगता है मेरी सलाह मानने से ही वह सेलेक्ट हुई है । कोफी अन्नान तो दूर रह गये वह मेरे पल्ले बँध गई है।मन-ही-मन झल्लाती हूँ और किसी तरह निभाये जा रही हूँ ।पता नहीं कब तक झेलना पडेगा ।
*
कोफ़ी अन्नान !संसार प्रसिद्ध हस्ती !कौन नहीं जानता उन्हें!कोई बिरला ही ऐसा मूढ होगा जिसने उनका नाम न सुना हो ।पर उनकी बीवी !उनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता ।कौन हैं, कहाँ की हैं, क्या नाम है किसी को नहीं पता ।अगर उनके बारे में भी सूचनायें दी जाती रहतीं तो ऐसा अनर्थ नहीं होता ।मेरा विचार है कि सीता-राम ,राधा-कृष्ण,गौरी -शंकर आदि में पति के साथ पत्नी नाम लेने की परंपरा इसीलिये शुरू की गई होगी कि इस प्रकार के गजब न होने पायें ।पर अब पुरानी बातों को कौन मानता है !माने-जाने लोगों की पत्नियाँ अनजानी ही रह जाती हैं।वैसे प्रसिद्ध हस्तियों के साथ उनकी पत्नियों के नाम अवश्य होना चाहिये -सभी लोग तो अपने वाजपेयी जी जैसे कठ-कुँआरे नहीं होते !
पर क्या किया जाय?कौन रोक सका है होनी को !जो होना था हो गया ।मेरे सामने होता रहा ,होता क्या रहा ,मैं खुद ,परोक्ष रूप से ही सही उस होने का माध्यम बन गई: और बन गई उसकी एक मात्र साक्षी भी ।अभी तक मैं कुछ नहीं बोली थी ,पर अब बातें सहन शक्ति के बाहर जा रही हैं।अब नहीं चुप रह सकती ।किसी से रिश्ते बिगडें ,बिगड जाय़ँ ,तोहमतें लगें ,लगती रहें ,पर अब मैं अकेली सहन नहीं करूँगी ।जो कुछ हुआ ब्योरेवार सब कह डालूँगी ।
इन्टर कॉलेज में पढा रही थी तब ।प्राइमरी से लेकर डिग्री कॉलेजों तक के इन्टर व्यू दिये हैं मैने ।और बडे बोल न समझें तो लगभग हर जगह सेलेक्शन हुआ है मेरा ।बहुत अनुभव है मुझे साक्षात्कारों का।हाँ तो तब मैं इन्टर कॉलेज में पढा रही थी ।खाली समय में पुस्तकालय में जा बैठना मेरी पुरानी आदत है ।पुतकालय सहायिका रूबी से मेरी अच्छी पटरी बैठने लगी वह हर नई पुस्तक ,मेरे मतलब की ,मेरे लिये चुन कर रख देती ,और उसके कामों में मैं उसकी भरसक सहायता कर देती थी ।
तो मैं बता रही थी हम दोनों एक दूसरी की मदद करते थे ।स्कूल में खरीदी गई ,किताबों की लिस्ट अक्सर ही अँग्रेजी में आ जाती थी ,और अंग्रेजी में लिखे हिन्दी नामों मे कन्फ्यूजन होने पर वह मेरा सहारा लेती थी । शुरुआत ऐसे हुई कि एक किताब का टाइटिल 'अंग्रेजी में था टाम काका की kutia'वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे 'कुतिया' पढे या 'कुटिया' ।मैंने समाधान दिया टाम काका का कुतिया /कुटिया लिख दो ,जिसे जो समझना होगा समझ लेगा ।।उसने जब लिखा तो उसक 'ट' 'र' की तरह लग रहा था ।बाद में 'राम' और 'टाम' की समस्या और खडी हो गई ।पर वह बाद ती बात है ।कमल कमाल ,हसन हासन तमाम शब्दों में असने यही पद्धति अपनाई । 'राग दरबारी' संगीत की किताबों में देख कर मुझे ताज्जुब हुआ ।मैंने उससे कहा यह हिन्दी का प्रसिद्ध उपन्यास है ,इसे उपन्यासों के शेल्फ़ में रखो ।पर वह हमेशा संगीत की पुस्तकों में शामिल रहा ।मैं क्या करती चुप लगा गई ।
रोज नई-नई साडियाँ पहन कर लडकियों के बीच इठलाती टीचर्स ,सीमित समय, गिने हुये पीरियड् लडकियों में सम्मान ,देख- देख कर उसका मन लेक्चरर बनने को मचलने लगा ,पुस्तकालय से उसका मन उचाट होने लगा ।उन्हीं दिनों इस डिग्री कॉलेज की वांट्स् निकलीं ।मैं एप्लाई कर रही थी ।उसका मन देख कर मैंने उसे भी बता दिया ।
ंमैने उससे पहले ही पूछ लिया था ,तुमने कभी पढाया है ।उसकी स्वीकारोक्ति थी किसी लीव-वेकेंसी पर कुछ महीने पढाया था ।मुझसे कुछ नहीं छिपाती थी ,उसने यह भी बता दिया कि कुञ्जी किताब में दबा कर रख लेती थी वही पढा देती थी ।
उसने भी आवेदन कर दिया पर इन्टर व्यू के नाम से उसे घबराहट हो रही थी ।मैंने उसे आश्वस्त किया ।मैने इतने इन्टर व्यू झेले हैं कि मुझे वह तमाशा लगने लगे हैं ।जो लोग इन्टर व्यू लेने बैठते हैं विशेष कर प्राइवेट मैनेजमेन्ट वाली संस्थाओं में उनमें से अधिकाँश विषय का ए.बी.सी.डी भी नहीं जानते पर सवाल करते रहते हैं ।दो एक लोग ऐसे होते हैं जो समझते-बूझते हैं पर उनकी वहाँ शायद चलती न ही ।मैं उनकी मुद्राओं को कौतुक से देखती और उनका विश्लेषण करती रहती ।मुझे पता था वे जो पूछ रहे हैं उसके सही उत्तर खुद नहीं जानते ।पता नहीं लोग इन्टरव्यू सो क्यों घबराते हैं !यही मैं उसे समझा रही थी -हमारे यहाँ इन्टरव्यू लेने वालों के लिये योग्यता का कोई मान निर्धारित नहीं है ,विशे,कर प्राइवेट सेक्टर में ।मैनेजिंग कमेटी में संस्थापक और सदस्य चाहे अँगूठाछाप हों उम्मीदवार के आगे ऐसे रौब से बैठते हैं जैसे साक्षात् बुद्धिदाता गणेश के अवतार हों ।और पता है ?वास्तव मे होते हैं वे गोबर गणेस ।एक -दो जो ढंग के लोग होते हैं वे दुबके बैठे रहते हैं क्योंकि पैसा तो उन्हीं का लगा है -लक्ष्मीवाहनों का !लक्ष्मी का वाहन उल्लू है ,ऐसे ही एक अवसर पर मेरे गले से उतर गया ।मेरे पति ने अपना किस्सा सुनाया था ।एक बार वे एक इन्टर कॉलेज के साक्षात्कार में फँस गये थे ।एक मोटे-तोंदवाले ने उनसे पूछा ,'तो आपने एम,एस सी किया है ।?'
'जी,हाँ ।डिवीजन भी ...'
बीच में ही उन्होंने टोक दिया ,'और बी एस सी भी किया है ?'
'हाँ पहले ही ...'
'तो आपको यह पहले बताना था ।'
पढे-लिखे मेम्बर चुप बैठे रहे ।
डिग्रियाँ और सार्टिफिकेट अँग्रेजी में थे, सामने रखे थे ,बिचारा क्या देखता !
मैं पूरी रौ में उसे सुना रही थी कि उसने कहा ,'बडी अच्छी बातें हैं पर जरा रुकिये ,मैं बाथरूम कर आऊँ।'
वह चली गई ।मैं सोचती रह गई ये 'बाथरूम करना ' क्या होता है।अगर सभी लोग यों बाथरूम करने लगें तो एक दिन सारी धरती पर बाथरूम ही बाथरूम दिखाई देंगे ।इससे अच्छा हो लोग किचन और ड्राइँगरूम किया करें ।
उसका मनोबल काफी बढ गया ,उसने भी एप्लाई कर दिया ।
इस बीच नई आई हुई किताबों की बौछार कर दी उसने मुझ पर ।सबसे बचा कर ,सबकी नजर बचा कर वह मेरी पसन्द की सारी किताबें मेरे लिये रिजर्व रखती थी । मेरे और निकट हो गई वह ,और मुझसे अपनी कोई बात नहीं छिपाती थी ।उसने मुझे सब बता दिया था कि उसने गाइडें और कुंजियों से पढ-पढ कर परीक्षायें पास की थीं ।और उसके पिता के किरायेदार स्कूल के टीचर होने के कारण ,परीक्षाओं में उसे नकल करने की सुविधा दी जाती थी ।उसकी पढ़ने में रुचि नहीं थी पर उसके पिता अपनी बेटी को एम .ए .पास देखना चाहते थे।उन्होंने उसे आश्वस्त कर दिया था ,'बिटिया ,तुम डरो मत ।भर दो फार्म ।हमारे ब़े ऊँचे- लंबे सोर्स हैं ।बस तुम इम्तहान दे डालो ।'और अपनी उसी पहुँच की बदौलत इस कॉलेज में नौकरी भी दिलवा दी थी ।
कुछ समय बाद हम लोगों के इन्टर-व्यू लेटर्स आ गये ।और एक दिन हम उपस्थित हो गये साक्षात्कार कमेटी के सामने अपने को प्रस्तुत करने ।काफी लोग थे ।लोग क्या महिला कॉलेज की रिक्तियाँ थीं ,उम्मीदवार महिलायें ही थीं ।हम दोनों भी वहीं जम गये ।
'अपने यहाँ भी हमलोग होल में बैठते हैं ,'उसने कहा ।'
'कहाँ,अपने घर में ?'
'नहीं घर में होल कहाँ?इस्कूल में ।'
मुझे विस्मय हो रहा था -यह कोई कीडा-मकोड़ा ,चिड़िया ,चूहा ,या छछूँदर तो है नहीं जो होल में समा जाये ।
'तुम होल में घुस कैसे पाती हो ?'
'अरे, बहुत बडा कमरा होता है होल ।अभी भी तो बैठे हैं ।'
मै समझी थी होल छोटा सा होता है ,पर इसका होल तो हॉल है ।
'दीदी ,मुझे तो बडी घबराहट हो रही है ।कैसे क्या होगा !'
'घबराओ मत अपने पर विश्वास रखो ।जो पढा है मन ही मन दोहरा जाओ।'
'पढा !हमने तो कभी कोर्स की किताबें खरीदी नहीं ,गाइड से तैयारी की थी बह कबकी बेंच दी ।'
'कभी तो कुछ पढती होगी ?'
'हमें तो मनोहर कहानियाँ ,सच्ची कथायें अच्छी लगती हैं ,या फिल्मी पत्रिकायें।कुछ तो तत्व होता है ।ये प्रसाद-पंत वगैरा तो जाने कहाँ-कहाँ की हाँकते हैं कुछ पल्ले नहीं पडता ।उपन्यास भी काफी पढे हैं ,गलशन नन्दा ,आवारा ...।'
'बस बस काफी है ।'
'हाय राम ,मेरा क्या होगा ?'
भरोसा रखो ।जो होगा ठीक ही होगा ।'
'नाम के हिसाब से पहले आपका नंबर आयेगा ,मेरा तो बहोत बाद में ..'आप बताइयेगा ,उसी हिसाब से हम सोच लेंगे ।'
'देखो ,किसी तरह उन्हें अपनी लाइन पर ले आओ ,तो समझो किला फतह ।मतलब ,वे अपने हिसाब से सवाल न कर तुम्हारे हिसाब से करने लगें ।'
वह कुछ देर चुप रही ।पासवाले ग्रुप की महिलायें अपनी चर्चा में लगीं थीं ,पॉलिटिक्स पर कुछ बात हो रही थी ।
'दीदी,कोफी !वो लोग भी कोफी पीने की बात कर रही हैं ?
'नहीं ,वो कोफी अन्नान की बात कर रहे हैं ।'
' कोफ़ी अन्नान ?''ये क्या होता है ?मैं तो पूछ रही हूँ कोफी पियेंगी ?थोडा फरेश हो जायेंगे ।'
'नहीं, मेरा मन नहीं है ।'
'ये कोफी अन्नान क्या था ?'
अब इसे बताने से क्या फायदा ।फिर भी मैंने कहा,'एक नाम है बस ।'
कुछ रुक कर मैंने पूछा ,'रूबी ,तुम अखबार तो पढती होगी ?'
'अखबार ?हाँ पढते हैं न। पर पोलिटिक्स में हमें बिल्कुल रुचि नहीं ।और खबरों में भी हत्या ,लूट-पाट,वगैरा ,और क्या होता है अखबार में ।क्या फायदा उस सब को पढने से ?'अपने शहर का पेज पढ लेते हैं ,बिजली पानी का हाल ,छुट्टी बगैरा ..।'
'संयुक्त-राष्ट्र-संघ के बारे में जानती हो ?'
'पहले जरनल नोलेज में पढते थे ,अब तो सब भूलभाल गये ।जरनल नोलेज में सबसे खराबी ये है कि हर बार नई चीजें आ जाती हैं ।पहले का पढा-लिखा बेकार ।आखिर कहाँ तक पढें! ..हाँ वो क़ोफी अन्नान क्या है?'
क्या फायदा बताने से -सोचा मैने -अभी फिर दिमाग चाटेगी ,'कोफी अन्नान ,एक नाम है ,आजकल चलन में है ।'
मेरा नाम पुकारा गया था
लौट कर आई तो कई महिलाओं ने घेर लिया ।
'क्या क्या पूछा ?'
'सब इन्टरव्युओं में एक से लोग होते हैं ।दूसरे की समझते नहीं ,बस अपनी लगाये रहते हैं ।'
'पर हुआ क्या ?'
'साहित्य के बजाय भूगोल पर उतर आये ।प्रसाद के भूगोल-ज्ञान की बात कर रहे थे।मैंने इतना समझाने की कोशिश की कि वे कवि थे पर वे अपनी धुन पूरे रहे ।
'क्या?
'कहते हैं हिमालय के शिखर पर वट का वृक्ष कहाँ से आ गया ?'
'और कुछ नहीं पूछा ?'
'अरे पूछेंगे क्या वे ?जो पूछ रहे थे वे कोई खास पढ्-लिखे लगे नहीं।एकाध ठीक-ठाक लगे पर उनने कुछ पूछा नहीं ।'
'आपको देर तो इतनी लगी,और कुछ पूछा नहीं ?'
'पूछा! और क्या पूछेंगे वे ?ये पूछा पति का क्या नाम है ?कै बच्चे हैं ,वगैरा वगैरा ।'
'अच्छा !'
'हाँ पति का नाम-धाम-काम पूछ कर सेलेक्शन करते हैं ।ठीक से याद करके जाना ?'
रूबी ने पूछा ,'और क्वाँरी ..?'
'क्या फर्क पडता है !कहीं-न-कहीं तो कोई होगा ही । कोई अच्छा सा नाम ले देना ।'
'अरे वाह !'
'हाँ ,और क्या ?कोई ढंग का सवाल करें तो ढंग का जवाब दिया जाय !एक से एक ऊल-जलूल सवाल ।'
'तो आपने कैसे समझाया उन्हें ?'
'वहाँ समझनेवाला था कौन ?बस उन्हें अपनी लाइन पर लाना था ,उन्हें घेर-घार कर वहीं ले आई ,प्रसाद पर ।और दूसरे सज्जन भूगोल पर उतर आये ।
हूँ ! अपनी लाइन पर ले आओ ,तो बात बन जाये ,' रूबी विचार पूर्ण मुद्रा में थी ।
इधर मैं पसोपेश में थी कि रूबी का क्या करूँ ।इसका सेलेक्शन कैसे होगा ,पहले सवाल में ही धराशायी हो जायेगी ।कहीं ऐसा न हो कि बाहर आये और मुझसे चिपट कर रोने लगे ।मुझे तो उसके लिये रुकना ही था ।और कुछ लोगों की बुलाहट हुई ,फिर रूबी का नंबर आया ।मैं कलेजा थामे बैठी रही ,पछताती रही कि इसे लेक्चररशिप के ख्वाब दिखाकर क्यों एप्लाई करवा दिया इससे।हॉल में एकाध महिला थी बाकी सब जा चुकीं थीं ।आधे घंटे से भी अधिक समय बीत गया । मैं परेशान हो उठी ,पता नहीं क्या हो रहा है अन्दर ?थोडी देर में वह आती दिखाई दी ।आँखें कुछ लाल थीं पर बड़ी आश्वस्त थी ।
मैं दौडी ,'क्या हुआ रूबी ?'
सब ठीक हो गया ।मैं उसका मुँह तके जा रही थी ।
'चलो दीदी ,यहाँ रुक कर क्या करेंगे!रास्ते मे सब ब्योरेवार बताती हूँ ।
उसने जो बताया वह इस प्रकार था -
'आपने मुझे अच्छा आगाह कर दिया था ।अभिवादन कर ,नम्रतापूर्वक धन्यवाद देकर मैं धीमे से कुर्सी पर बैठ गई ।छः लोग थे कागज पत्तर खोले बैठे थे ..।'
'पता है आगे की बात बताओ ।'
'आपने बताया था ,कि अपनी लाइन पर ले आओ तो सब ठीक हो जाता है ।मै उन्हें अपनी लाइन पर ले आई ।'
'अच्छा !कैसे?'
'आपने कहा था पति का नाम पूछते हैं ।मैं तो क्वाँरी हूँ , सोचा पहले से पति का नाम बता दूँ तो झंझट कटे।पर बताने लगी तो 'मेरे पति का नाम' बोलते-बोलते घबराहट में सोचा हुआ नाम ही ध्यान से उतर गया ।हड़बड़हट में थोड़ी देर पहले सुना हुआ कोफ़ी अन्नान याद आया वही मुँह से निकल गया ।आपने थोडी देर पहले बताया था न ।'
विस्मय में मेरे मुँह से निकला ,'कोफ़ी अन्नान ?'
'हाँ कोफी अन्नान !सोचा था अच्छा सा कोई बताऊँगी ,पर मेरे साथ हमेशा यही होता है ।एक तो पति का दूर-दूर तक पता नहीं फिर सोचा हुआ नाम दिमाग से गायब। लेकिन क्या फरक पडता है कोई नाम बता दो ,आप ही ने तो कहा था ।'
'कोफी अन्नान !'फिर मेरे मुँह से निकला ,मेरा तो दिमाग चकरा रहा था ।
'पहले ही नाम बता दिया तो वे प्रभावित हो गये .सब मेरी ओर देखने लगे ।'
अच्छा !फिर क्या कहा उन्होने ?'
'उन्होने भी ऐसे ही दोहराया ,जैसे आप दोहरा रही हैं ।आपस मे किसी से यू.एनो. यूनो कह रहे थे ।उसने सुन नहीं पाया होगा तो यू नो कह कर बता रहे होंगे । मैंने सिर हिला कर हाँ कह दिया और चुपचाप सिर झुकाये बैठी रही ।कुछ देर तो वे लोग बिल्कुल चुप रहे जैसे साँप सूँघ गया हो ।' ...फिर एक ने पूछा ,'तो आप अकेली यहाँ रहती हैं ?'
'क्या करूं रहना पड रहा है ।'
'वे तो आते होंगे ?'
'दुनिया भर से छुट्टी मिले तब न मेरा ध्यान आये ।'
'शादी कैसे हो गई आपकी ?'
कुछ मत पूछिये ,सर !कुछ नहीं बता पाऊँगी ।मैं तो वैसे ही बहुत परेशान हूँ ।'
'तो आप नौकरी करेंगी ?'
'करनी पडेगी और कोई रास्ता नहीं ।'
'लोगों को पता है कि आप उनकी ...'
मैं किसी से कुछ नहीं कहती ।बताती भी नहीं ,झूठ बोलने की आदत नहीं पर आपसे मजबूरी में कहना पडा ।'
'बडा भारी रिस्क लिया आपने ।'
'हाँ ,बडा रिस्क है पर अब क्या करूँ !मेरी कुछ समझ मे नहीं आ रहा ..'
दूसरेवाले ने पूछा ,'लेकिन ये हुआ कैसे ?'
'कैसे हुआ, क्यों हुआ ,मैं कुछ नहीं बता पाऊँगी ,सर !आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकती ।आप चाहे नौकरी मत दीजिये पर कुछ पूछिये मत ...'मैं तो रोने-रोने को हो आई ।
'नहीं आप परेशान मत होइये ,दुखी मत होइये ,हो जाता है ऐसा ..!'
'सच्ची ,उनकी सहानुभूति पाकर मेरी आँखों में आँसू भर आये । बडे सहृदय थे वे लोग !एक ने अपना पानी का गिलास आगे बढा दिया,बोला नहीं,नहीं रोइये मत ,लीजिये पानी पी लीजिये ।दूसरे ने जेब से रूमाल निकाला पर सबके सामने देने की हिम्मत नहीं पडी होगी '
उस ने कहा ,'आप चिन्ता मत कीजिये ,हम सब सम्हाल लेंगे ।'
मोटेवाले ने पूछा , बच्चे भी हैं ?'
'पति के बिना बच्चे कैसे ..' एकदम मेरे मुँह से निकला ।
साइडवाले ने कहा,'जब वे रहते ही नहीं ..।'
' यों ही नाम बता दिया.नहीं कहना था . मैं बिलकुल अकेली हूँ ।'
'सच है ,सच है ।..चिट्ठी -पत्री तो आती होगी ?'
कुछ मत कहिए .बस अब माफ़ करिए मुझसे नहीं होगा .
कोनेवाले से रहा नहीं गया उसने पूछा ,'आप लोगों की मुलाकात कहाँ हुई ?'
'वह सब मैं नहीं बता पाऊँगी ।मुझे तो इतना कहना भी भारी पड रहा है ।क्या करूँ लाचारी में कह बैठी ।'मैंने बह आये आँसू पोंछ लिये ।
'होता है ,ऐसा भी होता है ,'उधरवाले ने ढाढस बँधाया ,'किसी के साथ भी हो सकता है ।'
'हाँ सर, मेरी ही गल्ती है ।.ऐसा कह बैठी कि आगे बढा नहीं सकती ।पर मुँह से निकल गया ,अब कुछ नहीं हो सकता ।आप को गलत लग रहा हो तो मैं चली जाती हूँ सर ।'
'मैं उठ कर खडी होने लगी उनके प्रश्नों के उत्तर देना कठिन हो रहा था ,भाग आना चाहती थी ।पर उनने रोक लिया ।कहने लगे ,'अब उस बारे में कुछ नहीं पूछेंगे ,बैठिये आप ।बस इतना बता दीजिये कि आप कभी उनके साथ गईं हैं ?'
'किनके ?उनके साथ ?नहीं ,कभी नहीं ।किसीका कोई ठिकाना नहीं ।मुझे यहीं रहना है अपने देश में ।'
उन्होंने प्रशंसाभरी दृष्टि से देखा ,'इसे कहते हैं अपनी धरती से लगाव ।जाइये ,जाइये निश्चिंत रहिये ,सब ठीक हो जायगा ।हम लोग हैं न ।
और मैं धन्यवाद देकर चली आई ।'
और वह लेक्चर के पद के लिये चुन ली गई ।उसे लगता है मेरी सलाह मानने से ही वह सेलेक्ट हुई है । कोफी अन्नान तो दूर रह गये वह मेरे पल्ले बँध गई है।मन-ही-मन झल्लाती हूँ और किसी तरह निभाये जा रही हूँ ।पता नहीं कब तक झेलना पडेगा ।
*
रविवार, 13 जून 2010
फिर वह नहीं आई -
*
मुझे लगा वह जा रही है विलक्षणा ,वही कद ,वही पीठ पर झूलती ,लम्बी-सी अधखुली चोटी ,वही साड़ी जो अक्सर उसे पहने देखा है ,वही चलने का ढंग ,निश्चय वही है !मुझे विश्वास हो गया ।मैने चाल तेज़ कर दी ,आवाज़ लगाई ,' विलक्षणा -- बिलू !'
रास्ता चलते कुछ लोगों ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा ,पर मुझे उन की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत नहीं थी । मै जल्दी से उसके पास पहुँच जाना चाहती थी ।
'बिलू ,-- विलक्षणा ,-- ओ बिलू !'
'बिलू' अनायास मेरे मुँह से निकला जा रहा था जैसे मै उसे युगों से 'बिलू' कहकर बुलाती होऊँ । इसके पहले यह शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला था ,मन मे आया था पर मुँह से मैने निकलने नहां दिया था।
आगे जानेवाली युवती मेरे पीछे से आगे निकलते समय ध्यान से मुझे देख गई है -ऐसा मुझे आभास हुआ था ,उसके पग कुछ ठिठके ,कनखियों से उसने मुझे देख लिया और आगे बढ़ गई। मैने अपनी चाल और तेज़ कर दी । मै उससे मिलना चाहती थी ,अब तक जो उसे नहीं दे पाई ,वह देने को मै उतावली हो रही थी ,पर अब लेनेवाली रुक नहीं रही थी । अचानक ही उसने पीछे से आती हुई एक टैक्सी को हाथ दिया ,वह उसके पास जाकर रुकी और फिर उसे लेकर आँखों से ओझल हो गई। अब विलक्षणा नहीं मिलेगी ,देख लेगी तो भी नहीं आएगी मेरे पास ,कतरा कर चली जाएगी । क्यों ? लेकिन क्यों ?
*****
'कौन ?'
'दीदी , मै !'
अच्छा ,विलक्षणा है ।आओ ,आज बहुत दिनो मे दर्शन हुए ।'
'कहाँ ,दीदी, बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर आई हूँ,जरा देर के लिये। वहाँ सारा काम पड़ा होगा !'
मुझे बड़ा सन्तोष हुआ ,चलो ,चाय-नाशते का झंझट नहीं करना पड़ेगा ! फिर मन-ही-मन इस विचार के लिए मैने स्वयं को धिक्कारा ,वह तोइतनी दूर से रिक्शा लेकर मिलने आई और मै ये सोच रही हूँ !
यह तो मुझे काफ़ी बाद मे पता लगा था कि पीठ पीछे लोग उसकी बुराई करते हैं ।अपने साथियों मे भी वह लोक-प्रियता की सीमाओं से दीर रह गई थी । सामने-सामने तो सब अच्छी तरह बोलते पर पीठ फिरते ही मुँह बिचकाने लगते थे ।
मेरी एक साथिन ने एक दिन मेरे कान मे भी फूँका ,' देखना इससे चौकन्नी रहना !सबमे घुली रहकर सबसे भली बनने की कोशिश करती है ,और साधती है अपना मतलब !'
'कौन विलक्षणा ?'
और कौन है हमारे यहाँ जो सबसे मीठा बोलता फिरे ?'
'अच्छा --!'
और दो दिन बाद ही विलक्षणा मुझसे कह रही थी ,' दीदी ,मै कल एबसेन्ट थी । आपने जो नोट्स लिखाए वह मुझे दे दीजिए ।'
'वो तो मै घर छोड़ आई हूँ ।'
' अच्छा ' उलके मुख पर निराशा छा गई ।
'क्लास की किसी लड़की से ले लो ।'
'हाँ ,अच्छा ले लूँगी ।' उसका चेहरा बुझ गयाथा ।
अपने ग्रुप की लड़की को छोड़कर कौन अपने नोट्स किसी को देता है ,और विलक्षणा किसी ग्रुप मे नहीं है ,यह भी मै जानती थी ।
'घर से चाहो तो ले लेना ।'
आश्वस्त होकर वह प्रसन्न हो गई । पर एकदम मेरे दिमाग़ मे आया -ये कहां का झंझट पाल लिया !
'पर घर पर पता नहीं मै कब पहुँचूँ ?खैर मै देखूँगी फिर !' दूसरा आश्वासन दिया मैने ।
घर पहुँचने पर अम्माँ ने कहा ,' कोई लड़की आई थी ,तुझे पूछ रही थी ।'
'लड़की । क्या नाम था ?
'विलक्षणा ।'
मैने चैन की साँस ली .चलो अच्छा हुआ जो घर पर नहीं मिली मै ! अब बार-बार कौन आता है ?
' और वो तेरा सफ़ेद कार्डिगन मैने बिनने को दे दिया है ।'
'बड़ा अच्छा किया ! मै कहाँ तक करती !'
कुल एक हफ़्ता रह गया था शादी मे जाने को । एक तो मुझे समय ही कम मिलता था फिर कार्डिगन के अलावा और भी तो बहुत काम पड़े थे मेरे लिए ! इतनी जल्दी कैसे बुन पाता ,मोल बुनवाना ही सबसे ठीक रहा !
'किसे दिया है ?'
'वोई ले गई , वो जो आई थी ।'
' ऐं ,उसे क्यों दे दिया ? तुम काहे को सबसे कहने बैठ जाती हो ?'
' मैने कहाँ कहा ?उसी ने पूछा ।तू ही तो ऊपर सब छोड़ गई थी । वो पूछने लगी तो मैने बता दिया - काम इत्ता करने को पड़ा है और तेरी दीदी के पास टाइम ही नहीं है ,तो उसने कहा लाइए मै चार दिन मे बुन दूँगी ।'
अम्मा के ऊपर बड़ी खीझ लगी । हरेक के सामने अपना दुखड़ा रोने दैठ जाती हैं ।
किसी डाक्टर ने तो कहा नहीं था कि शादी मे सफ़ेद कार्डिगन पहनो ही ,दूसरी ओर थोड़ी खुशी भी हुई कि चलो बिना मेहनत के बुन जाएगा ।
'और ला के कब देगी ? कहीं रख के बैठ गई तो और मुश्किल ?'
'ऐसा भी कहीं हो सकता है ?तेरे कालेज मे तो पढ़ती है । वो तो बड़ी सीधी लड़की थी । खूब दीदी-दीदी करके बात कर रही थी तेरे लिए। '
अम्माँ बड़ी जल्दी सबसे सगापा जोड़ लेती हैं ! अब एहसान मेरे सिर चढ़ गया ! दूसरों को बेटी बना लेना इन्हें बड़ा आसान लगता है ,मेरी पोज़ीशन का ज़रा ख़याल नहीं ! पर मेरी झुँझलाहट सुनने को अम्मां वहाँ रुकी ही कब थीं !
तीसरे दिन शाम को अचानक विलक्षणा फिर टपक पड़ी । कार्डिगन का पिछला पल्ला और बाँहें उसने बड़ी सफ़ाई से बुने थे । नोट्स मैने ख़ुध लाकर उसे पकड़ा दिये । इतना काम कर रही है किसी मतलब से ही तो ! अम्माँ ने उसे चाय-वाय पिलाई और 'बेटी-बेटी' कर बात करती रहीं । वह मगन हो खाती-पीती रही और मुझे नमस्ते करके चली गई ।
फिर एक दिन घर पर देखा विलक्षणा बैठी मेरी साड़ी के पल्ले तुरप रही है । मुझे देख कर वह सकुचा सी गई ।अम्माँ झट् से बोल दीं ,' देखा ,मेरी नई बेटी मेरा कितना ध्यान रखती है । '
'अरे ,विलक्षणा ! तुम क्यों बेकार परेशान हो रही हो ?'
'आप मेरी दीदी हैं तो ये मेरी भी तो अम्माँ हैं ,अकेली आपकी थोड़े ही हैं ।'
'क्यों नहीं ,विलक्षणा ,तुम मेरी छोटी बहन हो ' एकदम मेरे मुँह से निकल गया ।
उसने अपनी तरल हो-आई पलकें झुका लीं ।
'कभी भी कोई डिफ़ीकल्टी हो तो चली आया करो ।'
मानो मैने उसे बहनत्व का पूरा अधिकार दे दिया !
फिर तो घर मे अक्सर ही उसका नाम सुनने को मिलने लगा । अम्माँ को तो जैसे उसने मोह लिया था ।घर की जो थोड़ी-बहुत सिलाई-बुनाई कर देती थी अब मुझे नहीं करनी पड़ती थी ।छोटी बहन के बर्थ -डे पर सुबह से शाम तक जुटी रही थी वह ।बड़े उत्साह से सारा काम निपटाया था और जब उसके खाने का समय आया तो बहुत सी वस्तुएं समाप्त हो चुकीं थीं । अम्माँ के बार-बार पछताने पर उसने जवाब दिया ,' अम्माँ ,अपने हाथों से पराँठे बना कर खिला दीजिये , म्रेरे लिये तो वह मिठाई से भी बढ़ कर होंगे !'
और वह पराँठों से पेट भरकर चली गई थी।
वह जो फ़्राक का पीस प्रेज़ेन्ट मे लाई थी वह लौटाने को मैने अम्माँ से कहा तो उन्होने साफ़ मना कर दिया कि ऐसे प्यार से लाई गई चीज़ वे वापस नहीं कर सकतीं । मैने वापस करना चाहा ,मेरे बर-बार कहने पर वह कुछ रुआँसी हो आई ,' दीदी ,इतना पराया समझती हैं आप ?'
फिर आगे मैने कुछ नहीं कहा था ।
सब अपने मतलब के लिये ,सोचा था मैने । चलते समयकह दिया था ,' कोई भी किताब चाहिये हो तो मुझसे ले लेना ।'
'जी ? मेरे पास हैं सब !'
'नहीं कोई लाइब्रेरी से न मिलती हो ,या मेरी कोई चाहिये हो तो -- ' मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया !
अम्माँ के लिये तो विलक्षणा 'बिलू' बन गई थी ,थोड़े दिन नहीं आती तो मुझसे पूछतीं ,' बहुत दिनो से बिलू नहीं दिखी । बीमार है क्या ?'
' नहीं कालेज तो रोज़ आती है ।'
'कह देना उससे आने को । तुम्हारे बस का तो है नहीं ,वही सिल जाएगी टेरिकाटवाली फ़्राक !'
मै स्वयं उससे अपने घर आने को कहूँ इसमे मुझे अपनी हेठी लगती थी । मेरा कोई काम उसके बिना थोड़े अटकता था । फिर भी मुझे साड़ियों मे फ़ाल लगे और बार्डर टँके मिलते थे ।मै भी जानती थी कौन करता है यह सब , पर मैने कभी कुछ नहीं कहा ।
गर्मियों की छुट्टियों मे भी उसका हफ़्ते मे एक चक्कर लग ही जाता था ।उस दिन विलक्षणा आई तो अम्माँ घर पर लहीं थीं । मुझे बड़ी उलझन होने लगी । अब क्या मै इसे चाय बना कर पिलाऊं ,अम्माँ ने भी खूब तमाशा लगा रक्खा है ! नहीं पिलाऊँगी तो सोचेगी अम्माँ तो इतनी ख़ातिर करती हैं ,और मैने यों ही टरका दिया ! पर मै काहे को ख़ातिर करूँ मेरी तो स्टूडेन्ट है ?मै पसोपेस मे पड़ी थी । मुझे लगा वह भी उलझन मे है । कुछ देर बैठी किताबें पलटती रही, फिर उठकर खड़ी हो गई ।
' दीदी ,अब चलूँ ?'
'क्यों बैठो चाय पीकर जाना ।'
पर कह कर मै मन ही मन पछताने लगी । चली जाती तो कौन सा गज़ब हो जाता ! हमेशा तो खा-पी कर ही जाती है एक बार नहीं ही सही !
'अच्छा आप अपना काम कीजिय़े ।मै बना लाती हूँ चाय ।'
वह उठ कर रसोई मे चली गई ।
चलो अच्छा हुआ ।बिना बनाए चाय पीने को मिल जाएगी ।बना भी लेगी तो क्या हुआ ,स्टूडेन्ट है मेरी ! और मै भी तो हमेशा उसकी डिफ़ीकल्टी दूर करने को तैयार रहती हूँ ,और कौन करता है उसके लिये इतना भी ?
चाय पीते-पीते मुझे लगा विलक्षणा बड़ी परेशान है । होगी ,मुझे क्या करना ? पर फिर रहा भी नहीं गया ।
' क्या बात है ,विलक्षणा ?'
मेरी आँखें अपने चेहरे पर जमी देख वह कुछ अस्थिर हो उठी । मेरी इच्छा हुई प्यार से उससे कहूँ 'बिलू ' जैसे मेरी अम्मा कहती थीं ,जैसे उसके घर के लोग कहते होंगे ! पर मैने कहा नहीं ,उससे दूरी जो बनाए रखना चाहती थी ।
'मै यदि तुम्हारे कुछ काम आ सकूँ तो कहो ?'
' नहीं दीदी ,आप कुछ नहीं कर सकतीं । मेरी माँ बीमार हैं ।'
उसकी माँ सौतेली थीं अधिकतर बीमार ही रहती थीं ,एक बड़ा भाई घर छोड़ कर कहीं चला गया था ,यह भी अम्माँ ने ही बताया था । यह उन्हें भी नहीं पता कि वह चला क्यों गया। दूसरे के घर की बात ,हमे करना भी क्या था ?
एकदम से मुझे लगा विलक्षणा भी स्वस्थ नहीं है । मैने ध्यान से देखा काफ़ी दुबली लग रही थी । बड़ी दया आई मुझे उस पर, !विलक्षणा शायद समझ गई मेरी दृष्टि को ! उठ कर खड़ी हो गई। फिर वह रुकी नहीं चसी गई ।
इसके बाद भी वह कई बार आई थी पर मेरी उपस्थिति मे नहीं । मेरी साड़िय़ाँ भी संवारी उसने बहिन की फ़्राकें भी सिलीं ,अम्माँ के जाने क्या-क्या काम भी करती रही । पर उसने कभी मुझसे किताबें नहीं माँगी ,न कोई सहायता ली । फ़ाइनल की परीक्षा दे दी उसने ।
सेकिण्ड डिवीज़न पास हो गई विलक्षणा ! बी.ए. की बाईस छात्राओं मे से केवल चार की सेकिण्ड डिवीज़न आई थी ,उन्ही मे एक वह भी थी ।
बीच ने कई बार वह अम्माँ से मिल गई थी ,मेरे लिए मिठाई भी रख गई थी , पर मेरा उसका सामना फिर नहीं हुआ । मुझे लगा ,अब उसकी परीक्षा हो गई है ,वह पास हो गई है ,अब उसे मेरी ज़रूरत भी क्या है ! और वह मेरे ध्यान से उतर गई ।
*****
छुट्टियाँ समाप्त हो चुकीं थीं ,कालेज खुलने ही वाले थे । घूम-घाम कर मै वापस घर लौट आई थी ।बड़ी उत्सुकता से अपनी डाक देख रही थी ,एक पत्र विलक्षणा का भी था - कहीं सर्विस कर ली थी उसने । खोल कर पढ़ा और देखती रह गई ! उन पंक्तियों से आँखें नहीं हट रहीं थीं। उन अक्षरों से परे और जाने क्या-क्या पढ़े जा रही थी मै । उसने लिखा था --
'आपके साथ से मैने अनुभव कर लिया कि माँ और बहिन का स्नेह कैसा होता होगा ! आपकी आभारी सदैव रहूँगी , धन्यवाद देकर सहज ही उऋण होने का साहस मै नहीं कर सकूँगी । वह स्नेह तो चिर- काल मेरे जीवन मे प्रकाश और स्फूर्ति भरता रहेगा --।'
स्तब्ध रह गई थी मै ! पता नहीं उसके मन मे कितने अभाव थे जिन्हे मुझसे भरने का व्यर्थ प्रयत्न करती रही वह । मेरी कितनी साड़ियाँ उसने सँवारीं ,कार्डिगन बुने और ब्लाउज़ सिल कर रख गई ।और अब वह चली गई ।मेरे पास था भी क्या उसे देने को ?
पूरा वर्ष बीत गया ।बीच मे ही उसके पिता ने सट्टे मे हार कर आत्महत्या कर ली ,कई मुखों से कई तरह की बातें उसके लिए सुनने मे आईँ । फिर सुना सौतेली माँ और बहनों को विलक्षणा अपने साथ ले गई । मेरी उससे मुलाकात नहीं हुई । मैने कई बार मिलने की कोशिश की पर ऐसा मौका आया नहीं ।
कालेज का टूर जा रहा था ।शरद-पूनम की रात मे ताजमहल देखने का कार्यक्रम बना था । तीन दिन जी भर कर आगरा घूमे । दूसरे दिन की शाम को चचेरी बहिन बीना के पति मुझे बुलाने आगये । बीना जीजी किसी तरह लौटने नहीं दे रहीं थीं पर 'ड्यूटी पर हूँ ,लड़कियों के साथ हूँ 'आदि कह कर बड़ी मुश्किल से आने की अनुमति ली । लौ़ते सम. रास्ते मे देखा विलक्षणा जा रही है ।किसी तरह मिल जाय वह ! उसके लिये इतना व्याकुल हो जाऊँगी ,मैने स्वप्न मे भी नहीं सोचा था।सोयी स्नेह-भावना जाग उठी थी ,मन उमग रहा था देने के लिये ! पर अब वह लेगी नहीं ।पड़ा रहेगा व्यर्थ जड़ सा होकर !
मै भी कैसे धोखे मे पड़ी रही ।नारी होकर एक नारी के हृदय का सहज स्नेह न ले सकी ,न दे सकी । उलकी सरलता मे मुझे दुनियादारी की गन्ध आने लगी थी ? धिक्कार है मेरी सावधानी ! उसने मुझसे लिया ही क्या ? पर मुझे बहुत कुछ दे गई । विश्वास ,जीवन का सबसे बड़ा संबल उसके पास था ,और मै धोखे की टट्टी मे अपने को उलझाए बैठी हूँ । अमृत उसके पास था पानी मेरे पास ! पानी ,जिसकी प्यास कभी बुझती नहीं ! और अमृत पिला गई वह ,जिसे पीकर मै आकण्ठ तृप्त हो गई हूँ ।
तेरी चिर ऋणी हूँ मै ,ओ विलक्षणा ,एक बार आ जा !
पर अब वह कभी नहीं आएगी ! मुझे देखकर कतरा जाएगी । मुझसे मिलेगी नहीं वह ,कभी नहीं मिलेगी ! अपना जो अभाव मेरे अनजाने वह मुझी से भरती रही, अब जान- बूझ कर उसे भरने नहीं देगी । कैसी विषम प्रकृति है ! विलक्षणा अब देखेगी तो मुँह फेर लेगी मुझसे ।अब वह कभी नहीं आएगी मेरे पास । कभी नहीं !
*
मुझे लगा वह जा रही है विलक्षणा ,वही कद ,वही पीठ पर झूलती ,लम्बी-सी अधखुली चोटी ,वही साड़ी जो अक्सर उसे पहने देखा है ,वही चलने का ढंग ,निश्चय वही है !मुझे विश्वास हो गया ।मैने चाल तेज़ कर दी ,आवाज़ लगाई ,' विलक्षणा -- बिलू !'
रास्ता चलते कुछ लोगों ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा ,पर मुझे उन की ओर ध्यान देने की फ़ुर्सत नहीं थी । मै जल्दी से उसके पास पहुँच जाना चाहती थी ।
'बिलू ,-- विलक्षणा ,-- ओ बिलू !'
'बिलू' अनायास मेरे मुँह से निकला जा रहा था जैसे मै उसे युगों से 'बिलू' कहकर बुलाती होऊँ । इसके पहले यह शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला था ,मन मे आया था पर मुँह से मैने निकलने नहां दिया था।
आगे जानेवाली युवती मेरे पीछे से आगे निकलते समय ध्यान से मुझे देख गई है -ऐसा मुझे आभास हुआ था ,उसके पग कुछ ठिठके ,कनखियों से उसने मुझे देख लिया और आगे बढ़ गई। मैने अपनी चाल और तेज़ कर दी । मै उससे मिलना चाहती थी ,अब तक जो उसे नहीं दे पाई ,वह देने को मै उतावली हो रही थी ,पर अब लेनेवाली रुक नहीं रही थी । अचानक ही उसने पीछे से आती हुई एक टैक्सी को हाथ दिया ,वह उसके पास जाकर रुकी और फिर उसे लेकर आँखों से ओझल हो गई। अब विलक्षणा नहीं मिलेगी ,देख लेगी तो भी नहीं आएगी मेरे पास ,कतरा कर चली जाएगी । क्यों ? लेकिन क्यों ?
*****
'कौन ?'
'दीदी , मै !'
अच्छा ,विलक्षणा है ।आओ ,आज बहुत दिनो मे दर्शन हुए ।'
'कहाँ ,दीदी, बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर आई हूँ,जरा देर के लिये। वहाँ सारा काम पड़ा होगा !'
मुझे बड़ा सन्तोष हुआ ,चलो ,चाय-नाशते का झंझट नहीं करना पड़ेगा ! फिर मन-ही-मन इस विचार के लिए मैने स्वयं को धिक्कारा ,वह तोइतनी दूर से रिक्शा लेकर मिलने आई और मै ये सोच रही हूँ !
यह तो मुझे काफ़ी बाद मे पता लगा था कि पीठ पीछे लोग उसकी बुराई करते हैं ।अपने साथियों मे भी वह लोक-प्रियता की सीमाओं से दीर रह गई थी । सामने-सामने तो सब अच्छी तरह बोलते पर पीठ फिरते ही मुँह बिचकाने लगते थे ।
मेरी एक साथिन ने एक दिन मेरे कान मे भी फूँका ,' देखना इससे चौकन्नी रहना !सबमे घुली रहकर सबसे भली बनने की कोशिश करती है ,और साधती है अपना मतलब !'
'कौन विलक्षणा ?'
और कौन है हमारे यहाँ जो सबसे मीठा बोलता फिरे ?'
'अच्छा --!'
और दो दिन बाद ही विलक्षणा मुझसे कह रही थी ,' दीदी ,मै कल एबसेन्ट थी । आपने जो नोट्स लिखाए वह मुझे दे दीजिए ।'
'वो तो मै घर छोड़ आई हूँ ।'
' अच्छा ' उलके मुख पर निराशा छा गई ।
'क्लास की किसी लड़की से ले लो ।'
'हाँ ,अच्छा ले लूँगी ।' उसका चेहरा बुझ गयाथा ।
अपने ग्रुप की लड़की को छोड़कर कौन अपने नोट्स किसी को देता है ,और विलक्षणा किसी ग्रुप मे नहीं है ,यह भी मै जानती थी ।
'घर से चाहो तो ले लेना ।'
आश्वस्त होकर वह प्रसन्न हो गई । पर एकदम मेरे दिमाग़ मे आया -ये कहां का झंझट पाल लिया !
'पर घर पर पता नहीं मै कब पहुँचूँ ?खैर मै देखूँगी फिर !' दूसरा आश्वासन दिया मैने ।
घर पहुँचने पर अम्माँ ने कहा ,' कोई लड़की आई थी ,तुझे पूछ रही थी ।'
'लड़की । क्या नाम था ?
'विलक्षणा ।'
मैने चैन की साँस ली .चलो अच्छा हुआ जो घर पर नहीं मिली मै ! अब बार-बार कौन आता है ?
' और वो तेरा सफ़ेद कार्डिगन मैने बिनने को दे दिया है ।'
'बड़ा अच्छा किया ! मै कहाँ तक करती !'
कुल एक हफ़्ता रह गया था शादी मे जाने को । एक तो मुझे समय ही कम मिलता था फिर कार्डिगन के अलावा और भी तो बहुत काम पड़े थे मेरे लिए ! इतनी जल्दी कैसे बुन पाता ,मोल बुनवाना ही सबसे ठीक रहा !
'किसे दिया है ?'
'वोई ले गई , वो जो आई थी ।'
' ऐं ,उसे क्यों दे दिया ? तुम काहे को सबसे कहने बैठ जाती हो ?'
' मैने कहाँ कहा ?उसी ने पूछा ।तू ही तो ऊपर सब छोड़ गई थी । वो पूछने लगी तो मैने बता दिया - काम इत्ता करने को पड़ा है और तेरी दीदी के पास टाइम ही नहीं है ,तो उसने कहा लाइए मै चार दिन मे बुन दूँगी ।'
अम्मा के ऊपर बड़ी खीझ लगी । हरेक के सामने अपना दुखड़ा रोने दैठ जाती हैं ।
किसी डाक्टर ने तो कहा नहीं था कि शादी मे सफ़ेद कार्डिगन पहनो ही ,दूसरी ओर थोड़ी खुशी भी हुई कि चलो बिना मेहनत के बुन जाएगा ।
'और ला के कब देगी ? कहीं रख के बैठ गई तो और मुश्किल ?'
'ऐसा भी कहीं हो सकता है ?तेरे कालेज मे तो पढ़ती है । वो तो बड़ी सीधी लड़की थी । खूब दीदी-दीदी करके बात कर रही थी तेरे लिए। '
अम्माँ बड़ी जल्दी सबसे सगापा जोड़ लेती हैं ! अब एहसान मेरे सिर चढ़ गया ! दूसरों को बेटी बना लेना इन्हें बड़ा आसान लगता है ,मेरी पोज़ीशन का ज़रा ख़याल नहीं ! पर मेरी झुँझलाहट सुनने को अम्मां वहाँ रुकी ही कब थीं !
तीसरे दिन शाम को अचानक विलक्षणा फिर टपक पड़ी । कार्डिगन का पिछला पल्ला और बाँहें उसने बड़ी सफ़ाई से बुने थे । नोट्स मैने ख़ुध लाकर उसे पकड़ा दिये । इतना काम कर रही है किसी मतलब से ही तो ! अम्माँ ने उसे चाय-वाय पिलाई और 'बेटी-बेटी' कर बात करती रहीं । वह मगन हो खाती-पीती रही और मुझे नमस्ते करके चली गई ।
फिर एक दिन घर पर देखा विलक्षणा बैठी मेरी साड़ी के पल्ले तुरप रही है । मुझे देख कर वह सकुचा सी गई ।अम्माँ झट् से बोल दीं ,' देखा ,मेरी नई बेटी मेरा कितना ध्यान रखती है । '
'अरे ,विलक्षणा ! तुम क्यों बेकार परेशान हो रही हो ?'
'आप मेरी दीदी हैं तो ये मेरी भी तो अम्माँ हैं ,अकेली आपकी थोड़े ही हैं ।'
'क्यों नहीं ,विलक्षणा ,तुम मेरी छोटी बहन हो ' एकदम मेरे मुँह से निकल गया ।
उसने अपनी तरल हो-आई पलकें झुका लीं ।
'कभी भी कोई डिफ़ीकल्टी हो तो चली आया करो ।'
मानो मैने उसे बहनत्व का पूरा अधिकार दे दिया !
फिर तो घर मे अक्सर ही उसका नाम सुनने को मिलने लगा । अम्माँ को तो जैसे उसने मोह लिया था ।घर की जो थोड़ी-बहुत सिलाई-बुनाई कर देती थी अब मुझे नहीं करनी पड़ती थी ।छोटी बहन के बर्थ -डे पर सुबह से शाम तक जुटी रही थी वह ।बड़े उत्साह से सारा काम निपटाया था और जब उसके खाने का समय आया तो बहुत सी वस्तुएं समाप्त हो चुकीं थीं । अम्माँ के बार-बार पछताने पर उसने जवाब दिया ,' अम्माँ ,अपने हाथों से पराँठे बना कर खिला दीजिये , म्रेरे लिये तो वह मिठाई से भी बढ़ कर होंगे !'
और वह पराँठों से पेट भरकर चली गई थी।
वह जो फ़्राक का पीस प्रेज़ेन्ट मे लाई थी वह लौटाने को मैने अम्माँ से कहा तो उन्होने साफ़ मना कर दिया कि ऐसे प्यार से लाई गई चीज़ वे वापस नहीं कर सकतीं । मैने वापस करना चाहा ,मेरे बर-बार कहने पर वह कुछ रुआँसी हो आई ,' दीदी ,इतना पराया समझती हैं आप ?'
फिर आगे मैने कुछ नहीं कहा था ।
सब अपने मतलब के लिये ,सोचा था मैने । चलते समयकह दिया था ,' कोई भी किताब चाहिये हो तो मुझसे ले लेना ।'
'जी ? मेरे पास हैं सब !'
'नहीं कोई लाइब्रेरी से न मिलती हो ,या मेरी कोई चाहिये हो तो -- ' मैने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया !
अम्माँ के लिये तो विलक्षणा 'बिलू' बन गई थी ,थोड़े दिन नहीं आती तो मुझसे पूछतीं ,' बहुत दिनो से बिलू नहीं दिखी । बीमार है क्या ?'
' नहीं कालेज तो रोज़ आती है ।'
'कह देना उससे आने को । तुम्हारे बस का तो है नहीं ,वही सिल जाएगी टेरिकाटवाली फ़्राक !'
मै स्वयं उससे अपने घर आने को कहूँ इसमे मुझे अपनी हेठी लगती थी । मेरा कोई काम उसके बिना थोड़े अटकता था । फिर भी मुझे साड़ियों मे फ़ाल लगे और बार्डर टँके मिलते थे ।मै भी जानती थी कौन करता है यह सब , पर मैने कभी कुछ नहीं कहा ।
गर्मियों की छुट्टियों मे भी उसका हफ़्ते मे एक चक्कर लग ही जाता था ।उस दिन विलक्षणा आई तो अम्माँ घर पर लहीं थीं । मुझे बड़ी उलझन होने लगी । अब क्या मै इसे चाय बना कर पिलाऊं ,अम्माँ ने भी खूब तमाशा लगा रक्खा है ! नहीं पिलाऊँगी तो सोचेगी अम्माँ तो इतनी ख़ातिर करती हैं ,और मैने यों ही टरका दिया ! पर मै काहे को ख़ातिर करूँ मेरी तो स्टूडेन्ट है ?मै पसोपेस मे पड़ी थी । मुझे लगा वह भी उलझन मे है । कुछ देर बैठी किताबें पलटती रही, फिर उठकर खड़ी हो गई ।
' दीदी ,अब चलूँ ?'
'क्यों बैठो चाय पीकर जाना ।'
पर कह कर मै मन ही मन पछताने लगी । चली जाती तो कौन सा गज़ब हो जाता ! हमेशा तो खा-पी कर ही जाती है एक बार नहीं ही सही !
'अच्छा आप अपना काम कीजिय़े ।मै बना लाती हूँ चाय ।'
वह उठ कर रसोई मे चली गई ।
चलो अच्छा हुआ ।बिना बनाए चाय पीने को मिल जाएगी ।बना भी लेगी तो क्या हुआ ,स्टूडेन्ट है मेरी ! और मै भी तो हमेशा उसकी डिफ़ीकल्टी दूर करने को तैयार रहती हूँ ,और कौन करता है उसके लिये इतना भी ?
चाय पीते-पीते मुझे लगा विलक्षणा बड़ी परेशान है । होगी ,मुझे क्या करना ? पर फिर रहा भी नहीं गया ।
' क्या बात है ,विलक्षणा ?'
मेरी आँखें अपने चेहरे पर जमी देख वह कुछ अस्थिर हो उठी । मेरी इच्छा हुई प्यार से उससे कहूँ 'बिलू ' जैसे मेरी अम्मा कहती थीं ,जैसे उसके घर के लोग कहते होंगे ! पर मैने कहा नहीं ,उससे दूरी जो बनाए रखना चाहती थी ।
'मै यदि तुम्हारे कुछ काम आ सकूँ तो कहो ?'
' नहीं दीदी ,आप कुछ नहीं कर सकतीं । मेरी माँ बीमार हैं ।'
उसकी माँ सौतेली थीं अधिकतर बीमार ही रहती थीं ,एक बड़ा भाई घर छोड़ कर कहीं चला गया था ,यह भी अम्माँ ने ही बताया था । यह उन्हें भी नहीं पता कि वह चला क्यों गया। दूसरे के घर की बात ,हमे करना भी क्या था ?
एकदम से मुझे लगा विलक्षणा भी स्वस्थ नहीं है । मैने ध्यान से देखा काफ़ी दुबली लग रही थी । बड़ी दया आई मुझे उस पर, !विलक्षणा शायद समझ गई मेरी दृष्टि को ! उठ कर खड़ी हो गई। फिर वह रुकी नहीं चसी गई ।
इसके बाद भी वह कई बार आई थी पर मेरी उपस्थिति मे नहीं । मेरी साड़िय़ाँ भी संवारी उसने बहिन की फ़्राकें भी सिलीं ,अम्माँ के जाने क्या-क्या काम भी करती रही । पर उसने कभी मुझसे किताबें नहीं माँगी ,न कोई सहायता ली । फ़ाइनल की परीक्षा दे दी उसने ।
सेकिण्ड डिवीज़न पास हो गई विलक्षणा ! बी.ए. की बाईस छात्राओं मे से केवल चार की सेकिण्ड डिवीज़न आई थी ,उन्ही मे एक वह भी थी ।
बीच ने कई बार वह अम्माँ से मिल गई थी ,मेरे लिए मिठाई भी रख गई थी , पर मेरा उसका सामना फिर नहीं हुआ । मुझे लगा ,अब उसकी परीक्षा हो गई है ,वह पास हो गई है ,अब उसे मेरी ज़रूरत भी क्या है ! और वह मेरे ध्यान से उतर गई ।
*****
छुट्टियाँ समाप्त हो चुकीं थीं ,कालेज खुलने ही वाले थे । घूम-घाम कर मै वापस घर लौट आई थी ।बड़ी उत्सुकता से अपनी डाक देख रही थी ,एक पत्र विलक्षणा का भी था - कहीं सर्विस कर ली थी उसने । खोल कर पढ़ा और देखती रह गई ! उन पंक्तियों से आँखें नहीं हट रहीं थीं। उन अक्षरों से परे और जाने क्या-क्या पढ़े जा रही थी मै । उसने लिखा था --
'आपके साथ से मैने अनुभव कर लिया कि माँ और बहिन का स्नेह कैसा होता होगा ! आपकी आभारी सदैव रहूँगी , धन्यवाद देकर सहज ही उऋण होने का साहस मै नहीं कर सकूँगी । वह स्नेह तो चिर- काल मेरे जीवन मे प्रकाश और स्फूर्ति भरता रहेगा --।'
स्तब्ध रह गई थी मै ! पता नहीं उसके मन मे कितने अभाव थे जिन्हे मुझसे भरने का व्यर्थ प्रयत्न करती रही वह । मेरी कितनी साड़ियाँ उसने सँवारीं ,कार्डिगन बुने और ब्लाउज़ सिल कर रख गई ।और अब वह चली गई ।मेरे पास था भी क्या उसे देने को ?
पूरा वर्ष बीत गया ।बीच मे ही उसके पिता ने सट्टे मे हार कर आत्महत्या कर ली ,कई मुखों से कई तरह की बातें उसके लिए सुनने मे आईँ । फिर सुना सौतेली माँ और बहनों को विलक्षणा अपने साथ ले गई । मेरी उससे मुलाकात नहीं हुई । मैने कई बार मिलने की कोशिश की पर ऐसा मौका आया नहीं ।
कालेज का टूर जा रहा था ।शरद-पूनम की रात मे ताजमहल देखने का कार्यक्रम बना था । तीन दिन जी भर कर आगरा घूमे । दूसरे दिन की शाम को चचेरी बहिन बीना के पति मुझे बुलाने आगये । बीना जीजी किसी तरह लौटने नहीं दे रहीं थीं पर 'ड्यूटी पर हूँ ,लड़कियों के साथ हूँ 'आदि कह कर बड़ी मुश्किल से आने की अनुमति ली । लौ़ते सम. रास्ते मे देखा विलक्षणा जा रही है ।किसी तरह मिल जाय वह ! उसके लिये इतना व्याकुल हो जाऊँगी ,मैने स्वप्न मे भी नहीं सोचा था।सोयी स्नेह-भावना जाग उठी थी ,मन उमग रहा था देने के लिये ! पर अब वह लेगी नहीं ।पड़ा रहेगा व्यर्थ जड़ सा होकर !
मै भी कैसे धोखे मे पड़ी रही ।नारी होकर एक नारी के हृदय का सहज स्नेह न ले सकी ,न दे सकी । उलकी सरलता मे मुझे दुनियादारी की गन्ध आने लगी थी ? धिक्कार है मेरी सावधानी ! उसने मुझसे लिया ही क्या ? पर मुझे बहुत कुछ दे गई । विश्वास ,जीवन का सबसे बड़ा संबल उसके पास था ,और मै धोखे की टट्टी मे अपने को उलझाए बैठी हूँ । अमृत उसके पास था पानी मेरे पास ! पानी ,जिसकी प्यास कभी बुझती नहीं ! और अमृत पिला गई वह ,जिसे पीकर मै आकण्ठ तृप्त हो गई हूँ ।
तेरी चिर ऋणी हूँ मै ,ओ विलक्षणा ,एक बार आ जा !
पर अब वह कभी नहीं आएगी ! मुझे देखकर कतरा जाएगी । मुझसे मिलेगी नहीं वह ,कभी नहीं मिलेगी ! अपना जो अभाव मेरे अनजाने वह मुझी से भरती रही, अब जान- बूझ कर उसे भरने नहीं देगी । कैसी विषम प्रकृति है ! विलक्षणा अब देखेगी तो मुँह फेर लेगी मुझसे ।अब वह कभी नहीं आएगी मेरे पास । कभी नहीं !
*
पाकिट
स्कूल से लौटते ही उसने बस्ता सोफ़े पर फेंका और मेरे गले मे हाथ डाल कर पीठ से झूलते हुए बोली ,'मम्मी... ! '
' क्या बात है?'
'मम्मी ,हमें भी पाकिट मँगा दो ।'
'अच्छा,अच्छा ,मँगा दूँगी ! पहले कपड़े बदलो और खाना खाओ ।'
खाना खाते-खाते भी वह पाकिट की बात करती रही -उसकी डिब्बी भी बन जाती है ,हवाई जहाज़ भी । कैंची से काटें तो लालटेन निकल आए । रीना के, मन्टू के पास तीन-तीन हैं ।
' , पापा से कहना बाज़ार से ला देंगे ।'
'पापा से तो हमने कहा था । वो कहते हैं हमें नही पता ।'
'कब कहा था ?'
' कल भी कहा था ,पहले भी कहा था ।'
' अच्छा , अब मैं भी कह दूँगी ।'
पर पता तो मुझे भी नहीं था कि वह काहे के लिए कह रही है । मैंने पूछा ,' यह बताओ, पाकिट क्या चीज़ है ?'
'पाकिट है।'
' पाकिट क्या ?'
'पाकिट है पाकिट ,जैसा सुधीर के पास है ,मोना के पास है और सब के पास है ।'
चार साल की बच्ची को मैं कैसे समझाऊँ कि जो चीज़ सिर्फ़ उसने देखी है ,मैंनहीं जान सकती ।
'किसी के पास से लाकर दिखाओ ,पहले देखूँ तो कैसा है ।'
' कोई नहीं देगा मम्मी , अपना पाकिट ।'
'अच्छा कितना बड़ा है ?'
उसने अपनी छोटी-सी गुलाबी हथेली खोलकर नाप बता दी । सफ़ेद रंग का है ,ऊपर लालटेन का फ़ोटू है और लिखा भी है ।क्या लिखा है ये पता नहीं -अभी जितना पढ़ना आता है उसे ,वह तो मजबूरी मे जितना पढ़ना पड़ता है उतना ही पढ़ती है ,बिचारी !
शाम को खेलने गई तो थोड़ी देर में वापस लौट आई । सबके पास पाकिट हैं उनसे खेल होता है रीनी के पास हई नहीं ।वह उदास होकर घर लौट आई ।उसका चेहरा देखकर मुझे बड़ा तरस आया ।
' नानक की दूकान पर मिलता है ?'
'पता नहीं ।'
' और लोग कहाँ से लाए ?'
'सब अपने घर से लाते हैं ।'
मैं चक्कर में पड़ी - सब के घरों मे पाकिट हैं ,हमारे घर में नहीं ,और हम जानते तक नहीं कि यह क्या चीज़ है , कैसी होती है ।
'अच्छा, अबकी से सुधीर आए तो तुम उसका पाकिट दिखा देना हम तुम्हारे लिए भी ला देंगे ।'
इनके बाज़ार जाते समय भी उसने याद दिलाई ,' पापा ,हमारे लिेये पाकिट जरूर लाना है ।'
'बेटे , हमें पता नहीं पाकिट कैसा होता है ।'
'पापा सबके पास तो है ।'
मैंने बीच में दखल दिया ,' कैसा पाकिट कह रही है ? ला क्यों नहीं देते -इतने दिनों से रट लगाए है ।'
' पर है क्या, कुछ पता भी तो चले ।'
' तो ऐसा कीजिये ,इसे अपने साथ लेते जाइये ।अपने आप देखकर ले लेगी ।'
अच्छा चलो। रीनी बेटे कपड़े बदलवा आओ ।'
ढाई घन्टे बाद बाप-बेटी दोनों मुँह लटकाए लौट आए ।
'क्यों मिल गया पाकिट ?'
रीनी तो रोने-रोने को हो आई ।ये झल्लाए हुए थे ,बोले अब तुम्हीं जाकर खरिदवा दो ।हम तो सारी बाज़ार ढूँढ फिरे , कहीं मिला नहीं ।'
इनसे डाँट खाती है तो मेरे पास आ बैठती है ,ये उसकी पुरानी आदत है ।
मैने सिर सहलाकर कहा ,'जाओ ,अपना स्कूल का काम कर डालो ,मै तुम्हारे लिए पाकिट मँगा दूँगी ।'
वह आश्वस्त होकर चली गई ।
सौदा लाने में इन्होने हमेशा मुझे झिंकाया है ।एक से दूसरी दूकान देखने में इनकी शान घटती है ।जिस दूकान पर ठहर जायेंगे उसी से सारा सामान खरीद लेंगे - चाहे सड़ा हो, गला हो , देखेंगे तक नहीं । घर पर आने के बाद कुछ कहो तो कह देंगे ,'मै क्या करूँ उसके यहाँ और था ही नहीं ।'
अरे ,आदमी दो-चार दुकाने देख कर पूरी तसल्ली कर सामान लेता है ! पर मजाल है जो ये एक दूकान से दूसरी तक बढ़ भी जायँ ।कभी-कभी तो ऐसा सामान लाकर पटका है कि पड़े-पड़े सड़ता रहा और अंत मे कूड़े में फेंक देना पड़ा । मैं तो इनकी खरीदारी जानती हूँ ,रीनी का पाकिट ठीक से ढूँढा थोड़े ही होगा !
मैंने रीनी से पूछा ,' क्यों रीनी ,पापा ने कहाँ-कहां ढूँढा था पाकिट ?'
'खूब सारी दुकाने देखी थीं ,' आशा के विपरीत उत्तर मिला ।
बाप-बेटी देने एक से हैं !
दुकानदार को अपनी बात समझा नहीं पाए होंगे ,नहीं तो सबके पास जो चीज़ है ,वो इन्हे ढूँढे नहीं मिलती ! अब मुझे ही जाना पड़ेगा ।
अगले दिन उसके स्कूल में छुट्टी थी। मैने रीनी से कहा ,'नानक की दुकान पर देख आओ ,पाकिट है ?'
नानक मोहल्ले की परचून की दूकानवाला है , बच्चों के मतलब की चीज़ें भी रखता है थोड़ी-बहुत ।
वह दौड़ी-दौड़ी चली गई पर आधे रास्ते जाकर लोट आई ,' मम्मी ,पैसे तो दिये ही नहीं ।'
'पहले तुम देख तो आओ जाके ।'
' ऐसे तो वो देगा भी नहीं और कह देगा भाग जाओ यहाँ से ।'
मुझे हँसी आ गई - बड़ी समझदार हो गई है मेरी बिटिया ! मैने पाँच रुपए का नोट उसे पकड़ा दिया ।
पर पाकिट उसे नानक की दूकान पर भी नहीं मिला ।
सब बच्चे अपने पापा से पाकिट लेते हैं ,बस रीनी के पापा के पास नहीं है ,उसके लिये शरम की बात है !
इनके आने पर फिर वही रट ! दो-तीन बार इन्होने उसे समझाया , देखा , नहीं समझती तो बुरी तरह डाँट दिया ।वह चुपचाप रोने लगी ।
बच्चों का चुपचाप रोना मन को कितना बुरा लगता है !मुझे बोलना ही पड़ा ,'इस बुरी तरह झिड़क दिया लड़की को ! ज़रा सी चीज़ लाकर दे नहीं सकते ?'
'तुम तो उसी की तरफ़ बोलोगी ! हर बखत पाकिट-पाकिट-- हमारी तो समझ मे नहीं आता आखिर है क्या चीज़ !'
मैने उसे पाँच रुपए का नोट दिया पाकिट के लिए , पर उसने फेंक दिया और रोती रही ।.
*
मेरी अच्छी मुसीबत है ! ये तो डाँट फटकार कर छुट्टी पा लेते हैं ,वह रोती हुई मेरे पास आती है । इन बापों का ढंग भी बड़ा अजीब होता है - कभी तो उसे इतना प्यार करेंगे और कभी एकदम फटकार देंगे ।इनके आगे वह अधिक बोल भी नहीं पाती ,डाँट खाते ङुए सहम जाती है ।पर मुझे तो उसका मन रखना ही है ।
रीनी तीसरे पहर फिर खेलने नहीं गई ।
सब बच्चे जान गए है कि वह पाकिट नहीं मँगा पाई .-उसे दिखा-दिखा कर और चिढ़ाते हैं ।इसलिए वह खेलने ही नहीं जाती ।उदास अकेली बैठी देखकर मेरा मन कचोटता है ।दो साल छोटे टोनू से उसकी बिल्कुल नहीं पटती ,वह तो कभी उसके रिबन खींचता है कभी बाल नोचता है ।
'रीनी , कल सुबह स्कूल जाते समय सुधीर से पाकिट लेकर मुझे दिखा देना फिर मैं तुम्हारा खरीद दूँगी ।'
सुबह का समय? क्या किसी तूफ़ान से कम होता है ।
रीनी तो फिर भी सीधी है ,दो साल का टोनू तो ज़रा सा मन के खिलाफ़ होते ही आसमान सिर पर उठा लेता है - उस पर न बाप की फटकार का असर , न मेरी पुचकार का ।अपनी पूरी बात बोल नहीं पाता तो क्या हुआ बे-मन की बात होने पर ऐसा धमकाता है ।पहली स्टेज होती है नीचे का होंठ सिकोड़ कर पूरा बाहर निकाल कर छ: कोने का मुँह बना कर रोने की तैयारी ।इस पर अगर कोई ध्यान न दे तो दूसरी और आखिरी स्टेज है -खूब ज़ोर से रोने की और वह भी आँखें बन्द करके कि कहीं किसी की पुचकार से रोने की मुद्रा भंग न हो जाए ।रुदन पूर्व की छ: कोने के मुँह और होंठ बाहर फुलाने की आदत तो तब की है जब वह तीन महीने का था ।पहने तो ऐसा मुँह देखकर मुझे बड़े ज़ोर की हँसी छूटती थी - दो चार बार सास वगैरा ने टोका तो अब हँसने पर काफ़ी कंट्रोल कर लिया है । मेरी रीनी ने ऐसा कभी नहीं किया वह सीधे-सीधे रोती है ।
सात बजे रीनी का रिक्शा आ जाता है ,छ: बजे से उसे जगाकर उसके पीछे लगती हूँ - बीच-बीच में टोनू की इमरजेन्सियाँ पूरी करती हूँ और जब वह खा - पी कर समय से तैयार होकर रिक्शे पर बैठ जाती है तो मुझे लगता है एक किला फ़तेह कर लिया । इस सब के बीच दूध गर्म करना , ठण्डा करना ,टोनू की शीशी भरना , शूशू कराना चलता रहता है ।
रीनी को रिक्शे पर भेज कर मैंने चैन की साँस ली ही थी कि रीनी की आवाज़ आई ,' मम्मी --मम्मी--'
'क्या हो गया ?' हाथ मे सँडासी लिए मै दौड़ी-दौड़ी ज़ीने पर आई ।
' मम्मी ये रहा सुधीर का पाकिट --' वह रिक्शे से चिल्लाई ,'सुधीर ,जल्दी दिखाओ मेरी मम्मी को --।'
सुधीर अपने बस्ते मे कुछ ढूँढ रहा था ।
मेरे पीछे-पीछे टोनू घिसटता चला आया था । मेरी साड़ी की चुन्नटें पकड़ कर वह ऊपरवाली सीढी पर खड़ा उछल-उछल कर नीचे रिक्शे पर ,रीनी को देख किलक रहा था ।नीचे को बढता उसका पाँव देखकर मैने एक हाथ से उसे सम्हाला ,आवाज़ लगाई ,' रीनू, जल्दी दिखा पाकिट ।'
सुधीर ने अपने बस्ते से कोई सफ़ेद सी चीज़ ऊपर उठाकर दिखाई ,इतने मे दूध जलने की महक आई ।
अरे , मै तो सारा दूध आग पर चढ़ा आई थी !,सँड़सी से उतारने जा रही थी कि रीनी की आवाज़ सुनी ।इधर टोनू एक साथ सारी सीढियाँ फलाँगने ने की कोशिश में ।मैने खींचा तो उसने बड़ी जोर से होंठ निकाल कर मुझे धमकाया , तभी रीनी का रिक्शे वाला चिल्लाया ,' जल्दी करो ।'
'मम्मी देख लिया पाकिट ?'
'हाँ,हाँ--' करती मैं एक हाथ से टोनु को खींचती ,दूसरे हाथ में सँड़ासी सम्हाले अन्दर भागी -दूध उतारने ।मैने सोचा लौटकर आएगी तब देख लूँगी ,पर उस दिन किसी कारण हाफ़ डे में ही छुट्टी हो गई , वह जल्दी ही लौट आई । मुझे पाकिट देखने का मौका नहीं मिला ।
*
शाम को बाज़ार जाने का प्रोग्राम बना ,बना क्या मैंने जान-बूझकर बनाया ।वैसे मुझे बज़ार जाने का कोई शौक नहीं है । पर अब तो पाकिट लेना था ।
हमलोगों ने सारा बाज़र छान मारा ।
दूकानदारों को समझाना मुश्किल हो गया कि पाकिट है क्या ।रीनी अपने ढंग से समझाती थी और वे समझ न पाकर उसे ही बहलाने की कोशिश करते थे ।वे अपनी ही कोई चीज़ भिड़ाने के चक्कर मे रहते ।पर बहल जाय तो रीनी कैसी !हम लोगों ने भी उसे समझाया ,कई खिलौने दिखाए - 'कहा तुम ये लेलो ये पाकिट से भी अच्छे हैं ,और किसी के पास ऐसा है भी नहीं ।'
पर उसकी एक ही रट '-हमें तो पाकिट चाहिए ,सबके पास है हमें भी चाहिए ।'
अब तो मैं भी परेशान हो गई, 'जो चीज़ कहीं मिलती ही नहीं ,तुम्हारे लिए कहाँ से ला दें ?हमने तो कभी देखी भी नहीं ।'
'सुधीर की दिखाई तो थी ।'
'कहाँ देख पाई मै !टोनू नीचे कूदा जा रहा था उधर दूध उबल गया -- ।'
रीनी फिर उदास हो गई ।मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था ।
शाम हो गई थी । मौसम सुहावना था । मैंने सोचा जल्दी घर पहुँच जाएँगे तो ये अकेली चुपचाप बैठी रहेगी खेलने भी नहीं जाएगी ,रास्ते में ही थोड़ा समय निकाल दें ।
'चलो पैदल ही घर चलें रिक्शा लेकर क्या करेंगे ?'
'तुम्हीं थक जाओगी , मुझे क्या -- ।'
हम लेग लौट पड़े ।
आज तो हद हो गई !बीस पच्चीस दूकानो पर पूछा पाकिट किसी के पास नहीं !
ऐसा क्या अजूबा है ?
नुमायश ग्राउण्ड की सफ़ाई हो गई थी ,उधर से निकल चलेंगे तो काफ़ी चक्कर बच जाएगा । हम लोग नुमायश की तैयारियाँ देखते हुए चलते रहे । पूरा मैदान एकदम साफ़ है ,जगह-जगह फाटक लग रहे हैं ,बिजलीवालों के तम्बू गड़े हैं ,बिजली की फ़िटिंग चल रही है .क्यारियों में फूलों की पौध तैयार हो रही है ।हप़्ते भर बाद यहाँ खूब रौनक रहेगी ,शहर के लोग इधर ही उमड़ पड़ेंगे ।लाउड-स्पीकरों के शोर के मारे एक-एक बजे तक सोना मुश्किल हो जाएगा !
गर्मियों की सुहावनी शामें बड़ी जल्दी ढल जाती हैं । नुमायश ग्राउण्ड की इक्की-दुक्की बिजलियाँ जल गईं थीं ,बिजलीवलों के तम्बुओं से हम जरा आगे बढ़े ही थे कि दैड़ती हुई रीनी चिल्लाई ,'मम्मी ,मम्मी , वो रहा पाकिट ! '
उसने झुक कर जमीन से कुछ उठाया ,फ्राक से उसकी मिट्टी पोंछी और दोनो हथेलियों से दबा कर सीने से लगा लिया ।
'देखें तो क्या है ,' हम दोनों उत्सुक होकर एक साथ भागे ।
उसने खोल कर दिखाया -
सिगरेट का एक खाली पैकेट ,जिस पर लालटेन की तस्वीर बनी हुई थी !
*
' क्या बात है?'
'मम्मी ,हमें भी पाकिट मँगा दो ।'
'अच्छा,अच्छा ,मँगा दूँगी ! पहले कपड़े बदलो और खाना खाओ ।'
खाना खाते-खाते भी वह पाकिट की बात करती रही -उसकी डिब्बी भी बन जाती है ,हवाई जहाज़ भी । कैंची से काटें तो लालटेन निकल आए । रीना के, मन्टू के पास तीन-तीन हैं ।
' , पापा से कहना बाज़ार से ला देंगे ।'
'पापा से तो हमने कहा था । वो कहते हैं हमें नही पता ।'
'कब कहा था ?'
' कल भी कहा था ,पहले भी कहा था ।'
' अच्छा , अब मैं भी कह दूँगी ।'
पर पता तो मुझे भी नहीं था कि वह काहे के लिए कह रही है । मैंने पूछा ,' यह बताओ, पाकिट क्या चीज़ है ?'
'पाकिट है।'
' पाकिट क्या ?'
'पाकिट है पाकिट ,जैसा सुधीर के पास है ,मोना के पास है और सब के पास है ।'
चार साल की बच्ची को मैं कैसे समझाऊँ कि जो चीज़ सिर्फ़ उसने देखी है ,मैंनहीं जान सकती ।
'किसी के पास से लाकर दिखाओ ,पहले देखूँ तो कैसा है ।'
' कोई नहीं देगा मम्मी , अपना पाकिट ।'
'अच्छा कितना बड़ा है ?'
उसने अपनी छोटी-सी गुलाबी हथेली खोलकर नाप बता दी । सफ़ेद रंग का है ,ऊपर लालटेन का फ़ोटू है और लिखा भी है ।क्या लिखा है ये पता नहीं -अभी जितना पढ़ना आता है उसे ,वह तो मजबूरी मे जितना पढ़ना पड़ता है उतना ही पढ़ती है ,बिचारी !
शाम को खेलने गई तो थोड़ी देर में वापस लौट आई । सबके पास पाकिट हैं उनसे खेल होता है रीनी के पास हई नहीं ।वह उदास होकर घर लौट आई ।उसका चेहरा देखकर मुझे बड़ा तरस आया ।
' नानक की दूकान पर मिलता है ?'
'पता नहीं ।'
' और लोग कहाँ से लाए ?'
'सब अपने घर से लाते हैं ।'
मैं चक्कर में पड़ी - सब के घरों मे पाकिट हैं ,हमारे घर में नहीं ,और हम जानते तक नहीं कि यह क्या चीज़ है , कैसी होती है ।
'अच्छा, अबकी से सुधीर आए तो तुम उसका पाकिट दिखा देना हम तुम्हारे लिए भी ला देंगे ।'
इनके बाज़ार जाते समय भी उसने याद दिलाई ,' पापा ,हमारे लिेये पाकिट जरूर लाना है ।'
'बेटे , हमें पता नहीं पाकिट कैसा होता है ।'
'पापा सबके पास तो है ।'
मैंने बीच में दखल दिया ,' कैसा पाकिट कह रही है ? ला क्यों नहीं देते -इतने दिनों से रट लगाए है ।'
' पर है क्या, कुछ पता भी तो चले ।'
' तो ऐसा कीजिये ,इसे अपने साथ लेते जाइये ।अपने आप देखकर ले लेगी ।'
अच्छा चलो। रीनी बेटे कपड़े बदलवा आओ ।'
ढाई घन्टे बाद बाप-बेटी दोनों मुँह लटकाए लौट आए ।
'क्यों मिल गया पाकिट ?'
रीनी तो रोने-रोने को हो आई ।ये झल्लाए हुए थे ,बोले अब तुम्हीं जाकर खरिदवा दो ।हम तो सारी बाज़ार ढूँढ फिरे , कहीं मिला नहीं ।'
इनसे डाँट खाती है तो मेरे पास आ बैठती है ,ये उसकी पुरानी आदत है ।
मैने सिर सहलाकर कहा ,'जाओ ,अपना स्कूल का काम कर डालो ,मै तुम्हारे लिए पाकिट मँगा दूँगी ।'
वह आश्वस्त होकर चली गई ।
सौदा लाने में इन्होने हमेशा मुझे झिंकाया है ।एक से दूसरी दूकान देखने में इनकी शान घटती है ।जिस दूकान पर ठहर जायेंगे उसी से सारा सामान खरीद लेंगे - चाहे सड़ा हो, गला हो , देखेंगे तक नहीं । घर पर आने के बाद कुछ कहो तो कह देंगे ,'मै क्या करूँ उसके यहाँ और था ही नहीं ।'
अरे ,आदमी दो-चार दुकाने देख कर पूरी तसल्ली कर सामान लेता है ! पर मजाल है जो ये एक दूकान से दूसरी तक बढ़ भी जायँ ।कभी-कभी तो ऐसा सामान लाकर पटका है कि पड़े-पड़े सड़ता रहा और अंत मे कूड़े में फेंक देना पड़ा । मैं तो इनकी खरीदारी जानती हूँ ,रीनी का पाकिट ठीक से ढूँढा थोड़े ही होगा !
मैंने रीनी से पूछा ,' क्यों रीनी ,पापा ने कहाँ-कहां ढूँढा था पाकिट ?'
'खूब सारी दुकाने देखी थीं ,' आशा के विपरीत उत्तर मिला ।
बाप-बेटी देने एक से हैं !
दुकानदार को अपनी बात समझा नहीं पाए होंगे ,नहीं तो सबके पास जो चीज़ है ,वो इन्हे ढूँढे नहीं मिलती ! अब मुझे ही जाना पड़ेगा ।
अगले दिन उसके स्कूल में छुट्टी थी। मैने रीनी से कहा ,'नानक की दुकान पर देख आओ ,पाकिट है ?'
नानक मोहल्ले की परचून की दूकानवाला है , बच्चों के मतलब की चीज़ें भी रखता है थोड़ी-बहुत ।
वह दौड़ी-दौड़ी चली गई पर आधे रास्ते जाकर लोट आई ,' मम्मी ,पैसे तो दिये ही नहीं ।'
'पहले तुम देख तो आओ जाके ।'
' ऐसे तो वो देगा भी नहीं और कह देगा भाग जाओ यहाँ से ।'
मुझे हँसी आ गई - बड़ी समझदार हो गई है मेरी बिटिया ! मैने पाँच रुपए का नोट उसे पकड़ा दिया ।
पर पाकिट उसे नानक की दूकान पर भी नहीं मिला ।
सब बच्चे अपने पापा से पाकिट लेते हैं ,बस रीनी के पापा के पास नहीं है ,उसके लिये शरम की बात है !
इनके आने पर फिर वही रट ! दो-तीन बार इन्होने उसे समझाया , देखा , नहीं समझती तो बुरी तरह डाँट दिया ।वह चुपचाप रोने लगी ।
बच्चों का चुपचाप रोना मन को कितना बुरा लगता है !मुझे बोलना ही पड़ा ,'इस बुरी तरह झिड़क दिया लड़की को ! ज़रा सी चीज़ लाकर दे नहीं सकते ?'
'तुम तो उसी की तरफ़ बोलोगी ! हर बखत पाकिट-पाकिट-- हमारी तो समझ मे नहीं आता आखिर है क्या चीज़ !'
मैने उसे पाँच रुपए का नोट दिया पाकिट के लिए , पर उसने फेंक दिया और रोती रही ।.
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मेरी अच्छी मुसीबत है ! ये तो डाँट फटकार कर छुट्टी पा लेते हैं ,वह रोती हुई मेरे पास आती है । इन बापों का ढंग भी बड़ा अजीब होता है - कभी तो उसे इतना प्यार करेंगे और कभी एकदम फटकार देंगे ।इनके आगे वह अधिक बोल भी नहीं पाती ,डाँट खाते ङुए सहम जाती है ।पर मुझे तो उसका मन रखना ही है ।
रीनी तीसरे पहर फिर खेलने नहीं गई ।
सब बच्चे जान गए है कि वह पाकिट नहीं मँगा पाई .-उसे दिखा-दिखा कर और चिढ़ाते हैं ।इसलिए वह खेलने ही नहीं जाती ।उदास अकेली बैठी देखकर मेरा मन कचोटता है ।दो साल छोटे टोनू से उसकी बिल्कुल नहीं पटती ,वह तो कभी उसके रिबन खींचता है कभी बाल नोचता है ।
'रीनी , कल सुबह स्कूल जाते समय सुधीर से पाकिट लेकर मुझे दिखा देना फिर मैं तुम्हारा खरीद दूँगी ।'
सुबह का समय? क्या किसी तूफ़ान से कम होता है ।
रीनी तो फिर भी सीधी है ,दो साल का टोनू तो ज़रा सा मन के खिलाफ़ होते ही आसमान सिर पर उठा लेता है - उस पर न बाप की फटकार का असर , न मेरी पुचकार का ।अपनी पूरी बात बोल नहीं पाता तो क्या हुआ बे-मन की बात होने पर ऐसा धमकाता है ।पहली स्टेज होती है नीचे का होंठ सिकोड़ कर पूरा बाहर निकाल कर छ: कोने का मुँह बना कर रोने की तैयारी ।इस पर अगर कोई ध्यान न दे तो दूसरी और आखिरी स्टेज है -खूब ज़ोर से रोने की और वह भी आँखें बन्द करके कि कहीं किसी की पुचकार से रोने की मुद्रा भंग न हो जाए ।रुदन पूर्व की छ: कोने के मुँह और होंठ बाहर फुलाने की आदत तो तब की है जब वह तीन महीने का था ।पहने तो ऐसा मुँह देखकर मुझे बड़े ज़ोर की हँसी छूटती थी - दो चार बार सास वगैरा ने टोका तो अब हँसने पर काफ़ी कंट्रोल कर लिया है । मेरी रीनी ने ऐसा कभी नहीं किया वह सीधे-सीधे रोती है ।
सात बजे रीनी का रिक्शा आ जाता है ,छ: बजे से उसे जगाकर उसके पीछे लगती हूँ - बीच-बीच में टोनू की इमरजेन्सियाँ पूरी करती हूँ और जब वह खा - पी कर समय से तैयार होकर रिक्शे पर बैठ जाती है तो मुझे लगता है एक किला फ़तेह कर लिया । इस सब के बीच दूध गर्म करना , ठण्डा करना ,टोनू की शीशी भरना , शूशू कराना चलता रहता है ।
रीनी को रिक्शे पर भेज कर मैंने चैन की साँस ली ही थी कि रीनी की आवाज़ आई ,' मम्मी --मम्मी--'
'क्या हो गया ?' हाथ मे सँडासी लिए मै दौड़ी-दौड़ी ज़ीने पर आई ।
' मम्मी ये रहा सुधीर का पाकिट --' वह रिक्शे से चिल्लाई ,'सुधीर ,जल्दी दिखाओ मेरी मम्मी को --।'
सुधीर अपने बस्ते मे कुछ ढूँढ रहा था ।
मेरे पीछे-पीछे टोनू घिसटता चला आया था । मेरी साड़ी की चुन्नटें पकड़ कर वह ऊपरवाली सीढी पर खड़ा उछल-उछल कर नीचे रिक्शे पर ,रीनी को देख किलक रहा था ।नीचे को बढता उसका पाँव देखकर मैने एक हाथ से उसे सम्हाला ,आवाज़ लगाई ,' रीनू, जल्दी दिखा पाकिट ।'
सुधीर ने अपने बस्ते से कोई सफ़ेद सी चीज़ ऊपर उठाकर दिखाई ,इतने मे दूध जलने की महक आई ।
अरे , मै तो सारा दूध आग पर चढ़ा आई थी !,सँड़सी से उतारने जा रही थी कि रीनी की आवाज़ सुनी ।इधर टोनू एक साथ सारी सीढियाँ फलाँगने ने की कोशिश में ।मैने खींचा तो उसने बड़ी जोर से होंठ निकाल कर मुझे धमकाया , तभी रीनी का रिक्शे वाला चिल्लाया ,' जल्दी करो ।'
'मम्मी देख लिया पाकिट ?'
'हाँ,हाँ--' करती मैं एक हाथ से टोनु को खींचती ,दूसरे हाथ में सँड़ासी सम्हाले अन्दर भागी -दूध उतारने ।मैने सोचा लौटकर आएगी तब देख लूँगी ,पर उस दिन किसी कारण हाफ़ डे में ही छुट्टी हो गई , वह जल्दी ही लौट आई । मुझे पाकिट देखने का मौका नहीं मिला ।
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शाम को बाज़ार जाने का प्रोग्राम बना ,बना क्या मैंने जान-बूझकर बनाया ।वैसे मुझे बज़ार जाने का कोई शौक नहीं है । पर अब तो पाकिट लेना था ।
हमलोगों ने सारा बाज़र छान मारा ।
दूकानदारों को समझाना मुश्किल हो गया कि पाकिट है क्या ।रीनी अपने ढंग से समझाती थी और वे समझ न पाकर उसे ही बहलाने की कोशिश करते थे ।वे अपनी ही कोई चीज़ भिड़ाने के चक्कर मे रहते ।पर बहल जाय तो रीनी कैसी !हम लोगों ने भी उसे समझाया ,कई खिलौने दिखाए - 'कहा तुम ये लेलो ये पाकिट से भी अच्छे हैं ,और किसी के पास ऐसा है भी नहीं ।'
पर उसकी एक ही रट '-हमें तो पाकिट चाहिए ,सबके पास है हमें भी चाहिए ।'
अब तो मैं भी परेशान हो गई, 'जो चीज़ कहीं मिलती ही नहीं ,तुम्हारे लिए कहाँ से ला दें ?हमने तो कभी देखी भी नहीं ।'
'सुधीर की दिखाई तो थी ।'
'कहाँ देख पाई मै !टोनू नीचे कूदा जा रहा था उधर दूध उबल गया -- ।'
रीनी फिर उदास हो गई ।मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था ।
शाम हो गई थी । मौसम सुहावना था । मैंने सोचा जल्दी घर पहुँच जाएँगे तो ये अकेली चुपचाप बैठी रहेगी खेलने भी नहीं जाएगी ,रास्ते में ही थोड़ा समय निकाल दें ।
'चलो पैदल ही घर चलें रिक्शा लेकर क्या करेंगे ?'
'तुम्हीं थक जाओगी , मुझे क्या -- ।'
हम लेग लौट पड़े ।
आज तो हद हो गई !बीस पच्चीस दूकानो पर पूछा पाकिट किसी के पास नहीं !
ऐसा क्या अजूबा है ?
नुमायश ग्राउण्ड की सफ़ाई हो गई थी ,उधर से निकल चलेंगे तो काफ़ी चक्कर बच जाएगा । हम लोग नुमायश की तैयारियाँ देखते हुए चलते रहे । पूरा मैदान एकदम साफ़ है ,जगह-जगह फाटक लग रहे हैं ,बिजलीवालों के तम्बू गड़े हैं ,बिजली की फ़िटिंग चल रही है .क्यारियों में फूलों की पौध तैयार हो रही है ।हप़्ते भर बाद यहाँ खूब रौनक रहेगी ,शहर के लोग इधर ही उमड़ पड़ेंगे ।लाउड-स्पीकरों के शोर के मारे एक-एक बजे तक सोना मुश्किल हो जाएगा !
गर्मियों की सुहावनी शामें बड़ी जल्दी ढल जाती हैं । नुमायश ग्राउण्ड की इक्की-दुक्की बिजलियाँ जल गईं थीं ,बिजलीवलों के तम्बुओं से हम जरा आगे बढ़े ही थे कि दैड़ती हुई रीनी चिल्लाई ,'मम्मी ,मम्मी , वो रहा पाकिट ! '
उसने झुक कर जमीन से कुछ उठाया ,फ्राक से उसकी मिट्टी पोंछी और दोनो हथेलियों से दबा कर सीने से लगा लिया ।
'देखें तो क्या है ,' हम दोनों उत्सुक होकर एक साथ भागे ।
उसने खोल कर दिखाया -
सिगरेट का एक खाली पैकेट ,जिस पर लालटेन की तस्वीर बनी हुई थी !
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शनिवार, 27 मार्च 2010
खिलौने
' वहाँ की यहाँ से क्या बराबरी ?वहाँ की चीजों की बात ही और है ।क्या फ़िनिश ,क्या बारीकियाँ ,जैसे असली ही छोटी कर के रख दी हो ।'
' भाई कब से अमरीका में है?' सुदीप के पापा कनु के खिलौनों की हाथ में उठा उठा कर तारीफ़ कर रहे हैं ।
कनु के लिये चाचा ने भेजे हैं अमरीका से !
' कौन? कमल ?वह गया था दो साल के लिये ,पर वहीं जॉब ले लिया ।एक बार आया था बीच में ,पर यहाँ कहाँ मन लगता उसका !' विमल गर्व से बता रहे हैं -' अब शादी करवाने आयेगा अगले साल ।'
' सच में ! क्या परफ़ेक्शन है ?' सुधा उत्फुल्ल भाव से सोच रही है ।
सुदीप के माता-पिता आये हैं । उन्हें चाचा के भेजे खिलौने दिखाये जा रहे हैं ।कनु और सुदीप रेलगाड़ी चला रहे है,' देखो , कैसे पटरी पर दौड़ती है ।'
सुदीप की माँ छोटा सा वायलिन उठाती हैं -' ये बजाना सीखना पड़ता होगा ?'
' अरे नहीं ,इसमें सात ट्यूने भरी हुई हैं -देखिये ,ऐसे बजाते हैं।'
विमल वायलन की ट्यून सुनवा रहे हैं ।
' वाह ,क्या बात है !'
सत्ते आ कर खड़ा हो गया ,चन्दो का बड़ा बेटा ।कनु से दो साल बड़ा ।
कई साल हो गये हैं चन्दो को इस घर में काम करते । यहीं पास में रहती है ।साफ़-सुथरी समझदार महिला है ।रंग-ढंग देख कर कोई नहीं कह सकता कामवाली है ।वो तो समय ने काम करने पर मजबूर कर दिया नहीं तो खाता-पीता परिवार था ,ससुर की दुकान थी, अच्छी चलती थी ।पर तीनों भाइयों के बँटवारे में सब चौपट हो गया ।
चन्दो का आदमी सबसे छोटा था ।पढने लिखने में मन नहीं ,दुकान पर बैठने लगा ।बँटवारे के बाद पनप नहीं पाया ।ठेला लगा कर गृहस्थी पालता है ,चन्दो दो घरों में काम कर लेती है ।बड़ा बेटा सत्य नारायण उर्फ़ सत्ते का इस घर में अबाध रूप से आना-जाना है ।कनु से अच्छी पटरी बैठती है उसकी।
चन्दो का व्यवहार ही ऐसा है कि वह कामवाली नहीं घर की सी लगती है ।उस पर बहुत निर्भर है सुधा ।
सत्ते खिलौनों का प्रदर्शन देखता रहा ,फिर कनु की ओर बढ गया ।
कोई घर मे आ जाये तो विमल को सत्ते का कनु के साथ होना भाता नहीं ।इसका यहाँ क्या काम !
' क्या सत्ते, अम्माँ ने किसी काम से भेजा है ?'
' नहीं ।हम तो ऐसे ही चले आये ।कनु भैया के पास ।'
' सत्ते ,वो वायलिन इधर लेते आना ,' कनु ने कहा ।
वह वायलिन लेने बढ़ा ।
विमल ने टोका , ' देखो इसके तार वगैरा न दब जायें ,कनु तुम क्यों नहीं ले जाते ?'
' पापा, उसे सब पता है ।वो अच्छी तरह बजा भी लेता है ।सत्ते बजा कर दिखाओ तो।'
विमल का मुँह बिगड़-सा गया ।
' ठीक है ,ठीक है ।पर जरा सम्हाल कर ।'
' बच्चों ,तुमलोग उस तरफ़ जाकर गाड़ी और प्लेन चलाओ वहाँ खुली जगह है ।'
सुधा चाय की व्यवस्था करने जाते जाते बोली ।
वे लोग दूसरी ओर चले गये
सत्ते के उधऱ जाते ही सुदीप के पिता ने पूछा ,' यह लड़का पड़ोस में रहता है क्या ?'
' हाँ ,' विमल कह नहीं पाये कि कामवाली का बेटा है ।
वे एक-एक की बारीकियाँ बता रहे हैं ।बच्चों से ज्यादा उछाह तो उनमें है ।
सुदीप की मम्मी बड़ा सा टैडी बियर उठाते हुये कह रही थीं ,' और ये स्टफ़्ड वाले भी तो देखो ।कितने सुन्दर एकदम मुलायम !'
' वहाँ बच्चे इन्हें साथ में लेकर सोते हैं ।'
' हैं ही इतने प्यारे !'
' पेंग्विन तो लग रहा है ,अभी चल पड़ेगी ।'
' और सबसे अच्छी बात, गंदे हो जायँ तो वाशिंग मशीन में डाल कर धो लो ,फिर एकदम साफ़ ,जैसे के तैसे !'
उनकी बेटी उससे गाल सटा कर खुश हो रही है ।
' ये मिकी माउस है ,वहाँ डिज़नी लैंड हैं न वहाँ का खासमखास ।'
' सुना है बिल्कुल परीलोक है ।'
' हमारे पास एल्बम है ।वहाँ की तस्वीरें देख के अंदाजा मिल जायेगा ।'
विमल एल्बम निकाल लाये ।
बड़े लोग तस्वीरों पर झुक आये ।
' ये मिकीमाउस-मिनीमाउस हैं ।ये इनका घर ।ये कॉसल है ,परियों के महल जैसा ।लेक बनाई है ,एक ट्रेन पूरा चक्कर लगवाती है,और खूब सारे राइड्ट !.अरे, एक दिन में तो आधे भी नहीं ले पाते ! ..रात को फ़ायरवर्क्स.. ..वंडरफ़ुल.।
***
दोस्त आते हैं तो कनु उन्हे बड़े चाव खिलौने से निकाल कर दिखाता है ।
बताता हैं यहाँ थोड़े ही मिलते हैं ,चाचा ने अमेरिका से भेजे हैं ।
बच्चों के माता-पिता भी उत्सुक हैं ।कभी कभी ख़ुद पूछ देते हैं -' विधु बता रहा था देखें तो कौन सा खिलौना है अमरीकावाला ।'
कनु ला कर दिखाता है बड़े लोग हाथ में लेकर घुमा फिरा कर देखते हैं । परम संतुष्ट भाव विमल के चेहरे पर! वे उनकी आँखों में प्रशंसा देख तुष्ट होते हैं ।
इधर सुधा एक चीज़ नोट कर रही है - चंदो का वह बेटा जिसका मुँह ' भइया भइया ' करते नहीं थकता था ,बड़े सहज रूप से घर में खप गया था , अलग-थलग रहने लगा है । अभी तक कनु और सत्ते दोनों मिल कर खेलते थे ।सत्ते कनु का पूरा-पूरा ध्यान रखता था ।अब चुप-चुप रहता है ,पहले की तरह हँसना -बोलना खत्म हो गया है ।पहले जो सहज रूप से घर के सामान की सम्हाल करता था अब तटस्थ -सा देखता रहता है ।विमल होते हैं तो बाहर -बाहर से चला जाता है ।
**
पिता ने कनु को समझाया था ,' ज़रा सावधान रहा करो ।'
' क्यों ,पापा ?'
' सबके सामने निकाल कर बैठ जाते हो और सत्ते वहीं मँडराया करता है,ज्यादा सिर मत चढाओ उसे ।
वह तो उपत कर वहीं जाता है जहाँ खिलौने रखे हैं ।'
फिर एक दिन -
विमल के ऑफ़िस के तनेजा सपरिवार आये थे ।
बातों-बातों में कमल की शादी की चर्चा -
' बढिया नौकरी है ।वहाँ के ठाठ के क्या कहने !'
' हाँ ,हमारे साढू का भाई भी वहीं है । जाकर आने का नाम नहीं लेता ।क्या फटाफट अंग्रेजी बोलते हैं बच्चे ।
वहाँ के कपड़े भेजता है ।क्या मेटीरियल ,क्या सिलाई ।सालोंसाल खराब नहीं होते ।'
'एक हमारे यहाँ !एक टाँका निकले तो उधड़ता चला जाये ।क्वालिटी पर कोई ध्यान नहीं देता ।'
' और खिलौने यहाँ के ऐसे कि पानी पड़े रंग उतर जाये ।एकाध बार खेलें तो कोरें निकल आती हैं ।नोंके और कोरें चुभने लगती हैं। .और वहाँ के खिलौने !नन्हा बच्चाभी मुँह में दे ले तो भी कोई डर नहीं ।अभी कमल ने भेजे हैं ,कनु के लिये ।बस , देखने की चीज़ है ।'
' अच्छा ,कमल ने भेजे ? .वहाँ से ?'
कनु की पुकार हुई ।
'वह के सत्ते के साथ बाहर खेल रहा था ।साथ-साथ सत्ते भी चला आया ।'
खिलौने मँगाये गये ।
' उत्साह में सत्ते कनु के साथ उठा-उठा कर लाने लगा । '
'रेलगाड़ी औऱ पटरी दोनों एक साथ उठाये चला आ रहा था ।
' अरे ,सम्हालकर,' जोर से विमल ने टोका ।
सत्ते चौंक गया ,सब उधऱ देखने लगे ।
'दोनो एक साथ उठा लिये ?उसे क्यों दे दिये कनु ?कहीं गिरा दिया तो यहाँ तो ठीक भी नहीं होगा ,',विमल ने एकदम कहा ।
' पापा. इतना वह समझता है ।वह तो मुझे भी बताता रहता है।'
इस बीच सत्ते एकदम सहम गया था गाड़ी उसके हाथ से छूट गई ।
' देखो कनु कुछ टूटा तो नहीं ।मैंने पहले ही कहा था ।'
सत्ते जड़-सा खड़ा। फिर धीरे से बाहर निकल गया ।
**
उस दिन कनु का उड़नजहाज नहीं मिल रहा था ।सारा घर छान डाला ।बाहर झाड़ियों में पड़ा मिला ।फिर तो आये दिन खिलौने कहीं के कहीं मिलते ।एक तो कूड़े में पड़ा दिखा । सुधा कहीं से आ रही थी उसने देख लिया ।
टूटा हुआ था । हारकर सुधा ने अल्मारी में रख दिया ।
विमल का शक सत्ते पर है ।
उस लड़के को इतनी छूट मिलेगी तो यही होगा ।
कनु को दस बार समझाया लेकिन उससे थोड़ा दूर -दूर रहे पर उसके साथ खेले बिना इसका जी नहीं भरता ।
' पर कहाँ खेलता है अब सत्ते साथ ?सुस्त सा घर में बैय़ा रहता है ।और उसके साथ खेलने में बुराई क्या थी ?मैं तो निश्चिंत हो जाती थी ।कनु तो लापरवाह है उसकी चीजों की वही तो ध्यान रखता था ।'
'क्यों, कनु से खुद नहीं रखा जाता ?अब देख लिया न नतीजा ।पता नहीं क्या-क्या चुरा ले गया हो ।'
' बस करो उन लोगों पर सारा घर छोड़ जाती हूँ ।कितने साल हो गये ।बेकार तोहमत मत लगाओ किसी पर ।'
' मैं तो लड़के की बात कर रहा हूँ ।अपने पास नहीं है तो इसका उड़ा दिया ।'
' माँ-बाप ऐसे नहीं कि ऐसी चीज़ घऱ में रख लें ।फिर खेलना तो यहीं है न '!
विमल भुनभुनाते रहे ।
उसने कनु से पूछा था -सत्ते अब तुम्हारे साथ नहीं खेलता ?
उसे इन चीजों से खेलने का ढंग नहीं है ।पापा कह रहे थे गिरा देगा तो खराब हो जायेगा ।यहाँ तो ऐसा मिलेगा भी नहीं ।उसकी नियत मेरी चीजों पर लगी रहती है। अकेले में मेरी चीजें छूता है ।'
जिस दिन खिलौने आये थे सुधा को याद है ,सत्ते का उत्साह कनु से कम नहीं था ।दौड़-डौड़ कर पैकिंग खुलवाने में चीज़ें उठाने-धरने में मदद करता रहा ।कनु से किसी घट कर नहीं था उसका चाव और खुशी । उमंग और कौतूहल से भरे दोनों एक -एक चीज़ को समझने की कोशिश करते रहे ।
कितना परायापन आ गया है अब ! कुण्ठित-सा अलग-थलग खड़ा रहता है ।कनु से दूरियाँ बढती जा रही हैं । उसकी नज़रों में अक्सर ही क्या होता है -द्वेष .घृणा ,प्रतिहिंसा ?वह समझ महीं पाती ।
परेशान है वह भी ।पति कहते हैं उसी सत्ते के कारनामे हैं ।सुधा कुछ बोल नहीं पाती। कुछ कुछ शक उसे भी है ।
पर कैसे हो गया यह सब ?सत्ते तो कभी ऐसा नहीं था! कनु उस पर कतना निर्भर रहा है ! उससे ज़्यादा सावधान वह रहता था कि कनु को या उसकी चीज़ों को कोई नुक्सान न पहुँचे ।कनु के लिये दूसरों से लड़ जाता था ।उसके लिये कोई कुछ कह दे तो उसे सहन नहीं होता था । और दोस्त हों या न हों, सत्ते के साथ मगन रहता था कनु । और अब क्या हो गया कि किसी काम से आता भी है तो रुकता नहीं , फ़ौरन चला जाता है ।चेहरे पर न मुस्कराहट न खुशी ,जैसे अपरिचित लोगों के बीच आ गया हो ।
सुधा जानती है अब वह पहले जैसा पास नहीं आता पर तृषित निगाहों से कनु के खिलौने देखता है ।कई बार उसने देखा है उसकी माँ जब उसे कुछ कहने -बताने या किसा और काम से भेजती है तो वह वहीं जाकर खड़ा होता है जहाँ कनु खेल रहा होता है ।कनु उधर न भी हो तो वह खिलौनों के पास ही जाकर खड़ा होता है ।
अकेले में छू कर देखता है ,किसी के आते ही डर कर अलग हो जाता है ।पहले खिलौने पड़े होते थे तो खूब इत्मीनान से समेट कर डब्बे में रखकर अल्मारी में रख देता था ।इससे पहले भी सत्तेहमेशा कनु के बाहर पड़े खिलौनों को सम्हाल कर लाताथा ,' देखिये , कनु भैया ये बाहर ही छोड़ गये थे '-कह कर अल्मारी में जमा देता।पर अब ..अब कितना बदल गया है ,जैसै उसे कोई मतलब ही न हो ।
**
मैंने तो पहले ही कहा था कि उन लोगों को मत दिखाओ ,उनके सामने निकालो ही मत खेलो ही मत ,।कैसी ललचायी निगाहों से देखता रहता है ...!
' तो खिलौने बंद कर रखने को होते हैं ?'
सुधा को अच्छा नहीं लगता कही है ,'बस बस रहने दो।खिलौने खेलने को हैं कि सेंत कर रखने को ?।दूसरों को तरसा कर क्या खुशी बढ जाती है ?ज्यादा संतोष मिलता है? "..
' क्या फ़ायदा कि मिल कर मन भऱ के खेल भी न पाये। ।आपस में मेल रखाने के जगह भेद डालें ! अकेले में निकालो और बंद करके रख दो ये भी कोई खेलना हुआ ?'
' अपने दोस्त आयें उनके साथ खेले ।'
' हाँ , खेले तो पर उन्हें भी ईर्ष्या होती है । और हमारा बच्चा कैसा खुश होता है कि मेरे पास है और किसी के पास नहीं ।यह क्या खेलना हुआ ?
' तो उन्हें मना किया है किसी ने ? वे भी मँगा लें ।'
' औरों के बल पर दिखावे की जरूरत नहीं ।कोई हमारे यहाँ का तो है नहीं कि कोई चाह कर भी ले ले ।
अभी से कनु को ये सब मत सिखाओ ।खेलने में सब बराबर ।पर यहाँ तो एक सबसे खास बनना चाहता है ।
खिलौने भी दिखावट की चीज़ हो गये !और लोग तरसें और एक खुश हो।
सब मिल कर नहीं खेलें तो खेल काहे का ?
वह सोचती रही पता नहीं कैसे खिलौने जो निर्मल आनन्द की जगह दूसरे के अभाव पर खुश हों ।खेल की भावना तो मर गई, रह गया दिखावा कि ,देखो ,हम ऐसे हैं ।
एक दूसरे से सहयोग की जगह साथ मिल कर खुश होने के दूसरे की मजबूरी का मज़ा लेना ।.मिल कर रहने की तो बत ही नहीं ।बस हम खास बने रहें बच्चों में यही भर दो ।आपसी दूरियाँ और हीनता की भावना पनप रही है जो किसी को चैन से नहीं रहने देगी ।
खिलौने थोड़े ही हैं दिखौने हैं !कोई तरसे किसी को खुशी हो ।
कई दनो से सुधा नोट कर रही है सत्ते की भाव-भंगिमा बदलती जा रही है ।।पहले कनु के लिये दौड़ कर आता था ,उसकी आँखों में प्यार और सम्मान था ,हमेशा मदद को तैयार ।।लापरवाह कनु की चीज़े सम्हालता था जैसे उसकी जुम्मेदारी हो उसके लिये। हमेशा मुस्तैद रहता था कि कहीं कोई नुक्सान न हो जाये ।कितना मानता था कनु को ।दोनों खेलते ।वह भी निश्चिंत रहती थी कि वह है तो कनु का पूरा ध्यान रखेगा ।चन्दो कहती थी कनु भैया बुलायें तो इसका खाने में भी मन नहीं लगता ,तुरंत दौड़ता है।
अब तो कनु घर में ही ज्यादा रहता है पहले मौका मिलते ही बाहर खुली हवा में दौड़-भाग के खेल खेलने निकल जाता था।अब अंदर घुसा रहता है ।कहो तो कह देता है बाहर कोई खेलता ही नहीं ।एक-दूसरे को देख कर चेहरे खिल जाते थे -चाहे सत्ते ही क्यों न हो ।
कभी-कभी वैसे ही खाली -खाली सा। खिलौनो में भी रुचि कम हो गई हो जैसे ।पहले की चपलता-चंचलता समाप्त हो गई ,खिन्न-सा रहता है ।सारा उछाह खत्म हो गया हो जैसे । दोस्त आते हैं वे बाहर खुली हवा मे न खेल कर उसके खिलौनों से ही खेलना चाहते हैं । पहले खूब कर भागते-दौड़ते हँसते खिलखिलाते थे ।कूदने -फाँदने गेंद खेलने का किसी को ध्यान ही नहीं आता ।
' जाओ मैदान मे खेल लो ,' वह कहती है ।
वे सब कह देते हैं,' बाहर से ही तो खेल कर आ रहे हैं ।'
कनु नहीं उसके खिलैने इन्हें खींच लाते हैं ।
कैसी कुंठाये पनप रही हैं जो संबंधों को सहज नहीं होने देतीं ।
**
चन्दो उदास रहती है ।आती है काम करके चली जाती है ।बहुत कम बोलती है -सिर्फ़ काम की बात ।
सुधा परेशान है ।क्या करे कुछ समझ में नहीं आता ।घर में चन्दो हँसती-बोलती थी तो कितना अच्छा लगता था ।
सुधा ने उसे कभी नीचा नहीं समझा -उसमें ओछापन बिल्कुल भी नहीं, नियत की अच्छी है माँगने की आदत बिल्कुल नहीं ।अपनी सीमायें समझती है ।
सुधा से रहा नहीं गया ।
'चन्दो ,क्या हो गया है आजकल ?तबीयत खराब चल रही है क्या ?'
'क्या कहें बीबी जी ,कुछ कहते नहीं बन रहा ।आज कल घर में बड़ी अशान्ति चल रही है ।'
'क्यों ?'
उसने ठंडी साँस भरी ।कुछ बोली नहीं ।
' बताती क्यों नहीं ,क्या हुआ ?'
'क्या बतायें ?सत्ते को का जाने क्या हो रहा है ?'
'हाँ , मुझे भी आज कल बड़ा बदला-बदला लगता है ।'
'न अपना खुस रहे न कसी को रहने दे ।कलेस मचाये रहता है घर में ।'
वह रोने लगी ,' बीबीजी भइया के खिलौने आये ।पहले कई दिन ये भी बड़ा खुस रहा ।आये-गये सबको चाव से बताता रहा -ऐसी रेलगाड़ी है पटरी पर भागती है ।उड़न जहाज उड़ता है और उसे एक बटन दबा कर मनचाही तरफ घुमा दो ।और बहुत बातें । बड़ा मगन रहता था -कनु भइया का खिलौना ऐसा है जैसे सचमुच का हो ।
पर फिर जाने का हुइ गया ।अब कैसा होता जा रहा है ,चुप चुप रहता है।किसी काम मे मन नही लगता उसका ।
।उखड़ा-उखड़ा रहता है ।छोटे भाई बहनों को जरा सी बात पर पीट देता है।'
ऐसा तो नहीं था ।क्या होता जा रहा है सत्ते को ।कभी-कभी चन्दो बड़ी दुखी हो जाती है ।
दुखी तो सुधा भी हो जाती है ।
चन्दो कहे जा रही ,' पहले कभी ऐसा नहीं था। अब तो बाप के सामंने-सामने बोलने लगा है ।बहस करता है ।'
' अच्छा !क्यों ?'
' कहता है मुझे भी खिलौने दो लाकर ।'
सुधा को कैसा-कैसा लग रहा है ।
' हमने समझाया ।कनु भैया के साथ खेल तो लेते हो ।पर उसकी समझ मे नहीं आता ।कहता है अपनी चाहिये ।
कुछ दिन से हल्ला मचाये है -मुझे भी ऐसी गाड़ी ला दो जो पटरी पर भागती है ।बस एक चीज़ ला दो ।
एक रेलगाड़ी ला कर दी तो उसने उठा कर फेंक दी ।इसी बात पर बाप को गुस्सा आ गया ,पीट दिया । रोते रोते सो गया ।अब बीबी जी ,सुबह का गया गया दिन भर मेहनत कर शाम को आता है। उस दिन सीधा बाज़ार होता हुआ उसके लिये रेलगाड़ी ले कर आया। पर इसके मिजाज मिलेंतब न !अब बीबी जी, मँहगी चीज़ें हम कहाँ से खरीदें ?उसकी समझ में कुछ नहीं आता ।बाप झींक जाता है ।
परसों तो बाप ने इसी से पीटा ।हम ग़रीब आदमी कहाँ से लायें ऐसे मँहगे खिलौने ।'
सुधा क्या कहे ।सुनती रही ,अपना काम करती रही ।
***
और फिर एक दिन पटरी पर दौड़नेवाली रेलगाड़ी गायब हो गई ।
घर मे से कहाँ चली जायेगी ।उसके सिवा और कौन घर में आता है ?
विमल का गुस्सा सत्ते पर है ,' पहले ही कहता था उसे सर मत चढाओ । पर तुमन लोग मानो तब '
' देखो ,जब से रेलगाड़ी ग़ायब हुई है उसने शकल भी नहीं दिखाई है ।'
' कनु के दोस्त ?नहीं वो ऐसा नहीं कर सकते !और इत्ती बड़ी रेलगाड़ी छिपा कर कैसे ले जायेंगे !
वही ले गया है ।मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।उसकी निगाहें लगी थीं गाड़ी पर ।'
चंदो से पूछा गया ।
' अभी तक तो कभी चोरी की नहीं ।बीबी जी ,घर जाकर पता लगाऊँगी।हाँ, और कोई तो आया भी नहीं दो दिनों से। फिर गई कहाँ?।इस लड़के के लच्छन आजकल समझ में नहीं आते ,पर लाता तो घर में ही लाता ।उसका कसूर होगा तो बाप जान से मार देगा ।मिलनी चाहिये रेलगाड़ी कहीं तो ,आप चिन्ता मत करो ।जायेगी कहाँ घऱ में से ?
परेशान सी चन्दो चली गई ।
सुना रात में बाप ने खूब मारा,बदन में नील पड़ गये पर सत्ते साफ़ मना करता रहा ।
दो दिन से सत्ते बाहर नही निकला ।
तीसरे दिन चन्दो दोपहर में आई ।
छिपा कर लाई हुई रेलगाड़ी निकाली और मेज़ पर रख दी ।
अरे ये कहाँ मिली ?
चन्दो रोने लगी ।
'माफ़ करना बीबी जी ,हमें पता नहीं था ।घर में लाने की हिम्मत तो थी नहीं सो उसने बाहर भूसे के ढेर में छिपा कर रखी थी ।आज कंडे लेने गई तो दिखाई दे गई । उसके बाप ने चमड़ी उधेड़ दी ,उस दिन से खाना भी नहीं दिया है ।वहीं भूसे की कोठरी में पड़ा है । सारा बदन नीला पड़ा है ।
सुधा सिहर उठी ।
चन्दो कह रही है,' कहीं सिर उठाने लायक नहीं रखा ।इससे तो मर ही जाता अभागा !
अब आपको भी जो सजा देना हो दे दो ।उसे भी और हमें माँ-बाप को भी !'
सुधा सुन रही है ।
सुधा सुन रही है ,कानों में जैसे कोई लावा उँडेल रहा है ।कान मूँद कर भाग जाना चाहती है , पर सब सुनना पड़ रहा है ।
'जो जो कुछ खराब हुआ है सबके पैसे काट लो ।मैं क्या करूं ,मैं तो हार गई ।'
कितने प्रयास से मुँह से बोल फूटे ,' बस ,बस चन्दो ,बहुत हो गया ।'
पल्ले से मुँह दबाये चंन्दो सिसक रही है ।
' रो मत चन्दो ,गलती तेरी नहीं है ।बड़ों-बड़ों को अपने पर काबू नहीं रहता ।वह तो बच्चा है ।जैसा तेरा ,वैसा मेरा ।...मैं भी दुखी हूँ चन्दो !
बड़ी मुश्किल से समझा कर चन्दो को भेजा ।
अब मारना-पीटना नहीं ,ऐसे तो लड़के बिगड़ जाते है ।जाकर खाना खिलाओ उसे ।
सुधा का मन खराब हो रहा है ।दिमाग में क्या क्या खयाल आ रहे हैं - कभी कनु को तरसना पड़े तो ? तो क्या गुज़रेगी उस पर.?क्या गुज़रेगी हम पर ?
जो नहीं खरीद सकता वह क्या करे ?और फिर बच्चे ?उन्हे कैसे समझाया जाय ?
कितने सवाल उठ रहे हैं ,खूब पिटा है भूखा पड़ा है सत्ते ?
ऐसा तो नहीं था !क्या हो गया उसे ?
दो दिन से भूखे बच्चे का बार-बार ध्यान आ रहा है । रह-रह कर तिलमिला उठता है मन ।
भूखे शरीर पर क्रोध से पागल बाप की लगातार पड़ती मार- सुधा झेल नहीं पा रही ।
**
क्या हो गया ? सब समझ रही है सुधा !
अब तक सिर्फ सोचती थी ।अब समझ में आ रहा है ।
यह कैसा खेल हैं ? आपस में असंतोष पलता रहे ,सब अलग-अलग पड़ते जायें, संवेदना -सहानुभूति रहित ? कनु जब खेलने बैठता है तो औरों को कैसे देखता है जैसे कह रहा हो -जो मेरे पास है तेरे पास कहाँ !तू कहाँ से लायेगा !और बच्चों पर जैसे कृपा कर रहा हो अपने साथ खिला कर ।कैसा खेल है यह ?
जहाँ की है वहीं रहें ऐसी चीज़ें ।वहाँ सबके पास होंगी ,दूसरों के बच्चों को तरसना नहीं पड़ता होगा !यहाँ ये खेलने के लिये थोड़े ही, हम कुछ खास है ये दिखाने के लिये आये हैं ?
या फिर सबके साथ खेले, मिल बाँट-कर । सो नहीं ।
सुनने को मिलता है,' हरेक के सामने मत निकाला करो ।खराब हो जायेंगे ।'
हरेक ?माने साधारण लोग !
और कनु तो खास बन गया है ।
खिलौने ?बच्चों के खेलने की निर्दोष चीज़े । को आनन्द देने के साधन !और ये मँहगी मँहगी मशीनों जैसी चीजें सिर्फ अपना बड़प्पन के दिखावे के लिये ! औरों को दिखा कर उनके मन में तृष्णा जगाने के लिये !चार जनो के साथ मिल कर खेलने के बजाय पड़ते जाने के लिये ! इसीसे बड़प्पन पता लगेगा ।इसीसे संतुष्टि होगी ?
तो रख लो सम्हाल कर सहेज कर !सबसे हटा कर। संदूक में बंद कर दो ।
***
एक झोला हाथ में पकड़े सुधा चन्दो के घर जा रही है ।
' अरे बीबी जी ,आप ?मुझे बुला लेतीं ।'
' क्यों? मैं नहीं आ सकती ?'
' आइये ,कही जा रही हैं क्या ?'
' नहीं । सत्ते कहाँ है ?'
' फिर कुछ किया क्या उसने ?'
' नहीं ।उसने कुछ नहीं किया । बुलाओ तो ।'
सत्ते कहीं से आ रहा है- चेहरा दुर्बल,सूखा-सा ठीक से चल नहीं पा रहा है ,हाथों पर नीले निशान ।
सुधा को देखा ,चौंक गया ।चाल थम-सी गई ।
' बीबी जी तुम्हें बुला रही हैं ।'
' रुक क्यों गये सत्ते ?आओ ,मैं तुम्हीं से मिलने आई हूँ ।'
कहीं शिकायत का स्वर नहीं , आवाज़ सहज स्नेहमय ।
सुधा खुद बढी ।उदास खड़े सत्ते का कंधा पकड़ अपने से सटा लिया ।
साथ लाये झोले से खिलौने निकालने लगी -वही पटरीवाली रेलगाड़ी !दो-तीन-और चीजें हैं ।
' ये ,तुम्हारे लिये !'
चन्दो चौंक गई है ।
' बीबी जी,ये क्या कर रही हो ?हम कहाँ इन खिलौनों के लायक।।कनु भइया के हैं। ले जाइये ।'
सत्ते अवाक् खड़ा है ।
' नहीं । अब सत्ते के हैं ।कनु के पास और भी हैं । इन से खेलना होगा तो सत्ते के साथ खेल लेगा ।'
सत्ते ने सिर झुका लिया है ।
किसी की समझ में नहीं आ रहा क्या बोले ।
'क्यों, मैं सत्ते को कुछ नही दे सकती ?'
सत्ते विमूढ !क्या कहे ,क्या करे !अंदर से गले-गले तक कुछ उमड़ा आ रहा है ।बड़ी मुश्किल से बोल निकले -
' माफ़ कर दीजिये १गलती हो गई ।'
आवाज़ बिल्कुल ऱुँधी है ।
' पागल है क्या ?खुशी से खेल ।'
चन्दो की ऑखों में द्विविधा है ,' और बाबूजी ?'
' मैं चुरा कर नहीं दे रही हूँ । बाबूजी की चिन्ता मत कर ।मैं हूँ न ?'
सत्ते फूट-फूट कर रो उठा है । आँखों से धाराधार आँसू बह रहे हैं ।
उसने आगे बढ कर सिर पर हाथ रखा -हथेली से गालें पर बहते आँसू पोंछ दिये ।
' अब कभी नहीं आंटी जी ।'
'मुझे मालुम है अब कभी नहीं ! गलती किससे नहीं होती ? '
'चन्दा ,तुम लोग उससे कुछ मत कहना ।'
विमल को वह समझा लेगी ।
पर ये चन्दो क्यों रो रही है ?
उद्वेलित लहरों को सहज होने में थोड़ा समय तो लगेगा ही ।
- प्रतिभा सक्सेना .
' भाई कब से अमरीका में है?' सुदीप के पापा कनु के खिलौनों की हाथ में उठा उठा कर तारीफ़ कर रहे हैं ।
कनु के लिये चाचा ने भेजे हैं अमरीका से !
' कौन? कमल ?वह गया था दो साल के लिये ,पर वहीं जॉब ले लिया ।एक बार आया था बीच में ,पर यहाँ कहाँ मन लगता उसका !' विमल गर्व से बता रहे हैं -' अब शादी करवाने आयेगा अगले साल ।'
' सच में ! क्या परफ़ेक्शन है ?' सुधा उत्फुल्ल भाव से सोच रही है ।
सुदीप के माता-पिता आये हैं । उन्हें चाचा के भेजे खिलौने दिखाये जा रहे हैं ।कनु और सुदीप रेलगाड़ी चला रहे है,' देखो , कैसे पटरी पर दौड़ती है ।'
सुदीप की माँ छोटा सा वायलिन उठाती हैं -' ये बजाना सीखना पड़ता होगा ?'
' अरे नहीं ,इसमें सात ट्यूने भरी हुई हैं -देखिये ,ऐसे बजाते हैं।'
विमल वायलन की ट्यून सुनवा रहे हैं ।
' वाह ,क्या बात है !'
सत्ते आ कर खड़ा हो गया ,चन्दो का बड़ा बेटा ।कनु से दो साल बड़ा ।
कई साल हो गये हैं चन्दो को इस घर में काम करते । यहीं पास में रहती है ।साफ़-सुथरी समझदार महिला है ।रंग-ढंग देख कर कोई नहीं कह सकता कामवाली है ।वो तो समय ने काम करने पर मजबूर कर दिया नहीं तो खाता-पीता परिवार था ,ससुर की दुकान थी, अच्छी चलती थी ।पर तीनों भाइयों के बँटवारे में सब चौपट हो गया ।
चन्दो का आदमी सबसे छोटा था ।पढने लिखने में मन नहीं ,दुकान पर बैठने लगा ।बँटवारे के बाद पनप नहीं पाया ।ठेला लगा कर गृहस्थी पालता है ,चन्दो दो घरों में काम कर लेती है ।बड़ा बेटा सत्य नारायण उर्फ़ सत्ते का इस घर में अबाध रूप से आना-जाना है ।कनु से अच्छी पटरी बैठती है उसकी।
चन्दो का व्यवहार ही ऐसा है कि वह कामवाली नहीं घर की सी लगती है ।उस पर बहुत निर्भर है सुधा ।
सत्ते खिलौनों का प्रदर्शन देखता रहा ,फिर कनु की ओर बढ गया ।
कोई घर मे आ जाये तो विमल को सत्ते का कनु के साथ होना भाता नहीं ।इसका यहाँ क्या काम !
' क्या सत्ते, अम्माँ ने किसी काम से भेजा है ?'
' नहीं ।हम तो ऐसे ही चले आये ।कनु भैया के पास ।'
' सत्ते ,वो वायलिन इधर लेते आना ,' कनु ने कहा ।
वह वायलिन लेने बढ़ा ।
विमल ने टोका , ' देखो इसके तार वगैरा न दब जायें ,कनु तुम क्यों नहीं ले जाते ?'
' पापा, उसे सब पता है ।वो अच्छी तरह बजा भी लेता है ।सत्ते बजा कर दिखाओ तो।'
विमल का मुँह बिगड़-सा गया ।
' ठीक है ,ठीक है ।पर जरा सम्हाल कर ।'
' बच्चों ,तुमलोग उस तरफ़ जाकर गाड़ी और प्लेन चलाओ वहाँ खुली जगह है ।'
सुधा चाय की व्यवस्था करने जाते जाते बोली ।
वे लोग दूसरी ओर चले गये
सत्ते के उधऱ जाते ही सुदीप के पिता ने पूछा ,' यह लड़का पड़ोस में रहता है क्या ?'
' हाँ ,' विमल कह नहीं पाये कि कामवाली का बेटा है ।
वे एक-एक की बारीकियाँ बता रहे हैं ।बच्चों से ज्यादा उछाह तो उनमें है ।
सुदीप की मम्मी बड़ा सा टैडी बियर उठाते हुये कह रही थीं ,' और ये स्टफ़्ड वाले भी तो देखो ।कितने सुन्दर एकदम मुलायम !'
' वहाँ बच्चे इन्हें साथ में लेकर सोते हैं ।'
' हैं ही इतने प्यारे !'
' पेंग्विन तो लग रहा है ,अभी चल पड़ेगी ।'
' और सबसे अच्छी बात, गंदे हो जायँ तो वाशिंग मशीन में डाल कर धो लो ,फिर एकदम साफ़ ,जैसे के तैसे !'
उनकी बेटी उससे गाल सटा कर खुश हो रही है ।
' ये मिकी माउस है ,वहाँ डिज़नी लैंड हैं न वहाँ का खासमखास ।'
' सुना है बिल्कुल परीलोक है ।'
' हमारे पास एल्बम है ।वहाँ की तस्वीरें देख के अंदाजा मिल जायेगा ।'
विमल एल्बम निकाल लाये ।
बड़े लोग तस्वीरों पर झुक आये ।
' ये मिकीमाउस-मिनीमाउस हैं ।ये इनका घर ।ये कॉसल है ,परियों के महल जैसा ।लेक बनाई है ,एक ट्रेन पूरा चक्कर लगवाती है,और खूब सारे राइड्ट !.अरे, एक दिन में तो आधे भी नहीं ले पाते ! ..रात को फ़ायरवर्क्स.. ..वंडरफ़ुल.।
***
दोस्त आते हैं तो कनु उन्हे बड़े चाव खिलौने से निकाल कर दिखाता है ।
बताता हैं यहाँ थोड़े ही मिलते हैं ,चाचा ने अमेरिका से भेजे हैं ।
बच्चों के माता-पिता भी उत्सुक हैं ।कभी कभी ख़ुद पूछ देते हैं -' विधु बता रहा था देखें तो कौन सा खिलौना है अमरीकावाला ।'
कनु ला कर दिखाता है बड़े लोग हाथ में लेकर घुमा फिरा कर देखते हैं । परम संतुष्ट भाव विमल के चेहरे पर! वे उनकी आँखों में प्रशंसा देख तुष्ट होते हैं ।
इधर सुधा एक चीज़ नोट कर रही है - चंदो का वह बेटा जिसका मुँह ' भइया भइया ' करते नहीं थकता था ,बड़े सहज रूप से घर में खप गया था , अलग-थलग रहने लगा है । अभी तक कनु और सत्ते दोनों मिल कर खेलते थे ।सत्ते कनु का पूरा-पूरा ध्यान रखता था ।अब चुप-चुप रहता है ,पहले की तरह हँसना -बोलना खत्म हो गया है ।पहले जो सहज रूप से घर के सामान की सम्हाल करता था अब तटस्थ -सा देखता रहता है ।विमल होते हैं तो बाहर -बाहर से चला जाता है ।
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पिता ने कनु को समझाया था ,' ज़रा सावधान रहा करो ।'
' क्यों ,पापा ?'
' सबके सामने निकाल कर बैठ जाते हो और सत्ते वहीं मँडराया करता है,ज्यादा सिर मत चढाओ उसे ।
वह तो उपत कर वहीं जाता है जहाँ खिलौने रखे हैं ।'
फिर एक दिन -
विमल के ऑफ़िस के तनेजा सपरिवार आये थे ।
बातों-बातों में कमल की शादी की चर्चा -
' बढिया नौकरी है ।वहाँ के ठाठ के क्या कहने !'
' हाँ ,हमारे साढू का भाई भी वहीं है । जाकर आने का नाम नहीं लेता ।क्या फटाफट अंग्रेजी बोलते हैं बच्चे ।
वहाँ के कपड़े भेजता है ।क्या मेटीरियल ,क्या सिलाई ।सालोंसाल खराब नहीं होते ।'
'एक हमारे यहाँ !एक टाँका निकले तो उधड़ता चला जाये ।क्वालिटी पर कोई ध्यान नहीं देता ।'
' और खिलौने यहाँ के ऐसे कि पानी पड़े रंग उतर जाये ।एकाध बार खेलें तो कोरें निकल आती हैं ।नोंके और कोरें चुभने लगती हैं। .और वहाँ के खिलौने !नन्हा बच्चाभी मुँह में दे ले तो भी कोई डर नहीं ।अभी कमल ने भेजे हैं ,कनु के लिये ।बस , देखने की चीज़ है ।'
' अच्छा ,कमल ने भेजे ? .वहाँ से ?'
कनु की पुकार हुई ।
'वह के सत्ते के साथ बाहर खेल रहा था ।साथ-साथ सत्ते भी चला आया ।'
खिलौने मँगाये गये ।
' उत्साह में सत्ते कनु के साथ उठा-उठा कर लाने लगा । '
'रेलगाड़ी औऱ पटरी दोनों एक साथ उठाये चला आ रहा था ।
' अरे ,सम्हालकर,' जोर से विमल ने टोका ।
सत्ते चौंक गया ,सब उधऱ देखने लगे ।
'दोनो एक साथ उठा लिये ?उसे क्यों दे दिये कनु ?कहीं गिरा दिया तो यहाँ तो ठीक भी नहीं होगा ,',विमल ने एकदम कहा ।
' पापा. इतना वह समझता है ।वह तो मुझे भी बताता रहता है।'
इस बीच सत्ते एकदम सहम गया था गाड़ी उसके हाथ से छूट गई ।
' देखो कनु कुछ टूटा तो नहीं ।मैंने पहले ही कहा था ।'
सत्ते जड़-सा खड़ा। फिर धीरे से बाहर निकल गया ।
**
उस दिन कनु का उड़नजहाज नहीं मिल रहा था ।सारा घर छान डाला ।बाहर झाड़ियों में पड़ा मिला ।फिर तो आये दिन खिलौने कहीं के कहीं मिलते ।एक तो कूड़े में पड़ा दिखा । सुधा कहीं से आ रही थी उसने देख लिया ।
टूटा हुआ था । हारकर सुधा ने अल्मारी में रख दिया ।
विमल का शक सत्ते पर है ।
उस लड़के को इतनी छूट मिलेगी तो यही होगा ।
कनु को दस बार समझाया लेकिन उससे थोड़ा दूर -दूर रहे पर उसके साथ खेले बिना इसका जी नहीं भरता ।
' पर कहाँ खेलता है अब सत्ते साथ ?सुस्त सा घर में बैय़ा रहता है ।और उसके साथ खेलने में बुराई क्या थी ?मैं तो निश्चिंत हो जाती थी ।कनु तो लापरवाह है उसकी चीजों की वही तो ध्यान रखता था ।'
'क्यों, कनु से खुद नहीं रखा जाता ?अब देख लिया न नतीजा ।पता नहीं क्या-क्या चुरा ले गया हो ।'
' बस करो उन लोगों पर सारा घर छोड़ जाती हूँ ।कितने साल हो गये ।बेकार तोहमत मत लगाओ किसी पर ।'
' मैं तो लड़के की बात कर रहा हूँ ।अपने पास नहीं है तो इसका उड़ा दिया ।'
' माँ-बाप ऐसे नहीं कि ऐसी चीज़ घऱ में रख लें ।फिर खेलना तो यहीं है न '!
विमल भुनभुनाते रहे ।
उसने कनु से पूछा था -सत्ते अब तुम्हारे साथ नहीं खेलता ?
उसे इन चीजों से खेलने का ढंग नहीं है ।पापा कह रहे थे गिरा देगा तो खराब हो जायेगा ।यहाँ तो ऐसा मिलेगा भी नहीं ।उसकी नियत मेरी चीजों पर लगी रहती है। अकेले में मेरी चीजें छूता है ।'
जिस दिन खिलौने आये थे सुधा को याद है ,सत्ते का उत्साह कनु से कम नहीं था ।दौड़-डौड़ कर पैकिंग खुलवाने में चीज़ें उठाने-धरने में मदद करता रहा ।कनु से किसी घट कर नहीं था उसका चाव और खुशी । उमंग और कौतूहल से भरे दोनों एक -एक चीज़ को समझने की कोशिश करते रहे ।
कितना परायापन आ गया है अब ! कुण्ठित-सा अलग-थलग खड़ा रहता है ।कनु से दूरियाँ बढती जा रही हैं । उसकी नज़रों में अक्सर ही क्या होता है -द्वेष .घृणा ,प्रतिहिंसा ?वह समझ महीं पाती ।
परेशान है वह भी ।पति कहते हैं उसी सत्ते के कारनामे हैं ।सुधा कुछ बोल नहीं पाती। कुछ कुछ शक उसे भी है ।
पर कैसे हो गया यह सब ?सत्ते तो कभी ऐसा नहीं था! कनु उस पर कतना निर्भर रहा है ! उससे ज़्यादा सावधान वह रहता था कि कनु को या उसकी चीज़ों को कोई नुक्सान न पहुँचे ।कनु के लिये दूसरों से लड़ जाता था ।उसके लिये कोई कुछ कह दे तो उसे सहन नहीं होता था । और दोस्त हों या न हों, सत्ते के साथ मगन रहता था कनु । और अब क्या हो गया कि किसी काम से आता भी है तो रुकता नहीं , फ़ौरन चला जाता है ।चेहरे पर न मुस्कराहट न खुशी ,जैसे अपरिचित लोगों के बीच आ गया हो ।
सुधा जानती है अब वह पहले जैसा पास नहीं आता पर तृषित निगाहों से कनु के खिलौने देखता है ।कई बार उसने देखा है उसकी माँ जब उसे कुछ कहने -बताने या किसा और काम से भेजती है तो वह वहीं जाकर खड़ा होता है जहाँ कनु खेल रहा होता है ।कनु उधर न भी हो तो वह खिलौनों के पास ही जाकर खड़ा होता है ।
अकेले में छू कर देखता है ,किसी के आते ही डर कर अलग हो जाता है ।पहले खिलौने पड़े होते थे तो खूब इत्मीनान से समेट कर डब्बे में रखकर अल्मारी में रख देता था ।इससे पहले भी सत्तेहमेशा कनु के बाहर पड़े खिलौनों को सम्हाल कर लाताथा ,' देखिये , कनु भैया ये बाहर ही छोड़ गये थे '-कह कर अल्मारी में जमा देता।पर अब ..अब कितना बदल गया है ,जैसै उसे कोई मतलब ही न हो ।
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मैंने तो पहले ही कहा था कि उन लोगों को मत दिखाओ ,उनके सामने निकालो ही मत खेलो ही मत ,।कैसी ललचायी निगाहों से देखता रहता है ...!
' तो खिलौने बंद कर रखने को होते हैं ?'
सुधा को अच्छा नहीं लगता कही है ,'बस बस रहने दो।खिलौने खेलने को हैं कि सेंत कर रखने को ?।दूसरों को तरसा कर क्या खुशी बढ जाती है ?ज्यादा संतोष मिलता है? "..
' क्या फ़ायदा कि मिल कर मन भऱ के खेल भी न पाये। ।आपस में मेल रखाने के जगह भेद डालें ! अकेले में निकालो और बंद करके रख दो ये भी कोई खेलना हुआ ?'
' अपने दोस्त आयें उनके साथ खेले ।'
' हाँ , खेले तो पर उन्हें भी ईर्ष्या होती है । और हमारा बच्चा कैसा खुश होता है कि मेरे पास है और किसी के पास नहीं ।यह क्या खेलना हुआ ?
' तो उन्हें मना किया है किसी ने ? वे भी मँगा लें ।'
' औरों के बल पर दिखावे की जरूरत नहीं ।कोई हमारे यहाँ का तो है नहीं कि कोई चाह कर भी ले ले ।
अभी से कनु को ये सब मत सिखाओ ।खेलने में सब बराबर ।पर यहाँ तो एक सबसे खास बनना चाहता है ।
खिलौने भी दिखावट की चीज़ हो गये !और लोग तरसें और एक खुश हो।
सब मिल कर नहीं खेलें तो खेल काहे का ?
वह सोचती रही पता नहीं कैसे खिलौने जो निर्मल आनन्द की जगह दूसरे के अभाव पर खुश हों ।खेल की भावना तो मर गई, रह गया दिखावा कि ,देखो ,हम ऐसे हैं ।
एक दूसरे से सहयोग की जगह साथ मिल कर खुश होने के दूसरे की मजबूरी का मज़ा लेना ।.मिल कर रहने की तो बत ही नहीं ।बस हम खास बने रहें बच्चों में यही भर दो ।आपसी दूरियाँ और हीनता की भावना पनप रही है जो किसी को चैन से नहीं रहने देगी ।
खिलौने थोड़े ही हैं दिखौने हैं !कोई तरसे किसी को खुशी हो ।
कई दनो से सुधा नोट कर रही है सत्ते की भाव-भंगिमा बदलती जा रही है ।।पहले कनु के लिये दौड़ कर आता था ,उसकी आँखों में प्यार और सम्मान था ,हमेशा मदद को तैयार ।।लापरवाह कनु की चीज़े सम्हालता था जैसे उसकी जुम्मेदारी हो उसके लिये। हमेशा मुस्तैद रहता था कि कहीं कोई नुक्सान न हो जाये ।कितना मानता था कनु को ।दोनों खेलते ।वह भी निश्चिंत रहती थी कि वह है तो कनु का पूरा ध्यान रखेगा ।चन्दो कहती थी कनु भैया बुलायें तो इसका खाने में भी मन नहीं लगता ,तुरंत दौड़ता है।
अब तो कनु घर में ही ज्यादा रहता है पहले मौका मिलते ही बाहर खुली हवा में दौड़-भाग के खेल खेलने निकल जाता था।अब अंदर घुसा रहता है ।कहो तो कह देता है बाहर कोई खेलता ही नहीं ।एक-दूसरे को देख कर चेहरे खिल जाते थे -चाहे सत्ते ही क्यों न हो ।
कभी-कभी वैसे ही खाली -खाली सा। खिलौनो में भी रुचि कम हो गई हो जैसे ।पहले की चपलता-चंचलता समाप्त हो गई ,खिन्न-सा रहता है ।सारा उछाह खत्म हो गया हो जैसे । दोस्त आते हैं वे बाहर खुली हवा मे न खेल कर उसके खिलौनों से ही खेलना चाहते हैं । पहले खूब कर भागते-दौड़ते हँसते खिलखिलाते थे ।कूदने -फाँदने गेंद खेलने का किसी को ध्यान ही नहीं आता ।
' जाओ मैदान मे खेल लो ,' वह कहती है ।
वे सब कह देते हैं,' बाहर से ही तो खेल कर आ रहे हैं ।'
कनु नहीं उसके खिलैने इन्हें खींच लाते हैं ।
कैसी कुंठाये पनप रही हैं जो संबंधों को सहज नहीं होने देतीं ।
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चन्दो उदास रहती है ।आती है काम करके चली जाती है ।बहुत कम बोलती है -सिर्फ़ काम की बात ।
सुधा परेशान है ।क्या करे कुछ समझ में नहीं आता ।घर में चन्दो हँसती-बोलती थी तो कितना अच्छा लगता था ।
सुधा ने उसे कभी नीचा नहीं समझा -उसमें ओछापन बिल्कुल भी नहीं, नियत की अच्छी है माँगने की आदत बिल्कुल नहीं ।अपनी सीमायें समझती है ।
सुधा से रहा नहीं गया ।
'चन्दो ,क्या हो गया है आजकल ?तबीयत खराब चल रही है क्या ?'
'क्या कहें बीबी जी ,कुछ कहते नहीं बन रहा ।आज कल घर में बड़ी अशान्ति चल रही है ।'
'क्यों ?'
उसने ठंडी साँस भरी ।कुछ बोली नहीं ।
' बताती क्यों नहीं ,क्या हुआ ?'
'क्या बतायें ?सत्ते को का जाने क्या हो रहा है ?'
'हाँ , मुझे भी आज कल बड़ा बदला-बदला लगता है ।'
'न अपना खुस रहे न कसी को रहने दे ।कलेस मचाये रहता है घर में ।'
वह रोने लगी ,' बीबीजी भइया के खिलौने आये ।पहले कई दिन ये भी बड़ा खुस रहा ।आये-गये सबको चाव से बताता रहा -ऐसी रेलगाड़ी है पटरी पर भागती है ।उड़न जहाज उड़ता है और उसे एक बटन दबा कर मनचाही तरफ घुमा दो ।और बहुत बातें । बड़ा मगन रहता था -कनु भइया का खिलौना ऐसा है जैसे सचमुच का हो ।
पर फिर जाने का हुइ गया ।अब कैसा होता जा रहा है ,चुप चुप रहता है।किसी काम मे मन नही लगता उसका ।
।उखड़ा-उखड़ा रहता है ।छोटे भाई बहनों को जरा सी बात पर पीट देता है।'
ऐसा तो नहीं था ।क्या होता जा रहा है सत्ते को ।कभी-कभी चन्दो बड़ी दुखी हो जाती है ।
दुखी तो सुधा भी हो जाती है ।
चन्दो कहे जा रही ,' पहले कभी ऐसा नहीं था। अब तो बाप के सामंने-सामने बोलने लगा है ।बहस करता है ।'
' अच्छा !क्यों ?'
' कहता है मुझे भी खिलौने दो लाकर ।'
सुधा को कैसा-कैसा लग रहा है ।
' हमने समझाया ।कनु भैया के साथ खेल तो लेते हो ।पर उसकी समझ मे नहीं आता ।कहता है अपनी चाहिये ।
कुछ दिन से हल्ला मचाये है -मुझे भी ऐसी गाड़ी ला दो जो पटरी पर भागती है ।बस एक चीज़ ला दो ।
एक रेलगाड़ी ला कर दी तो उसने उठा कर फेंक दी ।इसी बात पर बाप को गुस्सा आ गया ,पीट दिया । रोते रोते सो गया ।अब बीबी जी ,सुबह का गया गया दिन भर मेहनत कर शाम को आता है। उस दिन सीधा बाज़ार होता हुआ उसके लिये रेलगाड़ी ले कर आया। पर इसके मिजाज मिलेंतब न !अब बीबी जी, मँहगी चीज़ें हम कहाँ से खरीदें ?उसकी समझ में कुछ नहीं आता ।बाप झींक जाता है ।
परसों तो बाप ने इसी से पीटा ।हम ग़रीब आदमी कहाँ से लायें ऐसे मँहगे खिलौने ।'
सुधा क्या कहे ।सुनती रही ,अपना काम करती रही ।
***
और फिर एक दिन पटरी पर दौड़नेवाली रेलगाड़ी गायब हो गई ।
घर मे से कहाँ चली जायेगी ।उसके सिवा और कौन घर में आता है ?
विमल का गुस्सा सत्ते पर है ,' पहले ही कहता था उसे सर मत चढाओ । पर तुमन लोग मानो तब '
' देखो ,जब से रेलगाड़ी ग़ायब हुई है उसने शकल भी नहीं दिखाई है ।'
' कनु के दोस्त ?नहीं वो ऐसा नहीं कर सकते !और इत्ती बड़ी रेलगाड़ी छिपा कर कैसे ले जायेंगे !
वही ले गया है ।मैं अच्छी तरह जानता हूँ ।उसकी निगाहें लगी थीं गाड़ी पर ।'
चंदो से पूछा गया ।
' अभी तक तो कभी चोरी की नहीं ।बीबी जी ,घर जाकर पता लगाऊँगी।हाँ, और कोई तो आया भी नहीं दो दिनों से। फिर गई कहाँ?।इस लड़के के लच्छन आजकल समझ में नहीं आते ,पर लाता तो घर में ही लाता ।उसका कसूर होगा तो बाप जान से मार देगा ।मिलनी चाहिये रेलगाड़ी कहीं तो ,आप चिन्ता मत करो ।जायेगी कहाँ घऱ में से ?
परेशान सी चन्दो चली गई ।
सुना रात में बाप ने खूब मारा,बदन में नील पड़ गये पर सत्ते साफ़ मना करता रहा ।
दो दिन से सत्ते बाहर नही निकला ।
तीसरे दिन चन्दो दोपहर में आई ।
छिपा कर लाई हुई रेलगाड़ी निकाली और मेज़ पर रख दी ।
अरे ये कहाँ मिली ?
चन्दो रोने लगी ।
'माफ़ करना बीबी जी ,हमें पता नहीं था ।घर में लाने की हिम्मत तो थी नहीं सो उसने बाहर भूसे के ढेर में छिपा कर रखी थी ।आज कंडे लेने गई तो दिखाई दे गई । उसके बाप ने चमड़ी उधेड़ दी ,उस दिन से खाना भी नहीं दिया है ।वहीं भूसे की कोठरी में पड़ा है । सारा बदन नीला पड़ा है ।
सुधा सिहर उठी ।
चन्दो कह रही है,' कहीं सिर उठाने लायक नहीं रखा ।इससे तो मर ही जाता अभागा !
अब आपको भी जो सजा देना हो दे दो ।उसे भी और हमें माँ-बाप को भी !'
सुधा सुन रही है ।
सुधा सुन रही है ,कानों में जैसे कोई लावा उँडेल रहा है ।कान मूँद कर भाग जाना चाहती है , पर सब सुनना पड़ रहा है ।
'जो जो कुछ खराब हुआ है सबके पैसे काट लो ।मैं क्या करूं ,मैं तो हार गई ।'
कितने प्रयास से मुँह से बोल फूटे ,' बस ,बस चन्दो ,बहुत हो गया ।'
पल्ले से मुँह दबाये चंन्दो सिसक रही है ।
' रो मत चन्दो ,गलती तेरी नहीं है ।बड़ों-बड़ों को अपने पर काबू नहीं रहता ।वह तो बच्चा है ।जैसा तेरा ,वैसा मेरा ।...मैं भी दुखी हूँ चन्दो !
बड़ी मुश्किल से समझा कर चन्दो को भेजा ।
अब मारना-पीटना नहीं ,ऐसे तो लड़के बिगड़ जाते है ।जाकर खाना खिलाओ उसे ।
सुधा का मन खराब हो रहा है ।दिमाग में क्या क्या खयाल आ रहे हैं - कभी कनु को तरसना पड़े तो ? तो क्या गुज़रेगी उस पर.?क्या गुज़रेगी हम पर ?
जो नहीं खरीद सकता वह क्या करे ?और फिर बच्चे ?उन्हे कैसे समझाया जाय ?
कितने सवाल उठ रहे हैं ,खूब पिटा है भूखा पड़ा है सत्ते ?
ऐसा तो नहीं था !क्या हो गया उसे ?
दो दिन से भूखे बच्चे का बार-बार ध्यान आ रहा है । रह-रह कर तिलमिला उठता है मन ।
भूखे शरीर पर क्रोध से पागल बाप की लगातार पड़ती मार- सुधा झेल नहीं पा रही ।
**
क्या हो गया ? सब समझ रही है सुधा !
अब तक सिर्फ सोचती थी ।अब समझ में आ रहा है ।
यह कैसा खेल हैं ? आपस में असंतोष पलता रहे ,सब अलग-अलग पड़ते जायें, संवेदना -सहानुभूति रहित ? कनु जब खेलने बैठता है तो औरों को कैसे देखता है जैसे कह रहा हो -जो मेरे पास है तेरे पास कहाँ !तू कहाँ से लायेगा !और बच्चों पर जैसे कृपा कर रहा हो अपने साथ खिला कर ।कैसा खेल है यह ?
जहाँ की है वहीं रहें ऐसी चीज़ें ।वहाँ सबके पास होंगी ,दूसरों के बच्चों को तरसना नहीं पड़ता होगा !यहाँ ये खेलने के लिये थोड़े ही, हम कुछ खास है ये दिखाने के लिये आये हैं ?
या फिर सबके साथ खेले, मिल बाँट-कर । सो नहीं ।
सुनने को मिलता है,' हरेक के सामने मत निकाला करो ।खराब हो जायेंगे ।'
हरेक ?माने साधारण लोग !
और कनु तो खास बन गया है ।
खिलौने ?बच्चों के खेलने की निर्दोष चीज़े । को आनन्द देने के साधन !और ये मँहगी मँहगी मशीनों जैसी चीजें सिर्फ अपना बड़प्पन के दिखावे के लिये ! औरों को दिखा कर उनके मन में तृष्णा जगाने के लिये !चार जनो के साथ मिल कर खेलने के बजाय पड़ते जाने के लिये ! इसीसे बड़प्पन पता लगेगा ।इसीसे संतुष्टि होगी ?
तो रख लो सम्हाल कर सहेज कर !सबसे हटा कर। संदूक में बंद कर दो ।
***
एक झोला हाथ में पकड़े सुधा चन्दो के घर जा रही है ।
' अरे बीबी जी ,आप ?मुझे बुला लेतीं ।'
' क्यों? मैं नहीं आ सकती ?'
' आइये ,कही जा रही हैं क्या ?'
' नहीं । सत्ते कहाँ है ?'
' फिर कुछ किया क्या उसने ?'
' नहीं ।उसने कुछ नहीं किया । बुलाओ तो ।'
सत्ते कहीं से आ रहा है- चेहरा दुर्बल,सूखा-सा ठीक से चल नहीं पा रहा है ,हाथों पर नीले निशान ।
सुधा को देखा ,चौंक गया ।चाल थम-सी गई ।
' बीबी जी तुम्हें बुला रही हैं ।'
' रुक क्यों गये सत्ते ?आओ ,मैं तुम्हीं से मिलने आई हूँ ।'
कहीं शिकायत का स्वर नहीं , आवाज़ सहज स्नेहमय ।
सुधा खुद बढी ।उदास खड़े सत्ते का कंधा पकड़ अपने से सटा लिया ।
साथ लाये झोले से खिलौने निकालने लगी -वही पटरीवाली रेलगाड़ी !दो-तीन-और चीजें हैं ।
' ये ,तुम्हारे लिये !'
चन्दो चौंक गई है ।
' बीबी जी,ये क्या कर रही हो ?हम कहाँ इन खिलौनों के लायक।।कनु भइया के हैं। ले जाइये ।'
सत्ते अवाक् खड़ा है ।
' नहीं । अब सत्ते के हैं ।कनु के पास और भी हैं । इन से खेलना होगा तो सत्ते के साथ खेल लेगा ।'
सत्ते ने सिर झुका लिया है ।
किसी की समझ में नहीं आ रहा क्या बोले ।
'क्यों, मैं सत्ते को कुछ नही दे सकती ?'
सत्ते विमूढ !क्या कहे ,क्या करे !अंदर से गले-गले तक कुछ उमड़ा आ रहा है ।बड़ी मुश्किल से बोल निकले -
' माफ़ कर दीजिये १गलती हो गई ।'
आवाज़ बिल्कुल ऱुँधी है ।
' पागल है क्या ?खुशी से खेल ।'
चन्दो की ऑखों में द्विविधा है ,' और बाबूजी ?'
' मैं चुरा कर नहीं दे रही हूँ । बाबूजी की चिन्ता मत कर ।मैं हूँ न ?'
सत्ते फूट-फूट कर रो उठा है । आँखों से धाराधार आँसू बह रहे हैं ।
उसने आगे बढ कर सिर पर हाथ रखा -हथेली से गालें पर बहते आँसू पोंछ दिये ।
' अब कभी नहीं आंटी जी ।'
'मुझे मालुम है अब कभी नहीं ! गलती किससे नहीं होती ? '
'चन्दा ,तुम लोग उससे कुछ मत कहना ।'
विमल को वह समझा लेगी ।
पर ये चन्दो क्यों रो रही है ?
उद्वेलित लहरों को सहज होने में थोड़ा समय तो लगेगा ही ।
- प्रतिभा सक्सेना .
पुनर्नवा
अपू अपने कमरे में गुमसुम बिस्तर पर लेटी है।
घर-भर की चिन्ता रखनेवाली,संयत ,शिष्ट ,कर्तव्यपरायण ,बड़ी बहू, आज सुबह से उठी नहीं। हमेशा मुस्तैद रहकर ,खुशी-खुशी सारे काम निपटानेवाली,अपर्णा चुपचाप लेटी हुई है ,जैसे किसी से कोई मतलब ही नहीं।
मुँह से कुछ बोलती नहीं ,बस आँखों से आँसू बह आते हैं।कमरे में लोग आ रहे हैं ,जा रहे हैं। उसे किसी का भान नहीं ।आँखें बन्द किये पड़ी है, बेख़बर!
पत्नी के माथे पर हाथ रखा प्रबोध ने , उसने हल्के से पलकें उघारीं ।
'अपू ,तुम्हें क्या हो गया है ?'
उसने आँखें बन्द कर लीं उत्तर कुछ नहीं ।
'बोलो न ।तुम्हें क्या होगया, अपू ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं मुझे नहीं मालूम ।'
विस्मित से प्रबोध उसे हिलाते हैं ,'क्या कह रही हो ?'
कैसी निगाहों से देख रही है जैसे पहचानती न हो ।
'अपू,अपू, क्या कह रही हो तुम ?'
' मुझे कुछ नहीं मालूम ,कितने लोग हैं।'
'कैसा लग रहा है तुम्हे ,अपू ओ अपू ?'
देवर सुशील कमरे मे आया ,'भैया , क्या हो गया भाभी को ?'
'कुछ समझ मे नहीं आता । बुख़ार तो नहीं है।'
'भाभी, कैसी हो ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं , मुझे कुछ नहीं मालूम ।'
बालों मे कंघा लगाये शोभना कमरे मे आ रही थी ,बिस्तर की ओर आते-आते उसने अपू की बात सुनी,और ज़ोर से खिलखिला उठी ।
हँसी की आवाज़ ,कमरे की उदास स्तब्धता को चीरती चली गई। दोनो भाई चौंक कर उसकी ओर देखने लगे।
'कॉलेज जाना है ,' घबराकर शोभना बाहर निकल गई।
' क्या बड़ी भाभी की तबीयत कुछ खराब है?'
छोटी बहू ,ललिता ,कटोरी से चावल नाप कर थाली मे डाल रही थी ।
उसने सिर उठाकर शोभना को देखा ,बोली ,' कल रात पिक्चर से लौट कर मै उनके कमरे मे गई थी,तब तो ठीक थीं। ' फिर मुड़कर रसोई से बाहर निकलती शोभना को आवाज़ लगाई ,' अरे,कहाँ जा रही हैं ,सुनिये तो...सब काम लेट हुए जा रहे हैं जरा ये चावल तो बीन दीजिये। '
'मुझे तो ख़ुद देर हो रही है,पता नहीं कॉलेज टाइम से पहुँच पाऊँगी कि नहीं .... अच्छा लाओ,बीन दूँ।'
बे-मन से शोभना ने चावल की थाली पकड़ ली ,हथेली से चावल समेटती बीनने का उपक्रम करने लगी। बड़ी मुश्किल है।अभी नहाना है, तैयार होना है,नाश्ता करना है और ये चावल बीनने को पकड़ा दिये! शोभना को बड़ा नागवार गुज़र रहा था।
सास आवाज़ लगा रही थीं,' अरे, बड़ी बहू कहाँ है?आज सुबह से नहीं दिखी।'
सब एक-दूसरे से पूछ रहे हैं , ' अपू को क्या हो गया/'
आज सुबह से कमरे से बाहर नहीं आई ।
रोज़ तो मुँह अँधेरे से उठकर कितना काम निपटा डालती थी ! अब तक किसी को पता ही नहीं था कि घर मे ये काम भी होते हैं।इस बेला तक नहा-धोकर माथे पर बिन्दी लगाये चौके मे लगी दिखाई देती थी।
सुशील ने ललिता से कहा ,'तुम जाकर देखो, भाभी को क्या हो गया।'
गैस पर चाय का पानी रख कर देवरानी पहुँची अपू के पास ! छूकर देखा ,' नहीं देह तो बिल्कुल नही तप रही ,'दीदी,माथे मे दर्द है ?'
अपू ने शायद सुना नहीं।
'दीदी ,कैसी तबीयत है ,कुछ बताओ न। '
उसने आँखें खोलकर नहीं देखा ।
घऱ भर मे शोर मच रहा है ,सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
सास झींक रही हैं ,'मै मरूँ चाहे जिऊँ ,परवाह किसे है ? कब से नहा कर बैठी हूँ किसी ने एक कप चाय को नहीं पूछा । ठिठुरते हाथों पूजा के बर्तन माँजे ,सामग्री जुटाई । बुढ़ापे मे किसी का आसरा नहीं...। '
ससुर को शिकायत है ,'मेरा अब कोई पुछवैया नहीं। गुसलखाने मे न गरम पानी पहुँचा न तेल!मेरा ध्यान रखनेवाला कोई नहीं इस घर मे ....।'
ऊपरवाले कमरे मे ननद शोर मचा रही है ,' मेरा सलवार-कुर्ता बिना प्रेस के पड़ा है ....अब तो इतना भी टाइम नहीं कि खुद प्रेस कर लूँ ।....अरे छोटी भाभी..।'
और छोटी भाभी ललिता,रसोई में धीरे-धीरे कुछ कर रही है। सुबह बेड-टी मिली नहीं सिर दर्द कर रहा है।दिन भर का रुटीन बिगड़ गया, सो अलग !
बरामदे मे प्रबोध परेशान- से बैठे हैं। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था । उनकी समझ मे नहीं आ रहा है क्या करें । किससे शेव का पानी मागे , कहाँ से अपने कपड़े निकालें !
सुशील ललिता पर झल्ला रहा है ,' तुम एक दिन भी सम्हाल नहीं सकतीं ?'
अपू पर इस सबकी कोई प्रतिक्रिया नहीं । जैसे कान तक कोई आवाज़ पहुँच ही न रही हो ! रुचि एकटक माँ का चेहरा ताक रही है,कार्तिक उदास दरवाज़े के पास खड़ा है।
हरेक को एक ही शिकायत है- घर में इतने लोग है,किसी को मेरा ध्यान नहीं।
हाँ, कितने लोग हैं घर मे ,पर हरेक को कुछ-न-कुछ परेशानी है । किसी का अपना काम ही नहीं हुआ दूसरे को कौन देखे ?
सब बार-बार पूछ रहे हैं ,'अपू को क्या होगया है ?','बड़ी बहू को क्या हो गया है?'
उत्तर किसी के पास नहीं कि उसे क्या हो गया।
ताज्जुब तो यह है कि अब तक किसी को ध्यान नहीं आया कि पूछे ',अपू ,तुम्हे क्या हो रहा है ?'
***
बिदा करते समय माँ ने कहा था ,'बेटी अपनी कोई इच्छा नहीं ,अपना मन कुछ नहीं होता ।वहाँ सबका मन देख कर चलना ।सबको सन्तुष्ट करने मे ही अपना सुख समझना।'
शुरू-शुरू मे बहुत मुश्किल लगा था अपू को।नई ब्याही आई थी ।नये लोग ,नया वातावरण !
सुबह से शाम तक कुछ-न-कुछ काम चलता रहता है।और जब कुछ काम नहीं होता तो सास का घुटनो का दर्द मुखर हो जाता।हर व्यक्ति अपने मन से रहना चाहता है ,और सारी सुविधायें भी । ऐसे कैसे जीवन बितायेगी जहाँ अपना मन ही खत्म हो जाये ।
इतनी चौकस बनी रही , अपू कि कभी टोके जाने की नौबत नहीं आई।गृहस्थी की मशीन चलती रही .उसी का एक पुर्ज़ा बन गई अपर्णा - ऐसा पुर्ज़ा जो मशीन के साथ चलता रहता है ,अविराम !
फिर बच्चे हुए ,रुचि और कार्तिक !पालन - पोषण अपू की जुम्मेदारी ,सास-ससुर की सेवा ,देवर-ननद का ध्यान और घर की व्यवस्था सब अपू की जिम्मेदारी -प्रबोध को हर सुविधा देना तो उसका धर्म है ही ,सबसे प्रथम कर्तव्य !
अपू न दे तो पति को पहनने को कपड़े नहीं मिलते । वह न हो तो सास की पूजा ,ससुर का स्नान भोजन न हो ! देवर कैसे चुस्त - दुरुस्त ऑफ़िस जाये,ननद कैसे कॉलेज मे पढ़े ?
सोचती है कभी,अपू कि वह कपड़े न दे तो पति बनियान पहने ऑफ़िस चले जायेंगे ? कभी-कभी सब-कुछ अपरिचित लगने लगता है उसे । बच्चे मेरे हैं ,पति मेरे हैं ,घर मेरा है - सब कुछ मेरा है ।पर मै कहाँ हूँ ?
अम्माँ ने कहा था मन कुछ नहीं । मन कुछ नहीं तो भीतर-भीतर क्या उमड़ने लगता है ?क्यों होती है इतनी अशान्ति ?कभी ऐसा क्यों लगने वगता है जैसे कोई कलेजे को मुट्टी मे भर-भर कर निचोड़ रहा हो ?बड़ा अजीब लगने लगता है अपू को! पति को,बच्चों को चुपचाप देखती रहती है ।पढ़ने की कोशिश करती रहती है, इनमे कहाँ मेरा अपनापन है?ये मुझे जानते -समझते हैं ? पहचानते हैं मुझे ?
ललिता ने कहा था ' दीदी ,तुम्हारे जैसी आदर्श नारी नहीं बन सकती मै !तुम कैसे कर पाती हो इतना सब ? इतनी ठण्ड मे मुँह- अँधेरे उठ जाती हो ,तुम्हे जाड़ा नहीं लगता ? गर्मी मे तुम घन्टों चौके मे काम करती हो -पसीने से तर-बतर ।तुम्हे कष्ट नहीं होता ?तुम्हे क्या सर्दी-गर्मी नहीं लगती ?'
' मुझे..?मैने कभी सोचा ही नहीं।और जो करना है वह तो करना ही है,सर्दी-गर्मी लगने से क्या फ़र्क पड़ेगा ?'
शरीर तो शरीर है।सर्दी मे हाथ-पाँव ठिठुरते हैं ,अँगुलियाँ सुन्न पड़ने लगती हैं: गर्मियों मे पसीने से लथपथ कपड़े चुभते हैं घमौरियाँ काटती हैं ,पर अपू के मन तक यह सब कुछ नहीं पहुँचता ।
सब काम नियमित चलते रहते हैं ,वही क्रम साल के साल ,बारहों महीने ,तीसों दिन !
देर से उठनेवाली ललिता कहती है,'तुम्हारा मन कभी नहीं करता दीदी, कि सुबह देर तक रजाई ओढ़ कर सोओ ?'
मन ?
फिर मन की बात !यह ललिता हमेशा मन की बात लेकर बैठ जाती है । कहती है जिस लड़के से मेरे पिता ने मेरी शादी तय की थी , वह मेरे मन का नहीं था।
हाँ, उसका मन मिला था अपू के देवर से ! घर मे सब ने ग़ैर जात मे शादी का विरोध किया।ख़ूब झंझट हुआ । पर इधर सुशील अड़ गया उधर ललिता ने जान देने की धमकी दी । झख मार कर दोनो परिवारों को मानना पड़ा।
बेकार मे किया इतना विरोध, झगड़ा- झंझट दोनो घरों के लोगों ने! अरे, किसी से भी शादी हो कौन फर्क पड़ता है! फिर इन्ही दोनो को कौन अंतर पड़ गया!जिन्दगी का ढर्रा तो बदल नहीं जायेगा।चाहे कोई चाहे जिससे शादी करे ! रहना जब उसी तरह है तो इस आदमी या उस औरत से क्या बनना-बिगड़ना है -अपू ने सोचा था पर कहा कुछ नहीं।
गृहस्थी की मशीन, कल शाम तक दुरुस्त थी।रात पिक्चर से आकर ललिता अपू के पास गई थी । खुशी से फूली नहीं समा रही थी । दीवाली के लक्ष्मी-पूजन के लिये सबकी साड़ियाँ आई थीं , वही लेकर आई थी ललिता ,इस कमरे मे । शोभना कहाँ पीछे रहनेवाली थी।तुरन्त हाज़िर हो गई ,पैकेट से निकाल कर चारों साड़ियाँ बिस्तर पर डाल दीं।
'देखना यह अम्माँ की है।' क्रीम कलर की साड़ी अलग हो गई।
रुचि उठा कर साड़ियाँ देखने लगी।उसके हाथ मे हरी साड़ी है-सुनहरा बॉर्डर !अपू की आँखों मे चमक आ गई निगाहें उसी साड़ी पर अटक गईं।
ललिता ने बढ़ कर हाथ मे ले ली,'यह हरीवाली तो मै लूंगी।'
शोभना ने फ़ौरन टोका ,'छोटी भाभी ,तुम्हारे लियो तरबूज़ीवाली आई है,हरी तो बड़ी भाभी की है।'
'ना,ना मुझे नहीं चाहिये तरबूज़ी।इस तरह का शेड मेरे पास है, मै तो हरी लूँगी।'
आज फिर हरा रंग हाथ से निकल गया ! आँखें बुझ-सी गईं अपू की।रुचि समझ रही है।मन-ही-खीझ रही है।सब अपनी कह लेते हैं ,माँ क्यों नहीं बोल पातीं ?कभी नहीं बोलतीं !
'यह पहन कर टीका करने जाऊँगी' मगन सी ललिता बोल रही है ,'दीदी आज पिक्चर मे बड़ा मज़ा आया।'
फिर वह अपू से पूछने लगी ,' दिन-रात घर मे रहते ऊब नहीं लगती तुम्हें ?तुम्हारा मन नहीं करता - बाहर निकलो ,घूमो , फिरो पिक्चर देखो?'
अपू चुपचाप बैठी है।
ललिता ने आकर कहा ,' खाना खाने चलो ,दीदी।'
'भूख नहीं है। '
. ' कुछ भी नहीं खाओगी क्या ?' शोभना ने पूछा था ।
' नहीं। '
बिल्कुल चुपचाप बैठी है अपू ।
मन था क्या कभी ?कब कहाँ चला गया ?खोई सी बैठी है वह।वर्तमान अतीत की गहराइयों मे डूबता जा रहा है --
आठ-नौ बरस की बच्ची है अपू ।
अम्माँ के सामने मचल रही है - धोबन की मुनिया ने जैसी गोटेदार हरी चुन्नी ओढ़ी है ,उसे भी चाहिये ।
अम्माँ समझा रही हैं,' तेरी यह लाल चुन्नी बढ़िया है ,देख मोती जैसी बूँदें चमक रही हैं।'
'नहीं वह चुन्नी अच्छी है ,मुझे तो वही चाहिये ।'
'धत् ,कैसी सस्ती सी चुन्नी है ।और गोटा भी बिल्कुल देहातियों जैसा।'
'नहीं मुझे वैसी ही चाहिये।हरी चुन्नी चाहिये। '
'अरी ,तू धोबन है क्या ?उसकी तो गन्दी है ,तेरी कितनी सुन्दर है।'
' नहीं ,यह खराब है ।यह उसे दे दो।'
रोते-रोते ज़मीन पर लोट रही है।सब समझा कर हार गये।उसे धुन लग गई है- हरी चुन्नी चाहिये गोटेवाली।बहलाये -फुसलाये किसी तरह नहीं मानती अपू। चुन्नी उठा कर ज़मीन पर फेंक दी उसने।समझाने-बहलाने से काम नहीं चला तो दो झापड़ रसीद कर दिये अम्माँ ने।
उसने खाना लहीं खाया ,रोते-रोते सो गई ।
महीनो हरी चुन्नी को भूली नहीं अपू।जब-जब बाज़ार गई उसी के लिये ललकती रही,पर वह न मिलनी थी ,न मिली!फिर वह भूल गई उसे या शायद कहना बन्द कर दिया।अम्माँ कहती हैं यह लड़की हमेशा झिंकाती है मुझे!पराये घर जाकर पता नही क्या करेगी!
भाई बड़े है और छोटी बहिन ना-समझ। अपू की हम- उम्र पड़ोस की दो लड़कियाँ हैं श्यामा और बेबी।उनके साथ खेलने अपू नीचे उतर जाती है।एक बार उतर जाये तो उसे भूख-प्यास कुछ नहीं लगती।इच्छा होती है खेलती रहे ,बस खेलती रहे!
अम्माँ ने ऊपर से झाँक कर देखा,' देखो कब की निकली है खेलने !अरी अपू ,ओ अपरना, आ ।'
श्यामा और बेबी के साथ इक्कल-दुक्कल चल रहा है ,सामने के मैदान मे खड़िया से लाइने खींची गई है।श्यामा और बेबी खड़ी हैं ,अपू एक टाँग से कूद रही है।माँ की पुकार सुनाई नहीं दे रही अपनी धुन मे मस्त है।
बेबी ने बताया ,' अपू ,तेरी अम्माँ बुला रही हैं।'
'आ रही हूँ ' अपू ने आवाज़ लगाई ,' देखो, मै अभी आ रही हूं । मेरी बारी है, तुम रुकी रहना। '
वह ऊपर दौड़ गई।
'क्या कह रही हो अम्माँ ? '
'उन्हीं लड़कियों के साथ सड़क पर खेलना रह गया है ?जुएँ भर लाओगी सिर मे फिर कौन बीनेगा ? '
'जुएँ नहीं भरूँगी । अलग-अलग खेलूँगी।'
'नहीं घर मे खेलो। वहाँ जाने की जरूरत नहीं।'
'अच्छा ,जरा-सी देर ।अपनी बारी पूरी कर दूं।'
'नीचे जाकर तो तुम सब कुछ भूल जाती हो।काफ़ी खेल लिया।अब नहीं।'
'बस अभी आ जाऊँगी।'
अपनी गुड़िया खिलौने बर्तन ले लो ,घर मे खेलो।'
जिद करती रही वह,किसी ने नीचे नहीं जाने दिया।गुस्से मे गुड़िया फेंक दी खिलौने बिखेर दिये और रोने बैठ गई।
पिता ने पूछा ,'क्यों रुला रही हो उसे ?खेल आती जरा देर।'
'ज़िद पूरी कर-कर के सिर चढ़ाना है क्या ?ऐसी ही अड़ियल बनी रही तो कहीं निभाव नहीं होनेवाला।'
फिर स्कूल मे पढ़नेवाली अपर्णा! डिबेट मे पुरस्कार जीतनेवाली,क्लास सबसे अधिक नंबर लानेवाली -अपर्णा !टीचर कहती अपर्णा जैसी लड़कियाँ आगे चल कर जरूर कुछ कर दिखाती हैं।
साथिने ईर्ष्या से देखतीं ,उससे पूछतीं ,' अपर्णा ,तू डाक्टर बनेगी या कलक्टर ?हमे भूल तो नहीं जायेगी? '
और खूब पढ़-लिख कर कुछ कर दिखाने के स्वप्नो मे डूब-डूब जाती अपर्णा । मन ही-मन योजनाएँ बनाती ,ये विषय लेने हैं ,ख़ूब आगे बढ़ना है!
होम साइन्स का तो नाम सुनकर हँसी आती अपू को । उसने देखा है कैसे परीक्षायें होती हैं।स्टोव,कड़ाही,बर्तन लाद-लाद कर लड़कियाँ कुकिंग की परीक्षा देने आती हैं।अपू भी पहुँची थी,अपनी सहेली की बड़ी बहन के साथ ! सामान उठवाने,पानी लाकर देने ,रखवाली करने और इधर-उधर के कामो के लिये छोटी बहिनो का उपयोग ,और किसी-किसी के तो भाई भी साइकिल लिये बाहर खड़े रहते कि कोई ज़रूरत हो त झट् बाज़ार से खरीद कर ला दें।
हुँह,ऐसी होती है परीक्षा ? घर से सारा सामान तैयार करा के ले आईं औऱ गर्म करके सजा दिया; लूट लिये नम्बर !हँसी उड़ाते हुये कहती वह ,'खाना बनाने को घर ही काफ़ी नहीं क्या ?अब स्कूल मे भी यह सब चलेगा !'
'हमारी क्लास मे जाओगी तो तुम्हे भी यही सब करना पड़ेगा।'
' मै लूँगी ही नहीं ऐसा विषय ।'
'फिर सीखोगी कैसे ?'
' सीखूँगी ! हूँह ...यहाँ सीखा किसने है ?सब तो घर से तैयार करवा लिया।ये सिलाई-कढाई भी कौन अपनी बनाई हुई है! दूसरों से बनवा कर नमूने टांक दिये कापी मे ..और किसी-किसी की तो कॉपी भी माँगे की हैं ।मुझे नहीं करना यह सब।'
और घर पर घोषणा कर दी उसने ,मुझे होमसाइन्स नहीं साइन्स लेनी है.।
'अरे साइन्स किस काम आयेगी तुम्हारे ?आगे तो होमसाइन्स ही काम देगी ।'
' मेरे तो अंग्रेज़ी और गणित में सबसे बढ़िया नम्बर आये हैं।आगे कुछ करने के लिये...।'
'आगे करने के लिये ?कौन तुम्हें लाट-गवर्नर बनना है!घर-गिरस्थी मे सब भूल जाओगी।'
अपू के सारे तर्क बेकार गये ।वहाँ कोई सुनने - समझनेवाला नहीं था।हफ़्ते भर का विरोध प्रदर्शन भी काम न आया और हार कर होमसाइन्स लेकर अपू पिछले साल की लड़कियों की कापियाँ लाकर नकल उतारती रही।
सच मे आज वह सब भूल गई है।
समझ मे नहीं आता सुख किसे कहते हैं , दुख किसे । मन क्या होता है ? क्या बनना चाहती थी बिल्कुल याद नहीं रहा?सब विस्मृत हो गया हो जैसे !
***
ललिता आकर पास बैठ गई ।
वह क्या बोल रही है अपू की समझ मे नहीं आ रहा। कभी हाँ कर देती है कभी हूँ।शब्द कानो से टकरा कर लौट जाते हैं।भीतर-भीतर क्या कुछ हो रहा है,यह भी समझ नहीं पा रही।लगता है कोई दनादन घूँसे लगा रहा है - सीधे कलेजे पर।भीतर से मरोर सी उठ रही है।
पता नहीं ललिता कब चली गई।सुशील बैठा है पास मे।
'भाभी, आज शीतल आया था ।याद कर रहा था ,तुम्हे।'
शीतल -सुशील का दोस्त!अपू की बनाई कचौड़ियाँ बहुत पसन्द हैं उसे। बिना भाभी के हाथ की कचौड़ियों के इन लोगों को पिकनिक मे ज़रा मजा नहीं आता।और फिर घर पर चाय-नाशते के साथ चलता है प्रशंसा का दौर!
'मेरे दोस्त कहते हैं भाभी हो तो अपू भाभी जैसी।इतना ध्यान तो उनकी अपनी भाभियाँ नहीं रखतीं ।'
सगा तो अपू को शोभना की सहेलियाँ भी सबसे ज्यादा मानती हैं । उन्हे ज़रा सी भी ज़रूरत हो अपू के पास दौड़ी चली आती हैं।कहती हैं,'शोभना ,तू कितनी सौभाग्यशाली है ,ऐसी प्यारी,हमेशा मदद को तैयार भाभी है तेरी।'
अपू के मन मे सन्देह सिर उठाने लगते हैं - अगर कभी वह उनकी फ़र्माइशें पूरी न कर पाई तो ? तो ये सारा प्यार-प्रशंसा ताश के पत्तों की तरह ....आगे सोच नहीं पाती वह । बस तारीफ़ के रास्ते पर चलती जाती है-चलती जाती है।न चलने पर आलोचना होगी ,शिकायतें होंगी, तिरस्कार होगा ,कटुता बढ़ेगी और जीना मुश्किल हो जायेगा।बड़ी बहू बन कर आई इस घर मे, सबको अपेक्षायें थीं और वह अकेली १ घबरा गई थी पहले तो । प्रबोध किसी बात मे कभी बोलते नहीं ,अपने काम से काम !
पर यह सब पहले की बातें है ,उन पर भी सोच-विचार नहीं कर रही अपू ,बस गुमसुम लेटी है।
' पापा , माँ को क्या अच्छा लगता है ?'
'मुझे नहीं पता ,रुचि ,'अख़बार तहाते हुए प्रबोध ने कहा ।
'आपको कुछ भी नहीं पता ?'
अख़बार मेज़ पर रख दिया उन्होने , कुछ क्षण चुप रहे फिर बोले , ' उसने मुझे कभी कुछ नहीं बताया ।'
' उन्हें तो सब पता है , आपको क्या अच्छा लगता है ,और किसे क्या अच्छा लगता है।'
'तुम्हारी मम्मी ने अपने मन की कोई बात मुझे आज तक नहीं बताई।'
' वे तो हम सबका मन बिना बताये ही समझ लेती हैं।'
कुछ देर खड़ी रह कर रुचि निराश लौट गई । कमरे के दरवाज़े पर कार्तिक उदास खड़ा है।रुचि को आते देख बोला ',जिज्जी ,माँ को क्या होगया? उनका कोई ध्यान नहीं रखता।'
आवाज़ से लगता है अभी रो पड़ेगा । रुचि से एकदम कुछ बोलते नहीं बना ।
फिर कुछ सोचती सी बुदबुदाई,' किसी को क्या पड़ी है ? जब अपने आप कोई अपने लिये न सोचे तो दूसरा क्यों सोचे? मैने माँ से कित्ती बार कहा ,वे सुनती ही नहीं । देखूँ ,क्या कर रही हैं...।'
रुचि कमरे मे घुस गई। अपू सीधी लेटी छत को ताक रही थी।रुचि पलँग की पट्टी पर ठोड़ी टिका कर ज़मीन पर बैठ गई,एक हाथ मे अपू का हाथ पकड़ लिया , 'मोँ,तुम्हारी तबीयत कैसी है ?'
कोई उत्तर नहीं।
'ठीक है मत बोलो ।हमारी बात सुननेवाला हई कौन ? सबको अपनी-अपनी पड़ी है।भैया- हम दोनो फ़ालतू हैं इस घर मे ।'
रुचि को रोना आ रहा है।उसे लगा माँ ने उसका हाथ थाम लिया है , वह और पास खिसक आई।अपू के हाथ पर सिर टिका दिया उसने ।
'सब चाहते हैं हम उनके मन से चलें , और तुम कुछ बोलोगी नहीं...' रुचि चुपचाप रो रही है ,सिर टिकाये ।
अपू का हाथ उसके सिर पर आ गया ।
' घर मे बड़ी होकर अपने लिये नहीं बोलतीं तो हमारे लिये क्या बोलोगी.. ?.'
अपू रुचि की तरफ़ देख रही है - उसे लग रहा है,रुचि नहीं स्वयं अपू पलँग की पट्टी से सिर टिकाये रो रही है।अभी तक ऐसा नहीं लगा था उसे ।
रुचि का स्वभाव बहुत भिन्न है-वह धीरे नही बोलती,गुस्साती है तो चार कमरों तक आवाज़ जाती है।दादी टोकती हैं तो कहती है,'यह घर है या कैदखाना , अपनी बात भी नहीं कह सकते हम ?'
अभी तक अपू को लगता था एक छोर वह स्वयं है,,दूसरा रुचि । बोल-चाल स्वभाव मे बिल्कुल भिन्न ! आज लग रहा है सिक्का एक ही है - एक तरफ़ ऱुचि ,दूसरी तरफ़ वह!अलगाव कहीं है ही नहीं।रुचि के बहाने स्वयं को पहचान रही है वह !
अपू का हाथ रुचि के सिर पर थपकी-सी दे रहा है।माँ का प्यार पाने की आशा मे कार्तिक भी आ कर पलँग पर बैठ गया,अपू की गोद मे झुक आया और उसका दूसरा हाथ उठाकर अपने सिर पर रख लिया।
अपू के चेहरे पर शान्ति-सी छा गई।
***
'माँ,देखो क्या लाई हूँ तुम्हारे लिये...!'
अपू के पास बैठ कर पैकेट खोल दिया रुचि ने ,' देखो माँ ,कैसी है यह ?'
सुआपंखी साड़ी,ज़री का बॉर्डर और बूटियाँ !
'तुम्हारीवाली साड़ी बदलवा लाई हूँ मै ,यह तुम्हारे ऊपर ज्यादा अच्छी लगेगी।'
निर्निमेष देखे जा रही है अपू । मन की किस तह मे छिपी पड़ी थी यह इच्छा ? बचपन की गोटेवाली हरी चुन्नी, स्मृति मे लहरा गई। अपू ने हल्के से सिर हिलाया - स्वीकृति मे ।
रुचि ने साड़ी खोल कर फैलाई और ज़रीवाला पल्ला माँ के सिर पर उढ़ा दिया ।
'देखो न, कितनी सुन्दर लग रही है १'
अपू की आँखों मे सितारे झिलमिला उठे ,जिसे मै खुद भूल-बिसर गई, इसने कैसे जाना ?
प्रबोध रुचि को आवाज़ देते कमरे मे आये हैं।
' रुचि बेटे,तुम यहाँ हो ?दादी को बुरा लग रहा है तुमने उनसे क्या कह दिया ?'
'आप तो पापा , हर बात मे कह देते हैं दादी से पूछ लो । उन्हे कुछ पता भी है ? दुनिया की सारी लड़कियां स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन रही हैं । बेवकूफ़ बनने को एक मै ही रह गई हूँ ?'
रुचि की आवाज.ऊँची हो गई है।
ललिता अपनी सफ़ाई देने आगई ,' मुझे क्या पता था ज़रा-सी बात पर अम्माँजी हल्ला मचा देंगी। रुचि का मन था मै खरीद लाई।'
वह जाकर अपू के पास बैठ गई,' अम्माँजी को तो हर बात बुरी लगती है।उनका बस चले तो,अभी से इसे साड़ी पहना दें...।'
प्रबोध उलझन मे पड़े हैं,'उधर अम्माँ नाराज़ हो रही हैं।
' ललिता ,तुम पहले उनसे पूछ लेतीं । '
जेठ के सामने कुछ नहीं बोलती ललिता।उसने सिर्फ़ रुचि की ओर दृष्टि डाली,फिर अपू को देखने लगी।
'तुम्हे लगता है अपने मन का कर लेने से बड़ी हिंसा हो जयेगी ,क्यों माँ ?स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
उसी समय अम्माँ जी ने कमरे मे पैर रखा ,' सोचा, देख आऊँ बड़ी बहू को..क्या हो गया है?....यहाँ तो पंचायत जुड़ी है।'
प्रबोध बाहर चले गये,ललिता ने खिसक कर अम्माँ के लिये जगह बना दी।
'मै पूछ रही हूँ ,मेरे स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
'सो बात नहीं है ,बिटिया,..ज़माना बड़ा खराब है । तुम समझती नहीं हो।'
'ज़माना सिर्फ़ मेरे लिये ख़राब है ?'
ललिता ने रुचि को चुप रहने का इशारा किया।
'अम्माँ जी , इतनी बड़ी-बड़ी लड़कियाँ स्कर्ट-ब्लाउज़ पहनती हैं आजकल।रुचि तो अभी छोटी है।'
' छोटी है १इत्ते बड़े पे हमारी शादी होगई थी।'
'दादी तुम अपनी लेकर बैठ जाती हो । अब ज़माना बदल गया है।अच्छा माँ , तुम बताओ। ये पहनना तुम्हे बुरा लगता है?'
' मुझे क्यों बुरा लगेगा ?'
अम्माँ ने ताज्जुब से बड़ी बहू को देखा। बड़ी बहू ने उन्हें प्रश्न भरी दृष्टि से देखा,' वह कोई दुनिया से निराली तो नहीं है !'
ललिता का चेहरा हँसी से भरा है।
अम्माँ कुछ तेज पड़ीं.' हमे क्या ! अधनँग नचाओ, तुम्हारी बिटिया है । हम होते कौन है ?'
बोलते-बोलते उन्हे लगा तीन जोड़ी आँखें उन्हे विचित्र निगाहों से देख रही हैं।उनका सुर फ़ौरन बदल गया, ' पहनो ,बिटिया पहनो । हमे लगा सो कह दिया । अरे, हमे का पता दुनिया मे क्या हो रहा है।और तुम्हारी उमर ही क्या है अभी।'
उसके बाद रुचि को किसी ने नहीं टोका। सब चुप हो गये।
चुप्पी और सहमति एक दूसरे से बहुत दूर नहीं होतीं।
अपू को लगा उसके भीतर एक नई अपू करवट ले रही है।
अम्माँ को शिकायत है इतने दिन हो गये छोटी बहू को आये इस घर मे!अभी यहाँ के ढर्रे पर नहीं आई। कभी चटनी मे लहसुन डाल देती है कभी दाल मे करी पत्ता १अब तक नहीं समझ पाई किस चीज़ मे यहाँ क्या पड़ता है।अरे, पता नहीं तो पूछ तो सकती है !
छोटी का कहना है - ' उसी ढर्रे पर चलते-चलते ऊब नहीं लगती ।मैने तो चेन्ज के लिये किया था !'
जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुये आये और सामने-सामने बोलने लगीं - सास के असन्तोष का पार नहीं । ये अपने आगे किसी को नहीं गिनेगी ! एक हमारी बड़ी बहू को देखो,मजाल है बिना पूछे कुछ भी करे!सत्रह साल हो गये ब्याह को -कभी जो अपने मन की की हो!ऐसा ढाला है अपने आप को कि बस पानी ! जिधर चाहो ढलका दो,कभी चूँ तक नही। हरेक के लिये करने को हमेशा तैयार ! और एक ये आई हैं...! पर सुशील के सांमने कुछ कह नहीं पातीं।जानती हैं अपने मन से ब्याह किया है,उससे कुछ कहने से पहले दस बार सोचेगा । ललिता का घूमना-फिरना ,हँसना-बोलना भी उन्हें सुहाता नहीं । लेकिन कहने से क्या फ़ायदा ? अपनी इज़्ज़त अपने हाथ - न मुँह बाओ न उत्तर पाओ।
रुचि का रिज़ल्ट आ गया है । बड़े अच्छे नंबरों से पास हुई है ! वह साइन्स -मैथ्स लेना चाहती है।
अम्माँ पूछती हैं इन्टर के बाद क्या लड़कों के स्कूल मे पढेगी?
प्रबोध को भी लगता है,यह विषय लड़कियों के कॉलेज मे तो हैं नहीं,रुचि को समझा रहे हैं। वह ज़िद पर अड़ी हुई है,'मुझे पास कर के सिर्फ़ घर पर नहीं बैठ जाना है।आगे कॉम्पटीशन मे बैठना है।'
'लेकिन ,बेटे ,ज़रा सोचो तो,इन्टर के बाद...।'
'मै ने सब सोच लिया है पापा,पहले इन्टर का एक्ज़ाम तो दे लूं।आगे का रास्ता फिर देखा जायेगा ।'
उनका कोई तर्क रुचि के गले से नहीं उतर रहा । अपू चुपचाप सुने जा रही है।
प्रबोध झल्ला उठे ,' तो,अपने ही मन का करोगी तुम ?अपू तुम क्यों नही समझातीं उसे ?'
'कोई ग़लत काम तो कर नहीं रही।पढ़ना उसे है ,अपने मन का पढ़े तो क्या हर्ज है ?'
कभी निर्णय न देनेवाली बड़ी बहू बोल रही है,प्रबोध ने आश्चर्य से देखा।
'हियर,हियर,'सुशील ने ताली बजाई , ' बिल्कुल ठीक कह रही हो भाभी ।अरे, लड़कों के कॉलेज मे पढ़ लेगी तो कौन गज़ब हो जायेगा। नहीं तो होस्टल मे रख देंगे हम अपनी बिटिया को।'
फिर किसी ने आपत्ति नहीं उठाई।किसी को नहीं लगा, लड़की उद्दंड हो रही है।
कोई एक जन भी लड़की की तरफ़ बोले तो सहारा पा जाती है.नहीं तो निपट अकेली रह जाती है वह...अपू ने सोचा। वह उठ कर बैठ गई।
'अब कैसी तबीयत है भाभी?'
' बहुत ठीक।'
रुचि बाहर निकल रही थी,अपू ने उसकी ओर देख कर कहा , ' ललिता से कहो एक कप चाय बना दे।'
अपनी ही धुन मे तेज़ी से बाहर निकल रही रुचि के कानो मे उसकी आवाज़ नहीं पहुँची । प्रबोध उठ कर चल दिए। रसोई के दरवाज़े पर जाकर बोले,' ललिता ,एक कप चाय है क्या?'
'अभी बनी जा रही है ,दादा जी आप पियेंगे?'
'नहीं ,अपू को चाहिये।'
यह कैसी नई बात !
विस्फारित नेत्रों से देख रही है ललिता!दादा जी चौके के दरवाज़ पर पत्नी के लिये चाय ले जाने को खड़े हैं ? अभी तक तो पानी का गिलास तक ख़ुद उठाते नहीं देखा था।
ट्रे लगा कर पकड़ा दी उसने।
**
सुबह-सुबह अपू को उठने से रोकते हुए प्रबोध ने कहा, ' क्या करोगी इतनी जल्दी उठ कर ?और लोग भी तो हैं।'
नये दिन की हलचल शुरू हो गई है।रसोई से ललिता ने शोभना को पुकारा। थोड़ी देर मे हाथों मे चाय की ट्रे लेकर आती हुई शोभना ने देखा रुचि पढ़ाई मे लग गई है।एक कप उसके सामनेवाली मेज़ पर रख आगे बढ़ शोभना ने अपू के कमरे का उड़का हुआ दरवाज़ा खोला और दो चाय के कप अन्दर दे कर निकल गई।
' चलो अपू , बग़ीचे मे चलकर चाय पियेंगे । '
अपू की दृष्टि मे अचरज है।
'तुम्हे पेड़ के नीचे बैठना अच्छा लगता है न।'
'तुम्हे कैसे मालूम?'
'समझने की कोशिश कर रहा हूँ।'
अम्माँ ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई ,' छोटी बहू,पूजा के बर्तन निकाल कर रख दो,महरी ही माँज देगी। अरे वह भी तो इन्सान है ,बर्तनों में क्या ?''
दो दिनो से जो चल रहा था लोग उसे शुरुआत समझ रहे थे । पर रुचि जानती है वह क्लाइमेक्स थी जो बीत गई । अब सब उतार पर आ रहा है।
गृहस्थी के ढर्रे ने करवट बदली है , दो-चार दिन तो लग जायेंगे नये क्रम को सहज गति पकड़ने मे ।
बरामदेवाली कुर्सी पर कोहनियाँ मेज़ पर टिकाये , हथेलियों पर ठोड़ी जमाये रुचि परम संतुष्ट भाव से बैठी है।
- प्रतिभा सक्सेना.
.
घर-भर की चिन्ता रखनेवाली,संयत ,शिष्ट ,कर्तव्यपरायण ,बड़ी बहू, आज सुबह से उठी नहीं। हमेशा मुस्तैद रहकर ,खुशी-खुशी सारे काम निपटानेवाली,अपर्णा चुपचाप लेटी हुई है ,जैसे किसी से कोई मतलब ही नहीं।
मुँह से कुछ बोलती नहीं ,बस आँखों से आँसू बह आते हैं।कमरे में लोग आ रहे हैं ,जा रहे हैं। उसे किसी का भान नहीं ।आँखें बन्द किये पड़ी है, बेख़बर!
पत्नी के माथे पर हाथ रखा प्रबोध ने , उसने हल्के से पलकें उघारीं ।
'अपू ,तुम्हें क्या हो गया है ?'
उसने आँखें बन्द कर लीं उत्तर कुछ नहीं ।
'बोलो न ।तुम्हें क्या होगया, अपू ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं मुझे नहीं मालूम ।'
विस्मित से प्रबोध उसे हिलाते हैं ,'क्या कह रही हो ?'
कैसी निगाहों से देख रही है जैसे पहचानती न हो ।
'अपू,अपू, क्या कह रही हो तुम ?'
' मुझे कुछ नहीं मालूम ,कितने लोग हैं।'
'कैसा लग रहा है तुम्हे ,अपू ओ अपू ?'
देवर सुशील कमरे मे आया ,'भैया , क्या हो गया भाभी को ?'
'कुछ समझ मे नहीं आता । बुख़ार तो नहीं है।'
'भाभी, कैसी हो ?'
'दुनिया मे कितने लोग हैं , मुझे कुछ नहीं मालूम ।'
बालों मे कंघा लगाये शोभना कमरे मे आ रही थी ,बिस्तर की ओर आते-आते उसने अपू की बात सुनी,और ज़ोर से खिलखिला उठी ।
हँसी की आवाज़ ,कमरे की उदास स्तब्धता को चीरती चली गई। दोनो भाई चौंक कर उसकी ओर देखने लगे।
'कॉलेज जाना है ,' घबराकर शोभना बाहर निकल गई।
' क्या बड़ी भाभी की तबीयत कुछ खराब है?'
छोटी बहू ,ललिता ,कटोरी से चावल नाप कर थाली मे डाल रही थी ।
उसने सिर उठाकर शोभना को देखा ,बोली ,' कल रात पिक्चर से लौट कर मै उनके कमरे मे गई थी,तब तो ठीक थीं। ' फिर मुड़कर रसोई से बाहर निकलती शोभना को आवाज़ लगाई ,' अरे,कहाँ जा रही हैं ,सुनिये तो...सब काम लेट हुए जा रहे हैं जरा ये चावल तो बीन दीजिये। '
'मुझे तो ख़ुद देर हो रही है,पता नहीं कॉलेज टाइम से पहुँच पाऊँगी कि नहीं .... अच्छा लाओ,बीन दूँ।'
बे-मन से शोभना ने चावल की थाली पकड़ ली ,हथेली से चावल समेटती बीनने का उपक्रम करने लगी। बड़ी मुश्किल है।अभी नहाना है, तैयार होना है,नाश्ता करना है और ये चावल बीनने को पकड़ा दिये! शोभना को बड़ा नागवार गुज़र रहा था।
सास आवाज़ लगा रही थीं,' अरे, बड़ी बहू कहाँ है?आज सुबह से नहीं दिखी।'
सब एक-दूसरे से पूछ रहे हैं , ' अपू को क्या हो गया/'
आज सुबह से कमरे से बाहर नहीं आई ।
रोज़ तो मुँह अँधेरे से उठकर कितना काम निपटा डालती थी ! अब तक किसी को पता ही नहीं था कि घर मे ये काम भी होते हैं।इस बेला तक नहा-धोकर माथे पर बिन्दी लगाये चौके मे लगी दिखाई देती थी।
सुशील ने ललिता से कहा ,'तुम जाकर देखो, भाभी को क्या हो गया।'
गैस पर चाय का पानी रख कर देवरानी पहुँची अपू के पास ! छूकर देखा ,' नहीं देह तो बिल्कुल नही तप रही ,'दीदी,माथे मे दर्द है ?'
अपू ने शायद सुना नहीं।
'दीदी ,कैसी तबीयत है ,कुछ बताओ न। '
उसने आँखें खोलकर नहीं देखा ।
घऱ भर मे शोर मच रहा है ,सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
सास झींक रही हैं ,'मै मरूँ चाहे जिऊँ ,परवाह किसे है ? कब से नहा कर बैठी हूँ किसी ने एक कप चाय को नहीं पूछा । ठिठुरते हाथों पूजा के बर्तन माँजे ,सामग्री जुटाई । बुढ़ापे मे किसी का आसरा नहीं...। '
ससुर को शिकायत है ,'मेरा अब कोई पुछवैया नहीं। गुसलखाने मे न गरम पानी पहुँचा न तेल!मेरा ध्यान रखनेवाला कोई नहीं इस घर मे ....।'
ऊपरवाले कमरे मे ननद शोर मचा रही है ,' मेरा सलवार-कुर्ता बिना प्रेस के पड़ा है ....अब तो इतना भी टाइम नहीं कि खुद प्रेस कर लूँ ।....अरे छोटी भाभी..।'
और छोटी भाभी ललिता,रसोई में धीरे-धीरे कुछ कर रही है। सुबह बेड-टी मिली नहीं सिर दर्द कर रहा है।दिन भर का रुटीन बिगड़ गया, सो अलग !
बरामदे मे प्रबोध परेशान- से बैठे हैं। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था । उनकी समझ मे नहीं आ रहा है क्या करें । किससे शेव का पानी मागे , कहाँ से अपने कपड़े निकालें !
सुशील ललिता पर झल्ला रहा है ,' तुम एक दिन भी सम्हाल नहीं सकतीं ?'
अपू पर इस सबकी कोई प्रतिक्रिया नहीं । जैसे कान तक कोई आवाज़ पहुँच ही न रही हो ! रुचि एकटक माँ का चेहरा ताक रही है,कार्तिक उदास दरवाज़े के पास खड़ा है।
हरेक को एक ही शिकायत है- घर में इतने लोग है,किसी को मेरा ध्यान नहीं।
हाँ, कितने लोग हैं घर मे ,पर हरेक को कुछ-न-कुछ परेशानी है । किसी का अपना काम ही नहीं हुआ दूसरे को कौन देखे ?
सब बार-बार पूछ रहे हैं ,'अपू को क्या होगया है ?','बड़ी बहू को क्या हो गया है?'
उत्तर किसी के पास नहीं कि उसे क्या हो गया।
ताज्जुब तो यह है कि अब तक किसी को ध्यान नहीं आया कि पूछे ',अपू ,तुम्हे क्या हो रहा है ?'
***
बिदा करते समय माँ ने कहा था ,'बेटी अपनी कोई इच्छा नहीं ,अपना मन कुछ नहीं होता ।वहाँ सबका मन देख कर चलना ।सबको सन्तुष्ट करने मे ही अपना सुख समझना।'
शुरू-शुरू मे बहुत मुश्किल लगा था अपू को।नई ब्याही आई थी ।नये लोग ,नया वातावरण !
सुबह से शाम तक कुछ-न-कुछ काम चलता रहता है।और जब कुछ काम नहीं होता तो सास का घुटनो का दर्द मुखर हो जाता।हर व्यक्ति अपने मन से रहना चाहता है ,और सारी सुविधायें भी । ऐसे कैसे जीवन बितायेगी जहाँ अपना मन ही खत्म हो जाये ।
इतनी चौकस बनी रही , अपू कि कभी टोके जाने की नौबत नहीं आई।गृहस्थी की मशीन चलती रही .उसी का एक पुर्ज़ा बन गई अपर्णा - ऐसा पुर्ज़ा जो मशीन के साथ चलता रहता है ,अविराम !
फिर बच्चे हुए ,रुचि और कार्तिक !पालन - पोषण अपू की जुम्मेदारी ,सास-ससुर की सेवा ,देवर-ननद का ध्यान और घर की व्यवस्था सब अपू की जिम्मेदारी -प्रबोध को हर सुविधा देना तो उसका धर्म है ही ,सबसे प्रथम कर्तव्य !
अपू न दे तो पति को पहनने को कपड़े नहीं मिलते । वह न हो तो सास की पूजा ,ससुर का स्नान भोजन न हो ! देवर कैसे चुस्त - दुरुस्त ऑफ़िस जाये,ननद कैसे कॉलेज मे पढ़े ?
सोचती है कभी,अपू कि वह कपड़े न दे तो पति बनियान पहने ऑफ़िस चले जायेंगे ? कभी-कभी सब-कुछ अपरिचित लगने लगता है उसे । बच्चे मेरे हैं ,पति मेरे हैं ,घर मेरा है - सब कुछ मेरा है ।पर मै कहाँ हूँ ?
अम्माँ ने कहा था मन कुछ नहीं । मन कुछ नहीं तो भीतर-भीतर क्या उमड़ने लगता है ?क्यों होती है इतनी अशान्ति ?कभी ऐसा क्यों लगने वगता है जैसे कोई कलेजे को मुट्टी मे भर-भर कर निचोड़ रहा हो ?बड़ा अजीब लगने लगता है अपू को! पति को,बच्चों को चुपचाप देखती रहती है ।पढ़ने की कोशिश करती रहती है, इनमे कहाँ मेरा अपनापन है?ये मुझे जानते -समझते हैं ? पहचानते हैं मुझे ?
ललिता ने कहा था ' दीदी ,तुम्हारे जैसी आदर्श नारी नहीं बन सकती मै !तुम कैसे कर पाती हो इतना सब ? इतनी ठण्ड मे मुँह- अँधेरे उठ जाती हो ,तुम्हे जाड़ा नहीं लगता ? गर्मी मे तुम घन्टों चौके मे काम करती हो -पसीने से तर-बतर ।तुम्हे कष्ट नहीं होता ?तुम्हे क्या सर्दी-गर्मी नहीं लगती ?'
' मुझे..?मैने कभी सोचा ही नहीं।और जो करना है वह तो करना ही है,सर्दी-गर्मी लगने से क्या फ़र्क पड़ेगा ?'
शरीर तो शरीर है।सर्दी मे हाथ-पाँव ठिठुरते हैं ,अँगुलियाँ सुन्न पड़ने लगती हैं: गर्मियों मे पसीने से लथपथ कपड़े चुभते हैं घमौरियाँ काटती हैं ,पर अपू के मन तक यह सब कुछ नहीं पहुँचता ।
सब काम नियमित चलते रहते हैं ,वही क्रम साल के साल ,बारहों महीने ,तीसों दिन !
देर से उठनेवाली ललिता कहती है,'तुम्हारा मन कभी नहीं करता दीदी, कि सुबह देर तक रजाई ओढ़ कर सोओ ?'
मन ?
फिर मन की बात !यह ललिता हमेशा मन की बात लेकर बैठ जाती है । कहती है जिस लड़के से मेरे पिता ने मेरी शादी तय की थी , वह मेरे मन का नहीं था।
हाँ, उसका मन मिला था अपू के देवर से ! घर मे सब ने ग़ैर जात मे शादी का विरोध किया।ख़ूब झंझट हुआ । पर इधर सुशील अड़ गया उधर ललिता ने जान देने की धमकी दी । झख मार कर दोनो परिवारों को मानना पड़ा।
बेकार मे किया इतना विरोध, झगड़ा- झंझट दोनो घरों के लोगों ने! अरे, किसी से भी शादी हो कौन फर्क पड़ता है! फिर इन्ही दोनो को कौन अंतर पड़ गया!जिन्दगी का ढर्रा तो बदल नहीं जायेगा।चाहे कोई चाहे जिससे शादी करे ! रहना जब उसी तरह है तो इस आदमी या उस औरत से क्या बनना-बिगड़ना है -अपू ने सोचा था पर कहा कुछ नहीं।
गृहस्थी की मशीन, कल शाम तक दुरुस्त थी।रात पिक्चर से आकर ललिता अपू के पास गई थी । खुशी से फूली नहीं समा रही थी । दीवाली के लक्ष्मी-पूजन के लिये सबकी साड़ियाँ आई थीं , वही लेकर आई थी ललिता ,इस कमरे मे । शोभना कहाँ पीछे रहनेवाली थी।तुरन्त हाज़िर हो गई ,पैकेट से निकाल कर चारों साड़ियाँ बिस्तर पर डाल दीं।
'देखना यह अम्माँ की है।' क्रीम कलर की साड़ी अलग हो गई।
रुचि उठा कर साड़ियाँ देखने लगी।उसके हाथ मे हरी साड़ी है-सुनहरा बॉर्डर !अपू की आँखों मे चमक आ गई निगाहें उसी साड़ी पर अटक गईं।
ललिता ने बढ़ कर हाथ मे ले ली,'यह हरीवाली तो मै लूंगी।'
शोभना ने फ़ौरन टोका ,'छोटी भाभी ,तुम्हारे लियो तरबूज़ीवाली आई है,हरी तो बड़ी भाभी की है।'
'ना,ना मुझे नहीं चाहिये तरबूज़ी।इस तरह का शेड मेरे पास है, मै तो हरी लूँगी।'
आज फिर हरा रंग हाथ से निकल गया ! आँखें बुझ-सी गईं अपू की।रुचि समझ रही है।मन-ही-खीझ रही है।सब अपनी कह लेते हैं ,माँ क्यों नहीं बोल पातीं ?कभी नहीं बोलतीं !
'यह पहन कर टीका करने जाऊँगी' मगन सी ललिता बोल रही है ,'दीदी आज पिक्चर मे बड़ा मज़ा आया।'
फिर वह अपू से पूछने लगी ,' दिन-रात घर मे रहते ऊब नहीं लगती तुम्हें ?तुम्हारा मन नहीं करता - बाहर निकलो ,घूमो , फिरो पिक्चर देखो?'
अपू चुपचाप बैठी है।
ललिता ने आकर कहा ,' खाना खाने चलो ,दीदी।'
'भूख नहीं है। '
. ' कुछ भी नहीं खाओगी क्या ?' शोभना ने पूछा था ।
' नहीं। '
बिल्कुल चुपचाप बैठी है अपू ।
मन था क्या कभी ?कब कहाँ चला गया ?खोई सी बैठी है वह।वर्तमान अतीत की गहराइयों मे डूबता जा रहा है --
आठ-नौ बरस की बच्ची है अपू ।
अम्माँ के सामने मचल रही है - धोबन की मुनिया ने जैसी गोटेदार हरी चुन्नी ओढ़ी है ,उसे भी चाहिये ।
अम्माँ समझा रही हैं,' तेरी यह लाल चुन्नी बढ़िया है ,देख मोती जैसी बूँदें चमक रही हैं।'
'नहीं वह चुन्नी अच्छी है ,मुझे तो वही चाहिये ।'
'धत् ,कैसी सस्ती सी चुन्नी है ।और गोटा भी बिल्कुल देहातियों जैसा।'
'नहीं मुझे वैसी ही चाहिये।हरी चुन्नी चाहिये। '
'अरी ,तू धोबन है क्या ?उसकी तो गन्दी है ,तेरी कितनी सुन्दर है।'
' नहीं ,यह खराब है ।यह उसे दे दो।'
रोते-रोते ज़मीन पर लोट रही है।सब समझा कर हार गये।उसे धुन लग गई है- हरी चुन्नी चाहिये गोटेवाली।बहलाये -फुसलाये किसी तरह नहीं मानती अपू। चुन्नी उठा कर ज़मीन पर फेंक दी उसने।समझाने-बहलाने से काम नहीं चला तो दो झापड़ रसीद कर दिये अम्माँ ने।
उसने खाना लहीं खाया ,रोते-रोते सो गई ।
महीनो हरी चुन्नी को भूली नहीं अपू।जब-जब बाज़ार गई उसी के लिये ललकती रही,पर वह न मिलनी थी ,न मिली!फिर वह भूल गई उसे या शायद कहना बन्द कर दिया।अम्माँ कहती हैं यह लड़की हमेशा झिंकाती है मुझे!पराये घर जाकर पता नही क्या करेगी!
भाई बड़े है और छोटी बहिन ना-समझ। अपू की हम- उम्र पड़ोस की दो लड़कियाँ हैं श्यामा और बेबी।उनके साथ खेलने अपू नीचे उतर जाती है।एक बार उतर जाये तो उसे भूख-प्यास कुछ नहीं लगती।इच्छा होती है खेलती रहे ,बस खेलती रहे!
अम्माँ ने ऊपर से झाँक कर देखा,' देखो कब की निकली है खेलने !अरी अपू ,ओ अपरना, आ ।'
श्यामा और बेबी के साथ इक्कल-दुक्कल चल रहा है ,सामने के मैदान मे खड़िया से लाइने खींची गई है।श्यामा और बेबी खड़ी हैं ,अपू एक टाँग से कूद रही है।माँ की पुकार सुनाई नहीं दे रही अपनी धुन मे मस्त है।
बेबी ने बताया ,' अपू ,तेरी अम्माँ बुला रही हैं।'
'आ रही हूँ ' अपू ने आवाज़ लगाई ,' देखो, मै अभी आ रही हूं । मेरी बारी है, तुम रुकी रहना। '
वह ऊपर दौड़ गई।
'क्या कह रही हो अम्माँ ? '
'उन्हीं लड़कियों के साथ सड़क पर खेलना रह गया है ?जुएँ भर लाओगी सिर मे फिर कौन बीनेगा ? '
'जुएँ नहीं भरूँगी । अलग-अलग खेलूँगी।'
'नहीं घर मे खेलो। वहाँ जाने की जरूरत नहीं।'
'अच्छा ,जरा-सी देर ।अपनी बारी पूरी कर दूं।'
'नीचे जाकर तो तुम सब कुछ भूल जाती हो।काफ़ी खेल लिया।अब नहीं।'
'बस अभी आ जाऊँगी।'
अपनी गुड़िया खिलौने बर्तन ले लो ,घर मे खेलो।'
जिद करती रही वह,किसी ने नीचे नहीं जाने दिया।गुस्से मे गुड़िया फेंक दी खिलौने बिखेर दिये और रोने बैठ गई।
पिता ने पूछा ,'क्यों रुला रही हो उसे ?खेल आती जरा देर।'
'ज़िद पूरी कर-कर के सिर चढ़ाना है क्या ?ऐसी ही अड़ियल बनी रही तो कहीं निभाव नहीं होनेवाला।'
फिर स्कूल मे पढ़नेवाली अपर्णा! डिबेट मे पुरस्कार जीतनेवाली,क्लास सबसे अधिक नंबर लानेवाली -अपर्णा !टीचर कहती अपर्णा जैसी लड़कियाँ आगे चल कर जरूर कुछ कर दिखाती हैं।
साथिने ईर्ष्या से देखतीं ,उससे पूछतीं ,' अपर्णा ,तू डाक्टर बनेगी या कलक्टर ?हमे भूल तो नहीं जायेगी? '
और खूब पढ़-लिख कर कुछ कर दिखाने के स्वप्नो मे डूब-डूब जाती अपर्णा । मन ही-मन योजनाएँ बनाती ,ये विषय लेने हैं ,ख़ूब आगे बढ़ना है!
होम साइन्स का तो नाम सुनकर हँसी आती अपू को । उसने देखा है कैसे परीक्षायें होती हैं।स्टोव,कड़ाही,बर्तन लाद-लाद कर लड़कियाँ कुकिंग की परीक्षा देने आती हैं।अपू भी पहुँची थी,अपनी सहेली की बड़ी बहन के साथ ! सामान उठवाने,पानी लाकर देने ,रखवाली करने और इधर-उधर के कामो के लिये छोटी बहिनो का उपयोग ,और किसी-किसी के तो भाई भी साइकिल लिये बाहर खड़े रहते कि कोई ज़रूरत हो त झट् बाज़ार से खरीद कर ला दें।
हुँह,ऐसी होती है परीक्षा ? घर से सारा सामान तैयार करा के ले आईं औऱ गर्म करके सजा दिया; लूट लिये नम्बर !हँसी उड़ाते हुये कहती वह ,'खाना बनाने को घर ही काफ़ी नहीं क्या ?अब स्कूल मे भी यह सब चलेगा !'
'हमारी क्लास मे जाओगी तो तुम्हे भी यही सब करना पड़ेगा।'
' मै लूँगी ही नहीं ऐसा विषय ।'
'फिर सीखोगी कैसे ?'
' सीखूँगी ! हूँह ...यहाँ सीखा किसने है ?सब तो घर से तैयार करवा लिया।ये सिलाई-कढाई भी कौन अपनी बनाई हुई है! दूसरों से बनवा कर नमूने टांक दिये कापी मे ..और किसी-किसी की तो कॉपी भी माँगे की हैं ।मुझे नहीं करना यह सब।'
और घर पर घोषणा कर दी उसने ,मुझे होमसाइन्स नहीं साइन्स लेनी है.।
'अरे साइन्स किस काम आयेगी तुम्हारे ?आगे तो होमसाइन्स ही काम देगी ।'
' मेरे तो अंग्रेज़ी और गणित में सबसे बढ़िया नम्बर आये हैं।आगे कुछ करने के लिये...।'
'आगे करने के लिये ?कौन तुम्हें लाट-गवर्नर बनना है!घर-गिरस्थी मे सब भूल जाओगी।'
अपू के सारे तर्क बेकार गये ।वहाँ कोई सुनने - समझनेवाला नहीं था।हफ़्ते भर का विरोध प्रदर्शन भी काम न आया और हार कर होमसाइन्स लेकर अपू पिछले साल की लड़कियों की कापियाँ लाकर नकल उतारती रही।
सच मे आज वह सब भूल गई है।
समझ मे नहीं आता सुख किसे कहते हैं , दुख किसे । मन क्या होता है ? क्या बनना चाहती थी बिल्कुल याद नहीं रहा?सब विस्मृत हो गया हो जैसे !
***
ललिता आकर पास बैठ गई ।
वह क्या बोल रही है अपू की समझ मे नहीं आ रहा। कभी हाँ कर देती है कभी हूँ।शब्द कानो से टकरा कर लौट जाते हैं।भीतर-भीतर क्या कुछ हो रहा है,यह भी समझ नहीं पा रही।लगता है कोई दनादन घूँसे लगा रहा है - सीधे कलेजे पर।भीतर से मरोर सी उठ रही है।
पता नहीं ललिता कब चली गई।सुशील बैठा है पास मे।
'भाभी, आज शीतल आया था ।याद कर रहा था ,तुम्हे।'
शीतल -सुशील का दोस्त!अपू की बनाई कचौड़ियाँ बहुत पसन्द हैं उसे। बिना भाभी के हाथ की कचौड़ियों के इन लोगों को पिकनिक मे ज़रा मजा नहीं आता।और फिर घर पर चाय-नाशते के साथ चलता है प्रशंसा का दौर!
'मेरे दोस्त कहते हैं भाभी हो तो अपू भाभी जैसी।इतना ध्यान तो उनकी अपनी भाभियाँ नहीं रखतीं ।'
सगा तो अपू को शोभना की सहेलियाँ भी सबसे ज्यादा मानती हैं । उन्हे ज़रा सी भी ज़रूरत हो अपू के पास दौड़ी चली आती हैं।कहती हैं,'शोभना ,तू कितनी सौभाग्यशाली है ,ऐसी प्यारी,हमेशा मदद को तैयार भाभी है तेरी।'
अपू के मन मे सन्देह सिर उठाने लगते हैं - अगर कभी वह उनकी फ़र्माइशें पूरी न कर पाई तो ? तो ये सारा प्यार-प्रशंसा ताश के पत्तों की तरह ....आगे सोच नहीं पाती वह । बस तारीफ़ के रास्ते पर चलती जाती है-चलती जाती है।न चलने पर आलोचना होगी ,शिकायतें होंगी, तिरस्कार होगा ,कटुता बढ़ेगी और जीना मुश्किल हो जायेगा।बड़ी बहू बन कर आई इस घर मे, सबको अपेक्षायें थीं और वह अकेली १ घबरा गई थी पहले तो । प्रबोध किसी बात मे कभी बोलते नहीं ,अपने काम से काम !
पर यह सब पहले की बातें है ,उन पर भी सोच-विचार नहीं कर रही अपू ,बस गुमसुम लेटी है।
' पापा , माँ को क्या अच्छा लगता है ?'
'मुझे नहीं पता ,रुचि ,'अख़बार तहाते हुए प्रबोध ने कहा ।
'आपको कुछ भी नहीं पता ?'
अख़बार मेज़ पर रख दिया उन्होने , कुछ क्षण चुप रहे फिर बोले , ' उसने मुझे कभी कुछ नहीं बताया ।'
' उन्हें तो सब पता है , आपको क्या अच्छा लगता है ,और किसे क्या अच्छा लगता है।'
'तुम्हारी मम्मी ने अपने मन की कोई बात मुझे आज तक नहीं बताई।'
' वे तो हम सबका मन बिना बताये ही समझ लेती हैं।'
कुछ देर खड़ी रह कर रुचि निराश लौट गई । कमरे के दरवाज़े पर कार्तिक उदास खड़ा है।रुचि को आते देख बोला ',जिज्जी ,माँ को क्या होगया? उनका कोई ध्यान नहीं रखता।'
आवाज़ से लगता है अभी रो पड़ेगा । रुचि से एकदम कुछ बोलते नहीं बना ।
फिर कुछ सोचती सी बुदबुदाई,' किसी को क्या पड़ी है ? जब अपने आप कोई अपने लिये न सोचे तो दूसरा क्यों सोचे? मैने माँ से कित्ती बार कहा ,वे सुनती ही नहीं । देखूँ ,क्या कर रही हैं...।'
रुचि कमरे मे घुस गई। अपू सीधी लेटी छत को ताक रही थी।रुचि पलँग की पट्टी पर ठोड़ी टिका कर ज़मीन पर बैठ गई,एक हाथ मे अपू का हाथ पकड़ लिया , 'मोँ,तुम्हारी तबीयत कैसी है ?'
कोई उत्तर नहीं।
'ठीक है मत बोलो ।हमारी बात सुननेवाला हई कौन ? सबको अपनी-अपनी पड़ी है।भैया- हम दोनो फ़ालतू हैं इस घर मे ।'
रुचि को रोना आ रहा है।उसे लगा माँ ने उसका हाथ थाम लिया है , वह और पास खिसक आई।अपू के हाथ पर सिर टिका दिया उसने ।
'सब चाहते हैं हम उनके मन से चलें , और तुम कुछ बोलोगी नहीं...' रुचि चुपचाप रो रही है ,सिर टिकाये ।
अपू का हाथ उसके सिर पर आ गया ।
' घर मे बड़ी होकर अपने लिये नहीं बोलतीं तो हमारे लिये क्या बोलोगी.. ?.'
अपू रुचि की तरफ़ देख रही है - उसे लग रहा है,रुचि नहीं स्वयं अपू पलँग की पट्टी से सिर टिकाये रो रही है।अभी तक ऐसा नहीं लगा था उसे ।
रुचि का स्वभाव बहुत भिन्न है-वह धीरे नही बोलती,गुस्साती है तो चार कमरों तक आवाज़ जाती है।दादी टोकती हैं तो कहती है,'यह घर है या कैदखाना , अपनी बात भी नहीं कह सकते हम ?'
अभी तक अपू को लगता था एक छोर वह स्वयं है,,दूसरा रुचि । बोल-चाल स्वभाव मे बिल्कुल भिन्न ! आज लग रहा है सिक्का एक ही है - एक तरफ़ ऱुचि ,दूसरी तरफ़ वह!अलगाव कहीं है ही नहीं।रुचि के बहाने स्वयं को पहचान रही है वह !
अपू का हाथ रुचि के सिर पर थपकी-सी दे रहा है।माँ का प्यार पाने की आशा मे कार्तिक भी आ कर पलँग पर बैठ गया,अपू की गोद मे झुक आया और उसका दूसरा हाथ उठाकर अपने सिर पर रख लिया।
अपू के चेहरे पर शान्ति-सी छा गई।
***
'माँ,देखो क्या लाई हूँ तुम्हारे लिये...!'
अपू के पास बैठ कर पैकेट खोल दिया रुचि ने ,' देखो माँ ,कैसी है यह ?'
सुआपंखी साड़ी,ज़री का बॉर्डर और बूटियाँ !
'तुम्हारीवाली साड़ी बदलवा लाई हूँ मै ,यह तुम्हारे ऊपर ज्यादा अच्छी लगेगी।'
निर्निमेष देखे जा रही है अपू । मन की किस तह मे छिपी पड़ी थी यह इच्छा ? बचपन की गोटेवाली हरी चुन्नी, स्मृति मे लहरा गई। अपू ने हल्के से सिर हिलाया - स्वीकृति मे ।
रुचि ने साड़ी खोल कर फैलाई और ज़रीवाला पल्ला माँ के सिर पर उढ़ा दिया ।
'देखो न, कितनी सुन्दर लग रही है १'
अपू की आँखों मे सितारे झिलमिला उठे ,जिसे मै खुद भूल-बिसर गई, इसने कैसे जाना ?
प्रबोध रुचि को आवाज़ देते कमरे मे आये हैं।
' रुचि बेटे,तुम यहाँ हो ?दादी को बुरा लग रहा है तुमने उनसे क्या कह दिया ?'
'आप तो पापा , हर बात मे कह देते हैं दादी से पूछ लो । उन्हे कुछ पता भी है ? दुनिया की सारी लड़कियां स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन रही हैं । बेवकूफ़ बनने को एक मै ही रह गई हूँ ?'
रुचि की आवाज.ऊँची हो गई है।
ललिता अपनी सफ़ाई देने आगई ,' मुझे क्या पता था ज़रा-सी बात पर अम्माँजी हल्ला मचा देंगी। रुचि का मन था मै खरीद लाई।'
वह जाकर अपू के पास बैठ गई,' अम्माँजी को तो हर बात बुरी लगती है।उनका बस चले तो,अभी से इसे साड़ी पहना दें...।'
प्रबोध उलझन मे पड़े हैं,'उधर अम्माँ नाराज़ हो रही हैं।
' ललिता ,तुम पहले उनसे पूछ लेतीं । '
जेठ के सामने कुछ नहीं बोलती ललिता।उसने सिर्फ़ रुचि की ओर दृष्टि डाली,फिर अपू को देखने लगी।
'तुम्हे लगता है अपने मन का कर लेने से बड़ी हिंसा हो जयेगी ,क्यों माँ ?स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
उसी समय अम्माँ जी ने कमरे मे पैर रखा ,' सोचा, देख आऊँ बड़ी बहू को..क्या हो गया है?....यहाँ तो पंचायत जुड़ी है।'
प्रबोध बाहर चले गये,ललिता ने खिसक कर अम्माँ के लिये जगह बना दी।
'मै पूछ रही हूँ ,मेरे स्कर्ट-ब्लाउज़ पहन लेने से बड़ा अनर्थ हो जायेगा ?'
'सो बात नहीं है ,बिटिया,..ज़माना बड़ा खराब है । तुम समझती नहीं हो।'
'ज़माना सिर्फ़ मेरे लिये ख़राब है ?'
ललिता ने रुचि को चुप रहने का इशारा किया।
'अम्माँ जी , इतनी बड़ी-बड़ी लड़कियाँ स्कर्ट-ब्लाउज़ पहनती हैं आजकल।रुचि तो अभी छोटी है।'
' छोटी है १इत्ते बड़े पे हमारी शादी होगई थी।'
'दादी तुम अपनी लेकर बैठ जाती हो । अब ज़माना बदल गया है।अच्छा माँ , तुम बताओ। ये पहनना तुम्हे बुरा लगता है?'
' मुझे क्यों बुरा लगेगा ?'
अम्माँ ने ताज्जुब से बड़ी बहू को देखा। बड़ी बहू ने उन्हें प्रश्न भरी दृष्टि से देखा,' वह कोई दुनिया से निराली तो नहीं है !'
ललिता का चेहरा हँसी से भरा है।
अम्माँ कुछ तेज पड़ीं.' हमे क्या ! अधनँग नचाओ, तुम्हारी बिटिया है । हम होते कौन है ?'
बोलते-बोलते उन्हे लगा तीन जोड़ी आँखें उन्हे विचित्र निगाहों से देख रही हैं।उनका सुर फ़ौरन बदल गया, ' पहनो ,बिटिया पहनो । हमे लगा सो कह दिया । अरे, हमे का पता दुनिया मे क्या हो रहा है।और तुम्हारी उमर ही क्या है अभी।'
उसके बाद रुचि को किसी ने नहीं टोका। सब चुप हो गये।
चुप्पी और सहमति एक दूसरे से बहुत दूर नहीं होतीं।
अपू को लगा उसके भीतर एक नई अपू करवट ले रही है।
अम्माँ को शिकायत है इतने दिन हो गये छोटी बहू को आये इस घर मे!अभी यहाँ के ढर्रे पर नहीं आई। कभी चटनी मे लहसुन डाल देती है कभी दाल मे करी पत्ता १अब तक नहीं समझ पाई किस चीज़ मे यहाँ क्या पड़ता है।अरे, पता नहीं तो पूछ तो सकती है !
छोटी का कहना है - ' उसी ढर्रे पर चलते-चलते ऊब नहीं लगती ।मैने तो चेन्ज के लिये किया था !'
जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुये आये और सामने-सामने बोलने लगीं - सास के असन्तोष का पार नहीं । ये अपने आगे किसी को नहीं गिनेगी ! एक हमारी बड़ी बहू को देखो,मजाल है बिना पूछे कुछ भी करे!सत्रह साल हो गये ब्याह को -कभी जो अपने मन की की हो!ऐसा ढाला है अपने आप को कि बस पानी ! जिधर चाहो ढलका दो,कभी चूँ तक नही। हरेक के लिये करने को हमेशा तैयार ! और एक ये आई हैं...! पर सुशील के सांमने कुछ कह नहीं पातीं।जानती हैं अपने मन से ब्याह किया है,उससे कुछ कहने से पहले दस बार सोचेगा । ललिता का घूमना-फिरना ,हँसना-बोलना भी उन्हें सुहाता नहीं । लेकिन कहने से क्या फ़ायदा ? अपनी इज़्ज़त अपने हाथ - न मुँह बाओ न उत्तर पाओ।
रुचि का रिज़ल्ट आ गया है । बड़े अच्छे नंबरों से पास हुई है ! वह साइन्स -मैथ्स लेना चाहती है।
अम्माँ पूछती हैं इन्टर के बाद क्या लड़कों के स्कूल मे पढेगी?
प्रबोध को भी लगता है,यह विषय लड़कियों के कॉलेज मे तो हैं नहीं,रुचि को समझा रहे हैं। वह ज़िद पर अड़ी हुई है,'मुझे पास कर के सिर्फ़ घर पर नहीं बैठ जाना है।आगे कॉम्पटीशन मे बैठना है।'
'लेकिन ,बेटे ,ज़रा सोचो तो,इन्टर के बाद...।'
'मै ने सब सोच लिया है पापा,पहले इन्टर का एक्ज़ाम तो दे लूं।आगे का रास्ता फिर देखा जायेगा ।'
उनका कोई तर्क रुचि के गले से नहीं उतर रहा । अपू चुपचाप सुने जा रही है।
प्रबोध झल्ला उठे ,' तो,अपने ही मन का करोगी तुम ?अपू तुम क्यों नही समझातीं उसे ?'
'कोई ग़लत काम तो कर नहीं रही।पढ़ना उसे है ,अपने मन का पढ़े तो क्या हर्ज है ?'
कभी निर्णय न देनेवाली बड़ी बहू बोल रही है,प्रबोध ने आश्चर्य से देखा।
'हियर,हियर,'सुशील ने ताली बजाई , ' बिल्कुल ठीक कह रही हो भाभी ।अरे, लड़कों के कॉलेज मे पढ़ लेगी तो कौन गज़ब हो जायेगा। नहीं तो होस्टल मे रख देंगे हम अपनी बिटिया को।'
फिर किसी ने आपत्ति नहीं उठाई।किसी को नहीं लगा, लड़की उद्दंड हो रही है।
कोई एक जन भी लड़की की तरफ़ बोले तो सहारा पा जाती है.नहीं तो निपट अकेली रह जाती है वह...अपू ने सोचा। वह उठ कर बैठ गई।
'अब कैसी तबीयत है भाभी?'
' बहुत ठीक।'
रुचि बाहर निकल रही थी,अपू ने उसकी ओर देख कर कहा , ' ललिता से कहो एक कप चाय बना दे।'
अपनी ही धुन मे तेज़ी से बाहर निकल रही रुचि के कानो मे उसकी आवाज़ नहीं पहुँची । प्रबोध उठ कर चल दिए। रसोई के दरवाज़े पर जाकर बोले,' ललिता ,एक कप चाय है क्या?'
'अभी बनी जा रही है ,दादा जी आप पियेंगे?'
'नहीं ,अपू को चाहिये।'
यह कैसी नई बात !
विस्फारित नेत्रों से देख रही है ललिता!दादा जी चौके के दरवाज़ पर पत्नी के लिये चाय ले जाने को खड़े हैं ? अभी तक तो पानी का गिलास तक ख़ुद उठाते नहीं देखा था।
ट्रे लगा कर पकड़ा दी उसने।
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सुबह-सुबह अपू को उठने से रोकते हुए प्रबोध ने कहा, ' क्या करोगी इतनी जल्दी उठ कर ?और लोग भी तो हैं।'
नये दिन की हलचल शुरू हो गई है।रसोई से ललिता ने शोभना को पुकारा। थोड़ी देर मे हाथों मे चाय की ट्रे लेकर आती हुई शोभना ने देखा रुचि पढ़ाई मे लग गई है।एक कप उसके सामनेवाली मेज़ पर रख आगे बढ़ शोभना ने अपू के कमरे का उड़का हुआ दरवाज़ा खोला और दो चाय के कप अन्दर दे कर निकल गई।
' चलो अपू , बग़ीचे मे चलकर चाय पियेंगे । '
अपू की दृष्टि मे अचरज है।
'तुम्हे पेड़ के नीचे बैठना अच्छा लगता है न।'
'तुम्हे कैसे मालूम?'
'समझने की कोशिश कर रहा हूँ।'
अम्माँ ने अपने कमरे से आवाज़ लगाई ,' छोटी बहू,पूजा के बर्तन निकाल कर रख दो,महरी ही माँज देगी। अरे वह भी तो इन्सान है ,बर्तनों में क्या ?''
दो दिनो से जो चल रहा था लोग उसे शुरुआत समझ रहे थे । पर रुचि जानती है वह क्लाइमेक्स थी जो बीत गई । अब सब उतार पर आ रहा है।
गृहस्थी के ढर्रे ने करवट बदली है , दो-चार दिन तो लग जायेंगे नये क्रम को सहज गति पकड़ने मे ।
बरामदेवाली कुर्सी पर कोहनियाँ मेज़ पर टिकाये , हथेलियों पर ठोड़ी जमाये रुचि परम संतुष्ट भाव से बैठी है।
- प्रतिभा सक्सेना.
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