सोमवार, 13 सितंबर 2010

निर्वासिता --

(भूमिका )
महाकाल वन,जिसके क्षेत्र ने ब्रह्मा और विष्णु दोनों को निवसित किया है .साक्षात् महाकाल स्थित हैं यहाँ .इस क्षेत्र में सृष्टि का सृजन पालन और संहार समाहित हो गया है ..इसी धरती पर बहती है क्षिप्रा नदी ,दोनों ओर गहन घोर वन और बीच से बहती कल कल निनादिनी क्षिप्रा !समुद्र तल से बहुत ऊँचा समतल क्षेत्र .जिसकी मिट्टी काली है.जैसे माँ का काजल पुँछा ,नेहभरा आँचल .मालवा की धरती ,यह पुण्य क्षेत्र ,जहाँ से प्रत्येक युग में सृष्टि का पालन -परिचालन होता है .

काल और स्थान की परिकल्पना ,हमारी स्मृति के पहुँच से भी पहले यहीं से प्रारंभ हुई !

कितना सघन वन !सूर्य की किरणें ,जिसकी घन हरीतिमा की पर्तें पार करते-करते अपनी दमक खो कर सघन श्याम हो उठती हैं .इस उज्ज्वल श्यामलता से सारा वन प्रदेश उद्भासित हो उठता है .एक दूसरे होड लगा कर ऊँचे उठते पेड .लता जाल को अपने से लिपटाये आसमान टोहते खडे रहते हैं .)और हर-हर सर-सर करती हवायें..एक विचित्र सी सुगन्ध चतुर्दिक व्याप्त रहती है..ऋतुओं के साथ साथ वन गंध परिवर्तित होती रहती है .वसन्त में आम की बौराती और महुओं की मदमाती महक के साथ वन पुष्पों कीम मह-मह गंध .चैत में जाने कौन कौन सी अनाम अनगिन वनस्पतियाँ पुष्पित हो जाती हैं और मदहोश करती महक चारों ओर छा जाती है .पशु-पक्षी जोडे बाँधने लगते हैं ,धरती पर बिछे होते हैं ढेर के ढेर पत्ते ,पाँव रखते ही बालिश्त भर नीचे धँस जाते हैं ,जैसे धरती माँ ने अपनी सन्तानों की क्रीडा के लिये,सुख-सेज बिछा दी हो .

चिट्-चिट् करती गिलहरियां एक दूसरी के पीछे भागती हैं .तोतों के झुंड के झुंड वृक्षों पर टियू-टियू कर ऐसा शोर मचाते हैं जैसे पूरा वृक्ष कलरव कर उठा हो .वानरों की कूद-फाँद और हाथियों की पुकार भरी चिंघाड .शेर की दहाड गूँजती है वन में और एक सन्नाटा सा खिंच जाता है वन में .घनी अँधेरी रातें ,आकाश में झिलमिल करते सितारे और नीचे अलस वनस्पतियों में वन्य जीवों की साँसों के स्वर में स्वर मिला कर गहरी साँसें छोडता वन .रात्रि के अन्तिम प्रहर में गहरा सन्नाटा छा जाता है,सितारे ऊँघने लगते हैंऔर साँसों का संगीत भी थम जाता है,तब काल पुरुष, भी गहरी नींद सो जाता है- कुछ क्षणों के लिये .

उत्तर में है विन्ध्याटवी .यहाँ से वहाँ तक वन्य पशुओं का मुक्त आवागमन अबाध रूप से चलता है .सरपत और झाऊ के घने वन ,घासें इतनी ऊँची कि हाथी भी चलता हुआ दिखाई न दे ..बहुत ऊँचा है विन्ध्याचल .उत्तर और दक्षिण के बीच में एक ऊँची दीवीर ,कोई पार नहीं कर पाता .विंध्याटवी की कुछ भूमियाँ असूर्यंपश्या हैं .सूरज की किरणों ने भी नहीं देखा है -ऐसी कुँआरी धरती .

महुये टपाटप टपकते हैं और नशीली हवायें इस महाकाल वन में अपनी मादक गंध लिये घुस आती हैं.लगता है विन्ध्यवासिनी महाकाल का आवाहन कर रही है'आओ,आओ.चले आओ .अपनी समाधि भंग कर दो .'काल चंचल हो उठता है .कोई अट्टहास गूँजता है और वनप्रान्त चौंक जाठता है .

बारहों मास वृक्ष फलों या फूलों से लदे रहते हैं.,कभी आम तो कभी आमलक ,कैथ .बेर ,करंज काफल ,फलों की कोई गिनती है यहाँ ?कदली वन ऊँचे विशाल जात हिलाता,हरहराता डोलता अपनी महक उँडेल देता है.कौन खायेगा इतने फल ?पक्षी खाते है गिराते हैं .वानर कूद-फाँद मचाते खों-खों करते क्ीडा करते हैं .महाकाल और मुक्त प्रकृति दोनों मिल कर इस संसृति का संचालन करते हैं .

. बरसात की रातों का बीहड अँधकार धरती पर घनी वनस्पतियाँ ,आकाश में सजल मेघजाल ,और सबको घेरता सघन वन का अँधेरा .वृक्षों के पत्तों पर अविराम वर्षा की झडी ,धरती पंकिल हो गई है ,रह रह कर मेघों की गर्जना .कौंधती बिजलियों की चमक से पूरा वन क्षणांश को प्रकाशित हो उठता है .साँप-रेंग रेंग कर वृक्षों पर चढने को प्रयत्नशील,कहीं वृक्षों से लिपटे .सीत्कार करती उन्मुक्त हवा हरहराती चलती है ,लतायें वृक्षों से विच्छिन्न हो धरती पर गिरती हैं तरुओं को को झकझोरती  हवा4एं सारे अरण्य-प्रान्त को दहला देती हैं .लगता है साक्षात् महाकाल ताण्डव करने लगे हैं .
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स्वच्छ निरभ्र आकाश !पूर्ण चन्द्र अपनी पूरी द्युति से चमक रहा है .उज्ज्वल किरणें चारों ओर बिखरी पडी हैं ..कहीं कोई हलचल नहीं .उन्चासों पवन जैसे शान्त दिशाओं के आँचल में दुबके सो रहे हों .जल स्तब्ध लहरें लेना भूल गया हो जैसे .गति हीन पवन ,मेघहीन आकाश ,सितारे भी टिमटिमाना भूल गये हैं. एकदम स्तब्ध सौंदर्य.,ऊँचे-ऊँचे वृक्ष चित्रवत् खडे हैं,धरती से आकाश को मिलाते इस चाँदनी के ज्वार में डूबे .

अकेले बैठे बैठे सीता की आँखें भर आती हैं .अनसोई ,लंबी रातों की तडपन ,वह एकाकीपन जिसे बाँटनेवाला कोई नहीं.

जीवन के प्रारंभिक क्षणों में ही जननी के स्नेह से वंचित कर शायद नियति ने यह पूर्वाभास दे दिया कि जीवन में तुम्हें कुछ नहीं मिलना है .जो नव शिशु का सहज अधिकार होता है,जीवन की अनिवार्य शर्त होती है ,वह सब मेरे लिये नकार दिया गया था .प्रारंभ से पटाक्षेप तक उसी वंचना के बीच भटकना है राम तुम्हारी विश्वास ,बहुत वल देता था ,तुमने मेरे अतिरिक्त किसी नारी को स्वीकार न करने का जो वचन भरा था .उसके लिये मैं आभारी हूं तुम्हारी .नहीं ,चिर ऋणी हूँ तुम्हारी ..तुम राजा हो .सत्कुलोत्पन्न,सत् के प्रतिष्ठापक और मर्यादाओं के रक्षक कहलाते हो .

और मैं अज्ञात् कुलोत्पन्न ,जिसे दूसरों के द्वारा पाला गया ,मेरी क्या मर्यादा है ,चिर -कलंकिता हूँ मैं .बचपन से मैं सोचा करती थी ,मेरे माता-पिता कैसे होंगे जो जन्म लेते ही त्याग दियामुझे ?कौन हूँ मैं ?क्या अपराध था मेरा ?

अब तो जिस मनस्थिति में मैं जी रही हूं उसमें सच भी सपना लगने लगा है .
मैं कभी सामान्य नहीं रह सकी .दुनियाँ में सब जैसा स्वाभाविक जीवन जीते हैं ,मेरे हिस्से में वह बिल्कुल नहीं आया .मन पर यह बोझ लिये सारा जीवन बीतेगा .जानकी हूँ मैं .राजा जनक की कन्या ,कन्या नहीं पालिता कन्या !

जन साधारण का मुँह कौन बन्द कर सकता है?वह नीच धोबीपर किसी को नीच कने का मुझे क्या अधिकार .मैं रावण -मन्दोदरी की पुत्री राक्षसी हुई मैं भी .देव योनि में नहीं हूँ मैं .

पर इन्द्र की पत्नी शची भी पुलोमा दैत्य का पुत्री है ,कितनी असुर दैत्य और दनुजों की कन्यायें देवों के कुल में ब्याही हैं .

इतना पूर्ण चंद्रमा ,दूर तक फैला गहन नील आकाश .इतनी पूर्ण ,इतनी विचित्र रात्रि आज तक कभी देखने में नहीं आई .-क्या होनेवाला है?कैसा षड्यंत्र चल रहा है यह/

सीता का मन जाने कसा कैसा हो रहा है .प्रकृति शान्त ,वनस्पतियाँ शान्त,धरित्री शान्त ,आकास शान्त सारी दिशायें स्तब्ध ,मूक .पर मेरे मन में शान्ति क्यों नहीं ?

आँधियाँ और तूफान इस वन प्रदेश में आते ही रहते हैं .सीता उनसे नहीं घबराती .घनघोर गर्जन प्रचण्ड हवायें जब पेडों को उखाडती ,अंधाधुन्ध दौडती चली आती हैं ,तब सीता निर्भय कुटिया का द्वार खोल कर है. खडी हो जाती है .मन उन्मत्त आनन्द से भर उठता है .जैसा तूफान मन में समाया है ,वैसा ही बाहर भी .दोनों में ताल-मेल बैठाने की चेष्टा करती रहती है वह .इतने लम्बे वनवास में प्रकृति की ये क्रीडायें बहुत देखी हैं.अब इनमें ऐसा कुछ नहीं जो भयभीत करे .

पर आज की रात्रि!यह पूर्ण और विलक्षण शान्ति मन को विचलित किये दे रही है.ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ .

जीवन में क्या कुछ नहीं घटा ? जन्म  की सुनी भर हैं ,पर वह सुनना ,समझना मन को गहन रिक्तता से भर जाता था .,फिर वनवास ,अपहरण ,कलंक ,परित्याग और अब यह चिर एकाकी जीवन .अब क्या शेष रह गया .?कौन सी विडंबना बाकी रह गई ?

राम ,मुझमें क्या कमी रह गई थी ,,अपना मन और तन तुम्हें सौंप दिया था मैंने ,मेरा प्रेम ,विश्वास सब व्यर्थ कर दिया तुमने .

सीता चुप बैठी है ,रात का गहरा अँधेरा .आँखों से आँसू टप टप गिरते हैं और धरती की माटी सोख लेती है .....
(उपन्यासांश)क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

  1. बरसात की रातों का बीहड अँधकार धरती पर घनी वनस्पतियाँ ,आकाश में सजल मेघजाल ,और सबको घेरता सघन वन का अँधेरा .वृक्षों के पत्तों पर अविराम वर्षा की झडी ,धरती पंकिल हो गई है ,रह रह कर मेघों की गर्जना .कौंधती बिजलियों की चमक से पूरा वन क्षणांश को प्रकाशित हो उठता है .साँप-रेंग रेंग कर वृक्षों पर चढने को प्रयत्नशील,कहीं वृक्षों से लिपटे .सीत्कार करती उन्मुक्त हवा हरहराती चलती है ,लतायें वृक्षों से विच्छिन्न हो धरती पर गिरती हैं तरुओं को को झकझोरती हवा4एं सारे अरण्य-प्रान्त को दहला देती हैं .लगता है साक्षात् महाकाल ताण्डव करने लगे हैं .

    पहले हिस्से में क्या चित्रण किया है तूफानी काली रात का.....अपने जीवन की एक ऐसी ही रात्रि याद आ गयी।
    घने घने शुष्क से वन और उनसे छन कर आती धूप...आँखों के आगे घूमते रहे.....अलग अलग वन्य प्राणियों की अजीब अजीब आवाज़ें भी आतीं रहीं.......:)

    और दूसरा हिस्सा...खून बस खौल खौल के मुझे उबालता रहा.....:(
    ''राम ,मुझमें क्या कमी रह गई थी ,,अपना मन और तन तुम्हें सौंप दिया था मैंने ,मेरा प्रेम ,विश्वास सब व्यर्थ कर दिया तुमने . .''

    जाने क्यूँ स्त्रियाँ हमेशा कमियाँ स्वयं में ही ढूंढती हैं और...ढूंढना चाहती हैं...अभी हाल में एक महिला का केस देखा.....पतिदेव १२ साल से अत्याचार कर रहे थे....देवी जी पतिव्रता बनी सहती जा रहीं थीं......जब गला दबाने कि नौबत आई तब जाकर केस किया..पुलिस में रिपोर्ट की......और २ साल तक अदालत तारीख़ पर तारीख़ ...तारीख़ पर तारीख़ देती रही.....और आज पतिदेव आ आकर मगरमच्छ के आंसू बहतें हैं...तो कहतीं हैं हमसे कि ....मैं ही अपनी गृहस्थी नहीं निभा पायी...सबके घर में झगड़े होते हैं...मैंने क्यूँ अदालत का सहारा लिया.......:/

    खैर.....आपके संवाद कि बात करते हैं.....जो मैंने चुना ऊपर....उस बात को माता सीता ऐसे भी तो याद कर सकतीं हैं ना कि......., ''स्वामी,आप कितने कानों के कच्चे या भीरु निकले जो एक धोबी के मात्र 'कह' देने भर से ही मुझे त्याग गए.....इतने वर्षों का साथ...विश्वास क्या कुछ नहीं था..??और अच्छा ही हुआ कि आपने त्याग दिया ...ऐसे पतिदेव के साथ रहकर मेरा आत्मसम्मान आहत होता रहता...यहाँ पूर्ण एकाकी जीवन में मैं अपने आत्मसम्मान के साथ खुश हूँ.....:/ ''

    मुझे याद है..रामानंद सागर वाली रामायण.......हमेशा अशोक वाटिका में दीपिका सीता का वेश धरे बैठे रोती ही रहती थी....कभी मैं समझ नहीं पायी...कि वही बातें सामान्य लहजे में भी तो कही जा सकतीं हैं.......ज़रूरी है रोना धोना..!!?और कौन देख रहा था..कि उन्होंने हर समय ही विलाप किया...ठीक है याद व्याद आ जाती होगी तो रो लेतीं होंगी.....मगर उसे थोड़े परिवर्तित कर भी दिखाया जा सकता था.....यहाँ भी पुरुष प्रधान निर्देशन हुआ.....:/

    इस विषय में फिल्म ''लज्जा'' में सीता के मेकअप में माधुरी के संवादों से मैं बहुत सहमत हूँ....:) halanki यहाँ भी Rajkumar Santoshi थे ..एक पुरुष.....dil से दाद देती हूँ आज तक....इस तरह की फिल्म banane के liye....:)

    kshama !! :( ye aapka blog है....bhool ही गयी थी.......

    waise ye upanyaas का ansh था?? tuchh buddhi pehla और दूसरा हिस्सा aapas में jod नहीं पायी....donon अलग अलग likhe hue थे...aisa भी ho सकता है.....अगर....अगर कोई link है दोनों bhaagon का..तो मैं jaanna chaahungi..:(....समय हो तो संक्षेप में bata dijiyega...

    जितना समझ में आई ये पोस्ट...:)....वहां तक के लिए बधाई !!
    जो मैंने कहा....कुछ भूल हुई हो..तो अग्रिम क्षमा !

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