बुधवार, 5 जनवरी 2011

उपन्यासांश -1.

*
प्रकृति की रचना का कितना सुन्दर दृष्य है -भाई-बहिन का जोड़ा !निर्मल हास से प्रकाशित दो अनुरूप चेहरे जिनमे कहीं कुछ आरोपित नहीं ,सहज-स्वाभाविक ।समाज ने नहीं निसर्ग ने जोडा है इन्हें।दुनिया की कुरूपताओं और विकृतियों से बेख़बर ,निश्चिन्त । माता- पिता- पुत्र,पति -पत्नी भाई-भाई सबके संबंधों पर कवियों की लेखनी चली है पर भाई-बहिन के संबंध की सहजता और सुन्दरता पर किसी कवि की उक्तियाँ याद नहीं आ रहीं तरल को ।


उस कोठी के मालिक ने पीछे की तरफ कई कोठरियाँ बनवा दी हैं ,एक मे महरी दूसरे मे माली और तीसरे मे एक रिक्शेवाला रहता है ।कोठी के मालिक और अडोस-पडोस के घरों में काम करते हैं ये लोग !नाटू रिक्शेवाला अधिकतर अकेला ही रहता है ।दिन भर रिक्शा चलाता है ,रात गये आता है तब उसकी कोठरी से खाँसने की आवाज सुनाई देती रहती है तरु को ।एकाद बार तरु को बैठा कर लाया है तब से पहचानने लगी है वह । गाँव में रह रहे अपने घर-परिवार के पास दो-तीन महीनों में चक्कर लगा आता है ।

महरी के दो बच्चे ब्रजमती और कन्हैया झिंझरीवाली ईंटों की दीवार पर चढ कर इधर ही झाँक रहे हैं ।ब्रजमती के रूखे भूरे बाल उसके साँवले-सलोने चेहरे के चारों ओर बिखरे हैं और आँखों मे काजल है-एक मे खूब गहरा ,दूसरी मे हल्का ।महरी के चारो बच्चे साँवले हैं पर सबसे अच्छी लगती है ये ब्रजमती ,खूब सुडौल नाक-नक्श और चेहरे पर भोलापन ,खूब सौम्य।तरु को देखते ही जाने क्यों काँशस हो कर झेंप जाती है और हल्के से मुस्करा देती है । पर कन्हैया उतना ही जंगली है ।चलेगा तो रास्ते के कंकडों को ठोकर मार -मार कर उछालता हुआ।साथ के लडकों से उसकी लडाई भी बहुत होती है ।अब तो किसी ठेलेवाले के साथ काम करने लगा है ,बडा चालाक हो गया है ।हमेशा कुछ-न-कुछ बोलता रहेगा । ब्रजमती तीसरे नंबर पर है ,उससे पाँच साल छोटी पर बडी शान्त। सबसे छोटी मुनिया बडी रूनी और जिद्दी है ,अक्सर ही जमीन मे लोट-लोट कर रोती रहती है ।और गोद का छोटावाला तो अभी किसी गिनती मे है ही नहीं ।

विवाह की धूमधाम ने कोठी की काया ही पलट दी है । पडोस के परिवार ने शादी के लिये उस कोठी का कुछ भाग महीने भर को किराये पर ले लिया है ।महरी यही है बिरजो की अम्माँ ।महरी की जडें भी गाँव मे ही हैं ,फसल कटने के दिनों मे महरा को छोड कर पूरा परिवार चला जाता है ।

इस कोठी की झाडियाँ रंगीन बल्बों की रोशनी मे चमक रही हैं।रंग-बिरंगी कनातें और पण्डाल ,कालीन और कुर्सियों की कतारें ,साइड मे लॉन से थोडा उधर मेजों पर खाने का प्रबंध -तीन सौ लोगों के खाने की ए-वन व्यवस्था वेज-नानवेज दोनो ।सजे सजाये बैरे ,हर मेज पर खाना गर्म रखने का पूरा इन्तजाम ।लोगों को कॉफी पहुँचाने और खाली कप बटोरने के लिये बैरे इधर उधर घूम रहे हैं ।

गेंदे और मोगरे की झालरों से मंच सजा है ,जयमाल पड चुकी है ।वधू मंच पर रखी सिंहासनाकार कुर्सी पर वर के पास बैठा दी गई है ।दोनो बहुत सज रहे हैं -सबके आकर्षण का केन्द्र।कैमरों की रोशनी बार-बार चमक उठती है ।दीवार के पार चेहरों की संख्या बढ गई है ।लोग खाने की मेजों की ओर बढ़ने लगे हैं ।मिसेज रायज़ादा ,जो मेज़बान घर की बहू हैं तरल से कह रही हैं ,'चलिये न ,खाना खा लीजिये ।"

इतने मे रायज़ादा आगे बढ आये ,' इनसे मिलिये तरल जी ,और ये हैं हमारे परम मित्र असित वर्मा ।'

दोनो के हाथ जुडते हैं ।

'आपको कहीं देखा है !'

'हाँ जरूर देखा होगा ।इसी शहर में रहती हूँ ।'तरल आगे बढ गई ।प्लेट हाथ मे उठाये किसी की पुकार सुन पीछे घूमी ,पता नहीं किसे बुलाया वह खाना परसने लगी ।

ट्रेन की घटना उसके ध्यान में फिर से आ गई ।स्लीपर मे अपनी सीट ढूँते समय अटैची किसी से टकरा गई थी । तेज सी आवाज आई -

'अभी हड्डी टूट जाती तो ..?'

'वह अचकचा कर देखने लगी ,'वेरी सॉरी !'

'हुँह, सॉरी !हमसे कुछ हो जाता तो आसमान सिर पर उठा लिया जाता ।और खुद ऐसे अंधाधुन्ध चलती हैं आगा-पीछा देखे बिना ।'

'देखिये बिगडिये मत ।ऐसा ही है आप मेरे पाँव पर अटैची पटक कर बदला ले लीजिये ,'वह रुक कर खडी हो गई ।

'जाइये,जाइये ,बस बहुत हो गया ।'

कह रहा है कहीं देखा है !देखा क्यों नहीं होगा !ट्रेन की बदमज़गी क्या इतनी जल्दी भूली जा सकती है!

'इन्तजार करेंगी तो करती ही रह जायेंगी ,आगे बढ चलिये ।'पास मे खडी एक सौम्य सी तरुणी ने तरल को आगे बढा दिया ।

'अरे असित दा ,आप यहाँ कहाँ से ?'

'सुमी तुम ?अकेली हो या वो भी हैं ?'

'आये हैं वो उधर ।'

तरु ने आगे बढ कर परसना शुरू किया ,और अपनी प्लेट लेकर साइड मे जाकर खडी हो गई ।अचानक उसकी निगाह दीवार के पार जा पडी ।एक साथ कई जोडी आँखें खाने की प्लेटों पर लगी हैं ।तरु का चम्मच पुलाव की ओर बढ रहा है ,शेरू की आँखों मे चमक आ गई है ,ब्रजमती और कन्हैया भी इधर ही देक रहे हैं । मेहमान चल फिर कर खाना खा रहे हैं बच्चों की और किसी का ध्यान नहीं है।

'अरे आप ये कोफ्ते लीजिये ,'किसी ने चमचा भर कोफ्ते उसकी प्लेट मे डाल दिये ।रसा बह-बह कह हलुये और सूखी सब्जी मे समाया जा रहा है ,घी उतराते शोरबे से सब कुछ सन गया है ।तरु को लग रहा है दीवाल पार से बच्चों की निगाहें खाने पर लगी हुई हैं ।सारी प्लेट कोफ्ते के चिकनाई भरे रसे मे डूबी है।।मुँह मे कौर रखना मुश्किल हो गया है ।

'अरे आप खाइये न।'

ढेर सा खाना सामने रखा है ,खाने की पूरी छूट है फिर बार-बार कहने की क्या जरूरत है !तरु को खीझ लग रही है पता नहीं लोग अपनी पसंद की चीजें दूसरों की प्लेटों मे क्यों भर देते हैं !

पास ही सुमी खडी है ।उसने सिर उठा कर तरु की ओर देखा ,'अपने हिसाब से अपने आप लेना अच्छा रहता है ।कोई परस न दे इसीलिये प्लेट लेकर मै दूसरी तरप खिसक गई ।"

दोनो की आँखें चार हुईं -यह कैसे मेरे मन की बात समझ गई तरल ने सोचा वह भी उसी ओर बढ गई ।

घी से तर शोरबे मे डूबी कोई चीज वह खा नहीं पायेगी ,एकाध कचौरी खाकर प्लेट को यों ही नीये रख देगी तरल ।और लोगों की प्लेटों मे भी आग्रहपूर्क जो डाला जा रहा है उसमे से भी बहुत सा वैसे ही फिंक जायेगा ,कुर्सी पर भरी प्लेटें लिये बैठे बच्चे थोडा खायेंगे और बहुत छोडेंगे ..और वे लोग दीवार के पार से देखते रहेंगे ।

'छोले मे थोडी चटनी और प्याज मिलाओ तो मजेदार लगेंगे ,दो बच्चे बातें कर रहे हैं ।दोनो उठे और अपनी-अपनी प्लेट लेकर मेज की ओर बढ गये ।दीवार के पार से आवाज आई ,'छोले हैं ,दहीबडे ,कचौडी ,पुलान...,'

'और चटनी भी ,'कन्हैया की आवाज ।

तरु को लगा उधर खडे बच्चे मुँह चला रहे हैं ।डेढ हाथ की दूरी पर दीवार के पार से शेरू ,कन्हैया ,ब्रजमती और दो और बच्चे सब देख रहे हैं ,मेज पर रखेी सामगरी ,को ,खाते हुये लोगों को ,और बर्बाद होते खाने को भी देख रहे हैं ।इस जगमगाती रोशनी मे सब साफ़ दिखायी दे रहा है ,बार-बार उनके मुँह चलने लगते हैं ।

महरी बीमार है छोटे बच्चे को लेकर कब की सो गई ।जब तरु इधर आ रही थी ,उसका छोटा बच्चा रो रहा था ब्रजमती कह रही थी ,'अम्माँ ,जे अऊर दूध माँगत है ।'

'अरे दुलाई मे दुबकाय के थपक दे ,भरक के अभै सोय जाई ।'

बडी देर तक बच्चा रिरियाता रहा था और महरी ब्रजमती को डाँट रही थी ,'धियान तो खेल मे लगा है ,नेक चुपाय नाहीं लेत है ।'



'भूखा है अम्माँ ,हमाल कपडन पे मुँह मार रहा है ।'

आग लगी है ओहिका पेट मे ।कहाँ से दूध लाई भर-भर के ?'

महरी बीमार है दूध उतरता नहीं ।बच्चा परेशान करता है तो गुस्सा उतरता है ब्रजमती पर ।

मिसेज कपूर साथ खडी महिला से कह रही हैं ,'बाबा रे बाबा ,हमारा बेटा तो मुश्किल कर देता है ।एक दिन पेपरवाला नहीं आया और ङी आसक्ड मी अ थाउजेन्ड क्वेश्चन्स ।हमें तो एक ही काफी है .वी कान्ट अफोर्ड अनदर।'

दूसरी बोली ,'बच्चे पैदा करना और पालना कोई आसान काम है ?हम तो इन दो में ही भर पाये भइया. उन्हे सम्हालते-सम्हालते रो देते हैं ।नौकर है,आया है फिर भी फुर्सत नहीं मिलती ।'

'पता नहीं लोग तीन-तीन चार-चार कैसे मैनेज कर लेते है ।'

'अरे आप ताज्जुब करेंगी ,हमारी कामवाली के छः हो चुके हैं और फिर फूली घूम रही है ,बिल्कुल तन्दुरुस्त।'

'लाइक वाइल्ड ग्रोथ ।,'मिसेज कपूर के शब्द थे ,'इन लोगों के हो भी जाते हैं पल भी जाते हैं ।नखाने को ,न पहनने को जाडे मे नंगे घूमते हैं ,फिर भी बीमार नहीं पडते ।' 'अरे कुछ पूछो मत ।हर साल एक पैदा कर के भी जस की तस धरी रहती हैं ।यहाँ तो पैदा करना मुश्किल और पालना तो और भी ..कुछ पूछो मत ।'

'यहाँ तो एक पैदा करके ही ढोलक सा पेट हो गया ,हुआ भी ऑपरेशन से ।अपनी तो अब हिम्मत नहीं ।'

मिसेज कपूर ने तीस की हो जाने के बाद शादी की है ।एक ही लडका वह भी सिजेरियन से ,बोलीं ,'हमे तो एक ही पालना मुश्किल है लोग जाने कैसे एफोर्ड कर लेते हैं ।आई वंडर ङऊ डू दे मैनेज ।'

'और बडी आसानी से इनके पैदा भी हो जाते हैं ,न तकलीफ़ ,न कोई खर्चा !बाबा रे बाबा, हमें तो देख कर ताज्जुब लगता है ।एक ही कुठरिया उसी मे बच्चे पैदा होते हैं ,,मरते हैं ,पलते हैं ।जिन्दगी के सारे काम उसी जगह मे ।ङऊ हॉरिबल!'वे सिर हिला कर काँपने का अभिनय करती हैं ।

यहाँ जितनी भी औरतें हैं उनने बच्चा पैदा करने में बडी तकलीफें उठाई हैं ।वैसे सब सुविधायें हैं उनके पास,नौकर ,वाहन ,बँगला ,फ्रिज .टीवी ।और ये महरी मालिन जो पैदा करनेऔर पालने मे माहिर हो गई हैं ,इनके अपने आप पैदा होते हैं ,बडे हो जाते हैं जैसे उन्हें किसी चीज कीअपेक्षा नहीं ।इतनी आसानी से जन्मते हैं जैसे धरती की कोख से अँकुर ।
*

2 टिप्‍पणियां:

  1. ''और ये महरी मालिन जो पैदा करनेऔर पालने मे माहिर हो गई हैं ,इनके अपने आप पैदा होते हैं ,बडे हो जाते हैं जैसे उन्हें किसी चीज कीअपेक्षा नहीं ...''

    ..यहाँ मेहरी और मालिन जिस स्त्री समूह का प्रतिनिधित्व कर रहीं हैं ...उनकी bebasi और ''अपने आप पैदा हो जाने वाले बच्चों की संख्या'' के पीछे की वजहें एक एक कर आँखों के आगे घूम गयीं......
    वैसे यथार्थ यही है..कि ये भी चाहें तो इन कारणों को समूल नष्ट कर सकतीं हैं.....मगर...उसके लिए चाहना पड़ेगा...लीक से हटकर एक उदारहण बनना पड़ेगा... ....हम्म विषय से मैं भटक गयी...मुआफ कीजियेगा...लिखते लिखते क्रोधित हो उठी थी...:(

    'इस जगमगाती रोशनी मे सब साफ़ दिखायी दे रहा है ,बार-बार उनके मुँह चलने लगते हैं '

    'भूखा है अम्माँ ,हमाल कपडन पे मुँह मार रहा है ।'

    ...बच्चे कितनी आसानी से इतनी बड़ी समस्या कह गए ...आज ही देखा था..घर में चाउमीन न बनाकर जगह चावल तल दिए गए थे तो मौसी के एकलौते १२ साल के बेटे को बहुत गुस्सा होते हुए...और ये कहते हुए...''मम्मी आप ऐसा क्यूँ करतीं हैं....अब मैं नहीं खा सकता कुछ...'' और घंटे भर तक इस समस्या पर बहस चलती रही माँ और बेटे में।कोई भी समस्या/या दुःख बनाने से बड़ा बन जाता है....अन्यथा आप हर तरह से जी सकते हैं बिना अपेक्षाओं के।



    khair...

    ''इतनी आसानी से जन्मते हैं जैसे धरती की कोख से अँकुर''

    ये तो...एकदम सच है...सिर्फ बच्चों की बात करें तो जैसे जैसे बैंक में पैसे बढ़ते जाते हैं....इंसान उतना ही नाज़ुक होता जाता है......शायद प्रकृति भी जानती है...कि कहाँ किसके हौसले आज़माने हैं....जैसे ये बात मेडिकल साईंस भी मानती है...लड़कियां प्रकृति से ही मज़बूत होतीं हैं...जी ही जातीं हैं...जन्मदायिनी कि उपेक्षा के बाद भी....और बेटों को आप मेडिकल कॉलेज भी refer कर दें...वे आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बावजूद अंत तक साँसों के लिए संघर्ष करते ही रहते हैं।
    बहुत देखा है के अगर आपके पास पैसा है...तो सामान्य रूप से होने वाली डिलिवरी भी आपको खटकती है..आप दस बार डॉक्टर से पूछते हैं....सब नोर्मल है ना...ऑपरेशन कि ज़रुरत तो नहीं आदि आदि।

    दूसरी बात....बहुत देर तो ख़ुशी सँभालने में ही लग गयी...:D...आपकी कहानी की नायिका का नाम तरु है...हमेशा से चाहती थी..अपना नाम भी कहीं देखूं इस तरह से...:) और उससे भी बड़ी अचरज की बात कि....उसकी भावनाएं भी एकदम मेरे जैसीं हीं हैं।

    आप सोच रहीं होंगी कि इतनी simple सी कहानी पर इतना क्यूँ लिख रही हूँ..?? :)
    अपने नाम की वजह से,रोज़मर्रा इस तरह के cases देखने और अपने पसंदीदा विषय के कारण बहुत सीधी सादी सी आपकी कहानी मेरे लिए ख़ास बन गयी थी।

    :)


    ''शुक्रिया''

    उत्तर देंहटाएं
  2. इतना बारीक वर्णन!!
    कभी किसी बंगाली उपन्यास में पढ़ा था कोई ४ साल पहले।
    जैसे प्लेटें, खाने के पकवान, बच्चों की आँखें सब जीवन हो उठीं हों, दृश्य-दर-दृश्य।
    तरल, यह नाम बहुत अच्छा लगा। बहुत अलग।
    अब तरल, तरु (वैसे एक ऊपर है), असित नाम कम ही आत़े हैं सुनने में, तो बहुत भले लगे।
    ऐसे मनोभाव, ऐसा चित्रण, ऐसा साहित्यिक शिल्प नहीं मिलता पढने को आसानी से अब।
    और प्रथम अनुच्छेद के सौंदर्य के लिए विशेष आभार!

    पहले पहला अंश पढना था, अब दूसरा पढूँगा... और की प्रतीक्षा रहेगी।

    उत्तर देंहटाएं